गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

जय हो नर्मदा मैया...


वाह रे वाह मेरे भैया, जय हो नर्मदा मैया...
खोद दिया नगर सारा नर्मदाजल के नाम पर,
जनता को हैं लूट रहे थोथे विकास के काम पर।
पहले ही क्या माँ रेवा का आँचल साफ़-स्वच्छ रहा है!
शहर के गन्दे नालों का पानी निर्बाध उसमें बहा है।
अब वही दूषित जल जनता को पिलाओगे
हाय! नर्मदाजल घर के शौचालयों में डलवाओगे
माँ रेवा की खोह तो आज तक ना भरने पाई
रेत खोदने लेकिन तट पर मशीनें चलवाईं
इस पर भी अच्छे दिनों का दे रहे झूठा दिलासा
भ्रष्टाचार हुआ कितना बाद में होगा खुलासा
विकास हेतु निरीह जनों के सिर पर कर चढ़ा है
रातों-रात झट से देखो सम्पत्ति-कर बढ़ा है
कौन जाने विकास या विनाश की ये परिभाषा
जनता समझ ना पाती है राजनीति की भाषा
बस निवेदन है इतना चैन से जन को रहने दो
माँ रेवा का जल उसके अंक में कलकल बहने दो
शिखर चढ़ी धूल भी क्षण भर को तो इठलाती है
पवन के इक झोंके से लेकिन धूलधूसरित हो जाती है
फिर लोकतन्त्र में "दिनकर" की कविता पुन: दुहराती है
"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

’अप्पा सो परमप्पा‌’


आज बुद्ध और महावीर के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ गई। बुद्ध और महावीर दोनों ही ने परमात्मा को इनकार कर दिया था। महावीर ने तो यहाँ तक कहा कि -"अप्पा सो परमप्पा" अर्थात् आत्मा ही परमात्मा है। वहीं बुद्ध का प्रसिद्ध वचन है -"अप्प दीपो भव:" अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो। बौद्ध और जैन दोनों ही दर्शनों में आत्मा के ऊपर किसी आकाशीय परमात्मा स्वीकार नहीं है। मेरे देखे यह उचित ही है। हमारे सनातन धर्म में आत्मा के ऊपर परमात्मा को स्वीकार किया गया है। इसका आशय यह नहीं कि बुद्ध और महावीर परमात्म तत्व से अपरिचित थे, नहीं.. कदापि नहीं, वे भलीभाँति परिचित थे किन्तु उन्होंने जनमानस को आत्मा पर ही रोके रखा क्योंकि वे जानते थे कि जो आत्मा को जानने में सक्षम हो गया वह परमात्मा से साक्षात्कार कर ही लेगा। यदि आत्मा को जाने बिना परमात्मा को समझने का प्रयास किया तो वह झूठ होगा। वर्तमान में हमारे कई तथाकथित साधु-सन्तों द्वारा अपने निजी स्वार्थ व लाभ के लिए परमात्मा के नाम पर झूठ को खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया गया है। आखिर ये कैसे सम्भव है कि देश में धर्मगुरूओं व धार्मिक आयोजनों में निरन्तर वृद्धि होती रहे और समाज आध्यात्मिक रूप से कँगाल होता रहे? इस समस्या का मुख्य कारण है परमात्मा के नाम पर फ़ैलाया गया झूठ और फ़रेब। जब तक असल प्रचलन में है तभी तक नकल की सँभावना होती है जब असल ही विदा हो जाता है तो समाज में नकल का कोई स्थान नहीं रहता। ये हमने अभी कुछ ही वर्षों पूर्व "विमुद्रीकरण" (नोटबन्दी) के रूप देख लिया है। बुद्ध और महावीर ने यही किया था, मनुष्य से उसका आकाशीय परमात्मा छीन कर उसे उसी के अन्दर प्रतिष्ठित आत्मा पर ला खड़ा किया था। क्योंकि जब परमात्मा से ही इनकार कर दिया जावेगा तो कोई व्यक्ति, बाबा या सन्त अपने परमात्मा होने का दावा करेगा कैसे! स्वर्ग-नर्क की बात तो फ़िर बेमानी ही समझिए, जिसके नाम पर लोगों को डराया या प्रलोभन दिया जाता है। यहाँ मुझे स्मरण आता है प्रबुद्ध महिला सन्त राबिया का जो सदैव अपने एक हाथ में मशाल और दूसरे में पानी का पात्र रखती थी और पूछने पर कहती थी कि "मैं मशाल से स्वर्ग में आग लगा दूँगी और नर्क को पानी में डुबो दूँगी। आशय बहुत स्पष्ट है कि स्वर्ग-नर्क, परमात्मा के नाम पर जो खेल चल रहा है उसे समाप्त करना ही सच्चे सन्त का लक्षण है। जो धर्मगुरू धर्म के नाम पर झूठ के इस जाल को काटने के स्थान पर और अधिक बुनता है उसे धर्मगुरू या उपदेशक कहना सर्वथा अनुचित है। जब तक ऐसे तथाकथित धर्मगुरू व उपदेशक समाज में रहेंगे तब तक आम आदमी का इस प्रकार के फ़र्जी बाबाओं के चँगुल से मुक्त हो पाना मुश्किल है।
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया


रविवार, 17 दिसंबर 2017

क्या वर्ष बदलने से बदलेगा आपका भाग्य..!


अंग्रेजी नववर्ष 2018 आने वाला है। नववर्ष के आगमन के हर्ष के साथ सभी को उत्सुकता है कि उनके लिए यह नववर्ष कैसा रहेगा? समाचार-पत्रों, न्यूज़ चैनलों इत्यादि पर ज्योतिषाचार्यों, टैरोकार्ड रीडर, अंक ज्योतिषियों की आपका भविष्य बताने वाली गणनाएँ प्रसारित हो रही हैं। जिनकी राशि या मूलाँक में शुभफ़ल बताया जा रहा है वे प्रफ़ुल्लित हैं वहीं अशुभ फ़ल वाले जातक मायूस हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने से आपके भविष्य में कोई बड़ा परिवर्तन या बदलाव नहीं आता है। आप जिसे वर्षफ़ल समझ रहे है वह केवल "गोचर" गणना है। जो प्रतिमाह परिवर्तित होती है। कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने के अवसर पर "वर्षफ़ल" के नाम पर जातक के पूरे वर्ष का फ़लित बताना उचित नहीं है क्योंकि गोचर आधारित गणनाएँ प्रतिमाह परिवर्तित होती रहती हैं। ज्योतिष शास्त्र में "गोचर" का महत्त्वपूर्ण स्थान है लेकिन जातक का भविष्यफ़ल बताने में इसकी गणनाओं को 10 से 15 फ़ीसदी ही मूल्य दिया जाता है। फ़िर वर्षफ़ल क्या होता है? सही मायने में "वर्षफ़ल" आपके प्रत्येक जन्मदिन से परिवर्तित होता है ना कि कैलेण्डर या पँचांग का वर्ष बदलने से। इसमें आपके नवीन वर्ष की "वर्ष-कुण्डली" बनाकर आपका वर्षफ़ल बताया जाता है। किसी जातक का भविष्यफ़ल बताने के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक उसकी जन्मपत्रिका के मुख्य व महत्त्वपूर्ण शुभाशुभ योग, ग्रहस्थिति, विंशोत्तरी दशाएँ, योगिनी दशाएँ, गोचर, और अन्त में उस जातक का वर्षफ़ल होते हैं। वर्षफ़ल में "मुँथा" एवं "मुँथेश" का विशेष महत्त्व होता है। "मुँथा" एवं "मुँथेश" की स्थिति का जातक के वर्षफ़ल में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है।

मुँथा का निर्धारण- 

जातक की जन्मलग्न सँख्या में उसकी वर्तमान आयु के वर्ष जोड़कर 12 से भाग देने पर जो शेष बचता है उस राशि की "मुँथा" होती है। "मुँथा" राशि के स्वामी ग्रह को "मुँथेश" कहते हैं।

