गुरुवार, 16 जुलाई 2020

क्या पायलट भर पाएंगे राजनीति की उड़ान...!


राजस्थान आजकल खासा चर्चा में है। वहां की गहलोत सरकार में उप-मुख्यमन्त्री व प्रदेश अध्यक्ष रहे सचिन पायलट ने जिस तरह से अपने बगावती तेवर दिखाएं हैं उससे राजस्थान की राजनीति व कांग्रेस में उथलपुथल मच गई है। यद्यपि अभी तक सचिन पायलट ने अपना अगला कदम स्पष्ट नहीं किया है किन्तु फ़िर भी उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर राजनीति के पण्डितों से लेकर ज्योतिष के जानकार तक सभी अपने-अपने ज्ञानानुसार कयास लगा रहे हैं। आईए हम भी "वेबदुनिया" के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं सचिन पायलट की कुण्डली का ज्योतिषीय विश्लेषण-
* सचिन पायलट की कुण्डली-
 सचिन पायलट की कुण्डली सिंह लग्न व मिथुन राशि की है। लग्न में सूर्य, बुध व शनि स्थित हैं। एकादश भाव अर्थात् लाभ स्थान में चन्द्र, मंगल व गुरू की युति है। दशमेश शुक्र व्यय भाव में विराजमान हैं। राहु-केतु क्रमश: दूसरे व आठवें भाव में स्थित हैं।
* सचिन पायलट की कुण्डली के शुभाशुभ योग-
सचिन पायलट की कुण्डली बुधादित्य योग, महालक्ष्मी योग व गजकेसरी जैसे राजयोग विद्यमान है जिसके फ़लस्वरूप उन्हें बहुत ही कम आयु में इतनी सफलता प्राप्त हुई। सिंह राशि का जातक सदैव स्वाभिमानी व तेजस्वी स्वभाव वाला होता है। सिंह राशि के जातक का नैसर्गिक स्वभाव होता है कि वह किसी के अधीनस्थ होकर कार्य नहीं कर सकता जो सचिन पायलट के तेवरों से स्पष्ट जाहिर होता भी है। महालक्ष्मी योग उन्हें धनाढ़्य बना रहा है वहीं वाणी स्थान में स्थित बुध उनकी वाणी में तर्क प्रदान कर रहा है। ऐसा जातक कभी भी अतार्किक बात का समर्थन नहीं करता। ऐसे जातकों को केवल योग्य तर्क के द्वारा ही सहमत किया जा सकता है किन्तु ऐसे जातक अपनी तर्कयुक्त वाणी के कारण कभी-कभी गंभीर हानि भी उठाते हैं। सचिन पायलट की कुण्डली में सभी ग्रह राहु-केतु की परिधि में होने से उनकी कुण्डली में "कुलिक" नामक कालसर्पयोग का निर्माण भी हो रहा है जो उन्हें जीवन अपेक्षित सफलता से वंचित करेगा। उन्हें सफलता प्राप्ति हेतु कठोर संघर्ष करना होगा।
* पायलट का राजनीतिक भविष्य-
सचिन पायलट की कुण्डली की ग्रहस्थितियों के अनुसार सूर्य का अपनी स्वराशि सिंह में स्थित होना उनकी राजनीति में सफलता को दर्शाता है क्योंकि सूर्य राजसत्ता का प्रतीक होता है वहीं जनता व शासन का प्रतीक शनि भी सूर्य के साथ स्थित है जो उनके राजनीति में महत्वपूर्ण पदों की प्राप्ति का संकेत करता है किन्तु दशमेश शुक्र का शत्रुक्षेत्री होकर व्यय भावगत होना उनके कर्मक्षेत्र में अवरोध का द्योतक है। वहीं उनके कर्मक्षेत्र पर राहु की पूर्ण दृष्टि उन्हें अपने कर्मक्षेत्र में अपेक्षित सफलता प्राप्त करने के लिए कड़ा संघर्ष करने का संकेत दे रही है। जीवन में कई बार वे राजनीति के शीर्ष पर पहुंचते-पहुंचते सत्ता से दूर रह सकते हैं। राजयोग के कारण वे राजनीति के केन्द्र में तो रहेंगे किन्तु मुख्यमन्त्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए उन्हें अभी प्रतीक्षा के साथ-साथ कठोर संघर्ष से गुजरना होगा।
*विंशोत्तरी दशाओं का संकेत-
अभी वर्तमान में सचिन पायलट शनि की महादशा व दशमेश शुक्र की अन्तर्दशा के प्रभाव में हैं वहीं प्रत्यन्तर दशा गुरू की है। जैसे हमने पूर्व में स्पष्ट किया था राहु की दृष्टि उनके कर्मक्षेत्र के लिए हानिकारक है ठीक उसी प्रकार सचिन पायलट पर जनवरी से चली आ रही राहु की प्रत्यन्तर दशा विगत 1 जुलाई को ही समाप्त हुई है। सुधि पाठकगण इस बात को शीघ्र ही समझ लेंगे कि वर्तमान में सचिन पायलट के साथ जो घटनाक्रम हुआ जिसके कारण उन्हें अपना उप-मुख्यमन्त्री व प्रदेश अध्यक्ष का पद गंवाना पड़ा उसका बीजारोपण राहु की प्रत्यन्तर दशा में ही हो चुका था। यदि विंशोत्तरी दशाओं का समेकित विश्लेषण कर निष्कर्षत: कहें तो वर्तमान से लेकर वर्ष 2023 तक का समय सचिन पायलट के लिए अनुकूल है। इस अवधि में वे अपनी राजनीति की नई दिशा तय करेंगे। वर्तमान से लेकर वर्ष 2023 तक का समय सचिन पायलट के लिए सफलतादायक प्रतीत हो रहा है किन्तु इस समय का यथोचित लाभ प्राप्त करने के लिए उन्हें अशुभ योगों विशेषकर राहु व कालसर्प दोष की शान्ति करवाना आवश्यक है अन्यथा वे इन दुर्योगों के कारण पुन: सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने से वंचित रह सकते हैं।

