शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2020

कितना प्रामाणिक है सोशलमीडिया !

 


आजकल देश और समाज में चहुंओर सोशलमीडिया का चलन बढ़ता ही जा रहा है। केवल युवा ही नहीं हर वर्ग में इसकी गहरी पैठ स्पष्ट दिखाई दे रही है। देश व समाज में सोशलमीडिया का प्रयोग सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार से बखूबी किया जा रहा है। अब यह उपयोग करने वाले की मानसिकता पर निर्भर है कि वह किस प्रकार इस मंच का प्रयोग करता है। कोई किसी बुज़ुर्ग दम्पति की मदद करने हेतु उनके बहते अश्रु पोंछने के लिए उनकी छोटी सी खाने की दुकान का वीडियो बनाकर सोशलमीडिया पर साझा कर रातों-रात उनका संकटमोचक बन जाता है तो कोई इस माध्यम का प्रयोग समाज में अराजकता फ़ैलाने के लिए अफ़वाह के रूप में भी कर सकता है। धर्म जगत भी सोशलमीडिया के प्रभावों से अछूता नहीं है। आज इस माध्यम से समाज में अनेकों ऐसे तथ्य प्रचारित-प्रसारित किए जा रहे हैं जिनका वास्तविकता से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है या उनकी मूल भावना प्रचारित संदेशों से भिन्न है। ऐसा ही एक वीडियो आज ध्यानार्थ आया जिसमें हथिया नक्षत्र को लेकर एक वीडियो प्रसारित किया गया और इसके सत्य होने का दावा किया गया है। इसमें बताया गया कि "हथिया नक्षत्र जब आता है तो बादल हाथी की सूंड की तरह तालाबों और नदियों से पानी खींचता है।" इससे सम्बन्धित घटना का वीडियो भी प्रसारित किया गया है। जिसमें एक जलाशय से पानी बादल की ओर वाष्पीभूत होते दिखाया भी जा रहा है। अब बात करें इसकी सच्चाई और प्रामाणिकता की तो वह मैं अपने सुधि पाठकों पर छोड़ता हूं किन्तु उन्हें किसी निर्णय पर पहुंचने में सहायतार्थ कुछ कसौटियां अवश्य दे देना चाहता हूं जिसके आधार पर वे इस वीडियो की सच्चाई और प्रामाणिकता की पुष्टि स्वयं कर सकेंगे। पहली बात तो मुहूर्त्त व ज्योतिष शास्त्र के समस्त 27 नक्षत्रों (मतान्तर से अभिजित सहित 28) में "हथिया" नामक कोई नक्षत्र नहीं है। प्रत्येक नक्षत्र में 13 अंश 20 कला होते हैं। एक राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र 4 चरण होते हैं जिनका मान 3 अंश 20 कला होता है। अब यदि देशज भाषा अनुसार "हथिया" नक्षत्र का साम्य ज्योतिष शास्त्र में खोजें तो वह हमें "हस्त" नक्षत्र में मिलता है क्योंकि "हस्त" नक्षत्र का उल्लेख हमें शास्त्रों में मिलता है। देश के कई भागों मुख्यत: ग्रामीण क्षेत्रों में वैदिक शास्त्रों के सिद्धान्तों के आधार पर देशज व लोकोक्तिनुमा कुछ सूत्र बना लिए जाते हैं जैसे "चित्रा स्वाति विशाखा में मेघ गाज गरिरंग। सुख सुभिक्ष की धारणा, निर्णय शकुन प्रसंग॥ इस सूत्र में बताया गया है कि जब चित्रा,स्वाति,विशाखा नक्षत्र में बादलों की गर्जना के साथ बिजली चमकती है तो यह सुख अर्थात् अच्छी वर्षा का संकेत होता है। दूसरा उदाहरण देखें- "श्रीगणेश आर्द्रा रवि मेघ गाज अधिरंग। निर्णय शकुन शास्त्र का भावी समय कुरंग॥ इस सूत्रानुसार जब सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में हो और मेघ की गर्जना के साथ बिजली चमके तो यह आपदा का संकेत होता है। इसी प्रकार इस प्रचलित वीडियो के साथ जो तथ्य बताया जा रहा वह भी इसी प्रकार के किसी सूत्र का फ़लित है जिसका आशय इस प्रकार प्रतीत हो रहा है कि "हस्त नक्षत्र में भीषण गर्मी के कारण जलाशयों का जल वाष्पीभूत होगा।" यहां तक तो ठीक किन्तु जो घटना इसके साथ वीडियो के माध्यम से प्रचारित की जा रही है उसकी प्रामाणिकता की बात करें तो "हस्त" जिसे हथिया बताया जा रहा है वह तो 5 मई, 1 जून, 29 जून, 26 जुलाई, 22 अगस्त, 16 अक्टूबर इन सभी दिनों में था। शास्त्रोक्त नियम सार्वभौम होते हैं जैसे अग्नि सभी को एक जैसा ताप देती है, जल की आद्रता सभी को एक जैसा प्रभावित करती है। सूर्योदय, सूर्यास्त, ग्रहण का समय पंचांग के अनुसार पूरे देश में समान रूप से लागू होता है। यदि इस सूत्र के साथ हुई घटना को सत्य मानें तो यह परिणति देश के सभी जलाशयों पर एक समान रूप से लागू होनी चाहिए थी, जो कि नहीं हुई। हस्त नक्षत्र का प्रभाव तो पूरे देश में समान रूप से हुआ है पर यह तथाकथित घटना एक विशेष क्षेत्र को छोड़कर किसी अन्य राज्य के किसी भी क्षेत्र में दिखाई नहीं दी। अब इसी प्रकार की बातों को आधार बनाकर कई तर्कशास्त्री हमारे धर्म पर प्रश्नचिन्ह लगाने में सफल हो जाते हैं। मेरे देखे अपने निजी हित के लिए शास्त्रों के प्रामाणिक तथ्यों को इस प्रकार से प्रस्तुत करना सर्वथा अनुचित है। अत: पाठकगण सोशलमीडिया पर निरन्तर प्रचलित हो रहे इस प्रकार के समस्त संदेशों की प्रामाणिकता के प्रति अपने विवेक के आधार पर निर्णय करें।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

