आज 12 दिवसीय नर्मदापुरम् रंग महोत्सव ’नर्मदारंगम्’ 2018 का समापन हुआ। इस वर्ष ’नर्मदारंगम्’ रंग महोत्सव
में डा. शंकरशेष द्वारा लिखित नाटकों में से 12 नाटकों- रत्नगर्भा, अरे!मायावी
सरोवर, खजुराहो का शिल्पी,
आधी रात के बाद, कालजयी, बिनबाती
के दीप, फन्दी, मूर्तिकार,
एक और द्रोणाचार्य, बाढ़ का पानी, कोमल
गांधार और रक्तबीज का मंचन किया गया। रंग महोत्सव में हम थिएटर ग्रुप (भोपाल), एकरंग
(भोपाल), कर्मवीर थिएटर (भोपाल),
चेतना संस्था (भोपाल), एकरंग नाट्य दल (होशंगाबाद), द परफ़ारमर्स
(भोपाल), कृष्णदाम् संस्था (भोपाल), देशज रंगमंडप (भोपाल), अनवरत
थिएटर (इन्दौर) एवं रंगधारा-द थिएटर स्ट्रीम (हैदराबाद) के रंगकर्मियों एवं थिएटर समूहों
ने हिस्सा लिया। इस महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ नाटक को ’डा. शंकरशेष
फ़ाउण्डेशन मुम्बई’
द्वारा 51,000 रू. का नगद पुरूस्कार
एवं प्रतीक चिन्ह दिया जाना है। लोकतन्त्र की मर्यादा एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रतानुसार
एक कलाप्रेमी व दर्शक होने के नाते मेरा भी प्रस्तुत
नाटकों की समीक्षा करने का अधिकार बनता है। अपने उसी अधिकार का प्रयोग करते हुए मैंने "नर्मदारंगम्: रंग महोत्सव" में मंचन किए
गए सभी नाटकों का समीक्षात्मक अवलोकन किया। मेरे द्वारा किए गए समीक्षात्मक अवलोकन से आप पाठकों का सहमत होना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है क्योंकि आप
भी अपना व्यक्तिगत मत एवं अभिव्यक्ति के लिए पूर्णरूपेण स्वतन्त्र हैं।
प्रस्तुत है संक्षिप्त समीक्षा-
प्रस्तुत है संक्षिप्त समीक्षा-
"रत्नगर्भा" (हम थिएटर ग्रुप, भोपाल) निर्देशक श्री बालेन्द्र सिंह (बालू)
"अरे! मायावी सरोवर" (एकरंग, भोपाल) निर्देशक-विभा श्रीवास्तव
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‘नर्मदारंगम्’ रंग महोत्सव में हुए ये दोनों ही नाटक (रत्नगर्भा एवं अरे! मायावी सरोवर) दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ पाने
में असफ़ल रहे। सशक्त विषयवस्तु होते हुए भी नाटकों में अकारण हास्य मिश्रित कर नाटक
की गरिमा को कम कर दिया गया है। कहीं-कहीं तो हास्य भौंडेपन की सीमा तक पहुंच गया है
जो अनुचित लगा। " रत्नगर्भा" नाटक में मातृभाषा हिन्दी का उपहास किया जाना
मन को आहत कर गया। अब यह लेखक की त्रुटि हो तो भी, त्रुटि तो त्रुटि ही रहेगी।
कुल मिलाकर
ये दोनों ही नाटक
औसत रहे।
"खजुराहो का शिल्पी"-(कर्मवीर
थिएटर,भोपाल) निर्देशक-कर्मवीर सिंह
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नर्मदारंगम्
रंग महोत्सव में "खजुराहो
का शिल्पी" नामक
नाटक पिछले दो नाटकों
की तुलना में अपना
प्रभाव छोड़ने में सफ़ल
रहा। कामोपभोग एवं
आध्यात्मिकता के मध्य सांसारिक
ऊहापोह को प्रदर्शित करता
यह नाटक दर्शकों के
बीच अपनी उपस्थिति दर्ज़
करने में कामयाब रहा।
रंगकर्मियों की संवाद अदायगी
में हुई उच्चारणगत अशुद्धियों
एवं दृश्यानुकूल प्रकाश
व्यवस्था के अभाव ने
थोड़ा रसभंग किया। वहीं
मूल विषयवस्तु "काम"
को
"मोह"
से स्थानापन्न करना
निर्देशन की कमी को
अभिव्यक्त करता है। यदि
इन कमियों की उपेक्षा
की जाए तो अन्तिम
रूप से यह नाटक
अच्छा कहा जा सकता
है।
"आधी रात के बाद"-(चेतना संस्था,भोपाल) निर्देशक-श्री आशीष
श्रीवास्तव
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नर्मदारंगम्
रंग महोत्सव में "आधी
रात के बाद" नाटक
की प्रस्तुति आकर्षक
व अच्छी रही किन्तु
नाटक में निर्देशन की
अपरिपक्वता स्पष्ट दिखाई दी।
भला कौन सा जज
एक चोर को अपने
साथ अपने सोफ़े पर
बैठाकर बात करता है! इस
प्रकार की कई कमियां
नाटक में दिखाई दीं।
मंच सज्जा औसत होने
से नाटक की गरिमा
कम हुई। रंगकर्मियों का
अभिनय श्रेष्ठ रहा यदि
उन्हें योग्य निर्देशक का
लाभ प्राप्त होता तो
वे निश्चय ही इस
नाटक को ऊंचाईयाँ प्रदान
कराने में सफ़ल होते।
"कालजयी-(एकरंग नाट्य दल,होशंगाबाद) निर्देशक-संजय श्रोतीय
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नर्मदारंगम्
रंग महोत्सव में अगला
नाटक था- "कालजयी"।
शिष्टाचार का तकाज़ा है
कि बुरे को बुरा
नहीं कहना चाहिए किन्तु
कटु सत्य यह है
कि नाटक अत्यन्त औसत
था। निर्देशन, प्रस्तुति, सँगीत, मंच-सज्जा सभी
कुछ धरातल छू रहा
था। मेरे देखे अभिनय, निर्देशन,
लेखन बड़ी गंभीर विधाएँ
हैं। इनमें पारंगत होने
के लिए ईश्वर-प्रदत्त प्रतिभा
के अतिरिक्त अथक
परिश्रम,लगन,शिक्षण व धैर्य
की महती आवश्यकता होती
है। किन्तु आजकल प्रदर्शन
की शीघ्रता में लोग
बड़ी प्रारम्भिक अवस्था
में ही अपने आप
को पूर्ण समझने की
भूल कर बैठते हैं
जिसका परिणाम इस प्रकार
की औसत प्रस्तुतियाँ होती
हैं। नाटक के अनुरूप
पात्रों की वेशभूषा हास्यास्पद
लगी। रंगकर्मियों के
संवादों में उच्चारणगत अनेक
अशुद्धियाँ थी। हम जैसे
हिन्दी प्रेमियों के
लिए यह एक आहत
करने वाली बात है।
मैं तो इतना ही
कहूँगा कि इस प्रकार
के औसत प्रदर्शन से
पूर्व इन विधाओं का
पूर्ण शिक्षण व अभ्यास
बहुत आवश्यक है।
"बिनबाती के दीप"-(द परफ़ारमर्स,भोपाल) निर्देशक-श्री मारिस
लाजरस
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नर्मदारंगम् रंग
महोत्सव में आज का नाटक था- "बिनबाती
के दीप"। "द परफ़ारमर्स" भोपाल, द्वारा प्रस्तुत आज का नाटक बेहतरीन
था। निर्देशक मारिस लाजरस की कुशलता व योग्यता स्पष्ट दिखाई दे रही थी। निर्देशन,प्रस्तुति,संवाद, मंच-सज्जा,प्रकाश, ध्वनि, संगीत
सभी कुछ बहुत अच्छा था। विश्वास एवं विश्वासघात के ताने-बाने से बुना यह नाटक जीवन
की कड़वी सच्चाई को करीने से उभारने में सफ़ल रहा। प्रत्येक रंगकर्मी ने अपनी भूमिका
बड़ी ही ख़ूबसूरती से अदा की। इस महोत्सव में हुए नाटकों में यह नाटक
अग्रणी रहा।
"फ़न्दी"-(कृष्णदाम् संस्था,भोपाल) निर्देशक-श्री संतोष
पणिक्कर
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‘नर्मदारंगम्’ रंग महोत्सव
में नाटक "फ़न्दी" की कहानी एक ऐसे विवश पुत्र पर आधारित
है जो अपनी आर्थिक विपन्नता के चलते कैंसर से जूझते अपने पिता को दर्द से निजात दिलाने
के लिए उसकी हत्या कर देता
है। पिता को अगाध स्नेह करने वाला कैदी "फ़न्दी" अपने पिता की उत्कट इच्छा; मृत्यु
को पूरा करने के लिए फ़ाँसी का हकदार है या नहीं यह लेखक ने दर्शकों व समाज पर छोड़ दिया
है। नाटक का निर्देशन,
प्रस्तुति, मंच-सज्जा, ध्वनि सभी कुछ शानदार था।
रंगकर्मियों ने अपने अभिनय से नाटक को अत्यंत प्रभावी बनाया। "फ़न्दी" की
भूमिका में रंगकर्मी लोकेन्द्र दर्शकों के ह्रदयपटल पर अपने अभिनय की छाप छोड़ने में
कामयाब रहे। सम्पूर्ण नाटक में केवल एक ही कमी दृष्टिगोचर हुई वह थी "फ़न्दी"
की वेशभूषा, जो एक कैदी की अपेक्षा किसी राजनेता की वेशभूषा
अधिक लग रही थी। अंततोगत्वा एक विचारणीय विषय, सशक्त कहानी, दमदार
अभिनय व परिपक्व निर्देशन ने इस नाटक को यादगार बना दिया।
"एक और द्रोणाचार्य"-(अनवरत थिएटर,इन्दौर)-निर्देशक-श्री नीतेश
उपाध्याय
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‘नर्मदारंगम्’ रंग महोत्सव
में
"एक और द्रोणाचार्य" नाटक
बेहद नीरस लगा। निर्देशन,
प्रस्तुति, मंच-सज्जा सभी कुछ
औसत था। जब भी
आप ऐतिहासिक तथ्यों
को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत
करते हैं तो आप
वास्तव में एक अपराध
कर रहे होते हैं।
नाटक में द्रोणाचार्य के
चरित्र का सर्वथा गलत
प्रस्तुतिकरण किया गया है।
नाटक में द्रोणाचार्य के
समकक्ष चरित्र को अपने
निजी स्वार्थ के लिए
अन्याय एवं भ्रष्टाचार से
समझौता करते दिखाया गया
है,
जो अनुचित है। द्रोणाचार्य
ने अपने निजी स्वार्थ
एवं महत्वाकांक्षाओं की
पूर्ति लिए नहीं अपितु
अपनी राजनिष्ठा के
चलते विवश होकर कौरवों
के पक्ष में युद्ध
अवश्य किया था, किन्तु कभी
भी आचार्य द्रोण ने
कौरवों का पक्ष लेकर
उन्हें सही नहीं ठहराया
था। वे सदैव पाण्डवों
का ही समर्थन करते
रहे क्योंकि पाण्डव धर्मानुसार
सही थे। नाटक के
चरित्रों के अनुसार पात्रों
का चयन बेहद खराब
था। निर्देशक को
यह बात भलीभाँति समझ
लेनी लाभप्रद होगी कि
थिएटर और स्कूल-कालेज के
नाटकों में फ़र्क होता
है।
"बाढ़ का पानी"-(अनवरत थिएटर,इन्दौर) निर्देशक-श्री नीतेश
उपाध्याय
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‘नर्मदारंगम्’ रंग महोत्सव
में नाटक "बाढ़
का पानी" जाति
व्यवस्था एवं अस्पृशयता पर
केन्द्रित यह नाटक था।
यह नाटक औसत रहा।
अपरिपक्व निर्देशन के
अभाव में रंगकर्मियों का
