गुरुवार, 18 जनवरी 2024

क्या पौष मास में देवप्रतिष्ठा शास्त्रसम्मत है?


इन दिनों समूचा देश रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा मुहूर्त्त को लेकर विमर्श में लगा हुआ है। देश के धर्माचार्यों व विद्वानों का एक वर्ग इस देवप्रतिष्ठा मुहूर्त्त को सही बता रहा है वहीं दूसरा वर्ग इसे शास्त्रानुसार उचित व शुद्ध नहीं मान रहा है। अब इन दो मतों के मध्य देश का जनमानस असमंजस, संशय व ऊहापोह की स्थिति में है कि आखिर शास्त्रसम्मत सत्य क्या है? यहां हम शास्त्र की मर्यादा व निर्देशानुसार विभिन्न मतों का विश्लेषण कर कुछ निष्कर्ष पर पहुंचने का प्रयास करेंगे जिससे जनमानस को एक शास्त्रोक्त निर्णय करने में सुविधा हो। हमारे सनातन धर्म में प्रत्येक कार्य को करने से पूर्व शुद्ध मुहूर्त्त निकालकर उस मुहूर्त्त में ही नियत कार्य करने का निर्देश है। ज्योतिषशास्त्र अन्तर्गत ऐसी मान्यता है कि यदि मुहूर्त्त पूर्णरूपेण शुद्ध हो तो वह अनेकानेक दोषों का शमन करने में सक्षम होता है। सामान्यत: लोकाचार में पौष मास में शुभकार्य व देवप्रतिष्ठा नहीं करने का प्रचलन है किन्तु क्या यह शास्त्रसम्मत है? यहां हम निम्न शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर इसका समाधान प्राप्त करने का प्रयास करेंगे।

मातृ भैरववाराहनारसिंह्त्रिविक्रमा:।
महिषासुरहन्त्री च स्थाप्या वै दक्षिणायने॥
-(वैखानस संहिता)
श्रावणे स्थापयेल्लिंगमाश्विने जगदम्बिकाम्।
मार्गशीर्षे हरिश्चैव सर्वान्पौषेऽपि केचन॥
-(मुहूर्त्तगणपति)
सर्वेषां पौषमाघौ द्वौ विबुधस्थाने शुभौ।
-(बृहस्पति)
यदि्दनं यस्य देवस्य तद्दिने तस्य संस्थिति:।
-(वशिष्ठ संहिता)
उपर्युक्त शास्त्र वचनों से सुस्पष्ट है कि मलमास, गुरू-शुक्रास्त में देवप्रतिष्ठा सर्वत्र वर्जित है लेकिन कुछ शास्त्र पौष मास में देवप्रतिष्ठा को शुभ मानते हैं। आचार्य बृहस्पति पौष मास में देवप्रतिष्ठा को राज्यप्रद मानते हैं किन्तु शास्त्र के वचनानुसार
चैत्रे वा फाल्गुन वापि ज्येष्ठे वा माधवे तथा।
माघे वा सर्वदेवानां प्रतिष्ठा शुभदा भवेत।।
यस्य देवस्य यत्तिथिवार नक्षत्रादिकं तद्दिनेयदि।
तस्य प्रतिष्ठा मुहूर्त्तों भवेत्तदा अत्युत्तम:॥
अस्तु "यस्य देवस्य यत्तिथिवार नक्षत्रादिकं तद्दिनेयदिशास्त्र" , एवं "यदि्दनं यस्य देवस्य तद्दिने तस्य संस्थिति:।"
-(वशिष्ठ संहिता)