मुँथा की स्थिति-

यदि जातक की वर्षकुण्डली में "मुँथा" जन्मलग्न व राशि से 4.6.८.12 स्थानों में स्थित हो एवं पाप ग्रहों से दृष्ट हो जातक को उस वर्ष कष्ट एवं कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। वहीं यदि "मुँथा" जन्मलग्न व राशि से 2.3.9.12 में हो तो यह शुभ होती है। जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम् राशि का वर्षलग्न अशुभ होता है।
"वर्षफ़ल" का विषय अत्यन्त वृहद् व विस्तृत है। हमने यहाँ वास्तविक वर्षफ़ल का परिचय कराने के उद्देश्य मात्र से उपर्युक्त सँक्षिप्त जानकारी आप पाठकों को दी है। अत: यदि कैलेण्डर के वर्षफ़ल बदलने पर किसी भविष्यवक्ता की गणना आपके पक्ष में नहीं है या आपकी राशि के लिए उसका फ़ल अशुभ है तो चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारा विश्वास है कि अब आप "वर्षफ़ल" के विषय में भलीभाँति जान गए होंगे।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astrpoint_hbd@yahoo.com

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

मुख्यमंत्री की यात्राएँ

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जिन्हें प्रदेशवासी प्यार से ’मामा’ कहते हैं, उनका चुनावी तैयारी का अँदाज़ ही निराला है। वे चुनावी यात्रा निकालने में बड़े माहिर है और मजे की बात यह कि वे इस प्रकार की यात्राएँ धर्म के नाम पर करते हैं। पहले "नर्मदा सेवायात्रा" और अब "एकात्म यात्रा"। इन यात्राओं का उद्देश्य वैसे तो धार्मिक बताया जाता है लेकिन असल में ये होतीं चुनावी यात्राएँ ही हैं। इन यात्राओं के प्रचार-प्रसार में करोड़ों रूपए खर्च कर दिए जाते हैं केवल यह जानने के लिए कि हवा का रुख़ किस तरफ़ है। ’मामा’ आप निश्चिंत रहिए जब तक मध्यप्रदेश में किसी ’मौसा’ (सशक्त विपक्ष) का आगमन नहीं होता तब तक आप मज़े से "मेरी मर्ज़ी...." वाली तर्ज पर राज कीजिए। क्योंकि आपको सत्ता के सिंहासन उतारने के लिए मुद्दों की नहीं एक ’मौसा’ की अर्थात् सशक्त विपक्षी नेतृत्व की आवश्यकता है। मुद्दे तो वैसे ही प्रदेश में भरे पड़े हैं। आपसे रेत का अवैध उत्खनन रुक नहीं रहा, कोई नया उद्योग लग नहीं रहा, मेट्रो प्रोजेक्ट लगाने वाली कम्पनी ’ज़ायका’ ने अपने ऋण की सुरक्षा ना पाकर इस प्रोजेक्ट से अपने पैर वापस खींच लिए। किसानों में नाराजगी व्याप्त है, भले किसानों पर गोली चलवा कर आप आँदोलन को दबाने में सफ़ल हो गए हों। टीकाकरण में हमारा प्रदेश बहुत पीछे है। महिलाओं के साथ हुए अपराध में मध्यप्रदेश अव्वल है। सरप्लस बिजली उत्पादन के बावजूद हमारा प्रदेश सबसे महँगी बिजली दर वाले प्रदेशों से में से एक है। ये तो सिर्फ़ बानगी है ऐसे कई मुद्दे हैं जो आपके माथे पर बल डालने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन जनता विवश है उसके पास ’मामा’ के रुप में आप तो हैं लेकिन विकल्प के रूप में कोई ’मौसा’ नहीं हैं अर्थात् शक्तिशाली विपक्ष। मेरे देखे विवशता और विकल्प के अभाव में होने वाली विजयश्री खोखली व हल्की होती है। जब इसी आधार पर विजयश्री की निरन्तर पुनरावृत्ति होती है तब एक दिन क्रान्ति होती है और लोकतन्त्र में स्वर गूँजता है "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है..."। इससे पहले कि ये स्वर हमारे प्रदेश में गुँजायमान हो, आत्ममँथन कीजिए और अपनी कमियों में सुधार कर प्रदेश के वास्तविक विकास में सँलग्न हो जाईए। जिस दिन आप विकास के आधार पर विजयश्री प्राप्त करेंगे उसी दिन आप सही मायनों में सफ़ल माने जाएँगे।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया