गुरुवार, 7 जून 2018

नर्मदारंगम् : समीक्षा



आज 12 दिवसीय नर्मदापुरम् रंग महोत्सव ‍’नर्मदारंगम्2018 का समापन हुआ। इस वर्ष नर्मदारंगम्रंग महोत्सव में डा. शंकरशेष द्वारा लिखित नाटकों में से 12 नाटकों- रत्नगर्भा, अरे!मायावी सरोवर, खजुराहो का शिल्पी, आधी रात के बाद, कालजयी, बिनबाती के दीप, फन्दी, मूर्तिकार, एक और द्रोणाचार्य, बाढ़ का पानी, कोमल गांधार और रक्तबीज का मंचन किया गया। रंग महोत्सव में हम थिएटर ग्रुप (भोपाल), एकरंग (भोपाल), कर्मवीर थिएटर (भोपाल), चेतना संस्था (भोपाल), एकरंग नाट्य दल (होशंगाबाद), द परफ़ारमर्स (भोपाल), कृष्णदाम् संस्था (भोपाल), देशज रंगमंडप (भोपाल), अनवरत थिएटर (इन्दौर) एवं रंगधारा-द थिएटर स्ट्रीम (हैदराबाद) के रंगकर्मियों एवं थिएटर समूहों ने हिस्सा लिया। इस महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ नाटक को डा. शंकरशेष फ़ाउण्डेशन मुम्बईद्वारा 51,000 रू. का नगद पुरूस्कार एवं प्रतीक चिन्ह दिया जाना है। लोकतन्त्र की मर्यादा एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रतानुसार एक कलाप्रेमी व दर्शक होने के नाते मेरा भी प्रस्तुत नाटकों की समीक्षा करने का अधिकार बनता है। अपने उसी अधिकार का प्रयोग करते हुए मैंने "नर्मदारंगम्: रंग महोत्सव" में मंचन किए गए सभी नाटकों का समीक्षात्मक अवलोकन किया। मेरे द्वारा किए गए समीक्षात्मक अवलोकन से आप पाठकों का सहमत होना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है क्योंकि आप भी अपना व्यक्तिगत मत एवं अभिव्यक्ति के लिए पूर्णरूपेण स्वतन्त्र हैं। 
प्रस्तुत है संक्षिप्त समीक्षा-

 "रत्नगर्भा" (हम थिएटर ग्रुप, भोपाल) निर्देशक श्री बालेन्द्र सिंह (बालू)  
 "अरे! मायावी सरोवर" (एकरंग, भोपाल) निर्देशक-विभा श्रीवास्तव
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नर्मदारंगम् रंग महोत्सव में हुए ये दोनों ही नाटक (रत्नगर्भा एवं अरे! मायावी सरोवर) दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ पाने में असफ़ल रहे। सशक्त विषयवस्तु होते हुए भी नाटकों में अकारण हास्य मिश्रित कर नाटक की गरिमा को कम कर दिया गया है। कहीं-कहीं तो हास्य भौंडेपन की सीमा तक पहुंच गया है जो अनुचित लगा। " रत्नगर्भा" नाटक में मातृभाषा हिन्दी का उपहास किया जाना मन को आहत कर गया। अब यह लेखक की त्रुटि हो तो भी, त्रुटि तो त्रुटि ही रहेगी। कुल मिलाकर ये दोनों ही नाटक औसत रहे।
 
  "खजुराहो का शिल्पी"-(कर्मवीर थिएटर,भोपाल) निर्देशक-कर्मवीर सिंह
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नर्मदारंगम् रंग महोत्सव में "खजुराहो का शिल्पी" नामक नाटक पिछले दो नाटकों की तुलना में अपना प्रभाव छोड़ने में सफ़ल रहा। कामोपभोग एवं आध्यात्मिकता के मध्य सांसारिक ऊहापोह को प्रदर्शित करता यह नाटक दर्शकों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज़ करने में कामयाब रहा। रंगकर्मियों की संवाद अदायगी में हुई उच्चारणगत अशुद्धियों एवं दृश्यानुकूल प्रकाश व्यवस्था के अभाव ने थोड़ा रसभंग किया। वहीं मूल विषयवस्तु "काम" को "मोह" से स्थानापन्न करना निर्देशन की कमी को अभिव्यक्त करता है। यदि इन कमियों की उपेक्षा की जाए तो अन्तिम रूप से यह नाटक अच्छा कहा जा सकता है।