यहां सुस्पष्ट सिद्धान्त व निर्देश है कि देवताओं की अपनी प्राकट्य तिथि विशेष शुभ होती है एवं जहां तक सम्भव हो देवप्रतिष्ठा उस देव की प्राकट्य तिथि के अनुसार करना अतिउत्तम होता है।   जब रामचरितमानस में प्रभु श्रीराम के प्राकट्य के मुहूर्त्त का उल्लेख है-नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥ मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक विश्रामा॥ तब शास्त्र के इन सर्वमान्य सिद्धान्तों के अनुसार रामनवमी वाले मुहूर्त्त को ही प्राथमिकता देना श्रेयस्कर रहता। अधिकांश शास्त्र देवप्रतिष्ठा के लिए माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ एवं विकल्प के रूप में आश्विन मास को ग्रहण करते हैं। इसमें भी माघ मास में भगवान विष्णु की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती किन्तु भैरव,वराह, नृसिंह एवं देवी की प्राण-प्रतिष्ठा दक्षिणायन में भी की जा सकती है, अन्य देवों के लिए सूर्य का उत्तरायण होना आवश्यक है।किरीतार्जुन का प्रसिद्ध वाक्य है -"यद्दपि शुद्धं लोकविरुद्धं ना करणीयम, ना आचरणीयम।" जो स्पष्ट संकेत करता है कि चाहे सिद्धान्त कितना भी शुद्ध क्यों ना हो यदि वह लोकमान्यताओं के विपरीत है तो उसका आचरण नहीं करना चाहिए। हिन्दू धर्म में लोकमान्यता अनुसार पौष मास, पंचक, होलिकाष्टक इत्यादि में शुभकार्य वर्जित होते हैं।  यहां यह तथ्य भी विचारणीय है कि हमारी आध्यात्मिक परम्परा में सदैव ही भाव को प्राथमिकता देकर अग्रणी रखा गया है। तभी तो सन्त पलटूदास कहते हैं कि-"लगन मुहूर्त्त झूठ सब और बिगाड़े काम। "पलटू" शुभ दिन; शुभ घड़ी याद पड़े जब नाम।" अर्थात् जब प्रभु की याद आए और मन में भाव जगे तभी शुभ मुहूर्त्त होता है। तुलसीदास जी भी मानस में इसी बात का उल्लेख करते हैं कि "जोग लगन ग्रह वार तिथि सकल भए अनुकूल। चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥-(रामचरितमानस) अर्थात् जब प्रभु श्रीराम का प्राकट्य हो तब सभी योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि अनुकूल हो जाते हैं। इस दृष्टि से तो किसी विशेष मुहूर्त्त की कोई आवश्यकता ही नहीं है किन्तु आगे मानसकार ने यह भी कहा है कि "सियाराममय सब जग जानी, करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी" इसका आशय है कि समस्त जगत को मैं सियाराममय जानकर प्रणाम करता हूं। यदि साधक भावप्रवण नहीं है तो उसे शास्त्र की समस्त मर्यादाओं और सिद्धान्तों का पालन करना आवश्यक है और यदि साधक का आध्यात्मिक भाव प्रबल व शुद्ध है तो उसे किसी मुहूर्त्त की कोई आवश्यकता नहीं फ़िर वह जिस क्षण; जिस घड़ी जो कार्य करे वह श्रेष्ठ और सफल हो जाता है। अब रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा करने वाले यजमानों एवं उस कार्य में संलग्न समस्त साधकों के भाव की विशुद्धता का निर्णय हम आप पाठकों पर छोड़ते हैं।
॥जय सियाराम॥


