धन्य है हमारे देश का मीडिया और उस पर आनेवाले तथाकथित विश्लेषक, अभी सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ़ इतना भर कहा है कि सुशान्त केस की जांच सीबीआई करेगी। इस पर कितना हो-हल्ला मचाया जा रहा है, न्याय की जीत...सत्यमेव जयते...जाने क्या-क्या। अब यदि सीबीआई की जांच इस निष्कर्ष पर पहुंची कि वास्तव में सुशान्त सिंह राजपूत ने आत्महत्या ही की थी और उसकी वजह डिप्रेशन थी, डिप्रेशन की वजह चाहे जो हो; तब...! उसके लिए भी इन तथाकथित विश्लेषकों ने टिप्पणी करने के लिए अपने जुमले अभी से तैयार कर लिए होंगे। इस देश का मीडिया क्या चीज़ को कभी सलीके से होने देगा? ये वही मीडिया जिसने बिना किसी ठोस आधार के चन्द अभिनेता-अभिनेत्रियों के बयान पर इस केस में भाई-भतीजावाद (नेपोटिज़्म) का मुद्दा कई दिनों तक चलाया था और अब बिल्कुल ही शीर्षासन! कमाल है...ओ ख़बरनवीसों थोड़ा गंभीर पत्रकारिता भी कर लो...। एक ही मुद्दे की कई-कई दिनों तक जुगाली करना फ़िर एकदम खामोश हो जाना ये श्रेष्ठ पत्रकारिता की निशानी नहीं है। आप मित्रों को वो मरकज़ वाले साहब याद हैं कि नहीं...क्या हुआ उनका अब मीडिया में इसका ज़िक्र तक नहीं हो रहा। क्या किसी मुद्दे का फ़ालोअप लेना और उस बहस निष्कर्ष तक पहुंचाना मीडिया की ज़िम्मेवारी नहीं है। प्राइम टाइम मुर्गे लड़ाई की भांति बहस कराकर जनता को बिना किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचाए बिना बहस रोक कर देना क्या बस इतनी ही पत्रकारिता शेष है अब। पहले के समय में सम्पादकीय से जनता अपना मानस बनाती है, श्रेष्ठ सम्पादक व पत्रकार जनता का बौद्धिक मार्गदर्शन करते थे और आजकल के इन एंकरों को देख लीजिए, गला फ़ाड़ का चिल्ला-चिल्ला कर ना जाने क्या साबित करना चाहते हैं। खुद ही वकील...खुद ही जज...सब कुछ गंभीरता धेले भर की नहीं। ऐसा नहीं कि आज के दौर में श्रेष्ठ पत्रकार नहीं हैं..हैं निश्चित हैं मगर उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। रजत शर्मा जी हों, शरद द्विवेदी जी हों, अमिताभ अग्निहोत्री जी या फ़िर रविश कुमार हों ये सब वे नाम हैं जो पत्रकारिता की कसौटी हैं इनकी रिपोर्ट देख लीजिए, कम से कम तथ्यात्मक बात तो करते हैं, दूसरों की सुनते तो हैं और कभी भी पंचम सुर नहीं लगाते। मेरा निवेदन बस इतना है कि दिन-दिन भर किसी मुद्दे को अनावश्यक रूप से खींचना, उच्च स्वर में बिना तथ्यों व तर्कों के चिल्लाना इन सबसे आप महान पत्रकार नहीं हो जाते और ना ही इससे पत्रकारिता की गरिमा बढ़ती है। सम्पादकों का मुख्य कार्य ही बस इतना होता है कि किस खबर को किस "वज़न" (वैटेज) के साथ चलाया जाना चाहिए इसका निर्णय करें। आजकल के सम्पादक तो पड़ोसी चैनल क्या दिखा रहा है यह देखकर अपना सम्पादन (एडिटिंग) करते हैं। बहरहाल अब समय आ गया है; और नहीं भी आया है तो बहुत शीघ्र आ जाएगा जब मीडिया की सीमाएं भी संविधान को तय करनी ही पड़ेंगी।
-पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पादक "सरल-चेतना"

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