(निवेदन-उपर्युक्त विश्लेषण सचिन पायलट की उपलब्ध कुण्डली के आधार पर दिया गया है। हम इस कुण्डली की प्रामाणिकता का दावा नहीं करते हैं।)

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com




शनिवार, 13 जून 2020

"कोरोना" और पंगत-


भारतीय जनमानस यदि सुझावों पर अमल करने वाली मानसिकता का होता तो "कोरोना" से बचने हेतु सुझाव तो चहुंओर से दिए जा रहे हैं। आज गली-कूचे के नुक्कड़ से लेकर वातानुकूलित सभाकक्ष में बैठा हर कोई इस भयावह महामारी से कैसे बचा जाए ये बता रहा है किन्तु आमजन का आचरण कुछ इस प्रकार का देखने में आ रहा है जैसे "कोरोना" की दवा किसी सन्तरे की गोली की मानिंद हर दूसरी दुकान पर उपलब्ध है। कहते हुए मन दुखता है किन्तु भारत में आत्मानुशासन निचले पर स्तर पर रखा जाता है, करीब-करीब नदारद। ऐसे में तो सख़्ती ही एकमात्र विकल्प है चाहे किसी को कितना ही बुरा क्यों ना लगे। गंभीर रोगों से मुक्ति हेतु कड़वी दवाई लेनी ही होती है और कभी-कभी तो अपने प्राणों से प्यारी इस नश्वर काया की भी शल्य चिकित्सा करवानी पड़ती है। कहने का आशय सख़्ती नितान्त आवश्यक है। अब बात करें सुझावों की तो मैं भी सोच रहा था आज के माहौल में सर्वाधिक आवश्यक क्या है! चिकित्सा, भोजन, दवा, वैक्सीन की खोज ये तो सब हो ही रहा है और तालाबन्दी को खोल कर भी देख लिया। अब जब "कोरोना" के साथ रहना ही है तो आज एक पुरानी परम्परा के अनुसरण की आवश्यकता है, वह परम्परा है - पंगत की परम्परा। पहले के समय में विवाह; उत्सव आदि शुभकार्यों में अतिथिगणों को भोजन हेतु पंगत कराने की व्यवस्था थी। "पंगत" बड़ी प्यारी व अनूठी परम्परा थी जिसमें बड़े ही सत्कार से आदरपूर्वक अतिथिगणों को भोजन करवाया जाता था। मेज़बान का मेहमान से मिष्ठान परोसते समय का वो प्रेमपगा मनुहार भला कौन भूल सकता है। आजकल के गिद्धभोज में भोजन पाना व करना मेहमानों की स्वयं की जिम्मेदारी व साहस कौशल होता है क्योंकि मेज़बान ने तो आपको आमन्त्रित कर अपनी मेहमाननवाज़ी की तमाम जिम्मेवारियों से मुक्ति पा ली होती है। बहरहाल, उस पंगत परम्परा में एक व्यवस्था होती थी कि जब एक समूह (बैच) भोजन कर चुका होता था तब उस समूह के भोजन करवाने में जो भी खाद्य सामग्री गिरकर फ़ैल जाती थी उसे समेटने हेतु थोड़ा अन्तराल लिया जाता था जिससे साफ़-सफ़ाई की जा सके। जब साफ़-सफ़ाई हो जाती तब दूसरा समूह (बैच) भोजन हेतु आमन्त्रित किया जाता था ताकि "पंगत" सुचारू रूप से चलती रहे। आज हमें "कोरोना" के सन्दर्भ में भी इसी परम्परा का अनुसरण करना है। "अनलाक" के रूप में पहले समूह का भोजन हो चुका और "कोरोना" के रूप में रायता भी खूब फ़ैल चुका अब इसे समेटने के लिए पुन: "लाकडाउन" किया जाना चाहिए ताकि कुछ साफ़-सफ़ाई की जा सके। सरकार से बस इतना ही आग्रह है कि "अनलाक" करके लोगों को उनकी स्वयं जबावदेही पर छोड़ने से "कोरोना" पर नियन्त्रण नहीं होगा। भारत जैसे देश में "लाकडाउन" भी अब "कोरोना" के साथ-साथ ही चलाना होगा, भले एक साथ नहीं किन्तु कुछ-कुछ अन्तराल के साथ तो अवश्य ही क्योंकि यदि किसी नदी को प्रदूषण मुक्त करना है तो दो ही मार्ग हैं, पहला प्रदूषित जल को साफ़ करना और दूसरा स्वच्छ जल में प्रदूषण फ़ैलने से रोकना, तब पूर्णरूपेण नदी प्रदूषण मुक्त हो पाएगी। "कोरोना" के सन्दर्भ में भी यही दो मार्ग अपनाना अपेक्षित है। रही बात सुझाव व सरकारी अपीलों की तो वह तो सरकार कब से शराब, सिगरेट, तम्बाकू, के निषेध के लिए कर ही रही है, कुछ हुआ क्या! भारत में आत्मानुशासन की बात बेमानी है, सरकारों को यह जानते हुए ही अपनी नीतियों का निर्धारण व क्रियान्वयन करना चाहिए।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 14 मई 2020

शास्त्रानुसार क्या है मृत्यु का अर्थ-


शास्त्र के सूत्रों और वचनों को यदि भलीभांति व सही परिप्रेक्ष्य में ना समझा जाए तो वे लाभप्रद होने के स्थान पर हानिकारक भी सिद्ध हो सकते हैं। अक्सर उचित एवं सटीक व्याख्या ना होने पर अर्थ का अनर्थ कर शास्त्रों के सूत्रों व निर्देशों के प्रति भ्रांतियां निर्मित कर दी जाती हैं। आज हम "वेबदुनिया" के पाठकों ज्योतिष की मारकेश दशा से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दे रहे हैं। अधिकांश जनमानस ज्योतिष की दो दशाओं के आने पर अत्यधिक भयाक्रान्त होता है-शनि की साढ़ेसाती एवं मारकेश की दशा। मारकेश की दशा के सम्बन्ध में अक्सर यह भ्रान्ति प्रचलित है कि इस दशा में जातक की मृत्यु घटित होती है जबकि यह तथ्य पूर्णत: सत्य नहीं अपितु आंशिक सत्य है। क्योंकि ज्योतिष शास्त्रानुसार मृत्यु का अर्थ केवल प्राणहानि ही नहीं होता। शास्त्र का वचन है-
"व्यथा दु:खं भयं लज्जा रोग: शोकस्तथैव च।
बन्धनं चापमानं च मृत्युचाष्टविध: स्मृत:॥
उपर्युक्त सूत्रानुसार शास्त्र आठ बातों को मृत्यु के सदृश मानता है, ये हैं- व्यथा, दु:ख, भय, लज्जा, रोग, शोक, बन्धन, अपमान अर्थात् यदि किसी जातक पर "मारकेश" की दशा प्रभावशाली हो और उसकी आयु हो तो "मारकेश" की दशा में प्राणहानि ना होकर उसे इस दशा में केवल अत्यधिक कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


