सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/ सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
रविवार, 29 जनवरी 2012
शनिवार, 28 जनवरी 2012
फेसबुक:रिश्तों की शुरूआत या मनोरंजन
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
किसको डालूं वोट रामजी
किसको डालूं वोट रामजी
सब में ही है खोट रामजी
किसको डालूं वोट...
वादों की भरमार है देखो
लूटा सब संसार है देखो
लोकतंत्र की मर्यादा पर
करते कैसी चोट रामजी
किसको डालूं वोट.....
नकली-नकली चेहरे हैं
राज़ बड़े ही गहरे हैं
सबने अपने मुखमंडल पे
डाली तगड़ी ओट रामजी
किसको डालूं वोट....
आज़ादी के खातिर देखो
कितने फांसी पर झूले
सत्तालोलुपता में नेता
वो कुर्बानी भूले
ऐसी बातें दिल को
मेरे रही कचोट रामजी
किसको डालूं वोट...
कवि-हेमंत रिछारिया
सब में ही है खोट रामजी
किसको डालूं वोट...
वादों की भरमार है देखो
लूटा सब संसार है देखो
लोकतंत्र की मर्यादा पर
करते कैसी चोट रामजी
किसको डालूं वोट.....
नकली-नकली चेहरे हैं
राज़ बड़े ही गहरे हैं
सबने अपने मुखमंडल पे
डाली तगड़ी ओट रामजी
किसको डालूं वोट....
आज़ादी के खातिर देखो
कितने फांसी पर झूले
सत्तालोलुपता में नेता
वो कुर्बानी भूले
ऐसी बातें दिल को
मेरे रही कचोट रामजी
किसको डालूं वोट...
कवि-हेमंत रिछारिया
रविवार, 15 जनवरी 2012
लक्ष्मीशंकर वाजपेयी
हमारी हर कहानी में तुम्हारा नाम आता है
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है।
ज़रा सी परवरिश भी चाहिए हर एक रिश्ते को
अगर सींचा ना जाए तो पौधा सूख जाता है।
ये मेरे और ग़म के बीच में रिश्ता है बरसों से
मैं उसको आज़माता हूं वो मुझको आज़माता है।
जिसे चींटी से लेकर चांद-सूरज सब सिखाया था
वही बेटा बडा़ होकर सबक मुझको सिखाता है।
ये कैसे सबको समझाएं कि तुमसे कैसा नाता है।
ज़रा सी परवरिश भी चाहिए हर एक रिश्ते को
अगर सींचा ना जाए तो पौधा सूख जाता है।
ये मेरे और ग़म के बीच में रिश्ता है बरसों से
मैं उसको आज़माता हूं वो मुझको आज़माता है।
जिसे चींटी से लेकर चांद-सूरज सब सिखाया था
वही बेटा बडा़ होकर सबक मुझको सिखाता है।
दीक्षित दनकौरी
ज़ख्म मैं इसलिए दिखाता हूं
मैं तेरा हौंसला बढा़ता हूं।
सब्र करता हूं लाख मैं लेकिन
बांध की तरह टूट जाता हूं।
दर्द ज़ाहिर कभी नहीं करता
मैं ज़ालिम को यूं सताता हूं।
जानता हूं मैं मिज़ाज़ उनका
इसलिए हां मे हां मिलाता हूं।
मैं तेरा हौंसला बढा़ता हूं।
सब्र करता हूं लाख मैं लेकिन
बांध की तरह टूट जाता हूं।
दर्द ज़ाहिर कभी नहीं करता
मैं ज़ालिम को यूं सताता हूं।
जानता हूं मैं मिज़ाज़ उनका
इसलिए हां मे हां मिलाता हूं।
गोविंद गुलशन
वो साथ निभाने के बाद भी
रूठे हुए हैं मनाने के बाद भी
आते रहे याद भुलाने के बाद भी
जलता रहा चिराग बुझाने के बाद भी
उनसे मिले हुए ज़माना गुज़र गया
है इंतज़ार उनका ज़माने के बाद भी
जादू है तेरे नाम में या मेरे हाथ में
उभरा है तेरा नाम मिटाने के बाद भी
रूठे हुए हैं मनाने के बाद भी
आते रहे याद भुलाने के बाद भी
जलता रहा चिराग बुझाने के बाद भी
उनसे मिले हुए ज़माना गुज़र गया
है इंतज़ार उनका ज़माने के बाद भी
जादू है तेरे नाम में या मेरे हाथ में
उभरा है तेरा नाम मिटाने के बाद भी
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