"आधी रात के बाद"-(चेतना संस्था,भोपाल) निर्देशक-श्री आशीष श्रीवास्तव
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नर्मदारंगम् रंग महोत्सव में "आधी रात के बाद" नाटक की प्रस्तुति आकर्षक अच्छी रही किन्तु नाटक में निर्देशन की अपरिपक्वता स्पष्ट दिखाई दी। भला कौन सा जज एक चोर को अपने साथ अपने सोफ़े पर बैठाकर बात करता है! इस प्रकार की कई कमियां नाटक में दिखाई दीं। मंच सज्जा औसत होने से नाटक की गरिमा कम हुई। रंगकर्मियों का अभिनय श्रेष्ठ रहा यदि उन्हें योग्य निर्देशक का लाभ प्राप्त होता तो वे निश्चय ही इस नाटक को ऊंचाईयाँ प्रदान कराने में सफ़ल होते।

"कालजयी-(एकरंग नाट्य दल,होशंगाबाद) निर्देशक-संजय श्रोतीय
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नर्मदारंगम् रंग महोत्सव में अगला नाटक था- "कालजयी" शिष्टाचार का तकाज़ा है कि बुरे को बुरा नहीं कहना चाहिए किन्तु कटु सत्य यह है कि नाटक अत्यन्त औसत था। निर्देशन, प्रस्तुति, सँगीत, मंच-सज्जा सभी कुछ धरातल छू रहा था। मेरे देखे अभिनय, निर्देशन, लेखन बड़ी गंभीर विधाएँ हैं। इनमें पारंगत होने के लिए ईश्वर-प्रदत्त प्रतिभा के अतिरिक्त अथक परिश्रम,लगन,शिक्षण धैर्य की महती आवश्यकता होती है। किन्तु आजकल प्रदर्शन की शीघ्रता में लोग बड़ी प्रारम्भिक अवस्था में ही अपने आप को पूर्ण समझने की भूल कर बैठते हैं जिसका परिणाम इस प्रकार की औसत प्रस्तुतियाँ होती हैं। नाटक के अनुरूप पात्रों की वेशभूषा हास्यास्पद लगी। रंगकर्मियों के संवादों में उच्चारणगत अनेक अशुद्धियाँ थी। हम जैसे हिन्दी प्रेमियों के लिए यह एक आहत करने वाली बात है। मैं तो इतना ही कहूँगा कि इस प्रकार के औसत प्रदर्शन से पूर्व इन विधाओं का पूर्ण शिक्षण अभ्यास बहुत आवश्यक है।
 
"बिनबाती के दीप"-(द परफ़ारमर्स,भोपाल) निर्देशक-श्री मारिस लाजरस
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नर्मदारंगम् रंग महोत्सव में आज का नाटक था- "बिनबाती के दीप"। "द परफ़ारमर्स" भोपाल, द्वारा प्रस्तुत आज का नाटक बेहतरीन था। निर्देशक मारिस लाजरस की कुशलता व योग्यता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। निर्देशन,प्रस्तुति,संवाद, मंच-सज्जा,प्रकाश, ध्वनि, संगीत सभी कुछ बहुत अच्छा था। विश्वास एवं विश्वासघात के ताने-बाने से बुना यह नाटक जीवन की कड़वी सच्चाई को करीने से उभारने में सफ़ल रहा। प्रत्येक रंगकर्मी ने अपनी भूमिका बड़ी ही ख़ूबसूरती से अदा की। इस महोत्सव में हुए नाटकों में यह नाटक अग्रणी रहा।

"फ़न्दी"-(कृष्णदाम् संस्था,भोपाल) निर्देशक-श्री संतोष पणिक्कर
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नर्मदारंगम् रंग महोत्सव में नाटक "फ़न्दी" की कहानी एक ऐसे विवश पुत्र पर आधारित है जो अपनी आर्थिक विपन्नता के चलते कैंसर से जूझते अपने पिता को दर्द से निजात दिलाने के लिए उसकी हत्या कर देता है। पिता को अगाध स्नेह करने वाला कैदी "फ़न्दी" अपने पिता की उत्कट इच्छा; मृत्यु को पूरा करने के लिए फ़ाँसी का हकदार है या नहीं यह लेखक ने दर्शकों व समाज पर छोड़ दिया है। नाटक का निर्देशन, प्रस्तुति, मंच-सज्जा, ध्वनि सभी कुछ शानदार था। रंगकर्मियों ने अपने अभिनय से नाटक को अत्यंत प्रभावी बनाया। "फ़न्दी" की भूमिका में रंगकर्मी लोकेन्द्र दर्शकों के ह्रदयपटल पर अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। सम्पूर्ण नाटक में केवल एक ही कमी दृष्टिगोचर हुई वह थी "फ़न्दी" की वेशभूषा, जो एक कैदी की अपेक्षा किसी राजनेता की वेशभूषा अधिक लग रही थी। अंततोगत्वा एक विचारणीय विषय, सशक्त कहानी, दमदार अभिनय व परिपक्व निर्देशन ने इस नाटक को यादगार बना दिया।
"एक और द्रोणाचार्य"-(अनवरत थिएटर,इन्दौर)-निर्देशक-श्री नीतेश उपाध्याय
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नर्मदारंगम्रंग महोत्सव में "एक और द्रोणाचार्य" नाटक बेहद नीरस लगा। निर्देशन, प्रस्तुति, मंच-सज्जा सभी कुछ औसत था। जब भी आप ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं तो आप वास्तव में एक अपराध कर रहे होते हैं। नाटक में द्रोणाचार्य के चरित्र का सर्वथा गलत प्रस्तुतिकरण किया गया है। नाटक में द्रोणाचार्य के समकक्ष चरित्र को अपने निजी स्वार्थ के लिए अन्याय एवं भ्रष्टाचार से समझौता करते दिखाया गया है, जो अनुचित है। द्रोणाचार्य ने अपने निजी स्वार्थ एवं महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति लिए नहीं अपितु अपनी राजनिष्ठा के चलते विवश होकर कौरवों के पक्ष में युद्ध अवश्य किया था, किन्तु कभी भी आचार्य द्रोण ने कौरवों का पक्ष लेकर उन्हें सही नहीं ठहराया था। वे सदैव पाण्डवों का ही समर्थन करते रहे क्योंकि पाण्डव धर्मानुसार सही थे। नाटक के चरित्रों के अनुसार पात्रों का चयन बेहद खराब था। निर्देशक को यह बात भलीभाँति समझ लेनी लाभप्रद होगी कि थिएटर और स्कूल-कालेज के नाटकों में फ़र्क होता है।

"बाढ़ का पानी"-(अनवरत थिएटर,इन्दौर) निर्देशक-श्री नीतेश उपाध्याय
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नर्मदारंगम्रंग महोत्सव में नाटक "बाढ़ का पानी" जाति व्यवस्था एवं अस्पृशयता पर केन्द्रित यह नाटक था। यह नाटक औसत रहा। अपरिपक्व निर्देशन के अभाव में रंगकर्मियों का बेहतरीन अभिनय, सुन्दर मंच-सज्जा, दृश्यानुकूल प्रकाश सुमधुर संगीत भी नाटक को ऊंचाईयाँ प्राप्त नहीं करा सके। मेरे देखे सनातन धर्म के सिद्धान्तों को समझे बिना उन पर कटाक्ष करना सर्वथा अनुचित है। हमारे सनातन धर्म में जाति व्यवस्था का कोई उल्लेख नहीं है। वर्ण व्यवस्था अवश्य है, किन्तु फ़िर भी हमारा सनातन धर्म "आपातकाले मर्यादानाश्ति" के सिद्धान्त को मान्यता प्रदान करता है। बिना सनातन धर्म एवं वर्ण व्यवस्था की गहराई को समझे बिना उस व्यवस्था पर भौंडा कटाक्ष निर्देशक की अयोग्यता को दर्शाता है।