बुधवार, 19 अगस्त 2020

गणेश स्थापना की सम्पूर्ण “सरल पूजन विधि”-



गणेश उत्सव हमारे देश का महत्त्वपूर्ण उत्सव है। इस वर्ष गणेश चतुर्थी 22 अगस्त दिन शनिवार को रहेगी। इस दिन घर-घर में गणेशजी की पूजन व स्थापना होगी। आज जब "कोरोना" महामारी के चलते आवागमन प्रतिबन्धित है तब हम "सरल-चेतना" के पाठकों के लिए लाए हैं गणेश स्थापना की सम्पूर्ण सरल पूजन विधि जिससे वे अपने घर में स्वयं गणेशजी का विधिवत पूजन व स्थापना कर सकते हैं।

पूजन सामग्री- गणेश जी की प्रतिमा (मिट्टी,स्वर्ण,रजत,पीतल,पारद), हल्दी, कुमकुम, अक्षत (बिना टूटे हुए चावल), सुपारी, सिन्दूर, गुलाल, अष्टगंध, जनेऊ जोड़ा, वस्त्र, मौली, सुपारी, लौंग, ईलायची, पान, दूर्वा, पंचमेवा, पंचामृत, गौदुग्ध, दही, शहद, गाय का घी,शकर, गुड़, मोदक, फ़ल, नर्मदाजल/गंगाजल, पुष्प, माला, कलश, सर्वोषधि, आम के पत्ते, केले के पत्ते, गुलाबजल, इत्र, धूपबत्ती, दीपक-बाती, सिक्का, श्रीफल (नारीयल)

सम्पूर्ण पूजन विधि- गणेश चतुर्थी वाले दिन शुभ चौघड़िये के अनुसार उक्त सामग्री का प्रबन्ध कर अपने पूजागृह में एकत्र करें। अब सर्वप्रथम गणेश प्रतिमा को किसी चौकी पर केले पत्ते या दूर्वा का आसन देकर विराजमान करें। पूजा करते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व की रखें। घी का दीपक प्रज्जवलित करें।

पवित्रीकरण-किसी भी पूजा को करने से पूर्व पवित्र व शुद्ध होना अनिवार्य है। पवित्रीकरण के लिए अपने बाएं में जल लेकर दाहिने से उसे ढंके और निम्न मन्त्र के साथ अपने ऊपर एवं सम्पूर्ण पूजा सामग्री के ऊपर उसका मार्जन करें (छिड़कें) ।

मन्त्र- ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। 

य: स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तर शुचि:॥

अब आचमनी से लेकर तीन बार जल का निम्म मन्त्र बोलकर आचमन करें।

ॐ केशवाय नम:

ॐ नारायणाय नम: 

ॐ माधवाय नम:

हस्त प्रक्षालन के लिए "ॐ गोविन्दाय नमो नम:" तीन बार "पुण्डरीकाक्षं पुनातु:" बोलकर अपने हाथ धो लें। हस्त प्रक्षालन के पश्चात अपने भाल पर कुमकुम या चन्दन का तिलक धारण करें।

दीपक का पूजन-

दीपक के पूजन हेतु एक पुष्प में जल व अष्टगंध सहित हल्दी, कुमकुम, सिन्दूर लगाकर निम्न मन्त्र के साथ दीपक के समक्ष अर्पण करें-

"शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदाम्।

शत्रुबुद्धिविनाशाय च दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते।दीपो ज्योति: परब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:।दीपो हरतु मे पापं दीप ज्योति नमोऽस्तुते॥

संकल्प- 

संकल्प हेतु अपने बाएं हाथ में पुष्प, अक्षत, सुपारी व सिक्का लेकर उसमें एक आचमनी जल डालें और निम्न संकल्प बोलें- 

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमदभगवतो महापुरूषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्रि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वत्मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे “अमुक” (अमुक के स्थान पर अपने निवासरत नगर का उच्चारण करें) नगरे/ग्राम 2077 वैक्रमाब्दे प्रमादी नाम संवत्सरे भाद्रपद मासे शुक्ल पक्षे चतुर्थी तिथौ शनिवासरे प्रात:/अपरान्ह/मध्यान्ह/सायंकाले “अमुक” (अमुक के स्थान पर अपने गोत्र का उच्चारण करें) गोत्र:....शर्मा/वर्मा/गुप्त: श्रीगणेश देवता प्रीत्यर्थं पूजन स्थापना कर्म अहं करिष्ये।

उक्त संकल्प बोलकर हाथ की समस्त सामग्री गणेश के सम्मुख उनके चरणों में अर्पित करे दें और उस पर एक आचमनी जल चढ़ा दें।

ध्यान-

गणेशजी के ध्यान हेतु अपने दाएं में पुष्प लेकर दोनों हाथ जोड़ें और निम्न मन्त्र का उच्चारण करें और पुष्प गणेशजी के सम्मुख अर्पण करें-"गजाननं भूतगणादिसेवतं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥

गौरीजी के ध्यान हेतु अपने दाएं में पुष्प लेकर दोनों हाथ जोड़ें और निम्न मन्त्र का उच्चारण करें और पुष्प गौरीजी के सम्मुख अर्पण करें-

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।

नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम्।

आवाहन-

आवाहन हेतु अपने बाएं हाथ में अक्षत लेकर उसमें हरिद्रा (हल्दी) मिश्रित कर लें तत्पश्चात् उन पीतवर्णीय अक्षतों में से एक-एक अक्षत अपने दायें हाथ से उठाकर श्रीगणेशजी के सम्मुख निम्न मन्त्र के साथ अर्पण करें-

१. श्रीमन्महागणाधिपतये नम:

२. लक्ष्मीनारायणाभ्यां नम:

३. उमा-महेश्वराभ्यां नम:

४. वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नम:

५. शचीपुरन्दाराभ्यां नम:

६. मातृपितृचरणकमेलेभ्यो नम:

७. इष्टदेवताभ्यो नम:

८. कुलदेवताभ्यो नम:

९. ग्रामदेवताभ्यो नम:

१०. वास्तुदेवताभ्यो नम:

११. स्थानदेवताभ्यो नम:

१२. सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:

१३. सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम:

१४. ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नम:

 प्राणप्रतिष्ठा- 

गणेशजी की प्राणप्रतिष्ठा के लिए एक दूर्वा में घी लगाकर गणेशजी की प्रतिमा से स्पर्श कराते हुए निम्न मन्त्र का उच्चारण करें-

"अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणा: क्षरन्तु च। अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन गणेशाम्बिके सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम्।

आसन-

ध्यान के उपरान्त श्रीगणेशजी व गौरीजी के आसन हेतु एक पुष्प, दूर्वा व अक्षत "प्रतिष्ठापूर्वक आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नम:" बोलकर गणेशजी व गौरीजी के सम्मुख अर्पण करें।

पाद्य-

श्रीगणेशजी व गौरीजी के पादप्रक्षालन हेतु एक आचमनी जल गणेशजी व गौरीजी के सम्मुख अर्पण करें।

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पाद्यं अर्घ्यं समर्पयामि समर्पयामि।"

शुद्धजल से स्नान-

सर्वप्रथम गणेशजी को शुद्धजल से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।"

दुग्ध स्नान-

अब गणेशजी के चल विग्रह को एक बड़ी थाली में स्थापित करने के पश्चात् गणेशजी को निम्न मन्त्र बोलकर गौदुग्ध से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पय:स्नानं समर्पयामि।"

दधि स्नान-

गौदुग्ध से स्नान के पश्चात गणेशजी को दधि से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, दधिस्नानं समर्पयामि।"

घृत स्नान-

दधि से स्नान के पश्चात गणेशजी को गौघृत से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, घृतस्नानं समर्पयामि।"

मधु (शहद) स्नान-

गौघृत से स्नान के पश्चात गणेशजी को शहद से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, घृतस्नानं समर्पयामि।"

शर्करा स्नान-

शहद से स्नान के पश्चात गणेशजी को शर्करा से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, शर्करास्नानं समर्पयामि।"

पंचामृत से स्नान- 

शर्करा से स्नान के पश्चात गणेशजी को पंचामृत से स्नान कराएं-

मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, पंचामृतस्नानं समर्पयामि।"

पुन: शुद्धजल से स्नान-

पंचामृत से स्नान के पश्चात गणेशजी को शुद्धजल से स्नान कराएं-मन्त्र- "ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि।"

अब निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए एक आचमनी जल गणेशजी के सम्मुख अर्पण करें-

"शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि"

दुग्धाभिषेक-

अब गणेश जी का "अथर्वशीर्ष" का पाठ करते हुए गौ दुग्ध से अभिषेक करें। अभिषेक के उपरान्त पुन: शुद्ध जल से स्नान कराकर गणेश जी की प्रतिमा को सिंहासन या मण्डप में विराजमान कर उनका श्रंगार करें-

वस्त्र-अलंकार एवं जनेऊ-

शुद्ध जल से स्नान कराने के उपरान्त गणेशजी को वस्त्र-उपवस्त्र, अलंकार व जनेऊ धारण कराएं।मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, वस्त्रं समर्पयामि।"

चन्दन-

श्रंगार के उपरान्त गणेशजी को चन्दन व सिन्दूर लगाएं-

मन्त्र-"श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्। विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृहताम्॥ 

"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, चन्दानुलेपनं समर्पयामि।"

पंचोपचार-

अब गणेशजी का अक्षत, सिन्दूर, गुलाल, भोडर आदि से पंचोपचार पूजन करें।मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि।"

पुष्पमाला-

अब गणेश जी को पुष्प एवं पुष्पमाला चढ़ाएं-मन्त्र--"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:,पुष्पमालां समर्पयामि।"

दूर्वा-

अब गणेशजी को दूर्वा अर्पित करें-
मन्त्र--"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, दूर्वांकुरान समर्पयामि।"

इत्र-

अब गणेशजी को इत्र लगाएं- 
मन्त्र--"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, सुगन्धिद्रव्यं समर्पयामि।"

