शनिवार, 13 जून 2020

"कोरोना" और पंगत-


भारतीय जनमानस यदि सुझावों पर अमल करने वाली मानसिकता का होता तो "कोरोना" से बचने हेतु सुझाव तो चहुंओर से दिए जा रहे हैं। आज गली-कूचे के नुक्कड़ से लेकर वातानुकूलित सभाकक्ष में बैठा हर कोई इस भयावह महामारी से कैसे बचा जाए ये बता रहा है किन्तु आमजन का आचरण कुछ इस प्रकार का देखने में आ रहा है जैसे "कोरोना" की दवा किसी सन्तरे की गोली की मानिंद हर दूसरी दुकान पर उपलब्ध है। कहते हुए मन दुखता है किन्तु भारत में आत्मानुशासन निचले पर स्तर पर रखा जाता है, करीब-करीब नदारद। ऐसे में तो सख़्ती ही एकमात्र विकल्प है चाहे किसी को कितना ही बुरा क्यों ना लगे। गंभीर रोगों से मुक्ति हेतु कड़वी दवाई लेनी ही होती है और कभी-कभी तो अपने प्राणों से प्यारी इस नश्वर काया की भी शल्य चिकित्सा करवानी पड़ती है। कहने का आशय सख़्ती नितान्त आवश्यक है। अब बात करें सुझावों की तो मैं भी सोच रहा था आज के माहौल में सर्वाधिक आवश्यक क्या है! चिकित्सा, भोजन, दवा, वैक्सीन की खोज ये तो सब हो ही रहा है और तालाबन्दी को खोल कर भी देख लिया। अब जब "कोरोना" के साथ रहना ही है तो आज एक पुरानी परम्परा के अनुसरण की आवश्यकता है, वह परम्परा है - पंगत की परम्परा। पहले के समय में विवाह; उत्सव आदि शुभकार्यों में अतिथिगणों को भोजन हेतु पंगत कराने की व्यवस्था थी। "पंगत" बड़ी प्यारी व अनूठी परम्परा थी जिसमें बड़े ही सत्कार से आदरपूर्वक अतिथिगणों को भोजन करवाया जाता था। मेज़बान का मेहमान से मिष्ठान परोसते समय का वो प्रेमपगा मनुहार भला कौन भूल सकता है। आजकल के गिद्धभोज में भोजन पाना व करना मेहमानों की स्वयं की जिम्मेदारी व साहस कौशल होता है क्योंकि मेज़बान ने तो आपको आमन्त्रित कर अपनी मेहमाननवाज़ी की तमाम जिम्मेवारियों से मुक्ति पा ली होती है। बहरहाल, उस पंगत परम्परा में एक व्यवस्था होती थी कि जब एक समूह (बैच) भोजन कर चुका होता था तब उस समूह के भोजन करवाने में जो भी खाद्य सामग्री गिरकर फ़ैल जाती थी उसे समेटने हेतु थोड़ा अन्तराल लिया जाता था जिससे साफ़-सफ़ाई की जा सके। जब साफ़-सफ़ाई हो जाती तब दूसरा समूह (बैच) भोजन हेतु आमन्त्रित किया जाता था ताकि "पंगत" सुचारू रूप से चलती रहे। आज हमें "कोरोना" के सन्दर्भ में भी इसी परम्परा का अनुसरण करना है। "अनलाक" के रूप में पहले समूह का भोजन हो चुका और "कोरोना" के रूप में रायता भी खूब फ़ैल चुका अब इसे समेटने के लिए पुन: "लाकडाउन" किया जाना चाहिए ताकि कुछ साफ़-सफ़ाई की जा सके। सरकार से बस इतना ही आग्रह है कि "अनलाक" करके लोगों को उनकी स्वयं जबावदेही पर छोड़ने से "कोरोना" पर नियन्त्रण नहीं होगा। भारत जैसे देश में "लाकडाउन" भी अब "कोरोना" के साथ-साथ ही चलाना होगा, भले एक साथ नहीं किन्तु कुछ-कुछ अन्तराल के साथ तो अवश्य ही क्योंकि यदि किसी नदी को प्रदूषण मुक्त करना है तो दो ही मार्ग हैं, पहला प्रदूषित जल को साफ़ करना और दूसरा स्वच्छ जल में प्रदूषण फ़ैलने से रोकना, तब पूर्णरूपेण नदी प्रदूषण मुक्त हो पाएगी। "कोरोना" के सन्दर्भ में भी यही दो मार्ग अपनाना अपेक्षित है। रही बात सुझाव व सरकारी अपीलों की तो वह तो सरकार कब से शराब, सिगरेट, तम्बाकू, के निषेध के लिए कर ही रही है, कुछ हुआ क्या! भारत में आत्मानुशासन की बात बेमानी है, सरकारों को यह जानते हुए ही अपनी नीतियों का निर्धारण व क्रियान्वयन करना चाहिए।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

कोई टिप्पणी नहीं: