गुरुवार, 21 नवंबर 2013

किसको डालूं वोट रामजी


किसको डालूं वोट रामजी
सब में ही है खोट रामजी
किसको डालूं वोट...

वादों की भरमार है देखो
लूटा सब संसार है देखो
लोकतंत्र की मर्यादा पर
करते कैसी चोट रामजी
किसको डालूं वोट.....

नकली-नकली चेहरे हैं
राज़ बड़े ही गहरे हैं
सबने अपने मुखमंडल पे
डाली तगड़ी ओट रामजी
किसको डालूं वोट....

आज़ादी के खातिर देखो
कितने फांसी पर झूले
सत्तालोलुपता में नेता
वो कुर्बानी भूले
ऐसी बातें दिल को
मेरे रही कचोट रामजी
किसको डालूं वोट...

-हेमंत रिछारिया

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

कभी लौट कर नहीं आया...

बिछ्ड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
सफ़र में उसके कहीं अपना घर नहीं आया

वो एहतराम से करते हैं खून भरोसे का
हमें अब तक मगर ये हुनर नहीं आया

मेरे वादे का जुनूं देख,तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वावों में भी तेरा जिकर नहीं आया

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहज़े में तुमसा ज़हर नहीं आया

(साभार)

रिक्त


मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

चुनावी माहौल

एक बार देखी हमने श्वानों की लडा़ई
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई
एक गुर्राया; दूजे ने पंजा बढ़ाया; तीसरा काटने को आतुर,
हड्डी ले भागा वही जो श्वान था सबसे चातुर।

फिर कुछ दिनों के बाद जब चुनाव है आया,
हमारी नज़रों के सामने वही दृश्य दोहराया।
हमने देखी फिर से वही श्वानों की लड़ाई,
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई।
सुना था कि अपने क्षेत्र में "श्वान" भी "सिंह" होता है,
ये कैसा माहौल है यारों जहां "सिंह" "श्वान" होता है।

-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

“गांधीजी के बंदर”

चार बंदर आपस में बात कर रहे थे। एक बोला-"गांधी बापू ने कहा है बुरा मत देखो",  दूसरा बोला-"बुरा मत सुनो",  तीसरे ने कहा-बुरा मत कहो", तभी चौथे ने कहा- "यारों, लेकिन बुरा करने से मना थोड़े किया है।" चारों बंदर खिलखिला के हँस पड़े।”

-हेमन्त रिछारिया


बुधवार, 25 सितंबर 2013

क्योंकि मैं विशिष्ट हूं...

मैं नहीं लग सकता राशन की कतारों में,
ना ही पाओगे मुझे तुम टिकिट-खिड़की के आगे;
रेल्वे-स्टेशनों या थिएटरों में,
मिलूंगा नहीं मैं तुम्हें किसी बाज़ार में,
क्योंकि मैं विशिष्ट हूं।
                                                      
मैं सफ़र नहीं करता बसों में;जनरल बोगियों में,
घूमता नहीं पैदल बेफ़िक्र किसी नदी के किनारे,
ठठ्ठा मारकर हंसना नहीं तहज़ीब मेरी,
बुक्का फाड़कर रोते देखा है मुझे कभी?
अकेला तुम मुझे कभी ना पाओगे,
घिरा रहता हूं हमेशा मैं भीड़ से,
क्योंकि मैं विशिष्ट हूं।
                           

काश..! मैं भी अपने बच्चों को दुपहिया पर घुमा पाता,
कांधों पे बिठा अपने तितलियों की तरफ़ दौड़ पाता,
चौपाटी के वो गोल-गप्पे मेरा भी मन ललचाते हैं,
बारिश के सुहाने मौसम मुझे भी गुदगुदाते हैं,
लेकिन कुचलकर मैं सारे अरमानों को,
घुटता रहता हूं अपनी विशिष्टता की कैद में।
                    
हे विधाता! तू मुझे  अगला जन्म मत देना,
और यदि दे तो यह विशिष्टता मत देना।
क्योंकि मैं भी जीना चाहता हूं अपनी ज़िंदगी,
एक आम आदमी की तरह...।

-हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 21 सितंबर 2013

चारों धामों के चक्कर में

अपने धाम प्रसन्न सुखी थे, बारिश गर्मी ठण्ड में
चारों धामों के चक्कर में, मरे उत्तराखण्ड में।

महाप्रलय ने दी होगी जब दस्तक आकर द्वारे
ईश्वर शून्य लगे होंगे मंदिर,मस्ज़िद, गुरूद्वारे।
भूख-प्यास से, मृत्यु-त्रास से, जान गए तुम होंगे
कितनी निर्मम, कितनी अक्षम होती हैं सरकारें
अपने के कंधों पर जाते, चन्दन गंध चिता में पाते
जलने भर को मिली ना लकड़ी अनुकम्पा के फण्ड में॥

-डा.विनोद निगम