धूप-

अब गणेशजी को धूप की सुगन्ध अर्पित करें- 
मन्त्र--"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, धूपमघ्रापयामि समर्पयामि।"

दीप-

अब गणेशजी को दीप दर्शन कराएं- 
मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, दीपं समर्पयामि।" 

अब हस्तप्रक्षालन (अपने हाथ धो लें) करने के बाद गणेशजी को नैवेद्य (भोग में दूर्वा, गुड़ व मोदक रखकर) अर्पण करें-ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा,ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा।मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, नैवेद्यं निवेदयामि।"

फल-

नैवेद्य अर्पण करने के उपरान्त गणेशजी को ऋतुफल अर्पण करें-

मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, ऋतुफलानि निवेदयामि।"

ताम्बूल (पान का बीड़ा)-

अब गणेशजी को लौंग-ईलायची रखकर ताम्बूल अर्पण करें-

मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, मुखवासार्थम् एलालवंग-पूंगीफल्सहितं ताम्बूलं समर्पयामि।"

दक्षिणा-

अब गणेशजी को श्रीफल सहित यथासामर्थ्य दक्षिणा अर्पण करें-

मन्त्र-"ॐ भूर्भुव:स्व: गणेशाम्बिकाभ्यां नम:, कृताया: पूजाया: द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि।"

आरती-

अब गणेशजी की आरती उतारें।

क्षमाप्रार्थना-

अब हाथ में पुष्प व अक्षत लेकर पूजा में हुई त्रुटि के विनम्र भाव से क्षमा प्रार्थना करें-

मन्त्र-गणेशपूजनं कर्म यन्यूनमधिकं कृतम्।

तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नो‌ऽतु सदा मम॥

उक्त मन्त्र बोलकर हाथ में रखे पुष्प व अक्षत गणेशजी के सम्मुख अर्पण कर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करें।

अब एक आचमनी जल अपने आसन के नीचे छोड़कर उस जल को अपने नेत्रों से लगाकर पूजा सम्पन्न करें।

 

(निवेदन-उक्त पूजाविधान उन श्रद्धालुओं को दृष्टिगत रखकर दिया गया है जो स्वयं अपने घर में गणेशजी की स्थापना व पूजन करना चाहते हैं।)

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

 

 

मीडिया और सुशान्त-

धन्य है हमारे देश का मीडिया और उस पर आनेवाले तथाकथित विश्लेषक, अभी सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ इतना भर कहा है कि सुशान्त केस की जांच सीबीआई करेगी। इस पर कितना हो-हल्ला मचाया जा रहा है, न्याय की जीत...सत्यमेव जयते...जाने क्या-क्या। अब यदि सीबीआई की जांच इस निष्कर्ष पर पहुंची कि वास्तव में सुशान्त सिंह राजपूत ने आत्महत्या ही की थी और उसकी वजह डिप्रेशन थी, डिप्रेशन की वजह चाहे जो हो; तब...! उसके लिए भी इन तथाकथित विश्लेषकों ने टिप्पणी करने के लिए अपने जुमले अभी से तैयार कर लिए होंगे। इस देश का मीडिया क्या चीज़ को कभी सलीके से होने देगा? ये वही मीडिया जिसने बिना किसी ठोस आधार के चन्द अभिनेता-अभिनेत्रियों के बयान पर इस केस में भाई-भतीजावाद (नेपोटिज़्म) का मुद्दा कई दिनों तक चलाया था और अब बिल्कुल ही शीर्षासन! कमाल है...ओ ख़बरनवीसों थोड़ा गंभीर पत्रकारिता भी कर लो...। एक ही मुद्दे की कई-कई दिनों तक जुगाली करना फ़िर एकदम खामोश हो जाना ये श्रेष्ठ पत्रकारिता की निशानी नहीं है। आप मित्रों को वो मरकज़ वाले साहब याद हैं कि नहीं...क्या हुआ उनका अब मीडिया में इसका ज़िक्र तक नहीं हो रहा। क्या किसी मुद्दे का फ़ालोअप लेना और उस बहस निष्कर्ष तक पहुंचाना मीडिया की ज़िम्मेवारी नहीं है। प्राइम टाइम मुर्गे लड़ाई की भांति बहस कराकर जनता को बिना किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचाए बिना बहस रोक कर देना क्या बस इतनी ही पत्रकारिता शेष है अब। पहले के समय में सम्पादकीय से जनता अपना मानस बनाती है, श्रेष्ठ सम्पादक व पत्रकार जनता का बौद्धिक मार्गदर्शन करते थे और आजकल के इन एंकरों को देख लीजिए, गला फ़ाड़ का चिल्ला-चिल्ला कर ना जाने क्या साबित करना चाहते हैं। खुद ही वकील...खुद ही जज...सब कुछ गंभीरता धेले भर की नहीं। ऐसा नहीं कि आज के दौर में श्रेष्ठ पत्रकार नहीं हैं..हैं निश्चित हैं मगर उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। रजत शर्मा जी हों, शरद द्विवेदी जी हों, अमिताभ अग्निहोत्री जी या फ़िर रविश कुमार हों ये सब वे नाम हैं जो पत्रकारिता की कसौटी हैं इनकी रिपोर्ट देख लीजिए, कम से कम तथ्यात्मक बात तो करते हैं, दूसरों की सुनते तो हैं और कभी भी पंचम सुर नहीं लगाते। मेरा निवेदन बस इतना है कि दिन-दिन भर किसी मुद्दे को अनावश्यक रूप से खींचना, उच्च स्वर में बिना तथ्यों व तर्कों के चिल्लाना इन सबसे आप महान पत्रकार नहीं हो जाते और ना ही इससे पत्रकारिता की गरिमा बढ़ती है। सम्पादकों का मुख्य कार्य ही बस इतना होता है कि किस खबर को किस "वज़न" (वैटेज) के साथ चलाया जाना चाहिए इसका निर्णय करें। आजकल के सम्पादक तो पड़ोसी चैनल क्या दिखा रहा है यह देखकर अपना सम्पादन (एडिटिंग) करते हैं। बहरहाल अब समय आ गया है; और नहीं भी आया है तो बहुत शीघ्र आ जाएगा जब मीडिया की सीमाएं भी संविधान को तय करनी ही पड़ेंगी।

-पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पादक "सरल-चेतना"

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

क्या पायलट भर पाएंगे राजनीति की उड़ान...!


राजस्थान आजकल खासा चर्चा में है। वहां की गहलोत सरकार में उप-मुख्यमन्त्री व प्रदेश अध्यक्ष रहे सचिन पायलट ने जिस तरह से अपने बगावती तेवर दिखाएं हैं उससे राजस्थान की राजनीति व कांग्रेस में उथलपुथल मच गई है। यद्यपि अभी तक सचिन पायलट ने अपना अगला कदम स्पष्ट नहीं किया है किन्तु फ़िर भी उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर राजनीति के पण्डितों से लेकर ज्योतिष के जानकार तक सभी अपने-अपने ज्ञानानुसार कयास लगा रहे हैं। आईए हम भी "वेबदुनिया" के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं सचिन पायलट की कुण्डली का ज्योतिषीय विश्लेषण-
* सचिन पायलट की कुण्डली-
 सचिन पायलट की कुण्डली सिंह लग्न व मिथुन राशि की है। लग्न में सूर्य, बुध व शनि स्थित हैं। एकादश भाव अर्थात् लाभ स्थान में चन्द्र, मंगल व गुरू की युति है। दशमेश शुक्र व्यय भाव में विराजमान हैं। राहु-केतु क्रमश: दूसरे व आठवें भाव में स्थित हैं।
* सचिन पायलट की कुण्डली के शुभाशुभ योग-
सचिन पायलट की कुण्डली बुधादित्य योग, महालक्ष्मी योग व गजकेसरी जैसे राजयोग विद्यमान है जिसके फ़लस्वरूप उन्हें बहुत ही कम आयु में इतनी सफलता प्राप्त हुई। सिंह राशि का जातक सदैव स्वाभिमानी व तेजस्वी स्वभाव वाला होता है। सिंह राशि के जातक का नैसर्गिक स्वभाव होता है कि वह किसी के अधीनस्थ होकर कार्य नहीं कर सकता जो सचिन पायलट के तेवरों से स्पष्ट जाहिर होता भी है। महालक्ष्मी योग उन्हें धनाढ़्य बना रहा है वहीं वाणी स्थान में स्थित बुध उनकी वाणी में तर्क प्रदान कर रहा है। ऐसा जातक कभी भी अतार्किक बात का समर्थन नहीं करता। ऐसे जातकों को केवल योग्य तर्क के द्वारा ही सहमत किया जा सकता है किन्तु ऐसे जातक अपनी तर्कयुक्त वाणी के कारण कभी-कभी गंभीर हानि भी उठाते हैं। सचिन पायलट की कुण्डली में सभी ग्रह राहु-केतु की परिधि में होने से उनकी कुण्डली में "कुलिक" नामक कालसर्पयोग का निर्माण भी हो रहा है जो उन्हें जीवन अपेक्षित सफलता से वंचित करेगा। उन्हें सफलता प्राप्ति हेतु कठोर संघर्ष करना होगा।
* पायलट का राजनीतिक भविष्य-
सचिन पायलट की कुण्डली की ग्रहस्थितियों के अनुसार सूर्य का अपनी स्वराशि सिंह में स्थित होना उनकी राजनीति में सफलता को दर्शाता है क्योंकि सूर्य राजसत्ता का प्रतीक होता है वहीं जनता व शासन का प्रतीक शनि भी सूर्य के साथ स्थित है जो उनके राजनीति में महत्वपूर्ण पदों की प्राप्ति का संकेत करता है किन्तु दशमेश शुक्र का शत्रुक्षेत्री होकर व्यय भावगत होना उनके कर्मक्षेत्र में अवरोध का द्योतक है। वहीं उनके कर्मक्षेत्र पर राहु की पूर्ण दृष्टि उन्हें अपने कर्मक्षेत्र में अपेक्षित सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ा संघर्ष करने का संकेत दे रही है। जीवन में कई बार वे राजनीति के शीर्ष पर पहुंचते-पहुंचते सत्ता से दूर रह सकते हैं। राजयोग के कारण वे राजनीति के केन्द्र में तो रहेंगे किन्तु मुख्यमन्त्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए उन्हें अभी प्रतीक्षा के साथ-साथ कठोर संघर्ष से गुजरना होगा।
*विंशोत्तरी दशाओं का संकेत-
अभी वर्तमान में सचिन पायलट शनि की महादशा व दशमेश शुक्र की अन्तर्दशा के प्रभाव में हैं वहीं प्रत्यन्तर दशा गुरू की है। जैसे हमने पूर्व में स्पष्ट किया था राहु की दृष्टि उनके कर्मक्षेत्र के लिए हानिकारक है ठीक उसी प्रकार सचिन पायलट पर जनवरी से चली आ रही राहु की प्रत्यन्तर दशा विगत 1 जुलाई को ही समाप्त हुई है। सुधि पाठकगण इस बात को शीघ्र ही समझ लेंगे कि वर्तमान में सचिन पायलट के साथ जो घटनाक्रम हुआ जिसके कारण उन्हें अपना उप-मुख्यमन्त्री व प्रदेश अध्यक्ष का पद गंवाना पड़ा उसका बीजारोपण राहु की प्रत्यन्तर दशा में ही हो चुका था। यदि विंशोत्तरी दशाओं का समेकित विश्लेषण कर निष्कर्षत: कहें तो वर्तमान से लेकर वर्ष 2023 तक का समय सचिन पायलट के लिए अनुकूल है। इस अवधि में वे अपनी राजनीति की नई दिशा तय करेंगे। वर्तमान से लेकर वर्ष 2023 तक का समय सचिन पायलट के लिए सफलतादायक प्रतीत हो रहा है किन्तु इस समय का यथोचित लाभ प्राप्त करने के लिए उन्हें अशुभ योगों विशेषकर राहु व कालसर्प दोष की शान्ति करवाना आवश्यक है अन्यथा वे इन दुर्योगों के कारण पुन: सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने से वंचित रह सकते हैं।

