हमारे देश के मन्दिरों व घरों में सुन्दरकाण्ड, रामचरितमानस एवं रामायण का पाठ अक्सर होता रहता है। इस प्रकार के पाठ के लिए ध्वनि विस्तारक यन्त्र आदि की व्यवस्था हर मन्दिर और कभी-कभी तो घरों में भी की जाती है। लेकिन देखने में आता है कि अधिकतर इस प्रकार पाठ इत्यादि बिल्कुल यन्त्रवत हो रहे हैं, मशीन की तरह। सबसे बड़ी समस्या तो भाषा की है, पाठ की भाषा अवधि या सँस्कृत है। जो हर किसी के समझ नहीं आती फ़िर भी पाठ उसी भाषा में करने में विद्वता समझी व मानी जाती है। मेरे देखे किसी भी धर्मग्रन्थ का पाठ उसके हिन्दी अनुवाद सहित होना चाहिए क्योंकि मानस हो या रामायण इनका एक-एक सूत्र व्यक्ति का जीवन परिवर्तित करने का सामर्थ्य रखता है अगर समझ में आ जाए तो..। आजकल लोग हिन्दी ठीक प्रकार से नहीं समझ पा रहे हैं ऐसे में अवधि या सँस्कृत को भलीभाँति समझ पाना कठिन है। शायद ऐसा आत्मवँचना के लिए भी किया जाता है जिससे कहीं कोई सूत्र ह्रदय में चुभ ना जाए तीर की तरह, यदि चुभ गया तो फ़िर घर-सँसार का क्या होगा! मैंने देखा है मानस के गँभीर सूत्रों को भी लोग ढोलक और हारमोनियम बजा-बजाकर मनोरंजक बनाकर गा लेते हैं शायद इसलिए कि कहीं कोई सूत्र विचार करने पर विवश ना कर दे। संगीत का अपना नशा होता है। मेरे देखे आज बड़ी सँख्या में मानस व भागवतपाठ का आयोजन घरों व मन्दिरों में होता है, लोग बड़े गर्व से कहते-सुनते नज़र आते हैं-"अखण्ड रामायण का पाठ रखा है या मास पारायण है" किन्तु फ़िर भी समाज दिनों-दिन नैतिक व चारित्रिक पतन की ओर अग्रसर होता जा रहा है; क्यों ? क्योंकि हमने चिन्तन के गँभीर विषयों को भी मनोरंजन का साधन बना लिया है। मेरा आप सभी से बस यही निवेदन है कि चाहे मानस हो, रामायण हो, भागवत हो या कोई भी धर्मग्रन्थ उसका पाठ जहाँ तक बन सके हिन्दी अनुवाद सहित करे ताकि उसके सूत्र आपको चिन्तन करने पर विवश कर सके। यहाँ मेरा आशय सँस्कृत या किसी भाषा का निरादर करना नहीं है किन्तु भाषा की प्रासँगिकता देश-काल-परिस्थिति के अनुसार होती है। बुद्ध पाली में बोले, महावीर प्राकृत में, जीसस अरेमिक में, कबीर की भाषा सधुक्कड़ी थी, वहीं वासुदेव ने गीता के उपदेश के लिए सँस्कृत को चुना क्योंकि ये उस काल की भाषाएँ थीं, लोग उस दौर में इन भाषाओं को समझ सकते थे। आज के दौर की भाषा हिन्दी है अत: धर्मग्रन्थों का पाठ हिन्दी में ही होना चाहिए।
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

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