किसको डालूं वोट रामजीसब में ही है खोट रामजी
किसको डालूं वोट...
वादों की भरमार है देखो
लूटा सब संसार है देखो
लोकतंत्र की मर्यादा पर
करते कैसी चोट रामजी
किसको डालूं वोट.....
नकली-नकली चेहरे हैं
राज़ बड़े ही गहरे हैं
सबने अपने मुखमंडल पे
डाली तगड़ी ओट रामजी
किसको डालूं वोट....
आज़ादी के खातिर देखो
कितने फांसी पर झूले
सत्तालोलुपता में नेता
वो कुर्बानी भूले
ऐसी बातें दिल को
मेरे रही कचोट रामजी
किसको डालूं वोट...
-हेमंत रिछारिया
1 टिप्पणी:
वोट तो डालना ही पड़ेगा भले सब एक ही थैली के चट्टे -बट्टे क्यों न हो ....
यह भी एक तरह की मजबूरी ही है ...
अब देखो दिल्ली में वहाँ तो खिचड़ी ही बनने वाली है ..
बहुत बढ़िया सार्थक सामयिक रचना
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