(निवेदन-उपर्युक्त विश्लेषण सचिन पायलट की उपलब्ध कुण्डली के आधार पर दिया गया है। हम इस कुण्डली की प्रामाणिकता का दावा नहीं करते हैं।)

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com




शनिवार, 13 जून 2020

"कोरोना" और पंगत-


भारतीय जनमानस यदि सुझावों पर अमल करने वाली मानसिकता का होता तो "कोरोना" से बचने हेतु सुझाव तो चहुंओर से दिए जा रहे हैं। आज गली-कूचे के नुक्कड़ से लेकर वातानुकूलित सभाकक्ष में बैठा हर कोई इस भयावह महामारी से कैसे बचा जाए ये बता रहा है किन्तु आमजन का आचरण कुछ इस प्रकार का देखने में आ रहा है जैसे "कोरोना" की दवा किसी सन्तरे की गोली की मानिंद हर दूसरी दुकान पर उपलब्ध है। कहते हुए मन दुखता है किन्तु भारत में आत्मानुशासन निचले पर स्तर पर रखा जाता है, करीब-करीब नदारद। ऐसे में तो सख़्ती ही एकमात्र विकल्प है चाहे किसी को कितना ही बुरा क्यों ना लगे। गंभीर रोगों से मुक्ति हेतु कड़वी दवाई लेनी ही होती है और कभी-कभी तो अपने प्राणों से प्यारी इस नश्वर काया की भी शल्य चिकित्सा करवानी पड़ती है। कहने का आशय सख़्ती नितान्त आवश्यक है। अब बात करें सुझावों की तो मैं भी सोच रहा था आज के माहौल में सर्वाधिक आवश्यक क्या है! चिकित्सा, भोजन, दवा, वैक्सीन की खोज ये तो सब हो ही रहा है और तालाबन्दी को खोल कर भी देख लिया। अब जब "कोरोना" के साथ रहना ही है तो आज एक पुरानी परम्परा के अनुसरण की आवश्यकता है, वह परम्परा है - पंगत की परम्परा। पहले के समय में विवाह; उत्सव आदि शुभकार्यों में अतिथिगणों को भोजन हेतु पंगत कराने की व्यवस्था थी। "पंगत" बड़ी प्यारी व अनूठी परम्परा थी जिसमें बड़े ही सत्कार से आदरपूर्वक अतिथिगणों को भोजन करवाया जाता था। मेज़बान का मेहमान से मिष्ठान परोसते समय का वो प्रेमपगा मनुहार भला कौन भूल सकता है। आजकल के गिद्धभोज में भोजन पाना व करना मेहमानों की स्वयं की जिम्मेदारी व साहस कौशल होता है क्योंकि मेज़बान ने तो आपको आमन्त्रित कर अपनी मेहमाननवाज़ी की तमाम जिम्मेवारियों से मुक्ति पा ली होती है। बहरहाल, उस पंगत परम्परा में एक व्यवस्था होती थी कि जब एक समूह (बैच) भोजन कर चुका होता था तब उस समूह के भोजन करवाने में जो भी खाद्य सामग्री गिरकर फ़ैल जाती थी उसे समेटने हेतु थोड़ा अन्तराल लिया जाता था जिससे साफ़-सफ़ाई की जा सके। जब साफ़-सफ़ाई हो जाती तब दूसरा समूह (बैच) भोजन हेतु आमन्त्रित किया जाता था ताकि "पंगत" सुचारू रूप से चलती रहे। आज हमें "कोरोना" के सन्दर्भ में भी इसी परम्परा का अनुसरण करना है। "अनलाक" के रूप में पहले समूह का भोजन हो चुका और "कोरोना" के रूप में रायता भी खूब फ़ैल चुका अब इसे समेटने के लिए पुन: "लाकडाउन" किया जाना चाहिए ताकि कुछ साफ़-सफ़ाई की जा सके। सरकार से बस इतना ही आग्रह है कि "अनलाक" करके लोगों को उनकी स्वयं जबावदेही पर छोड़ने से "कोरोना" पर नियन्त्रण नहीं होगा। भारत जैसे देश में "लाकडाउन" भी अब "कोरोना" के साथ-साथ ही चलाना होगा, भले एक साथ नहीं किन्तु कुछ-कुछ अन्तराल के साथ तो अवश्य ही क्योंकि यदि किसी नदी को प्रदूषण मुक्त करना है तो दो ही मार्ग हैं, पहला प्रदूषित जल को साफ़ करना और दूसरा स्वच्छ जल में प्रदूषण फ़ैलने से रोकना, तब पूर्णरूपेण नदी प्रदूषण मुक्त हो पाएगी। "कोरोना" के सन्दर्भ में भी यही दो मार्ग अपनाना अपेक्षित है। रही बात सुझाव व सरकारी अपीलों की तो वह तो सरकार कब से शराब, सिगरेट, तम्बाकू, के निषेध के लिए कर ही रही है, कुछ हुआ क्या! भारत में आत्मानुशासन की बात बेमानी है, सरकारों को यह जानते हुए ही अपनी नीतियों का निर्धारण व क्रियान्वयन करना चाहिए।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 14 मई 2020

