बुधवार, 6 जून 2018

भारतवर्ष का शास्त्रोक्त इतिहास


 शास्त्रानुसार हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी सात द्वीपों का संयुक्त स्वरूप है। ये सात द्वीप हैं-
1. कुशद्वीप
2. क्रौंचद्वीप
3. जम्बूद्वीप
4. प्लक्षद्वीप
5. शाल्मद्वीप
6. शाकद्वीप
7. पुष्करद्वीप
इन सातों द्वीपों के स्वामी अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी के अधिपति महाराज अम्बरीश जो राजर्षि नाभाग के पुत्र थे। राजर्षि नाभाग वैवस्वत मनु के पुत्र थे। कालान्तर में जम्बूद्वीप के राजा हुए महाराज आग्नीध्र, जिनके नौ यशस्वी पुत्र थे-
1.नाभि (जिनका एक नाम अजनाभ भी था)
2. हरिवर्ष
3. हिरण्मय
4. केतुमाल
5. किम्पुरूष
6. इलावृत
7. रम्यक
8. कुरु
9. भद्राश्व।
महाराज आग्नीध्र ने अपने आधिपत्य वाले जम्बूद्वीप को अपने पुत्रों में बराबर-बराबर विभक्त कर दिया था। जिसमें महाराज नाभि के हिस्से वाले भूभाग को "नाभिखण्ड या अजनाभवर्ष" कहा जाने लगा। महाराज नाभि का विवाह मेरूदेवी से हुआ था। महाराज नाभि एवं मेरूदेवी की कोई सन्तान नहीं थी इसलिए उन्होंने सन्तान की कामना से एक यज्ञ किया। इस यज्ञ से प्रसन्न होकार भगवान ने स्वयं उनके यहाँ पुत्र रूप में अवतार लिया। जिसे शास्त्रों में "ऋषभ-अवतार" कहा गया। महाराज नाभि व मेरूदेवी के पुत्र भगवान ऋषभदेव का विवाह इन्द्र की कन्या जयन्ती से हुआ। भगवान ऋषभदेव व जयन्ती के सौ पुत्र हुए जिनमें ज्येष्ठ पुत्र का नाम "भरत" था। इन्हीं राजर्षि भरत के नाम पर हमारे देश का नाभ "भारतवर्ष" पड़ा। नाभिखण्ड के सदृश ही इसे "भरतखण्ड" भी कहा जाने लगा। इसका प्रमाण हमें कर्मकाण्ड व पूजा-पाठ इत्यादि के संकल्प लेते समय भी मिलता है जब संकल्प के उच्चारण में "जम्बूद्वीपे भरतखण्डे..." बोलकर संकल्प लिया जाता है। वर्तमान भारतवर्ष प्राचीन समय के जम्बूद्वीप का "भरतखण्ड" नामक भूभाग ही है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र


सोमवार, 4 जून 2018

"समाजसेवी"


कल एक कार्यक्रम में था, वहां कुछ धनाढ्य,प्रभुत्वसम्पन्न,एवं राजनीति से जुड़े व्यक्तियों को "समाजसेवी" बताकर सम्मानित किया जा रहा था। बहुत स्मरण करने पर भी मुझे उनके द्वारा की गई समाज की कोई सेवा जिसे तथाकथित "समाजसेवा" बताया जा रहा था, याद नहीं आई। मैं इसे पूर्णत: मेरी क्षीण होती स्मरणशक्ति का दोष मानता हूं। अत: मैंने अपने निकट बैठे मित्र से कहा कि आगामी कार्यक्रमों जब किसी को वरिष्ठ या कनिष्ठ....क्षमा कीजिए कनिष्ठ तो कोई होता नहीं; जहां कहीं भी "समाजसेवी" पाए जाते हैं वे वरिष्ठ ही होते हैं, तो जब भी किसी व्यक्ति को वरिष्ठ समाजसेवी कहकर सम्मानित किया जाए तो साथ ही साथ उसके द्वारा की गई समाज की महती सेवा का भी उल्लेख किया जाए जिससे मुझ जैसे दुर्बल स्मरणशक्ति वाले लोगों को उसकी समाजसेवा याद करने के लिए अपने मस्तिष्क पर अधिक ज़ोर ना डालना पड़े।

पुनश्च- सोच रहा हूं कि आज यदि स्वनाम-धन्य प्रख्यात व्यंग्यकार स्व. शरद जोशी जीवित होते तो अपनी लोकप्रिय व्यंग्य रचना "अध्यक्ष महोदय" की तर्ज़ पर ऐसे समाजसेवियों के लिए "समाजसेवी" नामक रचना करते अवश्य करते। रचना का प्रारम्भ कुछ इस प्रकार होता-"प्रत्येक शहर में कुछ 'समाजसेवी' किस्म के लोग पाए जाते हैं.....।"

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 2 मई 2018

तब ना कोई दलित था...

बात थोड़ी पुरानी है। मेरी आयु लगभग 6-7 वर्ष की होगी। मेरे नानाजी जो कि कपासी ग्राम के ज़मींदार थे उनके यहां गाड़ीवान दल (बैलगाड़ी चलाने वाले) में एक गाड़ीवान थे रामसिंह जिन्हें मैं ’रामसिंह मामा’ कहता था। मेरे नानाजी के संस्कार व उनका आदेश था कि मैं हमारे यहां कार्य करने वाले हर व्यक्ति को रिश्तों के नाम से जैसे भैया, मामा, काका, काकी, मौसी, दादा इत्यादि कहकर ही संबोधित करूं। रामसिंह मामा एक दलित आदिवासी थे। तब दलित क्या होता है यह मुझे तो पता नहीं था। लेकिन उस समय की देश-काल-परिस्थिति अनुसार इस वर्ग से एक सामाजिक दूरी अवश्य थी। जिसे सामाजिक मर्यादा के नाम पर हर वर्ग स्वीकार कर उसका अनुपालन करता था। रामसिंह मामा अपना भोजन हमारे घर से सटे खलिहान की एक कोठरी में पकाते थे। एक बार हुआ यूं कि रामसिंह मामा अपना भोजन बना रहे थे तभी मैं बाल-सुलभ चंचलता के चलते खेलते-खेलते उनकी कोठरीनुमा रसोई में पहुंच गया। मैंने देखा वहां चूल्हे पर एक पतीली में दाल उबल रही है और मामा अपने हाथों से ठोक-ठोक कर मोटे-मोटे टिक्कड़ बना रहे हैं। यह सब देखकर मेरा मन उनके हाथों के पकाए टिक्कड़ व दाल खाने को मचल गया। मैंने जब उनसे इस भोजन की मांग की तो उन्होंने सामाजिक मर्यादाओं का अनुपालन करते हुए मुझे मना कर समझाने की बहुत कोशिश की किन्तु जब मैंने बालहठ पकड़ ली तब रामसिंह मामा किंकर्त्त्वयमिमूढ़ हो मुझे नानाजी के पास ले गए। उन्हें डर था कि मेरी ज़िद पूरी करने से कहीं नानाजी नाराज़ ना हो जाएं, क्योंकि नानाजी ज़मींदार होने के साथ-साथ एक उच्चकुलीन ब्राह्मण भी थे। रामसिंह मामा से जब नानाजी ने मेरे मचलने का कारण पूछा तो सारी बात बता दी। इस पर नानाजी ने उनसे कहा कि "रामसिंह जा तू अपनी टिक्कड़ और दाल ले आ।" मामा थोड़े सकुचाए किन्तु नानाजी का आदेश तो उन्हें मानना ही था सो वे झट अपने हाथ के बने टिक्कड़ और दाल लेकर आ गए और फ़िर नानाजी ने स्वयं अपने हाथों से मुझे रामसिंह मामा के हाथ से बने टिक्कड़ और दाल खिला कर मेरी ज़िद पूरी की। पहले सामाजिक मर्यादाओं के नाम पर वर्ग-विशेष से दूरी अवश्य रखी जाती थी किन्तु उस वर्ग-विशेष के व्यक्ति के प्रति प्रेम को साध लिया जाता था। आज उस दूरी को मिटाने का नाटक तो किया जा रहा है किन्तु उन वर्ग-विशेष के व्यक्तियों के प्रति प्रेम कहीं खो गया है। मैंने उस समय कितनी ही बार अपने नानाजी को वर्षों से चली आ रही बद्धमूल छूत-अछूत की परम्पराओं का अतिक्रमण कर केवल प्रेम को प्राथमिकता देते हुए देखा है। मेरे देखे इस संसार में यदि केवल प्रेम साध लिया जाए तो शेष सब अपने से सध जाता है। बिना प्रेम के सारे साधन महज़ एक नाटक से अधिक कुछ नहीं हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया


सोमवार, 23 अप्रैल 2018

अनुवाद सहित करें धर्मग्रन्थों का पाठ


हमारे देश के मन्दिरों व घरों में सुन्दरकाण्ड, रामचरितमानस एवं रामायण का पाठ अक्सर होता रहता है। इस प्रकार के पाठ के लिए ध्वनि विस्तारक यन्त्र आदि की व्यवस्था हर मन्दिर और कभी-कभी तो घरों में भी की जाती है। लेकिन देखने में आता है कि अधिकतर इस प्रकार पाठ इत्यादि बिल्कुल यन्त्रवत हो रहे हैं, मशीन की तरह। सबसे बड़ी समस्या तो भाषा की है, पाठ की भाषा अवधि या सँस्कृत है। जो हर किसी के समझ नहीं आती फ़िर भी पाठ उसी भाषा में करने में विद्वता समझी व मानी जाती है। मेरे देखे किसी भी धर्मग्रन्थ का पाठ उसके हिन्दी अनुवाद सहित होना चाहिए क्योंकि मानस हो या रामायण इनका एक-एक सूत्र व्यक्ति का जीवन परिवर्तित करने का सामर्थ्य रखता है अगर समझ में आ जाए तो..। आजकल लोग हिन्दी ठीक प्रकार से नहीं समझ पा रहे हैं ऐसे में अवधि या सँस्कृत को भलीभाँति समझ पाना कठिन है। शायद ऐसा आत्मवँचना के लिए भी किया जाता है जिससे कहीं कोई सूत्र ह्रदय में चुभ ना जाए तीर की तरह, यदि चुभ गया तो फ़िर घर-सँसार का क्या होगा! मैंने देखा है मानस के गँभीर सूत्रों को भी लोग ढोलक और हारमोनियम बजा-बजाकर मनोरंजक बनाकर गा लेते हैं शायद इसलिए कि कहीं कोई सूत्र विचार करने पर विवश ना कर दे। संगीत का अपना नशा होता है। मेरे देखे आज बड़ी सँख्या में मानस व भागवतपाठ का आयोजन घरों व मन्दिरों में होता है, लोग बड़े गर्व से कहते-सुनते नज़र आते हैं-"अखण्ड रामायण का पाठ रखा है या मास पारायण है" किन्तु फ़िर भी समाज दिनों-दिन नैतिक व चारित्रिक पतन की ओर अग्रसर होता जा रहा है; क्यों ? क्योंकि हमने चिन्तन के गँभीर विषयों को भी मनोरंजन का साधन बना लिया है। मेरा आप सभी से बस यही निवेदन है कि चाहे मानस हो, रामायण हो, भागवत हो या कोई भी धर्मग्रन्थ उसका पाठ जहाँ तक बन सके हिन्दी अनुवाद सहित करे ताकि उसके सूत्र आपको चिन्तन करने पर विवश कर सके। यहाँ मेरा आशय सँस्कृत या किसी भाषा का निरादर करना नहीं है किन्तु भाषा की प्रासँगिकता देश-काल-परिस्थिति के अनुसार होती है। बुद्ध पाली में बोले, महावीर प्राकृत में, जीसस अरेमिक में, कबीर की भाषा सधुक्कड़ी थी, वहीं वासुदेव ने गीता के उपदेश के लिए सँस्कृत को चुना क्योंकि ये उस काल की भाषाएँ थीं, लोग उस दौर में इन भाषाओं को समझ सकते थे। आज के दौर की भाषा हिन्दी है अत: धर्मग्रन्थों का पाठ हिन्दी में ही होना चाहिए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र


गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

गिरिराज गोवर्धन

हमारे सनातन धर्म में प्रकृति को परमात्मा से अभिन्न माना गया है। इसलिए हमने प्रकृति की भी परमात्मा के रूप में ही आराधना की है। चाहे नदी हो, पर्वत हो या फ़िर वृक्ष, हमने सभी में परमात्मा के रूप का दर्शन किया है। परिक्रमा हमारी सनातन पूजा पद्धति का अहम् हिस्सा है। हिन्दू धर्म में परिक्रमा जिसे प्रदक्षिणा भी कहा जाता है; मन्दिर, देवप्रतिमा, पवित्र स्थानों, नदियों व पर्वतों की भी होती है। कलियुग में गोवर्धन पर्वत जिन्हें गिरिराज भी कहा जाता है उनकी परिक्रमा बहुत ही महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा श्रद्धालुओं के सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाली होती है। गोवर्धन पर्वत को योगेश्वर भगवान कृष्ण का साक्षात् स्वरूप माना गया है। गिरिराज गोवर्धन को प्रत्यक्ष देव की मान्यता प्राप्त है। इन्हीं गोवर्धन पर्वत को द्वापर युग में भगवान कृष्ण द्वारा इन्द्र का मद चूर करने के लिए एवं ब्रजवासियों को इन्द्र के कोप से बचाने के लिए 7 दिनों तक अपने वाम हाथ की कनिष्ठा अंगुली के नख पर धारण किया गया था। कलियुग में गिरिराज गोवर्धन को भगवान कृष्ण का ही साक्षात् स्वरूप मानकर उनकी परिक्रमा की जाती है। गिरिराज गोवर्धन की यह परिक्रमा अनन्त फ़लदायी व पुण्यप्रद होती है। गिरिराज गोवर्धन उत्तरप्रदेश के मथुरा जिले से लगभग 22 कि.मी की दूरी पर स्थित है। गिरिराज गोवर्धन पर्वत 21 कि.मी के परिक्षेत्र में फ़ैला हुआ है। गिरिराज पर्वत की परिक्रमा 7 कोस अर्थात 21 कि.मी की होती है।
तीन हैं मुखारबिन्द-
गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा वैसे तो कहीं से भी प्रारम्भ की जा सकती है किन्तु मान्यता अनुसार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा प्रारम्भ करने हेतु तीन मुखारबिन्द हैं। 
ये तीन मुखारबिन्द हैं-
1. गोवर्धन दानघाटी 2. जतीपुरा 3. मानसी-गंगा
इन तीन मुखारबिन्द में से किसी एक मुखारबिन्द से परिक्रमा प्रारम्भ कर परिक्रमा पूर्ण करने पर वापस उसी मुखारबिन्द पर पहुँचना होता है। किन्तु सभी वैष्णव भक्तजन "जतीपुरा-मुखारबिन्द" से ही अपनी परिक्रमा का प्रारम्भ करते हैं, शेष सभी भक्त गोवर्धन दानघाटी व मानसी-गंगा मुखारबिन्द से अपनी परिक्रमा प्रारम्भ करते हैं। "जतीपुरा-मुखारबिन्द" को श्रीनाथ जी के विग्रह की मान्यता प्राप्त है। गिरिराज गोवर्धन परिक्रमा में मार्ग में अनेक मठ, मन्दिर, गाँव व पवित्र कुण्ड इत्यादि आते हैं जैसे आन्यौर, राधाकुण्ड, कुसुम सरोवर, गोवर्धन दानघाटी, जतीपुरा, मानसी-गंगा, गौड़ीय मठ एवं "पूँछरी का लौठा" आदि। वैसे तो गिरिराज परिक्रमा वर्षभर अनवरत चलती रहती है किन्तु विशेष पर्व जैसे पूर्णिमा, अधिकमास, कार्तिकमास, श्रावणमास में गोवर्धन परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं की सँख्या में आशातीत वृद्धि हो जाती है।