रविवार, 3 मई 2020

क्या ज्योतिष की दृष्टि से आप हैं "ग्रीन जोन" में...!

  
आज समूचा विश्व "कोरोना" नामक महामारी से पीड़ित हैं। संसार के सभी देश अपने-अपने तरीकों से इस वैश्विक महामारी से निपटने का प्रयास कर रहे हैं। इस समय अनेक देशों ने स्थानीय स्तर पर तालाबन्दी अर्थात् "लाकडाउन" किया हुआ है। भारत में भी पिछले एक माह से "लाकडाउन" चला आ रहा है। "कोरोना" वायरस से निपटने के लिए अभी तक कोई कारगर ईलाज नहीं खोजा जा सका है, और ना ही "कोरोना" के स्वभाव का कोई ठीक-ठीक अनुमान लगाया जा सका है। इस वायरस ने सभी को प्रभावित किया है, चाहे वह 6 माह की बच्ची हो, 25 वर्ष का युवा हो, 40 वर्ष का प्रौढ़ हो, या 60 से 80 तक की आयु के वृद्ध। "कोरोना" से हुई मौतों में भी हमें असमान्य नियम देखने को मिला है जहां एक ओर तो 40 वर्षीय प्रौढ़ "कोरोना" की जंग हार कर काल के गाल में समा गए वहीं 90 वर्षीय वृद्ध "कोरोना" को शिकस्त देकर पूर्ण स्वस्थ हो गए। अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? यदि हम इस बीमारी से संक्रमित होने वाले व्यक्ति एवं इससे ग्रसित होकर स्वस्थ होने वाले व्यक्तियों व इससे प्रभावित होकर प्राण गंवा देने वाले व्यक्तियों को रेड, आरेंज व ग्रीन; तीन ज़ोन में विभक्त कर ज्योतिषीय आधार पर इसका विश्लेषण करने का प्रयास करें तो हम हमारी सर्तकता व सावधानी की दिशा में एक कदम ओर अग्रसर हो सकेंगे। ज्योतिष शास्त्र में किसी जातक के किसी रोग से पीड़ित होने व उस रोग से उसकी प्राणहानि होने के जोखिम के संकेत उसकी जन्मपत्रिका के अवलोकन के आधार पर मिलते हैं।
रोग का अधिपति ग्रह "षष्ठेश" -
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ज्योतिष शास्त्र में कुण्डली के छठे भाव को रोग का भाव माना गया है एवं इसके अधिपति ग्रह जिसे "षष्ठेश" कहा जाता है, रोग का अधिपति ग्रह माना गया है। यदि किसी जातक पर "षष्ठेश" की महादशा या अन्तर्दशा चल रही हो तो वह निश्चित ही किसी ना किसी रोग से पीड़ित होगा। जन्मपत्रिका में "षष्ठेश" रोग का पक्का कारक होता है। अत: यदि कोई जातक जन्मपत्रिका के अनुसार "षष्ठेश" की महादशा या अन्तर्दशा भोग रहा है तो वह अवश्य ही रोग से पीड़ित हो जाएगा। यदि "षष्ठेश" जन्मपत्रिका के किसी शुभ या लाभ भाव में स्थित हो तो ऐसे में रोगग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा जातक शीघ्र ही रोग से मुक्त नहीं होता।

