गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

"समाज आगे सत्ता पीछे, तभी होगा स्वस्थ विकास"- गोविन्दाचार्य

  नर्मदा यात्रा व अध्ययन प्रवास पर निकले देश के प्रसिद्ध चिन्तक, विचारक और एक समय बीजेपी का "थिंक टैंक" माने जाने वाले श्री के.एन.गोविन्दाचार्य अपनी यात्रा प्रवास के दौरान 25 फरवरी 2021 को डोंगरवाड़ा नर्मदा तट पर स्थित "नर्मदा आश्रम" पहुंचे। उनकी इस यात्रा में सहयात्री बने ज्योतिषाचार्य पं. हेमन्त रिछारिया ने उनसे विभिन्न विषयों पर चर्चा की। प्रस्तुत है ज्योतिषाचार्य पं. हेमन्त रिछारिया के साथ श्री गोविन्दाचार्य की बातचीत के प्रमुख अंश-

  • पं. रिछारिया- आपकी नर्मदा यात्रा का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
  • श्री गोविन्दाचार्य-मेरी यह यात्रा नितान्त धार्मिक व आध्यात्मिक है। अपने अन्दर खुद को देखने की कोशिश है और नर्मदा मैया से प्रार्थना कि वे हमें आगे की राह दिखाएं। इस यात्रा का उद्देश्य बस इतना ही है।
  • पं. रिछारिया-हमारे देश में राजपथ है, राजभवन है, राजनीति है, नेताओं का व्यवहार राजा के जैसा है। क्या हम लोकतन्त्र की परिभाषा में चूक कर रहे हैं?
  • श्री गोविन्दाचार्य-हम पहले से चूक गए हैं। आजादी के पहले, आजादी के बाद की संरचना के लिए गांधी जी ने तीन विषयों पर विशेष जोर दिया, एक था सम्पूर्ण गौरक्षा, सम्पूर्ण गौहत्या बन्दी कानून बनना चाहिए। दूसरा था भारतीय भाषाओं को महत्त्व देना, अंग्रेजी जाए-अंग्रेजियत जाए। तीसरा ग्रामस्वराज्य की बात कही थी, उसके लिए पंचायतों को, ग्राम-सभाओं को मजबूत करना चाहिए, वो भी छूट गया। बहुत मुश्किल से गौहत्या बन्दी और पंचायती राज को संविधान के निदेशित सिद्धान्तों में समाविष्ट किया गया है। उसके बाद भी आधा-अधूरा काम हुआ जो व्यस्थित रूप से नहीं हो पाया। यहीं जो हम चूके, रास्ता भूल गए कहीं निकल गए। इसका मूल कारण मैं मानता हूं आत्मविश्वास का अभाव। आत्मविश्वास के अभाव में स्वालम्बन ना होकर परावलम्बन की नीति अपनाई। आत्मविश्वास का आधार होना चाहिए था स्वाभिमान, स्वाभिमान का आधार होना चाहिए था स्वत्व-बोध। स्वत्व-बोध में भारत की परम्परा के बारे में मन में अभिमान, वो चूक गए हम रास्ता, परानुकरण में लग गए। कभी देश को कुछ लोग रूस बनाने में लग गए, कभी चीन बनाने में लग गए, कभी अमेरिका बनाने में लग गए, आजकल कुछ लोग ब्राजील बनाने के चक्कर में हैं।
  • पं. रिछारिया-आपने कुछ वर्ष पूर्व कहा था कि राजनीति समाजाभिमुख होना चाहिए, सत्ताभिमुख नहीं। आज की राजनीति को कैसे देखते हैं, कुछ प्रगति हुई है?
  • श्री गोविन्दाचार्य-प्रगति तो समाज की ओर से हुई है मैं यह मानता हूं, राजनैतिक लोगों के द्वारा यह प्रगति नहीं हुई है। समाज जरूर मुंह फेर रहा है राजनैतिक लोगों से, राजनैतिक लोगों की प्रतिष्ठा व साख बुरी तरह गिरी है समाज की नज़रों में, यह समाज का वैशिष्ट है। राजनीति सामाजिक बदलाव का औज़ार ना रहकर सत्ता प्राप्ति का निरंकुश खेल बनकर रह गई है। इसमें येन-केन-प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना और उस पर टिके रहना यही मानो लक्ष्य रह गया है। इसमें जनता की ओर से ही परिवर्तन की मुहिम चलानी पड़ेगी ऐसा मुझे लगता है।
  • पं. रिछारिया-राजनैतिक लोगों की प्रामाणिकता के पतन के पीछे आम जनता का कितना दायित्व व दोष देखते हैं आप?
  • श्री गोविन्दाचार्य-लोकतन्त्र में तो जन ही सर्वाधिक निर्णायक व सर्वोपरि है। जन की चेतना, जन की समझ और जन की हिस्सेदारी यही लोकतान्त्रिक प्रगति के रास्ते का उसूल है। इसमें समाज के स्तर पर और बहुत कुछ होना चाहिए था। राष्ट्रीय सत्ताभिमुखी ना हो समाज, समाज खुद अपना आंकलन करना सीखे। अब के वक्त का तकाज़ा है सही बात को डटकर बोले, जो जहां है वहीं से बोले, यह समाज पर ज्यादा लागू होता है बनिस्बत सत्ता के।
  • पं. रिछारिया- लेकिन आज समाज के बीच से कोई आवाज़ उठती है तो उसे देशद्रोह मान लिया जाता है।
  • श्री गोविन्दाचार्य-मानने या ना मानने का निर्णय करने वाले वे कौन होते हैं, समाज होता है। समाज आत्मविश्वास से अपने विवेक का इस्तेमाल करे और समाज में सत्ता की आपाधापी में ना लगने वाले लोग देश की आवाज़ बने यह आज देश की सबसे बड़ी ज़रूरत है। समाज के स्तर पर समझ भी है केवल किंकर्तव्यविमूढ़ता थोड़ी सी है इसलिए सिविल सोसायटी इसको कहा जाता है, सिविल सोसायटी का भारतीय संस्करण उत्पन्न होने की ज़रूरत है। इसमें मेरा कहना है कि धर्म-सत्ता, समाज-सत्ता, राज-सत्ता और अर्थ-सत्ता चारों स्तरों पर सत्ता की आपाधापी में ना उलझने वाले साखयुक्त लोगों की ताकत बननी चाहिए जिसको मैं कहता हूं सज्जन-शक्ति का आग्रह।
  • पं. रिछारिया-आपको नहीं लगता कि आज जनप्रतिनिधियों ने लोकतन्त्र को शीर्षासन करवा दिया है? जनप्रतिनिधियों का कार्य है लोक की बात संसद तक पहुंचे परन्तु वे उल्टे दल की बात लोगों तक पहुंचाने लगे हैं।
  • श्री गोविन्दाचार्य-मानता हूं, मगर इसमें दोष किसका कहें जब कुएं में ही भांग पड़ी हो तो बाल्टी में निकालिए तो भी वही मिलेगा, लोटे में निकालिए तो भी वही मिलेगा इसलिए बात तो वहां है कि समाज के स्तर पर चेतनासमग्र हिस्सेदारी बढ़ाने की ज़रूरत है। मैं मानता हूं कि वह निचले स्तर से ही शुरू होना पड़ेगा। उच्च-स्तर पर बदलाव का उत्तर ही है निचले स्तर से शुरूआत। समाज आगे सत्ता पीछे, तभी होगा स्वस्थ विकास।
  • पं. रिछारिया-आप पर्यावरण प्रदूषण के लिए बौद्धिक प्रदूषण को कितना ज़िम्मेवार मानते हैं?
  • श्री गोविन्दाचार्य-भारत का आधार है संयमित उपभोग, पश्चिम बाजारवाद का उसूल है पाशविक उपभोग। मूलत: उपभोग में संयम जीवनशैली का हिस्सा है। इसके लिए धर्म-सत्ता, समाज-सत्ता आगे बढ़े और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करे, यह वक्त की ज़रूरत है।
  • पं. रिछारिया-क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने चरमोत्कर्ष के बाद अब उतार की ओर अग्रसर है?
  • श्री गोविन्दाचार्य-मुझे तो यह नहीं मालूम। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सत्ता पर निर्भर नहीं है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार तो भरपूर हुआ है। दुनियाभर में सबसे बड़ा संगठन है। समाज के अराजक तत्वों पर अगर कोई सबसे बड़ा अवरोध है तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।

