बुधवार, 28 अप्रैल 2021

कोरोनाकाल में प्रियजन की विदाई



हमारे सनातन धर्म में षोडश संस्कारों का विशेष महत्त्व होता है। जीवात्मा गर्भ में प्रवेश से लेकर देहत्याग करने तक सोलह प्रकार के विभिन्न संस्कारों से गुजरता है। सनातन धर्मानुसार वैसे तो सभी सोलह संस्कार आवश्यक हैं किन्तु देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कुछ संस्कारों का लोप हो जाता है। इन षोडश संस्कारों में जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दो संस्कार हैं वे हैं गर्भाधान एवं अन्तिम-संस्कार, क्योंक गर्भाधान संस्कार के दौरान हम गर्भ में श्रेष्ठ आत्मा का आवाहन करते हैं एवं अन्तिम संस्कार में हम उस आत्मा को विदाई देते हैं। हमारे शास्त्रों में इन दोनों संस्कारों सहित सभी षोडश संस्कारों को करने का पूर्ण विधि-विधान उल्लेखित है जिसके अनुसार हमें यथासमय यह संस्कार करने चाहिए। वर्तमान समय में हमारी पीढ़ी व देश "कोरोना" महामारी नामक एक विकट समस्या से जूझ रहा है। इस महामारी ने असमय ही कई लोगों से उनके प्रियजनों को छीन लिया है। इस महामारी के प्रकोप से बचने के लिए चिकित्सकों द्वारा इस रोग से अपने प्राण गंवा चुके व्यक्तियों का अन्तिम-संस्कार भी एक विशेष रीति से करने का मार्गदर्शन दिया गया है, जिसमें प्रियजनों को दाह-संस्कार से दूर रखा जाता है। आज अनेक नगरों में "लाकडाऊन" भी लगा हुआ है जिससे अन्तिम-संस्कार के बाद की क्रियाएं भी विधिवत् सम्पन्न नहीं हो पा रही हैं। हमारे शास्त्रों के अनुसार यदि व्यक्ति का अन्तिम-संस्कार पूर्ण विधि-विधान से नहीं किया जाता है तो उसकी आत्मा को सद्गति प्राप्त नहीं होती है। ऐसे में दिवंगत व्यक्तियों के परिजनों के समक्ष बड़ी दुविधा है कि वे अपने प्रियजन को शास्त्रानुसार विदाई किस प्रकार दें, जिससे उनकी आत्मा को सद्गति प्राप्त हो। मित्रों, इसे प्रभु की इच्छा व उनके विराट रूप का प्राकट्य ही कहें कि हमें इस विषय पर आलेख के माध्यम से आपका मार्गदर्शन करना पड़ रहा है। बहरहाल, "हरि इच्छा बलवान" को स्वीकार करते हुए आज हम "सरल-चेतना" के पाठकों को "कोरोना" से दिवंगत हुए व्यक्तियों के अन्तिम-संस्कार के बारे उनके परिजनों हेतु कुछ शास्त्रोक्त जानकारी देंगे। आप सभी को विदित है कि इस महामारी से दिवंगत हुए व्यक्तियों के अन्तिम-संस्कार में उनके परिजनों को दूर रखा जा रहा है एवं उत्तर क्रिया जैसे दशगात्र आदि के लिए भी ब्राह्मण उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं ऐसे में उनका श्राद्ध किस प्रकार किया जाए इस सम्बन्ध में शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है-"श्रद्धया इदं श्राद्धम्" अर्थात् श्रद्धा से ही श्राद्ध है। आप इस नियम के अनुसार अपने दिवंगत हो चुके प्रियजन के लिए पूर्ण श्रद्धा से दस अथवा तेरह (देश-काल-लोक परम्परा अनुसार ) दिनों तक निम्न कर्म करें।

1. शास्त्र का वचन है-"तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि" अर्थात् धनाभाव अथवा अन्य कोई प्रतिकूल परिस्थिति होने पर दिवंगत व्यक्ति के परिजन केवल शाक (हरी सब्जी, जैसे पालक इत्यादि) के माध्यम से श्राद्ध सम्पन्न कर सकते हैं। दस अथवा तेरह दिनों तक प्रतिदिन कुतपकाल (अपरान्ह 11:35 से 12:35) के मध्य गाय को शाक खिलाने से श्राद्ध की पूर्णता होती है।

शाक की अनुपलब्धता होने पर विष्णु पुराण का निर्देश है कि कुतपकाल में श्राद्धकर्ता एकान्त में खुले आकाश के नीचे जाकर अपने हाथों को आसमान की ओर उठाकर यह प्रार्थना करे-" हे मेरे प्रियजन! मेरे पास श्राद्ध करने के लिए अनुकूल परिस्थिति नहीं है किन्तु मेरे पास आपके निमित्त श्रद्धा व भक्ति है। मैं इन्हीं के द्वारा आपको संतुष्ट करना चाहता हूं और मैंने शास्त्राज्ञा में अपने दोनों हाथ आकाश में उठा रखे हैं। आप मेरी श्रद्धा व भक्ति से ही तृप्त हों।"

2. दीपदान- दस अथवा तेरह (देश-काल-लोक परम्परा अनुसार ) दिनों तक दक्षिण दिशा में अपने दिवंगत हो चुके प्रियजन के लिए तिल के तेल (तिल के अभाव में किसी भी तेल) का दीपक प्रज्जवलित करें।

नारायबलि कर्म-

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उपर्युक्त वर्णित शास्त्रोक्त निर्देश आपत्तिकाल के लिए त्वरित करने योग्य कर्म हैं किन्तु इनके करने मात्र से विधिवत् अन्तिम-संस्कार ना किए जाने सम्बन्धी दोष का निवारण तब तक नहीं होगा जब तक कि इस निमित्त "नारायणबलि कर्म" को सम्पन्न ना कर लिया जाए क्योंकि ऐसे व्यक्ति जिनका शास्त्रोक्त रीति से विधिवत् अन्तिम-संस्कार नहीं किया जाता है वे सभी "दुर्मरण" की श्रेणी में आते हैं एवं "दुर्मरण" वाले व्यक्तियों के निमित्त "नारायणबलि" कर्म का किया जाना अत्यन्त आवश्यक होता है। शास्त्रानुसार "नारायणबलि" कर्म ना करने से दिवंगत आत्मा को सद्गति  प्राप्त नहीं होती है। "नारायणबलि" कर्म परिस्थिति सामान्य होने के उपरान्त किसी भी श्राद्धपक्ष में सम्पन्न किया जा सकता है। यदि "नारायणबलि" कर्म किसी तीर्थक्षेत्र या पवित्र नदी के तट पर दिवंगत होने की तिथि से तीन वर्षों के अन्दर सम्पन्न किया जाता है तो इसके शुभफल में अतीव वृद्धि होती है एवं दिवंगत व्यक्ति को सद्गति प्राप्त होने में किसी प्रकार का संशय नहीं रह जाता है। अत: हमारा पाठकों से विशेष निवेदन है कि जिनके परिजन भी "कोरोना" महामारी से दिवगंत हुए हो वे अपनी सुविधानुसार उनके निमित्त "नारायणबलि" कर्म अवश्य सम्पन्न करें जिससे उन्हें सद्गति प्राप्त हो।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

एकादशी व्रत कब करें

 


हमारे सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रानुसार हर हिन्दू धर्मावलम्बी के लिए एकादशी व्रत रखना श्रेयस्कर माना गया है वहीं वैष्णवों के लिए तो एकादशी  व्रत अनिवार्य बताया गया है। हिन्दू धर्म में एकादशी के व्रत को पुण्यदायक माना गया है। यह व्रत दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को किया जाता है लेकिन वर्तमान में अधिकतर श्रद्धालुओं को इस व्रत की तिथि निर्धारण को लेकर बड़ा असमंजस बना रहता है, इसका मुख्य कारण है पंचांगों में दो दिन एकादशी व्रत का उल्लेख होना। इसके कारण श्रद्धालुगण इस दुविधा में रहते हैं कि वे आखिर किस दिन एकादशी का व्रत करें। आज हम "सरल-चेतना" के पाठकों के लिए इस दुविधा का समाधान हेतु कुछ शास्त्रसम्मत जानकारियां दे रहे हैं-