दण्डवति परिक्रमा-
सामान्यत: गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा पैदल की जाती है किन्तु कुछ श्रद्धालु इसे दण्डवत करते हुए भी करते हैं जिसे "दण्डौति परिक्रमा" कहा जाता है। वृद्धजनों व बच्चों के लिए यहाँ रिक्शे आदि से परिक्रमा करने की भी व्यवस्था है।
शापित भी हैं गिरिराज जी-
एक प्राचीन कथा के अनुसार गिरिराज गोवर्धन शापित हैं। गोवर्धन पर्वत को कलियुग में प्रतिदिन तिल-तिल घटने का श्राप मिला हुआ है। इसे विडम्बना ही कहेंगे कि आज यह श्राप इस क्षेत्र के अतिक्रमणकारियों के कारण पूर्णरूपेण चरितार्थ हो रहा है।
"पूँछरी के लौठा" देते हैं साक्षी-
गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा मार्ग में "पूँछरी का लौठा" नामक स्थान आता है जो राजस्थान में पड़ता है। यहाँ पहलवान को "लौठा" कहा जाता है। यहाँ मन्दिर में श्री हनुमान जी का विग्रह स्थापित है। प्राचीन कथा अनुसार जब भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत के इस क्षेत्र में गोचारण के लिए आते थे तब श्री हनुमान जी उनके साथ खेला करते थे। दोनों साथ-साथ भोजन व बातें किया करते थे। किन्तु जब भगवान कृष्ण की लीला पूर्ण होकर उनके बैकुण्ड गमन का समय आया तो हनुमान जी उदास हो गए और उनके विरह में दु:खी होकर कहने लगे कि आप तो अपने धाम जा रहे हो लेकिन मैं अकेला हो जाऊँगा। क्योंकि हनुमान जी अमर हैं। हनुमान जी की इस बात पर भगवान कृष्ण ने उन्हें आश्वस्त किया कि कलियुग में गिरिराज गोवर्धन को मेरा साक्षात् स्वरूप मानकर इसकी परिक्रमा की जाएगी और यह परिक्रमा तभी पूर्ण मानी जाएगी जब आप स्वयं इसकी साक्षी देंगे। आपके दर्शनों के बिना गोवर्धन परिक्रमा पूर्ण नहीं मानी जाएगी इससे आपके पास सदैव भक्तों की चहल-पहल रहा करेगी। इसी मान्यता के अनुसार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा करते समय प्रत्येक श्रद्धालु व भक्त यहाँ दर्शन कर अपनी साक्षी दिलाने आते हैं। "पूँछरी के लौठा" अर्थात् हनुमान जी के दर्शन व साक्षी के उपरान्त प्रारम्भ वाले मुखारबिन्द पर पहुँचकर परिक्रमा की समाप्ति की जाती है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में वर्ष में एक बार गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

शनिवार, 24 मार्च 2018

राम का वनवास, ज्योतिष का दोष कहाँ ?


