बात थोड़ी पुरानी है। मेरी आयु लगभग 6-7 वर्ष की होगी। मेरे नानाजी जो कि कपासी ग्राम के ज़मींदार थे उनके यहां गाड़ीवान दल (बैलगाड़ी चलाने वाले) में एक गाड़ीवान थे रामसिंह जिन्हें मैं ’रामसिंह मामा’ कहता था। मेरे नानाजी के संस्कार व उनका आदेश था कि मैं हमारे यहां कार्य करने वाले हर व्यक्ति को रिश्तों के नाम से जैसे भैया, मामा, काका, काकी, मौसी, दादा इत्यादि कहकर ही संबोधित करूं। रामसिंह मामा एक दलित आदिवासी थे। तब दलित क्या होता है यह मुझे तो पता नहीं था। लेकिन उस समय की देश-काल-परिस्थिति अनुसार इस वर्ग से एक सामाजिक दूरी अवश्य थी। जिसे सामाजिक मर्यादा के नाम पर हर वर्ग स्वीकार कर उसका अनुपालन करता था। रामसिंह मामा अपना भोजन हमारे घर से सटे खलिहान की एक कोठरी में पकाते थे। एक बार हुआ यूं कि रामसिंह मामा अपना भोजन बना रहे थे तभी मैं बाल-सुलभ चंचलता के चलते खेलते-खेलते उनकी कोठरीनुमा रसोई में पहुंच गया। मैंने देखा वहां चूल्हे पर एक पतीली में दाल उबल रही है और मामा अपने हाथों से ठोक-ठोक कर मोटे-मोटे टिक्कड़ बना रहे हैं। यह सब देखकर मेरा मन उनके हाथों के पकाए टिक्कड़ व दाल खाने को मचल गया। मैंने जब उनसे इस भोजन की मांग की तो उन्होंने सामाजिक मर्यादाओं का अनुपालन करते हुए मुझे मना कर समझाने की बहुत कोशिश की किन्तु जब मैंने बालहठ पकड़ ली तब रामसिंह मामा किंकर्त्त्वयमिमूढ़ हो मुझे नानाजी के पास ले गए। उन्हें डर था कि मेरी ज़िद पूरी करने से कहीं नानाजी नाराज़ ना हो जाएं, क्योंकि नानाजी ज़मींदार होने के साथ-साथ एक उच्चकुलीन ब्राह्मण भी थे। रामसिंह मामा से जब नानाजी ने मेरे मचलने का कारण पूछा तो सारी बात बता दी। इस पर नानाजी ने उनसे कहा कि "रामसिंह जा तू अपनी टिक्कड़ और दाल ले आ।" मामा थोड़े सकुचाए किन्तु नानाजी का आदेश तो उन्हें मानना ही था सो वे झट अपने हाथ के बने टिक्कड़ और दाल लेकर आ गए और फ़िर नानाजी ने स्वयं अपने हाथों से मुझे रामसिंह मामा के हाथ से बने टिक्कड़ और दाल खिला कर मेरी ज़िद पूरी की। पहले सामाजिक मर्यादाओं के नाम पर वर्ग-विशेष से दूरी अवश्य रखी जाती थी किन्तु उस वर्ग-विशेष के व्यक्ति के प्रति प्रेम को साध लिया जाता था। आज उस दूरी को मिटाने का नाटक तो किया जा रहा है किन्तु उन वर्ग-विशेष के व्यक्तियों के प्रति प्रेम कहीं खो गया है। मैंने उस समय कितनी ही बार अपने नानाजी को वर्षों से चली आ रही बद्धमूल छूत-अछूत की परम्पराओं का अतिक्रमण कर केवल प्रेम को प्राथमिकता देते हुए देखा है। मेरे देखे इस संसार में यदि केवल प्रेम साध लिया जाए तो शेष सब अपने से सध जाता है। बिना प्रेम के सारे साधन महज़ एक नाटक से अधिक कुछ नहीं हैं।
-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें