किसने सोचा था दौड़-भाग में,
ऐसे भी दिन आएंगे।
आपाधापी छोड़ सारे,
घर में ही सुस्ताएंगे॥
घंटे;घड़ियाल;वे तुमुल नाद,
थमे हैं सारे वाद-विवाद।
बाजारों के कोलाहल पर,
सन्नाटे छा जाएंगे॥
किसने सोचा था....
दूरी ही वरदान बनी है,
जीवन की पहचान बनी है।
मौत से देखो ठनी है ऐसे,
शस्त्रों का सामान बनी है।
देह के सारे रिश्ते-नाते,
और निकट आ जाएंगे।
किसने सोचा था...
हवा बह रही ठसक से देखो,
मुक्त हुई है कसक से देखो।
नद;नदियां, झरने सारे,
अब स्वच्छ बहते जाएंगे।
किसने सोचा था...
आंख दिखा भय कंपित करते
अट्टाहासों नभ गुंजित करते
दम्भी अधिपति देखो सारे
औंधे मुंह गिर जाएंगे।
किसने सोचा था दौड़-भाग में,
ऐसे भी दिन आएंगे।
कवि-पं. हेमन्त रिछारिया

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