प्रभु श्रीराम के जीवन में जो बात सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है; वह है उनका अपने अनुज भरत के लिए राज्य का त्याग कर वनवास जाना। कुछ विद्वान उनके वनवास गमन को लेकर उनकी जन्मपत्रिका और गुरू वशिष्ठ द्वारा की गई उनके राज्याभिषेक की सँस्तुति को दोषी ठहराते हैं। वे अपने इस तथ्य के समर्थन में रामचरितमानस की इन पँक्तियों का उदाहरण देते हैं-
"जोग,लगन,ग्रह,वार,तिथि, सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत, राम जनम सुख मूल।"
इन पँक्तियों को आधार बनाकर अक्सर लोग ज्योतिष का मखौल उड़ाते हुए कहते हैं कि जब सभी कुछ अनुकूल था जो प्रभु श्रीराम के जीवन में इतने कष्ट क्यों आए? जबकि इस प्रकार का तर्क सर्वथा अनुचित है क्योंकि यदि आप उक्त पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे तो पाएँगे कि "योग, लगन, ग्रह, वार" का अनुकूल होना यहाँ भगवान श्रीराम के परिप्रेक्ष्य में नहीं कहा गया है, यहाँ यह बात समस्त जड़ व चेतन के परिप्रेक्ष्य में कही गई है। यहाँ दूसरी पँक्ति स्पष्ट सँकेत करती है कि "चर अरु अचर हर्षजुत, राम जनम सुख मूल।" अर्थात् समस्त जड़ और चेतन के लिए योग,लग्न,ग्रह,वार सभी कुछ अनुकूल हो जाते हैं जब भगवान राम का जन्म अर्थात् प्राकट्य होता है क्योंकि प्रभु श्रीराम का जन्म समस्तों सुखों का मूल है।
ज्योतिष को सन्देह के घेरे में लाने हेतु दूसरा तर्क प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक के मुहूर्त्त को लेकर दिया जाता है कि जब गुरू वशिष्ठ ने भगवान के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त निकाला था तो उन्हें राज्याभिषेक के स्थान पर वनवास क्यों जाना पड़ा? यह तर्क भी सरासर अनुचित है क्योंकि गुरू वशिष्ठ ने कभी श्रीराम के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त निकाला ही नहीं था। रामचरितमानस की ये पँक्तियाँ देखें-
"यह विचार उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ॥"
अर्थात राजा दशरथ ने अपने मन में प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक का विचार कर शुभ दिन और उचित समय पाकर अपना यह विचार गुरू वशिष्ठ जी को जाकर सुनाया था। यहा शुभदिन और सुअवसर का उल्लेख वशिष्ठ जी के पास जाने के समय के सन्दर्भ में है, ना कि भगवान राम के राज्याभिषेक के सम्बन्ध में। जब राजा दशरथ वशिष्ठ जी से मिलने पहुचे तब गुरू वशिष्ठ ने उनसे कहा-
"अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें॥
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेऊ नरेस रजायसु देहू॥
अर्थात राजा का सहज प्रेम देखकर वशिष्ठ जी ने उनसे राजाज्ञा देने को कहा। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुरू अनहोनी का संकेत कर सकता है किन्तु राजाज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। यहाँ भी गुरू वशिष्ठ संकेत करते हुए कहते हैं-
"बेगि बिलम्बु करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
 सुदिन सुमंगलु तबहिं जब राम होहिं जुबराजु॥"
अर्थात् शुभदिन तभी है जब राम युवराज हो जाएँ। यहाँ वशिष्ठ जी ने यह नहीं कहा कि राम ही युवराज होंगे। आगे एक और संकेत में कहा गया है-
"जौं पाँचहि मत लागै नीका, करहु हरषि हियैं रामहि टीका।"
अर्थात् यदि पंचों कों (आप सब को) यह मत अच्छा लग रहा है तो राम का राजतिलक कीजिए।
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि गुरू वशिष्ठ ने केवल राजाज्ञा और जनमत के वशीभूत होकर प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक की सहमति प्रदान की थी ना कि भगवान राम की जन्मपत्रिका व पँचांग इत्यादि देखकर मुहूर्त्त निकाला था। ऐसे में रामचरितमानस की इन पँक्तियों का गूढ़ अर्थ समझे बिना इन्हें आधार बनाकर ज्योतिष शास्त्र को दोष किस प्रकार दिया जा सकता है! प्रभु श्रीराम के वनवास के लिए ज्योतिष शास्त्र को दोष देना सर्वथा अनुचित व गलत है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
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सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