"मारकेश" की दशा देती है मृत्युतुल्य कष्ट-
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संसार में जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु होना अवश्यंभावी है लेकिन यह मृत्यु कब होगी इसका स्पष्ट संकेत भी ज्योतिष शास्त्र से मिल सकता है। जन्मपत्रिका के द्वितीयेष, सप्तमेष व द्वादशेष मारकेश ग्रह माने गए हैं इनमें द्वितीयेष व सप्तमेष को प्रबल मारकेश माना गया है। ज्योतिष में "मारकेश" मृत्यु देने वाला ग्रह होता है। यदि मारकेश शनि, मंगल, सूर्य, जैसे क्रूर ग्रह हों या "मारकेश" ग्रह राहु-केतु से संयुक्त हों तो यह अधिक हानिकारक हो जाते हैं। मारकेश की महादशा या अन्तर्दशा में जातक मृत्युतुल्य कष्ट पाता है और यदि आयु पूर्ण हो चुकी हो तो ऐसे में जातक की इन दशाओं में मृत्यु होना भी सम्भव है।


क्रूर ग्रह की दशा होती है हानिकारक-
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उपर्युक्त दशाओं के अतिरिक्त क्रूर ग्रहों जैसे अष्टमेश व राहु-केतु की दशाएं भी जातक के स्वास्थ्य व जीवन के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। उपर्युक्त ग्रह स्थितियों व दशाओं के आधार पर यदि हम जातकों को तीन जोन में विभक्त करें तो आईए जानते हैं कि ज्योतिष की दृष्टि से आप किस जोन में कहे जाएंगे-
1. ग्रीन जोन- सर्वप्रथम हम ज्योतिष के ग्रीन जोन वाले जातकों का विश्लेषण करते हैं। यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप "षष्ठेश", "मारकेश" व "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा के प्रभाव में नहीं हैं और आप पर किसी शुभ ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा चल रही है तो आप सुरक्षित अर्थात् "ग्रीन जोन" में माने जाएंगे।
2. ओरेंज जोन- यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप पर "षष्ठेश", या किसी "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा चल रही है किन्तु "मारकेश" की महादशा-अन्तर्दशा व प्रत्यन्तर दशा से आप प्रभावित नहीं हैं अथवा आप केवल "षष्ठेश" या किसी "क्रूर ग्रह" की प्रत्यन्तर दशा भोग रहे हैं। यदि आपका "षष्ठेश" 6,8,12 जैसे हानि स्थान में हो एवं आप पर किसी शुभ ग्रह की महदशा या अन्तर्दशा चल रही हो तब आप "ओरेंज जोन" में माने जाएंगे।
3. रेड जोन-यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप "षष्ठेश", "मारकेश" व "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा के प्रभाव में है और आप पर किसी शुभ ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा नहीं चल रही है एवं आप "मारकेश" की महादशा या अन्तर्दशा के प्रभाव में हैं तो आप अत्यन्त असुरक्षित अर्थात् "रेड जोन" में माने जाएंगे। यदि किसी जातक पर वर्तमान में महादशा (मारकेश/षष्ठेश), अन्तर्दशा ((मारकेश/षष्ठेश) व प्रत्यन्तर दशा (मारकेश/षष्ठेश/क्रूर ग्रह) का संयोग बन रहा हो तो ऐसे जातक को अत्यन्त सावधान व सर्तक रहने की आवश्यकता है। पूर्व वर्णित विंशोत्तरी दशाओं के साथ यदि जातक पर "संकटा" नामक योगिनी दशा चल रही हो तब ऐसा जातक निश्चित रूप से "रेड जोन" में माना जाएगा।

(निवेदन- उपर्युक्त विश्लेषण जिज्ञासु व ज्योतिष शास्त्र में रुचि रखने वाले पाठकों को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत किया गया है। पाठकों की व्यक्तिगत जन्मपत्रिका की ग्रहस्थिति एवं दशाओं के आधार पर उनका स्वास्थ्य सम्बन्धी जोखिम कम या अधिक हो सकता है। अत: पाठकों से अतिविनम्र निवेदन है कि वे किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी असावधानी व लापरवाही से बचें। उपर्युक्त आलेख को केवल सामान्य जानकारी तक ही सीमित रखें व इसके आधार पर स्वास्थ्य सुरक्षा सम्बन्धी निर्णय ना लें।)

