रविवार, 28 अक्टूबर 2018

आओ अबकी दीवाली कुछ यूं मनाएँ....विनम्र निवेदन


मित्रों, कुछ दिनों के बाद दीपावली है। बाज़ारों में चहुंओर रौनक ही रौनक है। हम सब इन दिनों तरह-तरह की खरीददारी करते हैं। इनमें सजावटी साजो-सामान से लेकर पूजा-पाठ तक की वस्तुएँ  होती है। मुझे अधिक भीड़ अक्सर सजावटी सामान की लक-दक दुकानों पर दिखाई देती है जिसमें प्लास्टिक इत्यादि की फ़ूल मालाएँ, पेंटिंग व रंगीन लाईटें प्रमुख होती हैं। इन दुकानों पर सामान्यत: मोल-भाव नहीं होता क्योंकि ये दुकानदार अक्सर अपनी वस्तुओं के बताए मूल्य पर अड़े रहते हैं और उनकी इस बेमानी सी ज़िद के आगे हमें झुकना पड़ता है क्योंकि इन्हीं वस्तुओं को हम प्रदर्शित कर पाते हैं अर्थात् ये सारी वस्तुएँ प्रदर्शन के काम आती हैं। वहीं मेरी नज़र कुछ ऐसे दुकानदारों और बच्चों पर पड़ी जो नीचे ज़मीन पर बैठकर अपनी सामान्य सी वस्तुओं का विक्रय कर रहे थे जैसे रुई की पौनी, मोरपंख, खील-बताशे, मिट्टी के दीपक इत्यादि। किन्तु यह देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि इन दुकानदारों से लोग बड़ा मोल-भाव कर रहे थे। एक-एक पैसे को लेकर खींचतान मची हुई थी और अन्तत: उस बेचारे निरीह दुकानदार को इन चतुर चालाक क्रेताओं के आगे नतमस्तक हो झुकना पड़ रहा था। मेरा निवेदन है कि सजावटी सामानों की खरीद से दुकान अथवा शोरूम की सजावट का एक नया आयाम जुड़ता है किन्तु इन ज़मीन पर बैठे दुकानदारों की वस्तुओं की खरीद से इनके घर का चूल्हा जलता है; इनके घर दीप जलता है। इस दीपावली क्यों ना हम इनके घरों में दीप जलाने सँकल्प करें। अत: इस प्रकार के दुकानदारों से अतिशय मोल-भाव ना करें।
                                           "आओ अबकी दीवाली कुछ यूं मनाएँ
                                            किसी बेबस के घर का दिया जलाएँ।"

दीपावली की  शुभकामनाओं के साथ-
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
 

बुधवार, 17 अक्टूबर 2018

शमी पूजन कर मनाएं विजयादशमी-

नवरात्र की पूर्णता के साथ ही देशभर में विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा। विजयादशमी का पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का सन्देश देता है। विजयादशमी पर्व है संकल्प का कि हम अपने अन्तर्तम में उपजी बुराईयों पर विजय प्राप्त कर सन्मार्ग पर अग्रसर हो सकें। देश के अलग-अलग हिस्सों में विजयादशमी का पर्व अपनी-अपनी लोकपरम्पराओं के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन रावण दहन भी किया जाता है जो बुराई एवं अहंकार का प्रतीक है। विजयादशमी के दिन शस्त्रपूजा एवं शमी वृक्ष की पूजा का विशेष महत्त्व होता है। विजयादशमी के दिन देश के कुछ हिस्सों में अश्व-पूजन भी किया जाता है। सनातन धर्मानुसार विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमी वृक्ष का पूजन अवश्य किया जाना चाहिए। आईए जानते हैं कि शमीवृक्ष का पूजन किस प्रकार किया जाना श्रेयस्कर रहता है-
- विजयादशमी के दिन प्रदोषकाल में शमीवृक्ष के समीप जाकर उसे प्रणाम करें। तत्पश्चात शमीवृक्ष की जड़ में गंगालज/नर्मदाजल/शुद्धजल का सिंचन करें। जल सिंचन के उपरान्त शमीवृक्ष के सम्मुख दीपक प्रज्जवलित करें। दीप प्रज्जवलन के पश्चात शमीवृक्ष के नीचे कोई सांकेतिक शस्त्र रखें। तत्पश्चात शमीवृक्ष एवं शस्त्र का यथाशक्ति धूप,दीप,नैवेद्य,आरती से पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करें। पूजन के उपरान्त हाथ जोड़कर निम्न प्रार्थना करें-
"शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।
अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥
करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।
तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता॥"
-अर्थात हे शमी वृक्ष आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं। आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय हैं। जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा की, हम भी करेंगे। हमारी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये।
-प्रार्थना उपरान्त यदि आपको शमीवृक्ष के समीप शमीवृक्ष की कुछ पत्तियां गिरी मिलें तो उन्हें आशीर्वाद स्वरूप ग्रहण कर लालवस्त्र में लपेटकर सदैव अपने पास रखें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि आपको शमीवृक्ष से स्वयमेव गिरी पत्तियां ही एकत्र करना है शमीवृक्ष से पत्तियां तोड़नी नहीं हैं। इस प्रयोग से आप शत्रुबाधा से मुक्त एवं शत्रु पराभव करने में सफ़ल होंगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

