बुधवार, 14 जुलाई 2021

17 जुलाई 2021 से होंगे सूर्य "दक्षिणायण"-

 


इस माह की दिनांक 17, आषाढ़ शुक्ल अष्टमी, दिन शनिवार से सूर्यदेव "दक्षिणायण" होने जा रहे हैं। हमारे शास्त्रों में सूर्य के "दक्षिणायण" व "उत्तरायण" होने का विशेष महत्त्व होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत में इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त होने पर भी पितामह भीष्म ने अपनी देहत्याग कर मृत्युलोक से प्रस्थान करने के लिए सूर्य के "उत्तरायण" होने की प्रतीक्षा की थी। ऐसी मान्यता है कि सूर्य के "उत्तरायण" रहते देहत्याग होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है जबकि "दक्षिणायण" के समय मृत्यु होने पर जीव को पुन: इस नश्वर संसार में लौटना पड़ता है।

क्या है "उत्तरायण" व "दक्षिणायण"-

शास्त्रानुसार एक सौर वर्ष में दो अयन होते हैं।

1. उत्तरायण 2. दक्षिणायण

1. उत्तरायण-सूर्य की उत्तर गति अर्थात् चलन को सूर्य का "उत्तरायण" (सौम्यायन) होना कहा जाता है। गोचरवश जब सूर्य मकर राशि से मिथुन राशि तक गोचर करता है तब इस अवधि को सूर्य का "उत्तरायण" होना कहा जाता है। "उत्तरायण" का प्रारम्भ "मकर-संक्रान्ति" से होता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है। यह अत्यन्त शुभ व सकारात्मक होता है। अत: समस्त शुभ एवं मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुण्डन, दीक्षा, गृहप्रवेश, व्रतोद्यापन, उपनयन संस्कार (जनेऊ), देव-प्रतिष्ठा आदि सूर्य के "उत्तरायण" रहते ही अधिक श्रेयस्कर माने गए हैं। उत्तरायण में शिशिर, वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतु आती हैं।

2. दक्षिणायण-सूर्य की दक्षिण गति अर्थात् चलन को सूर्य का "दक्षिणायन" (याम्यायन) होना कहा जाता है। गोचरवश जब सूर्य कर्क राशि से धनु राशि तक गोचर करता है तब इस अवधि को सूर्य का "दक्षिणायण" कहा जाता है। "दक्षिणायण" का प्रारम्भ कर्क-संक्रान्ति से होता है। दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि माना गया है। यह काल अत्यन्त नकारात्मक व निर्बल होता है। अत: समस्त शुभ एवं मांगलिक कार्यों जैसे विवाह, मुण्डन, दीक्षा, गृहप्रवेश, व्रतोद्यापन, उपनयन संस्कार (जनेऊ), देव-प्रतिष्ठा आदि का सूर्य के "दक्षिणायण" रहते निषेध होता है किन्तु अत्यावश्यक होने पर यथोचित वैदिक पूजन कर इन्हें सम्पन्न किया जा सकता है। दक्षिणायण में वर्षा, शरद एवं हेमन्त ऋतु आती हैं।

क्या होती है संक्रान्ति-

शास्त्रानुसार सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में गोचरवश प्रवेश करने को "संक्रान्ति" कहा जाता है। एक सौर वर्ष में बारह संक्रान्तियां आती हैं। सूर्य गोचरवश एक राशि में एक माह तक रहते है अत: संक्रान्ति प्रतिमाह आती है। गोचरवश सूर्य जिस राशि में प्रवेश करते हैं उसी राशि के नाम के अनुसार संक्रान्ति का नाम होता है जैसे सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश को "कर्क संक्रान्ति" व मकर राशि में प्रवेश को "मकर संक्रान्ति" कहते हैं। इन समस्त बारह संक्रान्तियों में "मकर संक्रान्ति" का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि इसी दिन से सूर्य "उत्तरायण" होते हैं।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

सोमवार, 12 जुलाई 2021

स्त्रियों को दण्डवत प्रणाम क्यों नहीं करना चाहिए..!

हमारे सनातन धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के लिए यथासामर्थ्य पूजा करना अनिवार्य बताया गया है। शास्त्रों में पूजा करने के विविध रूप व विधान बताए गए हैं। जिनके माध्यम से श्रद्धालु अपने इष्टदेव की पूजा कर उनके श्रीचरणों में अपनी श्रद्धा ज्ञापित कर सकता है। पूजा के यह विविध प्रकार पंचोपचार,दशोपचार,षोडशोपचार पूजन कहे जाते हैं। इन सभी प्रकारों में सर्वश्रेष्ठ प्रकार षोडषोपचार पूजन विधि का माना गया है। षोडषोपचार पूजन विधि में सोलह विविध उपचारों से भगवान की पूजा की जाती है जिसमें अन्तिम उपचार षाष्टांग दण्डवत प्रणाम माना गया है। दण्डवत प्रणाम की हमारी पूजा विधि में सर्वाधिक मान्यता होती है। दण्डवत प्रणाम को सभी प्रकार के प्रणामों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है किन्तु क्या आप यह जानते हैं कि हमारे शास्त्रों में स्त्रियों को दण्डवत प्रणाम करने का सर्वथा निषेध है। शास्त्रनुआर स्त्रियों को कभी भी किसी के भी सम्मुख दण्डवत प्रणाम नहीं करना चाहिए। आजकल अनेक स्थानों पर देखने में आता है कि स्त्रियां भी मन्दिरों, पूजास्थलों व परिक्रमा आदि में षाष्टांग दण्डवत प्रणाम करती हैं जो शास्त्रानुसार अनुचित है। ऐसा क्यों है इसका समाधान हमें "धर्मसिन्धु" नामक ग्रन्थ में मिलता है जिसमें स्पष्ट निर्देश है- "ब्राह्मणस्य गुदं शंखं शालिग्रामं च पुस्तकम्। वसुन्धरा न सहते कामिनी कुच मर्दनं॥ अर्थात् ब्राह्मणों का पृष्ठभाग, शंख, शालिग्राम, धर्मग्रन्थ (पुस्तक) एवं स्त्रियों का वक्षस्थल (स्तन) यदि सीधे भूमि (बिना आसन) का स्पर्श करते हैं तो पृथ्वी इस भार को सहन नहीं कर सकती है। इस असहनीय भार को सहने के कारण वह इस भार को डालने वाले से उसकी श्री (अष्ट लक्ष्मियों) का हरण कर लेती है। ब्राह्मणों का पृष्ठभाग, शंख, शालिग्राम, धर्मग्रन्थ (पुस्तक) एवं स्त्रियों के वक्षस्थल को पृथ्वी पर सीधे स्पर्श कराने वाले की अष्ट-लक्ष्मियों क्षय होने लगता है। अत: शास्त्र के इस निर्देशानुसार स्त्रियों को दण्डवत प्रणाम कभी नहीं करना चाहिए। स्त्रियों को दण्डवत प्रणाम के स्थान पर घुटनों के बल बैठकर अपना मस्तक भूमि से लगाकर ही प्रणाम करना चाहिए एवं ब्राह्मणों को, शंख को, शालिग्राम भगवान को, धर्मग्रन्थ (पुस्तक) को सदैव उनके यथोचित आसन पर ही विराजमान कराना चाहिए। 
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया 
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र 
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com 
 
प्रणाम की सही मुद्रा-