"कोमल गांधार"-(अनवरत थिएटर,इन्दौर) निर्देशक-श्री नीतेश उपाध्याय
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नर्मदारंगम्रंग महोत्सव शृंखला का अगला नाटक था-"कोमल गांधार" यदि इस नाटक की मात्र एक शब्द में समीक्षा की जाए तो वह है- निकृष्ट अर्थात् घटिया। निकृष्ट; इसलिए क्योंकि निर्देशन, अभिनय, संगीत,प्रकाश व्यवस्था इत्यादि में हुई कमी को तो सहन क्षमा किया जा सकता है किन्तु ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ को कदापि क्षमा नहीं किया जा सकता और ना ही इस घोर निन्दनीय कृत्य को बर्दाश्त किया जा सकता है। आज का यह निम्नस्तरीय नाटक महाभारत की पृष्ठभूमि पर आधारित था किन्तु इसमें दर्शाए गए तथ्यों का महाभारत के वास्तविक तथ्यों से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था। मेरे देखे इस प्रकार ऐतिहासिक पौराणिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने वाले नाटकों फ़िल्मों को सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति नहीं होनी चाहिए। यदि इस प्रकार वास्तविक तथ्यों से परे अपने ही तथ्य गढ़कर किसी प्राचीन कथा या पात्र के नाम पर बनाए गए नाटकों का सार्वजनिक मंचन किया जाता रहा तो आज की युवा पीढ़ी हमारे शास्त्रों आदर्श पौराणिक पात्रों के प्रति एक निन्दित पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाएगी जो समाज के लिए अँततोगत्वा घातक सिद्ध होगा। मैं इस प्रकार के नाटक की घोर निन्दा एवं भर्त्सना करता हूँ।

"रक्तबीज"-(रंगधारा-द थिएटर स्ट्रीम, हैदराबाद) निर्देशक-श्री विनय वर्मा
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नर्मदारंगम्रंग महोत्सव की अन्तिम प्रस्तुति थी-"रक्तबीज" अभिनय की दृष्टि से यह नाटक सर्वश्रेष्ठ कहा जा सकता है किन्तु पटकथा की कसौटी पर यह नाटक खरा नहीं उतरा। नाटक भौतिकवाद के समक्ष दम तोड़ती नैतिकता पर केन्द्रित था, जो वर्तमान में आम बात है। नाटक समाज को सकारात्मक सन्देश देने पूर्णत: असफ़ल रहा। रंगकर्मियों का श्रेष्ठ अभिनय, दृश्यानुकूल संगीत, प्रकाश व्यवस्था, एवं उत्तम निर्देशन ने नाटक को पर्याप्त सहारा दिया किन्तु यह सभी घटक मिलकर भी सशक्त पटकथा का अभाव दूर नहीं कर सके।

समीक्षक- ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया




बुधवार, 6 जून 2018

भारतवर्ष का शास्त्रोक्त इतिहास


 शास्त्रानुसार हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी सात द्वीपों का संयुक्त स्वरूप है। ये सात द्वीप हैं-
1. कुशद्वीप
2. क्रौंचद्वीप
3. जम्बूद्वीप
4. प्लक्षद्वीप
5. शाल्मद्वीप
6. शाकद्वीप
7. पुष्करद्वीप
इन सातों द्वीपों के स्वामी अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी के अधिपति महाराज अम्बरीश जो राजर्षि नाभाग के पुत्र थे। राजर्षि नाभाग वैवस्वत मनु के पुत्र थे। कालान्तर में जम्बूद्वीप के राजा हुए महाराज आग्नीध्र, जिनके नौ यशस्वी पुत्र थे-
1.नाभि (जिनका एक नाम अजनाभ भी था)
2. हरिवर्ष
3. हिरण्मय
4. केतुमाल
5. किम्पुरूष
6. इलावृत
7. रम्यक
8. कुरु
9. भद्राश्व।
महाराज आग्नीध्र ने अपने आधिपत्य वाले जम्बूद्वीप को अपने पुत्रों में बराबर-बराबर विभक्त कर दिया था। जिसमें महाराज नाभि के हिस्से वाले भूभाग को "नाभिखण्ड या अजनाभवर्ष" कहा जाने लगा। महाराज नाभि का विवाह मेरूदेवी से हुआ था। महाराज नाभि एवं मेरूदेवी की कोई सन्तान नहीं थी इसलिए उन्होंने सन्तान की कामना से एक यज्ञ किया। इस यज्ञ से प्रसन्न होकार भगवान ने स्वयं उनके यहाँ पुत्र रूप में अवतार लिया। जिसे शास्त्रों में "ऋषभ-अवतार" कहा गया। महाराज नाभि व मेरूदेवी के पुत्र भगवान ऋषभदेव का विवाह इन्द्र की कन्या जयन्ती से हुआ। भगवान ऋषभदेव व जयन्ती के सौ पुत्र हुए जिनमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम "भरत" था। इन्हीं राजर्षि भरत के नाम पर हमारे देश का नाभ "भारतवर्ष" पड़ा। नाभिखण्ड के सदृश ही इसे "भरतखण्ड" भी कहा जाने लगा। इसका प्रमाण हमें कर्मकाण्ड व पूजा-पाठ इत्यादि के संकल्प लेते समय भी मिलता है जब संकल्प के उच्चारण में "जम्बूद्वीपे भरतखण्डे..." बोलकर संकल्प लिया जाता है। वर्तमान भारतवर्ष प्राचीन समय के जम्बूद्वीप का "भरतखण्ड" नामक भूभाग ही है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र