धर्म, आस्था और न्यायपालिका


विगत कुछ दिनों में देश की न्यायपालिका से कुछ ऐसे फ़ैसले आए जिन्हें स्वीकारने में समाज के एक बड़े वर्ग ने झिझक महसूस की। कुछ फ़ैसले सामाजिक सरोकारों से जुड़े थे, वहीं कुछ धार्मिक क्षेत्र से। इन फ़ैसलों ने देश में चिन्तन का एक नया अध्याय प्रारम्भ किया। समाज का प्रत्येक वर्ग इन फ़ैसलों को अपनी बुद्धिमत्ता के अनुसार अपनी तर्कसरणी की कसौटी पर कसकर जाँचने-परखने लगा और इन फ़ैसलों के पक्ष व विपक्ष में खड़ा होने लगा। अब प्रश्न यह उठता है कि लैंगिक समानता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और निजता के अधिकार की ढ़ाल के पीछे छिपकर अपनी सनातन सँस्कृति पर प्रहार करना कहाँ तक उचित व स्वीकार्य है। भारतीय मनीषा को इस यक्ष प्रश्न का उत्तर खोजना ही होगा। ईश्वर ने सभी व्यक्तियों को समान बनाया है यह बात सत्य है लेकिन इस समानता का आधार क्या है! क्या इस तथ्य को जानने व समझने का प्रयास कभी किया गया है? ईश्वर की बनाई समानता और इस समानता का तर्क देकर प्रकृति प्रदत्त विभेद को मिटाने का प्रयास दो विपरीत बाते हैं। जैसे ईश्वर ने प्रत्येक स्त्री-पुरूष को आत्मा व सात चक्रों के आधार पर समानता प्रदान की है किन्तु प्रकृति ने स्त्री-पुरूषों में शारीरिक भेद भी किया है। प्रकृति द्वारा किया गया यह भेद किसी भी प्रकार से नहीं मिटाया जा सकता। जो लैंगिक समानता की बातें करते हैं वे मूलरूप में अपने अहंकार को तुष्ट करने की बात करते हैं क्योंकि हमारे सनातन धर्म में कहीं भी स्त्री-पुरूषों में श्रेष्ठ व निकृष्ट का कोई भेद नहीं किया गया है। जिसे कुछ लोग असमानता समझने की भूल करते हैं वास्तविक रूप में वह स्त्री-पुरूष की विशिष्टताएँ हैं जो एक-दूसरे के समान नहीं हो सकती। स्त्री को जो विशिष्टताएँ प्राप्त हैं वह पुरूषों में नहीं हो सकती जैसे गर्भधारण व सन्तान को जन्म एवं उसे पोषण देना, ठीक पुरूषों में कुछ विशिष्टताएँ हैं जो स्त्री में नहीं हो सकती। हमारे सनातन धर्म में कई ऐसे कर्मकाण्ड हैं जिनमें स्त्रियों को वरीयता प्राप्त है इसका जीवन्त उदाहरण है- नवरात्रि में कन्या पूजन। हिन्दू देवी-देवताओं के नामों में भी अक्सर प्रथम नाम स्त्रीसूचक ही होता है जैसे राधाकृष्ण, लक्ष्मीनारायण, सीताराम आदि। इन बातों को श्रेष्ठ व निकृष्ट में बाँटकर सामाजिक सौहार्द को विखण्डित करना सर्वथा अनुचित है। अब बात करें लोक परम्पराओं व मान्यताओं की, तो हर देश; हर समाज; हर वर्ग एवं हर क्षेत्र की कुछ अपनी मान्याएँ होती हैं जिनसे सामाजिक ताना-बाना सुदृढ़ होता है। देश-काल-परिस्थिति के अनुसार समय-समय पर इन मान्यातों व परम्पराओं की समीक्षा होकर इनमें परिवर्तन भी होता रहता है किन्तु लोक-परम्पराओं व मान्यताओं में होने वाला यह परिवर्तन यदि जागरूकता के आधार पर होता है तब यह अधिक सुदृढ़ व ग्राह्य होता है। यदि यह परिवर्तन बलपूर्वक एक-दूसरे को नीचा दिखाकर जय-पराजय के उद्देश्य से किया जाता है तब यह सामाजिक विद्वेष का कारण बनता है। हमारे मतानुसार धर्म एक व्यवस्था है जो व्यवस्था बनाने में सहायक होता है वही धार्मिक है और जो व्यवस्था बिगाड़ता है वह अधार्मिक है। ईश्वर तो सभी प्राणियों को जन्म से ही प्राप्त है, साधना तो केवल उस जन्म से प्राप्त ईश्वर के अंश को अनुभूत करने मात्र की है। जब श्रद्धा से कहीं पर भी शीश झुका दिया जाता है तत्क्षण वहीं परमात्मा अवतरित हो जाता है और वह स्थल मन्दिर बन जाता है। भक्त और भगवान के मध्य ना तो मन्दिर की आवश्यकता है और ना ही किसी विशिष्ट कर्मकाण्ड या पूजा-पद्धाति की। भक्त और भगवान के मध्य यदि कुछ अनिवार्य है तो वह है-प्रेम। अब इस प्रेम को श्रद्धा कहें, भक्ति कहें, भाव कहें, पूजा-पद्धति कहें, या फ़िर लोकमान्यता कहें, जो भी नाम देना चाहें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जब भक्त का भाव ईश्वरानुराग में लग जाता है तब उसे किसी बाहरी वस्तु की कोई आवश्यकता नहीं होती। लोकपरम्पराओं व मान्यताओं के मध्य खींचतान अहंकार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अत: सामाजिक सौहार्द के लिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए है कि इन क्षेत्रों में हस्तक्षेप यदि आवश्यक हो तो वह जागरूकता के आधार पर हो ना कि बल के आधार पर। तभी हम हमारी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ समाज दे पाएँगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


सोमवार, 15 अक्टूबर 2018

महाआहुतियां अर्पण कर पाएं देवी का आशीर्वाद

नवरात्र के नौ दिनों में श्रद्धालुगण पूर्ण श्रद्धाभाव से देवी की आराधना करते हैं। नवरात्र के नौ दिन यथाशक्ति भगवती की पूजा-अर्चना के उपरान्त अन्तिम दिवस "महानिशा-पूजा" की जाती है। जिसमें राजराजेश्वरी माँ जगदम्बा की प्रसन्नता हेतु हवन किया जाता है। हमारे सनातन धर्म में किसी भी अनुष्ठान की पूर्णता हवन के माध्यम से ही की जाती है। देवी जी की आराधना में हवन का विशेष महत्त्व होता है। हवन के उपरान्त कन्या-भोज कराया जाता है। श्रद्धालुगण "महानिशा-पूजा" का हवन यथाशक्ति व सामर्थ्य अनुसार सम्पन्न कर सकते हैं। किन्तु जिन श्रद्धालुओं द्वारा नवरात्र में दुर्गासप्तशती के सम्पूर्ण तेरह अध्यायों का पाठ किया गया हो उन्हें दुर्गासप्तशती के मन्त्रों से हवन करना एवं प्रत्येक अध्याय की विशेष आहुति जिसे "महाआहुति" कहा जाता है, अर्पण करना श्रेयस्कर रहता है। जो श्रद्धालुगण सप्तशती के मन्त्रों से हवन करने के स्थान पर मात्र देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" का पाठ कर हवन एवं महाआहुतियाँ अर्पण करना चाहते हैं वे देवी के नवार्ण मन्त्र "ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै" की माला के उपरान्त प्रत्येक का अध्याय के निर्दिष्ट मन्त्र का उच्चारण करके माँ दुर्गा को "महाआहुति" अर्पण कर सकते हैं।
आईए जानते हैं कि सम्पूर्ण तेरह अध्यायों की महाआहुतियाँ कौन सी हैं-
1. पहला अध्याय-
मन्त्र- ॐ महाकाल्यै स्वाहा
महाआहुति- कमलगट्टा, काली मिर्च, शहद, महुआ, राई
2. दूसरा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- जायफ़ल, जावित्री, कद्दू, पीली सरसों, राई
3. तीसरा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- उड़द का बड़ा
4. चौथा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महालक्ष्म्यै स्वाहा
महाआहुति- पंचमेवा व छुआरा (खारक)
5. पांचवा अध्याय-
मन्त्र- ॐ महासरस्वत्यै स्वाहा
महाआहुति- शक्कर व गन्ना
6. छ्ठा अध्याय-
मन्त्र- ॐ धूम्राक्ष्यै स्वाहा
महाआहुति- जासौन का फ़ूल
7. सातवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ चामुण्डायै स्वाहा
महाआहुति- बीला (बिल्वफ़ल), बिल्वपत्र, पालक
8. आठवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ रक्ताक्ष्यै स्वाहा
महाआहुति- रक्त चन्दन
9. नौवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ भैरव्यै तारा देव्यै स्वाहा
महाआहुति- केला, नागरमोंथा, अगर, तगर
10. दसवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ भगवत्यै स्वाहा
महाआहुति- बिजोरा नींबू
11. ग्यारहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ नारायण्यै स्वाहा
महाआहुति- खीरपूड़ी
12. बारहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ राजराजेश्वर्यै स्वाहा
महाआहुति- दाड़िम (अनार)
13. तेरहवां अध्याय-
मन्त्र- ॐ दुर्गा देव्यै स्वाहा
महाआहुति- श्रीफ़ल 

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com