मित्रों, कुछ दिनों के बाद दीपावली है। बाज़ारों में चहुंओर रौनक ही रौनक है। हम सब इन दिनों तरह-तरह की खरीददारी करते हैं। इनमें सजावटी साजो-सामान से लेकर पूजा-पाठ तक की वस्तुएँ होती है। मुझे अधिक भीड़ अक्सर सजावटी सामान की लक-दक दुकानों पर दिखाई देती है जिसमें प्लास्टिक इत्यादि की फ़ूल मालाएँ, पेंटिंग व रंगीन लाईटें प्रमुख होती हैं। इन दुकानों पर सामान्यत: मोल-भाव नहीं होता क्योंकि ये दुकानदार अक्सर अपनी वस्तुओं के बताए मूल्य पर अड़े रहते हैं और उनकी इस बेमानी सी ज़िद के आगे हमें झुकना पड़ता है क्योंकि इन्हीं वस्तुओं को हम प्रदर्शित कर पाते हैं अर्थात् ये सारी वस्तुएँ प्रदर्शन के काम आती हैं। वहीं मेरी नज़र कुछ ऐसे दुकानदारों और बच्चों पर पड़ी जो नीचे ज़मीन पर बैठकर अपनी सामान्य सी वस्तुओं का विक्रय कर रहे थे जैसे रुई की पौनी, मोरपंख, खील-बताशे, मिट्टी के दीपक इत्यादि। किन्तु यह देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि इन दुकानदारों से लोग बड़ा मोल-भाव कर रहे थे। एक-एक पैसे को लेकर खींचतान मची हुई थी और अन्तत: उस बेचारे निरीह दुकानदार को इन चतुर चालाक क्रेताओं के आगे नतमस्तक हो झुकना पड़ रहा था। मेरा निवेदन है कि सजावटी सामानों की खरीद से दुकान अथवा शोरूम की सजावट का एक नया आयाम जुड़ता है किन्तु इन ज़मीन पर बैठे दुकानदारों की वस्तुओं की खरीद से इनके घर का चूल्हा जलता है; इनके घर दीप जलता है। इस दीपावली क्यों ना हम इनके घरों में दीप जलाने सँकल्प करें। अत: इस प्रकार के दुकानदारों से अतिशय मोल-भाव ना करें।
"आओ अबकी दीवाली कुछ यूं मनाएँकिसी बेबस के घर का दिया जलाएँ।"
दीपावली की शुभकामनाओं के साथ-
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र