1. सूर्योदयव्यापिनी तिथि (उदयातिथि) की सर्वग्राह्यता-

शास्त्रानुसार एकादशी व्रत में सदैव सूर्योदयव्यापिनी तिथि जिसे लोकभाषा में "उदयातिथि" कहते हैं; उसे ही ग्रहण किया जाता है अर्थात् जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि होगी उसी दिन एकादशी तिथि का व्रत रखा जाना चाहिए।

2. स्मार्त, वैष्णव एवं सर्व के लिए निर्देश-

जैसा की पूर्व में सूर्योदयव्यापिनी तिथि (उदयातिथि) की सर्वग्राह्यता के सम्बन्ध में शास्त्र का मत पाठकों को बताया जा चुका है लेकिन अक्सर पंचांगों में यह दो दिन बताया जाता है ऐसा इसलिए है क्योंकि सनातन धर्मानुसार “स्मार्त व वैष्णव” की श्रेणी अनुसार किसी भी व्रत को किया जाना श्रेयस्कर माना गया है। पाठकों ने अक्सर पंचांग में व्रत के आगे "स्मार्त" एवं "वैष्णव" लिखा देखा होगा। यह इस बात का संकेत है कि "स्मार्त" वाले दिन केवल “स्मार्त” श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले श्रद्धालु उस व्रत को करेंगे एवं "वैष्णव" वाले दिन "वैष्णव" श्रेणी में आने वाले श्रद्धालुगण उस व्रत को करेंगे। जब व्रत के आगे "सर्वे." लिखा हो तो उस दिन "स्मार्त" एवं "वैष्णव" दोनों ही श्रेणी के श्रद्धालुगण उस व्रत को उस दिन कर सकते हैं। वर्तमान समय में कुछ पंचांगों में "निम्बार्क" भी लिखा जाने लगा है जिससे आशय है उस दिन "निम्बार्क" सम्प्रदाय के दीक्षित श्रद्धालु उस व्रत को करेंगे यद्यपि शास्त्रानुसार "स्मार्त" एवं "वैष्णव" श्रेणियां ही सर्वमान्य होती हैं।

"स्मार्त" व "वैष्णव" की श्रेणी में कौन आते हैं-

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पंचांग अनुसार "स्मार्त" व "वैष्णव" की श्रेणी अन्तर्गत तिथि सुनिश्चित होने के उपरान्त अब दुविधा यह होती है कि इन श्रेणियों में कौन से श्रद्धालुगण आते हैं। आईए जानते हैं-

1. स्मार्त- इस श्रेणी के अन्तर्गत सभी गृहस्थ एवं वे श्रद्धालु आते हैं जो किसी भी वैष्णव सम्प्रदाय से दीक्षित नहीं हैं अर्थात् जिन्होंने "वैष्णव" सम्प्रदाय के गुरू से दीक्षा प्राप्त नहीं की है।

2. "वैष्णव"- इस श्रेणी के अन्तर्गत वे सभी श्रद्धालु आते हैं जो वैष्णव सम्प्रदाय से दीक्षित हैं और जिन्होंने "वैष्णव" सम्प्रदाय के गुरू से दीक्षा प्राप्त की है।

3. "निम्बार्क"- इस श्रेणी के अन्तर्गत वे सभी श्रद्धालु आते हैं जो "निम्बार्क" सम्प्रदाय से दीक्षित हैं और जिन्होंने "निम्बार्क" सम्प्रदाय के गुरू से दीक्षा प्राप्त की है।

हमारा विश्वास है कि उपर्युक्त विश्लेषण से अब पाठकों को किसी भी व्रत की तिथि के निर्धारण में किसी प्रकार की कोई दुविधा नहीं रहेगी। उपरोक्त शास्त्रसम्मत निर्देश केवल एकादशी ही नहीं अपितु हर व्रत की तिथि निर्धारण में समान रूप से लागू होता है। प्राचीन समय से मान्यता है कि "वैष्णवों" का व्रत "स्मार्त" के अगले दिन ही होता है।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com