बेहतरीन अभिनय, सुन्दर मंच-सज्जा, दृश्यानुकूल
प्रकाश व सुमधुर संगीत
भी नाटक को ऊंचाईयाँ
प्राप्त नहीं करा सके।
मेरे देखे सनातन धर्म
के सिद्धान्तों को
समझे बिना उन पर
कटाक्ष करना सर्वथा अनुचित
है। हमारे सनातन धर्म
में जाति व्यवस्था का
कोई उल्लेख नहीं है।
वर्ण व्यवस्था अवश्य
है,
किन्तु फ़िर भी हमारा
सनातन धर्म "आपातकाले
मर्यादानाश्ति" के सिद्धान्त
को मान्यता प्रदान करता
है। बिना सनातन धर्म
एवं वर्ण व्यवस्था की
गहराई को समझे बिना
उस व्यवस्था पर
भौंडा कटाक्ष निर्देशक की
अयोग्यता को दर्शाता है।
"कोमल गांधार"-(अनवरत थिएटर,इन्दौर) निर्देशक-श्री नीतेश
उपाध्याय
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‘नर्मदारंगम्’ रंग महोत्सव
शृंखला का अगला नाटक
था-"कोमल
गांधार"। यदि इस
नाटक की मात्र एक
शब्द में समीक्षा की
जाए तो वह है- निकृष्ट
अर्थात् घटिया। निकृष्ट; इसलिए क्योंकि
निर्देशन, अभिनय, संगीत,प्रकाश व्यवस्था
इत्यादि में हुई कमी
को तो सहन व
क्षमा किया जा सकता
है किन्तु ऐतिहासिक तथ्यों
से छेड़छाड़ को कदापि
क्षमा नहीं किया जा
सकता और ना ही
इस घोर निन्दनीय कृत्य
को बर्दाश्त किया
जा सकता है। आज
का यह निम्नस्तरीय नाटक
महाभारत की पृष्ठभूमि पर
आधारित था किन्तु इसमें
दर्शाए गए तथ्यों का
महाभारत के वास्तविक तथ्यों
से दूर-दूर तक
कोई सम्बन्ध नहीं था।
मेरे देखे इस प्रकार
ऐतिहासिक व पौराणिक तथ्यों
को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत
करने वाले नाटकों व
फ़िल्मों को सार्वजनिक प्रदर्शन
की अनुमति नहीं होनी
चाहिए। यदि इस प्रकार
वास्तविक तथ्यों से परे
अपने ही तथ्य गढ़कर
किसी प्राचीन कथा या
पात्र के नाम पर
बनाए गए नाटकों का
सार्वजनिक मंचन किया जाता
रहा तो आज की
युवा पीढ़ी हमारे शास्त्रों
व आदर्श पौराणिक पात्रों
के प्रति एक निन्दित
पूर्वाग्रह से ग्रसित हो
जाएगी जो समाज के
लिए अँततोगत्वा घातक
सिद्ध होगा। मैं इस
प्रकार के नाटक की
घोर निन्दा एवं भर्त्सना
करता हूँ।
"रक्तबीज"-(रंगधारा-द थिएटर स्ट्रीम, हैदराबाद) निर्देशक-श्री विनय वर्मा
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‘नर्मदारंगम्’ रंग महोत्सव
की अन्तिम प्रस्तुति थी-"रक्तबीज"।
अभिनय की दृष्टि से
यह नाटक सर्वश्रेष्ठ कहा
जा सकता है किन्तु
पटकथा की कसौटी पर
यह नाटक खरा नहीं
उतरा। नाटक भौतिकवाद के
समक्ष दम तोड़ती नैतिकता
पर केन्द्रित था, जो
वर्तमान में आम बात
है। नाटक समाज को
सकारात्मक सन्देश देने पूर्णत: असफ़ल
रहा। रंगकर्मियों का
श्रेष्ठ अभिनय, दृश्यानुकूल संगीत, प्रकाश
व्यवस्था, एवं उत्तम निर्देशन
ने नाटक को पर्याप्त
सहारा दिया किन्तु यह
सभी घटक मिलकर भी
सशक्त पटकथा का अभाव
दूर नहीं कर सके।
समीक्षक- ज्योतिर्विद पं. हेमन्त
रिछारिया

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