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com



सोमवार, 27 अप्रैल 2020

कोरोना संकट: परमात्मा का विराट रूप


आज समूचा विश्व "कोरोना" नामक महामारी से भयाक्रान्त है। लगभग 5 माह पूर्व इस खतरनाक वायरस ने चीन के वुहान शहर में अपनी आमद दी और फिर विश्व के अधिकांश देशों को इसने अपनी चपेट में ले लिया। भारत भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। इस घातक विषाणु का अभी तक कोई कारगर ईलाज नहीं खोजा जा सका है सिवाय इससे बचने के। कोरोना वायरस से बचाव के लिए चीन सहित अधिकांश देशों ने "लाकडाउन" विकल्प को अपनाकर इसके दुष्प्रभाव में कमी करने में सफलता प्राप्त की है। मौजूदा हालात यह हैं कि विगत कुछ दिनों से विश्व के अनेक देश किसी पक्षाघात के रोगी की तरह जड़वत अपनी गतिविधियों को बन्द किए जस के तस रुके हुए हैं। लोग अपने-अपने घरों में बन्द हैं, कल-कारखानों पर ताला है, परिवहन के साधनों के पहिए थमे हुए हैं, मजदूर बेरोजगार बैठे हैं। ऐसे लग रहा है जैसे समूचा विश्व रुक सा गया है। अब इस परिस्थिति को क्या कहें; प्राकृतिक आपदा, महामारी का प्रकोप या परमात्मा का विराट रूप! मेरे देखे वर्तमान संकट को यदि परमात्मा का विराट रूप कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दरअसल ये एक जंग है भौतिकवाद और अध्यात्म के मध्य। जब भी मनुष्य ने स्वयंभू सर्वशक्तिमान बनने का दु:साहस किया है तब-तब प्रकृति ने उसे इसी प्रकार अपना विराट रूप दिखाकर सावधान किया है। प्राकृतिक आपदाएं यूं ही नहीं आती, हर आपदा हमारे लिए एक संकेत होती है। हम अपने भौतिकतावादी दृष्टिकोण में इतने उलझे हुए होते हैं कि हमें इस बात का पता ही नहीं चलता कि कब हमने प्रकृति का दोहन करने के स्थान पर शोषण करना आरम्भ कर दिया। पर्यावरण...प्रकृति परमात्मा का ही रूप है। हमने अपने तथाकथित विकास के लिए परमात्मा के इस प्रकट रूप का बुरी तरह अनादर किया है। जिस भौतिकवाद को हमें परिधि पर रखना था उसे हमने अपने जीवन का केन्द्र बना लिया और जो अध्यात्म हमारे जीवन का केन्द्र होना चाहिए था उसे हमने परिधि पर रख दिया। इसी असंतुलन का परिणाम आज भिन्न-भिन्न प्रकार की आपदाओं के रूप में मनुष्यता के सामने है। तनिक विचार कीजिए दूसरे पर आधिपत्य जमाने के चलते हम शस्त्रों की कैसी बाढ़ ले आए हैं विश्व में। परमाणु बम तक हमने बना डाले, आखिर क्यों? केवल दूसरों पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए। आज विश्व में जितने परमाणु बम हैं वे पूरी वसुधा को विनष्ट करने के लिए शायद पर्याप्त होंगे। ईश्वर ने हमें जीवित रखने के लिए शुद्ध जल, शुद्ध वायु, क्षुधा तृप्ति के लिए सुस्वादु और पौष्टिक आहार की व्यवस्था प्राकृतिक रूप से की थी किन्तु हमने भौतिकतावाद की अन्धी दौड़ में इसे बुरी तरह प्रदूषित कर दिया। आज का मनुष्य अध्यात्म से कोसों दूर है। अध्यात्म से दूर होने का आशय है- आत्मानुशासन से दूर होना। आज जो महामारी हमारे सम्मुख सुरसा सा मुख खोले खड़ी है वह भी केवल कुछ मनुष्यों द्वारा नियत अनुशासन के उल्लंघन का परिणाम मात्र है। मनुष्य जब प्रकृति प्रदत्त स्वतन्त्रता से परे उच्छंखलता व स्वच्छंदता का आचरण करने लगता है तब इस प्रकार की चेतावनी हमें प्रकृति के ही द्वारा मिलती है। मनुष्य कभी भी सर्वशक्तिमान व पूर्ण स्वतन्त्र नहीं हो सकता। वह सदैव अपने जीवनयापन के लिए प्रकृति के बनाए अनुशासन को मानने के लिए बाध्य है। जब भी वह इस अनुशासन का उल्लंघन करता है उसे इस प्रकार के परिणाम भोगने ही पड़ते हैं। इसे आप परमात्मा की ओर से दिया गया दण्ड कह लें या फ़िर प्राकृतिक आपदा, वास्तव में यह हमारे अनुशासनहीन व स्वच्छंद जीवनशैली का परिणाम है। आज "कोरोना" नामक इस महामारी ने हमें अवसर दिया है कि हम अपने अंतस में झांके और इस अकाट्य सत्य का साक्षात्कार करें कि हमें जो कुछ भी अपने जीवनयापन के लिए प्राप्त हुआ है; चाहे वे हमारी सांसे ही क्यों ना हो, परमात्मा की ओर से दिया गया प्रसाद है। हम उसके अधिकारी नहीं हैं; वह केवल हमें ईश्वर की कृपा से मिला है अत: हम उसका आदर करें। हमें अपनी भौतिकतावादी जीवनशैली को परिवर्तित करना होगा क्योंकि भौतिकतावादी जगत का सत्य इन कुछ दिनों में हम सभी के सामने आ चुका है। आज बड़ी-बड़ी महाशक्तियां इस अदने से विषाणु के आगे घुटने टेकने पर विवश हो चुकी हैं। वर्तमान समय की आवश्यकता प्रकृति के साथ लयबद्ध होने की है ना कि अपने तथाकथित विकास के लिए उसके शोषण करने की। हमें अपने विकास के मानदण्ड बदलने होंगे। हम विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश के सहभागी नहीं बन सकते। हमें अपने लोभ, लालच व वर्चस्व की लड़ाई को स्थगित करना होगा। हम सर्वशक्तिमान है इसलिए स्वच्छंद आचरण करेंगे ऐसी आत्मवंचनाओं से हमें बचना होगा। आज हमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना के आधार पर अपना आचरण करना सीखना होगा। सर्वशक्तिमान केवल ईश्वर है, जगत में जो भी गति हो रही है वह उसी नियंता की इच्छा का परिणाम मात्र है। यदि उसकी मर्ज़ी ना हो तो समस्त अस्तित्व चाहकर भी गति नहीं कर सकता, "कोरोना संकट इसका जीवन्त उदाहरण है। समस्त अस्तित्व को उसी सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान के अनुशासन में चलना होता है। जब भी इस अनुशासन की मर्यादा का अतिक्रमण होता है इस प्रकार के संकट हमें सावधान करने आते रहते हैं। अब यह हम पर है कि हम इन संकेतों से कितना सीखते हैं। यह महामारी आज नहीं तो कल विदा हो जाएगी लेकिन इस महामारी के चलते सीखा हुआ सबक यदि हम भूले तो हो सकता दुबारा मनुष्यता इस सबक को सीखने के लिए बचे ही ना।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
संपादक (सरल-चेतना)

27.04.2020

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

अच्छे दिन...!



किसने सोचा था दौड़-भाग में,
ऐसे भी दिन आएंगे।
आपाधापी छोड़ सारे,
घर में ही सुस्ताएंगे॥

घंटे;घड़ियाल;वे तुमुल नाद,
थमे हैं सारे वाद-विवाद।
बाजारों के कोलाहल पर,
सन्नाटे छा जाएंगे॥
    किसने सोचा था....
दूरी ही वरदान बनी है,
जीवन की पहचान बनी है।
मौत से देखो ठनी है ऐसे,
शस्त्रों का सामान बनी है।
देह के सारे रिश्ते-नाते,
और निकट आ जाएंगे।
    किसने सोचा था...

हवा बह रही ठसक से देखो,
मुक्त हुई है कसक से देखो।
नद;नदियां, झरने सारे,
अब स्वच्छ बहते जाएंगे।
     किसने सोचा था...
 
आंख दिखा भय कंपित करते
अट्टाहासों नभ गुंजित करते
दम्भी अधिपति देखो सारे
औंधे मुंह गिर जाएंगे।

किसने सोचा था दौड़-भाग में,
ऐसे भी दिन आएंगे।

कवि-पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

पृथकता (आइसोलेशन) या अस्पृश्यता (छुआछूत) …!


प्राचीनकाल में पृथकता (आइसोलेशन) को अस्पृश्यता (छुआछूत) का नाम देकर जहां सवर्णों की बड़ी आलोचना की गई वहीं एक विशेष वर्ग को निन्दित व घृणास्पद समझने का कुत्सित प्रयास किया गया। मेरे देखे दोनों ही दृष्टिकोण पूर्वाग्रह से प्रेरित अतिवादी दृष्टिकोण थे। वास्तविकता में पृथकता (आइसोलेशन) और अस्पृश्यता (छुआछूत) देश-काल-परिस्थिति के अनुसार की गई स्वास्थ्य सम्बन्धी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के अंग हैं जिन्हें उस दौर की आवश्यकता के अनुसार परिभाषित किया गया। जिस प्रकार आज "लाकडाउन"और "कर्फ़्यू" एक ही व्यवस्था के अंग हैं बस उन्हें परिभाषित करने का ढंग अलग है लेकिन दोनों ही व्यवस्थाओं का उद्देश्य एक है कि लोग घर से बाहर ना निकलें। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आज एकान्तवास (क्वारंटाइन) या पृथकता (आइसोलेशन) में रखे गए व्यक्ति पापी या अपराधी नहीं हैं वे केवल एक संक्रामक रोग से पीड़ित हैं या हो सकते हैं, जो उनसे किसी अन्य व्यक्ति या सम्पूर्ण समाज में फ़ैल सकता है। ठीक उसी प्रकार प्राचीन समय में जिन्हें "शूद्र" कहा जाता था वे कोई अपराधी, पापी या घृणास्पद व्यक्ति नहीं थे; वे केवल उनके द्वारा सम्पादित किए जाने वाले कार्यों के आधार पर स्वास्थ्य सम्बन्धी सामाजिक सुरक्षा को देखते हुए समाज से एक सीमित दूरी पर रखे जाते थे। सामाजिक स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु बनाई गई इस सीमित दूरी को वर्ग विशेष के तथाकथित ठेकेदारों ने मनुवादी सोच, छुआछूत व अस्पृश्यता का नाम देकर समाज में एक गहरी खाई का निर्माण कर सामाजिक सौहार्द्र को समाप्त कर दिया। ज़रा सोचिए जब आज के वैज्ञानिक युग में जहां मनुष्यता चांद को पददलित करने का दम्भ भरती है वहां इस प्रकार के संक्रामक रोग का कोई ईलाज खोजना सम्भव नहीं हो पा रहा है; केवल उस समय की छुआछूत व अस्पृश्यता (आज के दौर के क्वारंटाइन व आइसोलेशन) के, तो प्राचीन समय में ऐसे संक्रमित रोग का ईलाज खोजना भला कहां सम्भव हो पाता! ऐसे में तथाकथित छुआछूत व अस्पृश्यता (क्वारंटाइन व आइसोलेशन); वास्तविकता में पृथकता, नितांत आवश्यक थी। अपितु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है इस विशुद्ध सामाजिक स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्था को कुछ व्यक्तियों ने अपने अहंकार को परिपोषित करने का साधन बना लिया था किन्तु कुछ लोगों की नासमझी के कारण किसी आवश्यक व उपयोगी सिद्धान्त से उत्पन्न किसी सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाना भी अनुचित है। हम इस बात को स्वीकर करते हैं कि समय के साथ-साथ देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार इस प्रकार की व्यवस्थाओं की समुचित समीक्षा कर उन्हें समाप्त या जारी रखने पर निर्णय लिया जाना भी आवश्यक होता है। आज समूचा विश्व इस बात को स्वीकार व इसका समर्थन करने पर विवश है।

- पं. हेमन्त रिछारिया
(संपादक "सरल चेतना")