शास्त्रानुसार क्या है मृत्यु का अर्थ-


शास्त्र के सूत्रों और वचनों को यदि भलीभांति व सही परिप्रेक्ष्य में ना समझा जाए तो वे लाभप्रद होने के स्थान पर हानिकारक भी सिद्ध हो सकते हैं। अक्सर उचित एवं सटीक व्याख्या ना होने पर अर्थ का अनर्थ कर शास्त्रों के सूत्रों व निर्देशों के प्रति भ्रांतियां निर्मित कर दी जाती हैं। आज हम "वेबदुनिया" के पाठकों ज्योतिष की मारकेश दशा से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं। अधिकांश जनमानस ज्योतिष की दो दशाओं के आने पर अत्यधिक भयाक्रान्त होता है-शनि की साढ़ेसाती एवं मारकेश की दशा। मारकेश की दशा के सम्बन्ध में अक्सर यह भ्रान्ति प्रचलित है कि इस दशा में जातक की मृत्यु घटित होती है जबकि यह तथ्य पूर्णत: सत्य नहीं अपितु आंशिक सत्य है। क्योंकि ज्योतिष शास्त्रानुसार मृत्यु का अर्थ केवल प्राणहानि ही नहीं होता। शास्त्र का वचन है-
"व्यथा दु:खं भयं लज्जा रोग: शोकस्तथैव च।
बन्धनं चापमानं च मृत्युचाष्टविध: स्मृत:॥
उपर्युक्त सूत्रानुसार शास्त्र आठ बातों को मृत्यु के सदृश मानता है, ये हैं- व्यथा, दु:ख, भय, लज्जा, रोग, शोक, बन्धन, अपमान अर्थात् यदि किसी जातक पर "मारकेश" की दशा प्रभावशाली हो और उसकी आयु हो तो "मारकेश" की दशा में प्राणहानि ना होकर उसे इस दशा में केवल अत्यधिक कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


रविवार, 3 मई 2020

क्या ज्योतिष की दृष्टि से आप हैं "ग्रीन जोन" में...!

  
आज समूचा विश्व "कोरोना" नामक महामारी से पीड़ित हैं। संसार के सभी देश अपने-अपने तरीकों से इस वैश्विक महामारी से निपटने का प्रयास कर रहे हैं। इस समय अनेक देशों ने स्थानीय स्तर पर तालाबन्दी अर्थात् "लाकडाउन" किया हुआ है। भारत में भी पिछले एक माह से "लाकडाउन" चला आ रहा है। "कोरोना" वायरस से निपटने के लिए अभी तक कोई कारगर ईलाज नहीं खोजा जा सका है, और ना ही "कोरोना" के स्वभाव का कोई ठीक-ठीक अनुमान लगाया जा सका है। इस वायरस ने सभी को प्रभावित किया है, चाहे वह 6 माह की बच्ची हो, 25 वर्ष का युवा हो, 40 वर्ष का प्रौढ़ हो, या 60 से 80 तक की आयु के वृद्ध। "कोरोना" से हुई मौतों में भी हमें असमान्य नियम देखने को मिला है जहां एक ओर तो 40 वर्षीय प्रौढ़ "कोरोना" की जंग हार कर काल के गाल में समा गए वहीं 90 वर्षीय वृद्ध "कोरोना" को शिकस्त देकर पूर्ण स्वस्थ हो गए। अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? यदि हम इस बीमारी से संक्रमित होने वाले व्यक्ति एवं इससे ग्रसित होकर स्वस्थ होने वाले व्यक्तियों व इससे प्रभावित होकर प्राण गंवा देने वाले व्यक्तियों को रेड, आरेंज व ग्रीन; तीन ज़ोन में विभक्त कर ज्योतिषीय आधार पर इसका विश्लेषण करने का प्रयास करें तो हम हमारी सर्तकता व सावधानी की दिशा में एक कदम ओर अग्रसर हो सकेंगे। ज्योतिष शास्त्र में किसी जातक के किसी रोग से पीड़ित होने व उस रोग से उसकी प्राणहानि होने के जोखिम के संकेत उसकी जन्मपत्रिका के अवलोकन के आधार पर मिलते हैं।
रोग का अधिपति ग्रह "षष्ठेश" -
------------------------------------
ज्योतिष शास्त्र में कुण्डली के छठे भाव को रोग का भाव माना गया है एवं इसके अधिपति ग्रह जिसे "षष्ठेश" कहा जाता है, रोग का अधिपति ग्रह माना गया है। यदि किसी जातक पर "षष्ठेश" की महादशा या अन्तर्दशा चल रही हो तो वह निश्चित ही किसी ना किसी रोग से पीड़ित होगा। जन्मपत्रिका में "षष्ठेश" रोग का पक्का कारक होता है। अत: यदि कोई जातक जन्मपत्रिका के अनुसार "षष्ठेश" की महादशा या अन्तर्दशा भोग रहा है तो वह अवश्य ही रोग से पीड़ित हो जाएगा। यदि "षष्ठेश" जन्मपत्रिका के किसी शुभ या लाभ भाव में स्थित हो तो ऐसे में रोगग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा जातक शीघ्र ही रोग से मुक्त नहीं होता।

"मारकेश" की दशा देती है मृत्युतुल्य कष्ट-
--------------------------------------------------
संसार में जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु होना अवश्यंभावी है लेकिन यह मृत्यु कब होगी इसका स्पष्ट संकेत भी ज्योतिष शास्त्र से मिल सकता है। जन्मपत्रिका के द्वितीयेष, सप्तमेष व द्वादशेष मारकेश ग्रह माने गए हैं इनमें द्वितीयेष व सप्तमेष को प्रबल मारकेश माना गया है। ज्योतिष में "मारकेश" मृत्यु देने वाला ग्रह होता है। यदि मारकेश शनि, मंगल, सूर्य, जैसे क्रूर ग्रह हों या "मारकेश" ग्रह राहु-केतु से संयुक्त हों तो यह अधिक हानिकारक हो जाते हैं। मारकेश की महादशा या अन्तर्दशा में जातक मृत्युतुल्य कष्ट पाता है और यदि आयु पूर्ण हो चुकी हो तो ऐसे में जातक की इन दशाओं में मृत्यु होना भी सम्भव है।


क्रूर ग्रह की दशा होती है हानिकारक-
------------------------------------------
उपर्युक्त दशाओं के अतिरिक्त क्रूर ग्रहों जैसे अष्टमेश व राहु-केतु की दशाएं भी जातक के स्वास्थ्य व जीवन के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। उपर्युक्त ग्रह स्थितियों व दशाओं के आधार पर यदि हम जातकों को तीन जोन में विभक्त करें तो आईए जानते हैं कि ज्योतिष की दृष्टि से आप किस जोन में कहे जाएंगे-
1. ग्रीन जोन- सर्वप्रथम हम ज्योतिष के ग्रीन जोन वाले जातकों का विश्लेषण करते हैं। यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप "षष्ठेश", "मारकेश" व "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा के प्रभाव में नहीं हैं और आप पर किसी शुभ ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा चल रही है तो आप सुरक्षित अर्थात् "ग्रीन जोन" में माने जाएंगे।
2. ओरेंज जोन- यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप पर "षष्ठेश", या किसी "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा चल रही है किन्तु "मारकेश" की महादशा-अन्तर्दशा व प्रत्यन्तर दशा से आप प्रभावित नहीं हैं अथवा आप केवल "षष्ठेश" या किसी "क्रूर ग्रह" की प्रत्यन्तर दशा भोग रहे हैं। यदि आपका "षष्ठेश" 6,8,12 जैसे हानि स्थान में हो एवं आप पर किसी शुभ ग्रह की महदशा या अन्तर्दशा चल रही हो तब आप "ओरेंज जोन" में माने जाएंगे।
3. रेड जोन-यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप "षष्ठेश", "मारकेश" व "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा के प्रभाव में है और आप पर किसी शुभ ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा नहीं चल रही है एवं आप "मारकेश" की महादशा या अन्तर्दशा के प्रभाव में हैं तो आप अत्यन्त असुरक्षित अर्थात् "रेड जोन" में माने जाएंगे। यदि किसी जातक पर वर्तमान में महादशा (मारकेश/षष्ठेश), अन्तर्दशा ((मारकेश/षष्ठेश) व प्रत्यन्तर दशा (मारकेश/षष्ठेश/क्रूर ग्रह) का संयोग बन रहा हो तो ऐसे जातक को अत्यन्त सावधान व सर्तक रहने की आवश्यकता है। पूर्व वर्णित विंशोत्तरी दशाओं के साथ यदि जातक पर "संकटा" नामक योगिनी दशा चल रही हो तब ऐसा जातक निश्चित रूप से "रेड जोन" में माना जाएगा।

(निवेदन- उपर्युक्त विश्लेषण जिज्ञासु व ज्योतिष शास्त्र में रुचि रखने वाले पाठकों को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत किया गया है। पाठकों की व्यक्तिगत जन्मपत्रिका की ग्रहस्थिति एवं दशाओं के आधार पर उनका स्वास्थ्य सम्बन्धी जोखिम कम या अधिक हो सकता है। अत: पाठकों से अतिविनम्र निवेदन है कि वे किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी असावधानी व लापरवाही से बचें। उपर्युक्त आलेख को केवल सामान्य जानकारी तक ही सीमित रखें व इसके आधार पर स्वास्थ्य सुरक्षा सम्बन्धी निर्णय ना लें।)

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com