                   


 

 

 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

जन्मपत्रिका में ज्योतिषी बनने के योग

 

आज जैसे-जैसे विज्ञान प्रगति के सोपान चढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ज्योतिष व विज्ञान का फ़ासला कम होता जा रहा है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आने वाले कुछ दशकों में ज्योतिष विज्ञान के रूप में प्रसिद्धि पा लेगा लेकिन यह तभी सम्भव है जब श्रेष्ठ व विद्वान ज्योतिषीगण ज्योतिष कार्य को रूढ़िगत सिद्धान्तों एवं व्यावसायिक मापदण्डों से ऊपर उठकर अनुसंधनात्मक एवं शोधपरक रूप में करें। क्या यह योग्यता हर ज्योतिषी को अनिवार्यरूपेण प्राप्त हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर भी हमें ज्योतिशास्त्र में ही मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में एक श्रेष्ठ ज्योतिषी या भविष्यवक्ता बनने के कुछ विशेष योगों व ग्रहस्थितियों का उल्लेख हमें प्राप्त होता है। यह विशेष ग्रहस्थितियां व योग यदि किसी जातक की जन्मपत्रिका में हों तो वह एक श्रेष्ठ व अनुसंधानात्मक ज्योतिष कार्य करने वाला ज्योतिषी होता है। किसी भी ज्योतिषी की पत्रिका का विश्लेषण कर यह पता लगाया जा सकता है कि उसमें भविष्यकथन करने की योग्यता है भी या नहीं। एक आध्यात्मिक व श्रेष्ठ ज्योतिषी की पहचान उसकी जन्मपत्रिका में स्थित ग्रहों की विशेष स्थिति से सरलता से की जा सकती है। आईए जानते हैं कि वे कौन से ग्रह, योग व ग्रहस्थितियां होती हैं जिनके फलस्वरूप जातक एक श्रेष्ठ भविष्यवक्ता बन सकता है।
 
गुरू की शुभ स्थिति-
श्रीमद्भगवदगीता में कहा गया है "गहना कर्मणो गति:" अर्थात् कर्म की गति गहन है। मनुष्य के संचित कर्मों से ही "प्रारब्ध" का निर्माण होता है। जातक को जन्मपत्रिका में जो भी शुभाशुभ योग व ग्रहस्थितियां प्राप्त होती हैं वे सभी पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम होती हैं। कर्म के सिद्धान्त को समझ पाना एक दुष्कर कार्य है जो बिना विवेक के असम्भव है। ज्योतिष शास्त्र में गुरू को बुद्धि, विवेक व अध्यात्म का प्रतिनिधि ग्रह माना गया है। अत: एक श्रेष्ठ ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में गुरू की शुभ स्थिति होना अनिवार्य है। एक विद्वान ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में गुरू का केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ, स्वग्रही, उच्चग्रही, उच्चाभिलाषी ग्रह होना आवश्यक है। गुरू की शुभ स्थिति के बिना कोई भी जातक अच्छा ज्योतिषी नहीं बन सकता। 

बुध की शुभ स्थिति-

ज्योतिष शास्त्र में बुध को वाणी का नैसर्गिक कारक माना गया है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी के लिए वाक् सिद्धि होना आवश्यक है। बिना वाणी को सिद्ध किए कोई भी जातक एक सफल भविष्यकवक्ता नहीं बन सकता। वाक् सिद्धि के लिए बुध का शुभ स्थिति में होना अनिवार्य है। बुध की शुभ स्थिति के लिए बुध का जन्मपत्रिका में केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ व उच्चराशिस्थ या उच्चाभिलाषी होना आवश्यक है।

सूर्य की शुभ स्थिति-

ज्योतिष शासत्रानुसार सूर्य आत्मा का कारक है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी तब तक आध्यात्मिक रूप से समृद्ध नहीं होगा जब तक की उसकी जन्मपत्रिका में सूर्य की शुभ स्थिति नहीं होगी। आध्यात्मिक ज्योतिषी के लिए सूर्य का केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ व उच्चराशिस्थ या उच्चाभिलाषी होना आवश्यक है।

बुध-गुरू का सम्बन्ध-

ज्योतिष शास्त्र के नियमानुसार बुध एवं गुरू के परस्पर प्रबल सम्बन्ध के बिना कोई जातक श्रेष्ठ भविष्यवक्ता नहीं बन सकता। विद्वान भविष्यवक्ता की जन्मपत्रिका में बुध व गुरू का पारस्परिक सम्बन्ध होना अनिवार्य है। ये सम्बन्ध चार प्रकार से क्रमश: प्रबलता प्राप्त करता है-

1. बुध-गुरू की युति

2. बुध-गुरू का दृष्टि सम्बन्ध

3. बुध-गुरू अधिष्ठित राशिस्वामी का दृष्टि सम्बन्ध

4. बुध-गुरू का परस्पर राशि परिवर्तन सम्बन्ध

पंचम् भाव एवं पंचमेश- 

जन्मपत्रिका के पंचम् भाव को उच्चशिक्षा एवं विवेक का प्रतिनिधि भाव माना जाता है। पंचम् भाव का अधिपति विवेक व बुद्धि का तात्कालिक कारक होता है। एक अच्छे ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में पंचमेश का शुभ भावों में स्थित होना आवश्यक है एवं पंचम् भाव पर किसी अशुभ ग्रह का प्रभाव भी नहीं होना चाहिए। 

अष्टम् भाव व केतु की भूमिका भी महत्तवपूर्ण-

ज्योतिष शास्त्रानुसार केतु को मोक्ष का कारक माना गया है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी तभी सटीक भविष्यवाणी कर सकता है जब उसे पराविज्ञान का लाभ मिले। जन्मपत्रिका का अष्टम् भाव आयु के साथ-साथ पराविद्याओं का भी होता है यदि अष्टम् भाव का सम्बन्ध किसी प्रकार से भी केतु से हो तो ऐसे जातक को पराविद्या का लाभ किसी वरदान की तरह प्राप्त होता है। इस योग के फलस्वरूप वह जातक सटीक भविष्यसंकेत करने में सक्षम होता है।

उपर्युक्त ज्योतिषीय विवेचन के आधार पाठकगण यह भलीभांति समझ चुके होंगे कि ऊपर वर्णित ग्रहस्थिति के बिना कोई भी जातक श्रेष्ठ व प्रामाणिक ज्योतिषी नहीं बन सकता है। यहां पाठकों को यह बताना लाभदायक होगा कि हमारी जन्मपत्रिका में ऊपर वर्णित ग्रहस्थितियों में से अधिकांश ग्रहस्थितियां (प्रत्येक सिद्धान्त में से एक अवश्य उपस्थित) निर्मित हुई हैं। मुझे विश्वास है कि अब ज्योतिष-शास्त्र की प्रामाणिकता का निर्णय आप सभी सुधि पाठकगण भलीभांति कर सकेंगे।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com