-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र




रविवार, 5 फ़रवरी 2023

सन्त श्री रामजी बाबा

सन्त श्री रामजी बाबा समाधि    

यदा-कदा देश में जहां विलग-विलग सम्प्रदायों के मध्य छोटी-छोटी बातों पर साम्प्रदायिक तनाव होते रहते हैं वहीं कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां हमें साम्प्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल देखने को मिलती हैं। ऐसा ही एक स्थान है सन्त श्री रामजी बाबा समाधि स्थल, जो देश के ह्रदय स्थल मध्यप्रदेश के नर्मदापुरम(होशंगाबाद) में स्थित है। यहां सन्त श्री रामजी बाबा ने जीवित समाधि ली थी। सन्त श्री रामजी बाबा का पूरा नाम स्वामी रामदास था। आपका अवतरण ग्वालियर रियासत के मौजा रिखी घूघरी में सोलहवीं शताब्दी में सम्वत् 1601 के आसपास हुआ था। स्वामी रामदास के बाल्यकाल से उनके संतत्व की झलक परिलक्षित होने लगी थी। आपने आज से लभगभ 400 वर्ष पूर्व नर्मदापुरम् से लगभग 7 किमी. दूर नर्मदा व तवा संगम स्थल बान्द्राभान के समीप घानाबड़ को अपनी तपस्थली बनाया था। स्वामी रामदास घानाबड़ में निवास करते हुए प्रभुभक्ति एवं तपश्चर्या किया करते थे। स्वामी जी नर्मदा तट पर गौचारण के लिए जाते थे और साथ ही साथ वहीं भजन व ध्यान साधना भी किया करते थे। एक दिन स्वामी जी को चमत्कारिक रूप से सिद्ध सन्त श्री मृगन्नाथ जी के दर्शन हुए। सन्त श्री मृगन्नाथ जी ने स्वामी रामदास जी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि "तुम सामर्थ्यवान व ज्ञानी पुरूष हो तुम्हें एक दिन परमतत्व का साक्षात्कार होगा।" सन्त श्री मृगन्नाथ द्वारा आशीर्वाद दिए जाने के कुछ समय पश्चात् स्वामी रामदास जी को समाधि में परमात्मा का साक्षात्कार हुआ और वे रात्रि के आठ पहर तक समाधिस्थ रहे। स्वामी रामदास जी को सिद्धावस्था प्राप्त होते ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैलने लगी। लोग उनके प्रति अगाध श्रद्धा रखते हुए उनके दर्शन हेतु आने लगे और उन्हें स्नेह व श्रद्धा से "रामजी बाबा" कहकर संबोधित करने लगे। संत "रामजी बाबा" के पास आते ही भक्तों व अनुयायी की समस्याओं का समाधान होने लगता था। आज भी नर्मदपुरम् स्थित "रामजी बाबा" के समाधि स्थल पर प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु अपने संकटों से मुक्ति पाने एवं अपनी मनोभिलषाओं की पूर्ती हेतु प्रार्थना करने आते हैं। प्रतिवर्ष माघ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर रामजी बाबा की समाधि पर मेला लगता है जिसमें लाखों श्रद्धालु पहुंचते है और "रामजी बाबा" की समाधि स्थल के अखण्ड दिव्यज्योति का दर्शन करते हैं।