होली: कुछ विशेष बातें



होली वैसे तो रंगो का त्यौहार है लेकिन हमारे सनातन धर्म में होली के पर्व का विशेष धार्मिक महत्त्व है। होली से जुड़ी प्रह्लाद की कथा तो आप सभी को भलीभाँति विदित ही है लेकिन होली की रात्रि यन्त्र निर्माण, तन्त्र-साधना एवं मन्त्र सिद्धि के लिए एक श्रेष्ठ मुहूर्त्त होती है। होली की रात्रि को सम्पन्न की गई साधना शीघ्र सफ़ल व फ़लदायी होती है। 
आईए जानते हैं होली से जुड़ी कुछ विशेष बातें-
 
होली से भविष्यसंकेत-
प्राचीन समय में होली के पर्व पर होलिका-दहन के उपरान्त उठते हुए धुएँ को देखकर भविष्यकथन किया जाता था। यदि होलिका-दहन से उठा धुआँ पूर्व दिशा की ओर जाता है तब यह राज्य, राजा व प्रजा के लिए सुख-सम्पन्नता का कारक होता है। यदि होलिका का धुआँ दक्षिण दिशा की ओर जाता है तब यह राज्य, राजा व प्रजा के लिए सँकट का सँकेत करता है। यदि होली का धुआँ पश्चिम दिशा की ओर जाता है तब राज्य में पैदावार की कमी व अकाल की आशँका होती है। जब होलिका-दहन का धुआँ उत्तर दिशा की ओर जाए तो राज्य में पैदावार अच्छी होती है और राज्य धन-धान्य से भरपूर रहता है। लेकिन यदि होली का धुआँ सीधा आकाश में जाता है तब यह राजा के लिए संकट का प्रतीक होता है अर्थात् राज्य में सत्ता परिवर्तन की सँभावना होती है ऐसी मान्यता है।

होली का वैज्ञानिक आधार-
हमारे सनातन धर्म से जुड़ी हुई अनेक परम्पराएँ व पर्व भले किसी ना किसी पौराणिक कथा से सम्बन्धित हों लेकिन अधिकाँश वे किसी ना किसी वैज्ञानिक आधार से सम्बन्धित अवश्य होती हैं। होली के पर्व के पीछे भी एक सशक्त वैज्ञानिक आधार है। होली का पर्व अक्सर उस समय मनाया जब शीत ऋतु विदा ले रही होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो रहा होता है। इसे दो ऋतुओं का "सन्धिकाल" कहा जाता है। यह "सन्धिकाल" अनेक रोगों व बीमारियों को जन्म देने वाले रोगाणुओं का जनक होता है। आपने अक्सर देखा होगा कि इस काल में आम जनमानस रोग का शिकार अधिक होता है क्योंकि वातावरण में इस "सन्धिकाल" से उत्पन्न रोगाणुओं की सँख्या अधिक मात्रा में होती है। इन रोगाणुओं को समाप्त करने के लिए प्रचण्ड अग्नि के ताप की जरूरत  होती है इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इस समय होलिक-दहन किया जाता है जिससे वातावरण में पर्याप्त ताप व धुआँ उत्पन्न हो जो विषैले रोगाणुओं का नाश कर सके।

भद्रा उपरान्त ही करें "होलिका-दहन"-
शास्त्रोक्त मान्यतानुसार "होलिका-दहन" भद्रा के उपरान्त ही करना चाहिए। भद्रा में "होलिका-दहन" करने से राज्य,राजा व प्रजा पर संकट आते हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com