सोमवार, 4 जून 2018

"समाजसेवी"


कल एक कार्यक्रम में था, वहां कुछ धनाढ्य,प्रभुत्वसम्पन्न,एवं राजनीति से जुड़े व्यक्तियों को "समाजसेवी" बताकर सम्मानित किया जा रहा था। बहुत स्मरण करने पर भी मुझे उनके द्वारा की गई समाज की कोई सेवा जिसे तथाकथित "समाजसेवा" बताया जा रहा था, याद नहीं आई। मैं इसे पूर्णत: मेरी क्षीण होती स्मरणशक्ति का दोष मानता हूं। अत: मैंने अपने निकट बैठे मित्र से कहा कि आगामी कार्यक्रमों जब किसी को वरिष्ठ या कनिष्ठ....क्षमा कीजिए कनिष्ठ तो कोई होता नहीं; जहां कहीं भी "समाजसेवी" पाए जाते हैं वे वरिष्ठ ही होते हैं, तो जब भी किसी व्यक्ति को वरिष्ठ समाजसेवी कहकर सम्मानित किया जाए तो साथ ही साथ उसके द्वारा की गई समाज की महती सेवा का भी उल्लेख किया जाए जिससे मुझ जैसे दुर्बल स्मरणशक्ति वाले लोगों को उसकी समाजसेवा याद करने के लिए अपने मस्तिष्क पर अधिक ज़ोर ना डालना पड़े।

पुनश्च- सोच रहा हूं कि आज यदि स्वनाम-धन्य प्रख्यात व्यंग्यकार स्व. शरद जोशी जीवित होते तो अपनी लोकप्रिय व्यंग्य रचना "अध्यक्ष महोदय" की तर्ज़ पर ऐसे समाजसेवियों के लिए "समाजसेवी" नामक रचना करते अवश्य करते। रचना का प्रारम्भ कुछ इस प्रकार होता-"प्रत्येक शहर में कुछ 'समाजसेवी' किस्म के लोग पाए जाते हैं.....।"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 2 मई 2018

तब ना कोई दलित था...

बात थोड़ी पुरानी है। मेरी आयु लगभग 6-7 वर्ष की होगी। मेरे नानाजी जो कि कपासी ग्राम के ज़मींदार थे उनके यहां गाड़ीवान दल (बैलगाड़ी चलाने वाले) में एक गाड़ीवान थे रामसिंह जिन्हें मैं ’रामसिंह मामा’ कहता था। मेरे नानाजी के संस्कार व उनका आदेश था कि मैं हमारे यहां कार्य करने वाले हर व्यक्ति को रिश्तों के नाम से जैसे भैया, मामा, काका, काकी, मौसी, दादा इत्यादि कहकर ही संबोधित करूं। रामसिंह मामा एक दलित आदिवासी थे। तब दलित क्या होता है यह मुझे तो पता नहीं था। लेकिन उस समय की देश-काल-परिस्थिति अनुसार इस वर्ग से एक सामाजिक दूरी अवश्य थी। जिसे सामाजिक मर्यादा के नाम पर हर वर्ग स्वीकार कर उसका अनुपालन करता था। रामसिंह मामा अपना भोजन हमारे घर से सटे खलिहान की एक कोठरी में पकाते थे। एक बार हुआ यूं कि रामसिंह मामा अपना भोजन बना रहे थे तभी मैं बाल-सुलभ चंचलता के चलते खेलते-खेलते उनकी कोठरीनुमा रसोई में पहुंच गया। मैंने देखा वहां चूल्हे पर एक पतीली में दाल उबल रही है और मामा अपने हाथों से ठोक-ठोक कर मोटे-मोटे टिक्कड़ बना रहे हैं। यह सब देखकर मेरा मन उनके हाथों के पकाए टिक्कड़ व दाल खाने को मचल गया। मैंने जब उनसे इस भोजन की मांग की तो उन्होंने सामाजिक मर्यादाओं का अनुपालन करते हुए मुझे मना कर समझाने की बहुत कोशिश की किन्तु जब मैंने बालहठ पकड़ ली तब रामसिंह मामा किंकर्त्त्वयमिमूढ़ हो मुझे नानाजी के पास ले गए। उन्हें डर था कि मेरी ज़िद पूरी करने से कहीं नानाजी नाराज़ ना हो जाएं, क्योंकि नानाजी ज़मींदार होने के साथ-साथ एक उच्चकुलीन ब्राह्मण भी थे। रामसिंह मामा से जब नानाजी ने मेरे मचलने का कारण पूछा तो सारी बात बता दी। इस पर नानाजी ने उनसे कहा कि "रामसिंह जा तू अपनी टिक्कड़ और दाल ले आ।" मामा थोड़े सकुचाए किन्तु नानाजी का आदेश तो उन्हें मानना ही था सो वे झट अपने हाथ के बने टिक्कड़ और दाल लेकर आ गए और फ़िर नानाजी ने स्वयं अपने हाथों से मुझे रामसिंह मामा के हाथ से बने टिक्कड़ और दाल खिला कर मेरी ज़िद पूरी की। पहले सामाजिक मर्यादाओं के नाम पर वर्ग-विशेष से दूरी अवश्य रखी जाती थी किन्तु उस वर्ग-विशेष के व्यक्ति के प्रति प्रेम को साध लिया जाता था। आज उस दूरी को मिटाने का नाटक तो किया जा रहा है किन्तु उन वर्ग-विशेष के व्यक्तियों के प्रति प्रेम कहीं खो गया है। मैंने उस समय कितनी ही बार अपने नानाजी को वर्षों से चली आ रही बद्धमूल छूत-अछूत की परम्पराओं का अतिक्रमण कर केवल प्रेम को प्राथमिकता देते हुए देखा है। मेरे देखे इस संसार में यदि केवल प्रेम साध लिया जाए तो शेष सब अपने से सध जाता है। बिना प्रेम के सारे साधन महज़ एक नाटक से अधिक कुछ नहीं हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया


सोमवार, 23 अप्रैल 2018

अनुवाद सहित करें धर्मग्रन्थों का पाठ


हमारे देश के मन्दिरों व घरों में सुन्दरकाण्ड, रामचरितमानस एवं रामायण का पाठ अक्सर होता रहता है। इस प्रकार के पाठ के लिए ध्वनि विस्तारक यन्त्र आदि की व्यवस्था हर मन्दिर और कभी-कभी तो घरों में भी की जाती है। लेकिन देखने में आता है कि अधिकतर इस प्रकार पाठ इत्यादि बिल्कुल यन्त्रवत हो रहे हैं, मशीन की तरह। सबसे बड़ी समस्या तो भाषा की है, पाठ की भाषा अवधि या सँस्कृत है। जो हर किसी के समझ नहीं आती फ़िर भी पाठ उसी भाषा में करने में विद्वता समझी व मानी जाती है। मेरे देखे किसी भी धर्मग्रन्थ का पाठ उसके हिन्दी अनुवाद सहित होना चाहिए क्योंकि मानस हो या रामायण इनका एक-एक सूत्र व्यक्ति का जीवन परिवर्तित करने का सामर्थ्य रखता है अगर समझ में आ जाए तो..। आजकल लोग हिन्दी ठीक प्रकार से नहीं समझ पा रहे हैं ऐसे में अवधि या सँस्कृत को भलीभाँति समझ पाना कठिन है। शायद ऐसा आत्मवँचना के लिए भी किया जाता है जिससे कहीं कोई सूत्र ह्रदय में चुभ ना जाए तीर की तरह, यदि चुभ गया तो फ़िर घर-सँसार का क्या होगा! मैंने देखा है मानस के गँभीर सूत्रों को भी लोग ढोलक और हारमोनियम बजा-बजाकर मनोरंजक बनाकर गा लेते हैं शायद इसलिए कि कहीं कोई सूत्र विचार करने पर विवश ना कर दे। संगीत का अपना नशा होता है। मेरे देखे आज बड़ी सँख्या में मानस व भागवतपाठ का आयोजन घरों व मन्दिरों में होता है, लोग बड़े गर्व से कहते-सुनते नज़र आते हैं-"अखण्ड रामायण का पाठ रखा है या मास पारायण है" किन्तु फ़िर भी समाज दिनों-दिन नैतिक व चारित्रिक पतन की ओर अग्रसर होता जा रहा है; क्यों ? क्योंकि हमने चिन्तन के गँभीर विषयों को भी मनोरंजन का साधन बना लिया है। मेरा आप सभी से बस यही निवेदन है कि चाहे मानस हो, रामायण हो, भागवत हो या कोई भी धर्मग्रन्थ उसका पाठ जहाँ तक बन सके हिन्दी अनुवाद सहित करे ताकि उसके सूत्र आपको चिन्तन करने पर विवश कर सके। यहाँ मेरा आशय सँस्कृत या किसी भाषा का निरादर करना नहीं है किन्तु भाषा की प्रासँगिकता देश-काल-परिस्थिति के अनुसार होती है। बुद्ध पाली में बोले, महावीर प्राकृत में, जीसस अरेमिक में, कबीर की भाषा सधुक्कड़ी थी, वहीं वासुदेव ने गीता के उपदेश के लिए सँस्कृत को चुना क्योंकि ये उस काल की भाषाएँ थीं, लोग उस दौर में इन भाषाओं को समझ सकते थे। आज के दौर की भाषा हिन्दी है अत: धर्मग्रन्थों का पाठ हिन्दी में ही होना चाहिए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र


गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

गिरिराज गोवर्धन

हमारे सनातन धर्म में प्रकृति को परमात्मा से अभिन्न माना गया है। इसलिए हमने प्रकृति की भी परमात्मा के रूप में ही आराधना की है। चाहे नदी हो, पर्वत हो या फ़िर वृक्ष, हमने सभी में परमात्मा के रूप का दर्शन किया है। परिक्रमा हमारी सनातन पूजा पद्धति का अहम् हिस्सा है। हिन्दू धर्म में परिक्रमा जिसे प्रदक्षिणा भी कहा जाता है; मन्दिर, देवप्रतिमा, पवित्र स्थानों, नदियों व पर्वतों की भी होती है। कलियुग में गोवर्धन पर्वत जिन्हें गिरिराज भी कहा जाता है उनकी परिक्रमा बहुत ही महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा श्रद्धालुओं के सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली होती है। गोवर्धन पर्वत को योगेश्वर भगवान कृष्ण का साक्षात् स्वरूप माना गया है। गिरिराज गोवर्धन को प्रत्यक्ष देव की मान्यता प्राप्त है। इन्हीं गोवर्धन पर्वत को द्वापर युग में भगवान कृष्ण द्वारा इन्द्र का मद चूर करने के लिए एवं ब्रजवासियों को इन्द्र के कोप से बचाने के लिए 7 दिनों तक अपने वाम हाथ की कनिष्ठा अंगुली के नख पर धारण किया गया था। कलियुग में गिरिराज गोवर्धन को भगवान कृष्ण का ही साक्षात् स्वरूप मानकर उनकी परिक्रमा की जाती है। गिरिराज गोवर्धन की यह परिक्रमा अनन्त फ़लदायी व पुण्यप्रद होती है। गिरिराज गोवर्धन उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले से लगभग 22 कि.मी की दूरी पर स्थित है। गिरिराज गोवर्धन पर्वत 21 कि.मी के परिक्षेत्र में फ़ैला हुआ है। गिरिराज पर्वत की परिक्रमा 7 कोस अर्थात 21 कि.मी की होती है।
तीन हैं मुखारबिन्द-
गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा वैसे तो कहीं से भी प्रारम्भ की जा सकती है किन्तु मान्यता अनुसार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा प्रारम्भ करने हेतु तीन मुखारबिन्द हैं। 
ये तीन मुखारबिन्द हैं-
1. गोवर्धन दानघाटी 2. जतीपुरा 3. मानसी-गंगा
इन तीन मुखारबिन्द में से किसी एक मुखारबिन्द से परिक्रमा प्रारम्भ कर परिक्रमा पूर्ण करने पर वापस उसी मुखारबिन्द पर पहुँचना होता है। किन्तु सभी वैष्णव भक्तजन "जतीपुरा-मुखारबिन्द" से ही अपनी परिक्रमा का प्रारम्भ करते हैं, शेष सभी भक्त गोवर्धन दानघाटी व मानसी-गंगा मुखारबिन्द से अपनी परिक्रमा प्रारम्भ करते हैं। "जतीपुरा-मुखारबिन्द" को श्रीनाथ जी के विग्रह की मान्यता प्राप्त है। गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा में मार्ग में अनेक मठ, मन्दिर, गाँव व पवित्र कुण्ड इत्यादि आते हैं जैसे आन्यौर, राधाकुण्ड, कुसुम सरोवर, गोवर्धन दानघाटी, जतीपुरा, मानसी-गंगा, गौड़ीय मठ एवं "पूँछरी का लौठा" आदि। वैसे तो गिरिराज परिक्रमा वर्षभर अनवरत चलती रहती है किन्तु विशेष पर्व जैसे पूर्णिमा, अधिकमास, कार्तिकमास, श्रावणमास में गोवर्धन परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं की सँख्या में आशातीत वृद्धि हो जाती है।
दण्डवति परिक्रमा-
सामान्यत: गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा पैदल की जाती है किन्तु कुछ श्रद्धालु इसे दण्डवत करते हुए भी करते हैं जिसे "दण्डौति परिक्रमा" कहा जाता है। वृद्धजनों व बच्चों के लिए यहाँ रिक्शे आदि से परिक्रमा करने की भी व्यवस्था है।
शापित भी हैं गिरिराज जी-
एक प्राचीन कथा के अनुसार गिरिराज गोवर्धन शापित हैं। गोवर्धन पर्वत को कलियुग में प्रतिदिन तिल-तिल घटने का श्राप मिला हुआ है। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि आज यह श्राप इस क्षेत्र के अतिक्रमणकारियों के कारण पूर्णरूपेण चरितार्थ हो रहा है।
"पूँछरी के लौठा" देते हैं साक्षी-
गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा मार्ग में "पूँछरी का लौठा" नामक स्थान आता है जो राजस्थान में पड़ता है। यहाँ पहलवान को "लौठा" कहा जाता है। यहाँ मन्दिर में श्री हनुमान जी का विग्रह स्थापित है। प्राचीन कथा अनुसार जब भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत के इस क्षेत्र में गोचारण के लिए आते थे तब श्री हनुमान जी उनके साथ खेला करते थे। दोनों साथ-साथ भोजन व बातें किया करते थे। किन्तु जब भगवान कृष्ण की लीला पूर्ण होकर उनके बैकुण्ड गमन का समय आया तो हनुमान जी उदास हो गए और उनके विरह में दु:खी होकर कहने लगे कि आप तो अपने धाम जा रहे हो लेकिन मैं अकेला हो जाऊँगा। क्योंकि हनुमान जी अमर हैं। हनुमान जी की इस बात पर भगवान कृष्ण ने उन्हें आश्वस्त किया कि कलियुग में गिरिराज गोवर्धन को मेरा साक्षात् स्वरूप मानकर इसकी परिक्रमा की जाएगी और यह परिक्रमा तभी पूर्ण मानी जाएगी जब आप स्वयं इसकी साक्षी देंगे। आपके दर्शनों के बिना गोवर्धन परिक्रमा पूर्ण नहीं मानी जाएगी इससे आपके पास सदैव भक्तों की चहल-पहल रहा करेगी। इसी मान्यता के अनुसार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा करते समय प्रत्येक श्रद्धालु व भक्त यहाँ दर्शन कर अपनी साक्षी दिलाने आते हैं। "पूँछरी के लौठा" अर्थात् हनुमान जी के दर्शन व साक्षी के उपरान्त प्रारम्भ वाले मुखारबिन्द पर पहुँचकर परिक्रमा की समाप्ति की जाती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में वर्ष में एक बार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com