सन्त रामजी बाबा की सूफ़ी सन्त गौरीशाह बाबा से मित्रता-
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सन्त रामजी बाबा की सूफ़ी सन्त औलिया गौरीशाह बाबा से प्रगाढ़ मित्रता थी। दोनों सन्त एक-दूसरे के यहां आते-जाते थे। रामजी बाबा व सूफ़ी सन्त गौरीशाह की मित्रता देश में साम्प्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल के तौर पर देखी जाती है। जनश्रुति के अनुसार जब रामजी बाबा की समाधि का निर्माण हो रहा था तब समाधि का गुम्बद बार-बार ढ़ह जाता था। अथक प्रयासों के पश्चात् भी समाधि के गुम्बद का निर्माण नहीं हो पा रहा था, तब रामजी बाबा ने स्वयं तत्कालीन महन्त जी को स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि मेरे मित्र गौरीशाह की मज़ार से एक पत्थर लाकर गुम्बद का निर्माण करो तभी मेरी समाधि का गुम्बद पूर्ण होगा। महन्त जी ने रामजी बाबा के स्वप्नादेश से गौरीशाह बाबा की मज़ार का पत्थर लाकर समाधि के गुम्बद पर लगवाया तब समाधि के गुम्बद का कार्य पूर्ण हो सका। गौरीशाह बाबा की मज़ार का यह पत्थर आज भी साम्प्रदायिक समरसता को परिलक्षित करता रामजी बाबा की समाधि के गुम्बद पर लगा है। प्रतिवर्ष माघी पूर्णिमा पर रामजी बाबा के मेले का प्रारम्भ भी एक स्नेहिल परम्परा से होता है जो संत श्री रामजी बाबा और सूफ़ी संत औलिया गौरीशाह बाबा की मित्रता का स्मरण कराती है। इस परम्परा के अनुसार माघी पूर्णिमा से एक दिन पूर्व संत रामजी बाबा के समाधि स्थल से एक चादर औलिया गौरीशाह बाबा की मज़ार पर चढ़ाई जाती है और सूफ़ी संत गौरीशाह बाबा की मज़ार से निशान (ध्वज) लाकर रामजी बाबा की समाधि पर लगाया जाता है। इसके उपरान्त ही मेले का विधिवत् शुभारम्भ होता है। मेले में प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु आते हैं और समाधिस्थल पर तुलादान, भण्डारा, मुण्डन आदि कार्य सम्पन्न करते हैं। ऐसी मान्यता है कि सन्त रामजी बाबा की विभूति के सेवन,अखण्ड ज्योति के दर्शन और समाधि की परिक्रमा करने से कठिन से कठिन संकट से मुक्ति प्राप्त होकर मनोवांछित मनोकामना की पूर्ती होती है।

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया, प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

भारत
 


रामजी बाबा की समाधि पर लगा गौरीशाह बाबा की मज़ार का पत्थर (लाल घेरे में हरे रंग की आकृति में)






शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

पत्रकार कमाल खान का निधन

 

आज की चिल्लाने,धमकाने,चीख-पुकार भरी और चाटुकारितायुक्त पत्रकारिता के दौर में शान्त, मीठे व सहज अंदाज़ में जनता से जुड़े मुद्दों को मुख्य खबर बनाकर प्रस्तुत कर वास्तविक व श्रेष्ठ पत्रकारिता करने वाले पत्रकार कमाल खान अब हमारे बीच नहीं रहे। एनडीटीवी के वरिष्ठ व लोकप्रिय पत्रकार कमाल खान का निधन हो गया है। एनडीटीवी के साथ वे लम्बे समय से जुड़े थे। ऐसा लगता है कि शनै: शनै: पत्रकारिता का स्वर्णम युग व वास्तविक पत्रकार एक-एक करके विदा होते जा रहे हैं। लोकतन्त्र के इस चौथे स्तंभ का क्या भविष्य होगा यह तो समय के गर्भ में है लेकिन मेरे देखे एक ज़माना था जब पत्रकारिता में संबंधों (रिलेशनसिप) का दौर हुआ करता था। पत्रकारों व नेताओं के बीच आत्मीय संबंध हुआ करते थे जो उनके पेशे में कभी आड़े नहीं आते थे, पत्रकार अपने चहेते नेता से भी कटु से कटु सवाल पूछने से नहीं झिझकते थे और नेता भी तमतमाते हुए जवाब देने के बाद सबकुछ हंसकर भूल जाया करते थे, फ़िर आया मीडिया मैनेजमेंट का दौर जहां ज़ाहिरात (एडवरटाइज़मेन्ट) के माध्यम से मीडिया संस्थानों का राजस्व बढ़ाकर उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से नियन्त्रित किया जाने लगा यहां से पत्रकारिता जगत एक पायदान नीचे की ओर सरकना प्रारम्भ हुआ। वर्तमान दौर है पत्रकारिता दमन का (मीडिया डामीनेशन) का जहां येन-केन-प्रकारेण साम-दाम-दण्ड-भेद का प्रयोग करके मीडिया को चारण बनाया जा रहा है ये पत्रकारिता का सर्वाधिक बुरा और निम्न-स्तरीय दौर है। ऐसे प्रतिकूल दौर में कमाल खान जैसे पत्रकार ने धारा के विपरीत चलते हुए लोकतन्त्र के इस चौथे स्तंभ को जिस प्रकार ध्वस्त होने से बचाने का जो भगीरथी प्रयास किया वह निश्चय ही स्तुत्य और प्रशंसनीय है। अब कमाल खान हमारे बीच नहीं है लेकिन एक पत्रकार के तौर पर उनके द्वारा कायम की श्रेष्ठ पत्रकारिता की मिसाल सदैव इस जगत में अक्षुण्ण रहेगी। अलविदा कमाल खान.....

