
मुझे "फेसबुक" के मंच पर अपने आप को साझा करते हुए एक लम्बा समय बीत चुका है। इस बीच मेरी मित्र संख्या अर्धशतक को पार कर चुकी है। इनमें से अधिकांश मेरे वे मित्र हैं जिन्हे मैं पहले से ही जानता था और निरंतर संपर्क में था। वहीं दूसरे वे मित्र है जिनसे मैं "फेसबुक" के माध्यम से मिला। जिन मित्रों को मैं "फेसबुक" के माध्यम से मिला उन मित्रों में से कुछ मित्रों की मित्र संख्या हजार के भी पार जा चुकी है। ये एक अच्छी बात है परंतु उनमें से अधिकांश मित्रों से जब मैंने संदेशो के माध्यम से मित्रता को परवान चढा़ने का प्रयास किया या जब कभी वे "चैट" के लिए उपलब्ध हुए; बात करने की कोशिश की तो उनकी ओर से कोई भी प्रत्युत्तर नहीं मिला। ऐसा एक बार नहीं अपितु अक्सर हुआ लिहाज़ा मुझे उन्हें अपनी मित्र-सूची से हटाना पड़ा। जिसके कारण मेरी मित्र-सूची लगभग स्थिर रही; कारण साफ़ था, मैं किसी के जीवन में एक संख्या मात्र बनकर नहीं रहना चाहता लिहाज़ा इसमें कई नाम जुड़ते और हटते रहे। यहां एक बात काबिले-गौर है कि अक्सर अधिकांश मित्र केवल अपनी मित्र संख्या बढ़ाने में रूचि दिखाते हैं ना कि मित्रता निभाने में। शायद वे सोचते होंगे कि मित्र संख्या जितनी ज़्यादा होगी वे उतने ही व्यवहार कुशल और सामाजिक प्राणी माने जाएंगे। भले ही वे अपने सभी मित्रों से एक बार भी संदेशों का आदान-प्रदान ना करें। मित्रों की "पोस्ट" पर टिप्पणी करना एक बात है वहीं मित्रों से बात करना और उनसे मित्रता निभाना दूसरी बात। यदि आप यह नहीं कर सकते तो आपको मित्र बनाने का कोई अधिकार नहीं है। पुराने ज़माने में शादी विवाह, जन्म-मरण, धार्मिक आयोजन ये सभी मित्रता के लिए मंच के रूप में उपयोग किए जाते थे। यहीं पर मित्रता का बीज पड़ता था। परंतु वर्तमान समय में व्यक्ति भौतिकवाद में उलझ कर रह गया है जिसके फलस्वरूप उसके पास समय का बेहद अभाव हो गया है। मार्क ज़करबर्ग ने शायद आधुनिक मनुष्य की इसी नब्ज़ को पकड़कर "फेसबुक" जैसा मंच हमें उपलब्ध कराया। जिसके माध्यम से हम बिना अधिक समय गवांए अपने जीवन में एक नया मित्र जोड़ सकते हैं। जो शारीरिक रूप से भले हमसे कोसों दूर हो। परंतु इस बेहतरीन मंच का उपयोग जिस तरह किया जा रहा है वह बेहद निराशाजनक है। आज "फेसबुक" महज़ मनोरंजन और टाइम पास का साधन मात्र बनकर रह गया है। जबकि यह समाज में एक नए अध्याय की शुरूआत कर सकता था। ज़रा सोचिए कितना अच्छा हो यदि आपकी ज़िंदगी में कोई ऐसा मित्र आए जो आपके जीवन को नई दिशा प्रदान करे या जिसके सामने आप अपना दिल किसी किताब की भांति खोल कर रख सकें और वो मित्र आपको "फेसबुक" जैसे किसी मंच के माध्यम से मिला हो। मेरा अति-विनम्र निवेदन बस इतना ही है कि यदि आप मित्रता निभा नहीं सकते हैं, अपने मित्रों से बात नहीं कर सकते हैं या उनके भेजे हुए संदेशो का समुचित प्रत्युत्तर नहीं दे सकते तो किसी के भी मित्रता निमंत्रण को महज़ अपनी मित्र संख्या बढ़ाने के लिए स्वीकार मत कीजिए। कोई आपकी ज़िंदगी में संख्या बनकर नहीं बल्कि आपके दिल का हिस्सा बनकर जुड़ना चाहता है।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
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