चिर सजग आंखें उनींदी;
आज कैसा व्यस्त बाना
जाग तुझे है दूर जाना!
अचल हिमगिरी के हर्द्य में आज चाहे कंप हो ले
या पृलय के अश्रऊओं में मौन अलसित व्योम रो ले
आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया
जागकर विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले
जाग तुझे है दूर जाना...
बांध लेंगे क्या तुझे ये मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेगें तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का कृंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन?
क्या डुबो देंगे तुझे ये फूल के दल ओस गीले?
तू न अपनी छांव को अपने लिये कारा बनाना
जाग तुझे है दूर जाना...!
-महादेवी वर्मा
सफलता के गगन छूकर धरा पर लौट आएंगे