!! ऊं शान्ति !!

-सम्पादक "सरल चेतना"

 

मंगलवार, 3 अगस्त 2021

कब करें हवन, क्या होता "अग्निवास"!

 

हमारे सनातन धर्म में हवन, यज्ञ, अग्निहोत्र का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दू परम्परा में कोई भी मांगलिक कार्य हवन किए बिना सम्पूर्ण नहीं माना जाता चाहे वह विवाह हो, देव प्रतिष्ठा हो, गृहप्रवेश हो, व्रतोद्यापन, ग्रहशान्ति अनुष्ठान आदि सभी कार्यों की पूर्णता हवन से ही होती है। शास्त्रानुसार विप्रों को तो नित्य अग्निहोत्र करना चाहिए किन्तु जब कभी किसी विशेष कार्य हेतु हवन करना हो तो उसमें अग्निवास का पृथ्वी पर होना अनिवार्य माना गया है। हवन की अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है इसलिए हवन वाले दिन अग्नि का वास पृथ्वी पर होना आवश्यक होता है। वहीं अग्नि की साक्षी भी मांगलिक कार्यों में महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। अत: अग्निवास के पृथ्वी पर होने से हवन के शुभफलों में वृद्धि होकर कार्य सिद्धि में कोई भी संशय नहीं रहता है। आज हम अपने पाठकों के लिए यह महत्त्वपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं कि पक्षानुसार किन तिथियों व दिनों में अग्नि का वास पृथ्वी पर होता है। आईए जानते हैं-

-नीचे दिए गए विवरण में जब अमुक तिथि; अमुक वार को होगी तभी अग्निवास पृथ्वी पर होगा जैसे कृष्ण पक्ष प्रतिपदा के दिन यदि सोमवार और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को रविवार होगा तो अग्निवास पृथ्वी पर होगा अत: इस दिन हवन करना अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक उत्तम व श्रेयस्कर रहेगा।

कृष्ण पक्ष  -    वार  -                   तिथि

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01-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - प्रतिपदा

02-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - द्वितीया

03-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - तृतीया

04-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - चतुर्थी

05-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - पंचमी

06-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - षष्ठी

07-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - सप्तमी

08-         मंगलवार-बुधवार,शनिवार                - अष्टमी

09-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - नवमी

10-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - दशमी

11-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - एकादशी

12-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - द्वादशी

13-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - त्रयोदशी

14-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - चतुर्दशी

15-         रविवार,मंगलवार,बुधवार                 - अमावस

शुक्ल पक्ष  -    वार                      -तिथि

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01-         रविवार, सोमवार, गुरूवार,शुक्रवार         - प्रतिपदा

02-         रविवार,बुधवार,,गुरूवार                 - द्वितीया

03-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - तृतीया

04-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - चतुर्थी

05-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - पंचमी

06-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - षष्ठी

07-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - सप्तमी

08-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - अष्टमी

09-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - नवमी

10-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - दशमी

11-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - एकादशी

12-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - द्वादशी

13-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - त्रयोदशी

14-         रविवार,मंगलवार,बुधवार                 - चतुर्दशी

15-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - पूर्णिमा

 

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com