मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

होली: कुछ विशेष बातें



होली वैसे तो रंगो का त्यौहार है लेकिन हमारे सनातन धर्म में होली के पर्व का विशेष धार्मिक महत्त्व है। होली से जुड़ी प्रह्लाद की कथा तो आप सभी को भलीभाँति विदित ही है लेकिन होली की रात्रि यन्त्र निर्माण, तन्त्र-साधना एवं मन्त्र सिद्धि के लिए एक श्रेष्ठ मुहूर्त्त होती है। होली की रात्रि को सम्पन्न की गई साधना शीघ्र सफ़ल व फ़लदायी होती है। 
आईए जानते हैं होली से जुड़ी कुछ विशेष बातें-
 
होली से भविष्यसंकेत-
प्राचीन समय में होली के पर्व पर होलिका-दहन के उपरान्त उठते हुए धुएँ को देखकर भविष्यकथन किया जाता था। यदि होलिका-दहन से उठा धुआँ पूर्व दिशा की ओर जाता है तब यह राज्य, राजा व प्रजा के लिए सुख-सम्पन्नता का कारक होता है। यदि होलिका का धुआँ दक्षिण दिशा की ओर जाता है तब यह राज्य, राजा व प्रजा के लिए सँकट का सँकेत करता है। यदि होली का धुआँ पश्चिम दिशा की ओर जाता है तब राज्य में पैदावार की कमी व अकाल की आशँका होती है। जब होलिका-दहन का धुआँ उत्तर दिशा की ओर जाए तो राज्य में पैदावार अच्छी होती है और राज्य धन-धान्य से भरपूर रहता है। लेकिन यदि होली का धुआँ सीधा आकाश में जाता है तब यह राजा के लिए संकट का प्रतीक होता है अर्थात् राज्य में सत्ता परिवर्तन की सँभावना होती है ऐसी मान्यता है।

होली का वैज्ञानिक आधार-
हमारे सनातन धर्म से जुड़ी हुई अनेक परम्पराएँ व पर्व भले किसी ना किसी पौराणिक कथा से सम्बन्धित हों लेकिन अधिकाँश वे किसी ना किसी वैज्ञानिक आधार से सम्बन्धित अवश्य होती हैं। होली के पर्व के पीछे भी एक सशक्त वैज्ञानिक आधार है। होली का पर्व अक्सर उस समय मनाया जब शीत ऋतु विदा ले रही होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो रहा होता है। इसे दो ऋतुओं का "सन्धिकाल" कहा जाता है। यह "सन्धिकाल" अनेक रोगों व बीमारियों को जन्म देने वाले रोगाणुओं का जनक होता है। आपने अक्सर देखा होगा कि इस काल में आम जनमानस रोग का शिकार अधिक होता है क्योंकि वातावरण में इस "सन्धिकाल" से उत्पन्न रोगाणुओं की सँख्या अधिक मात्रा में होती है। इन रोगाणुओं को समाप्त करने के लिए प्रचण्ड अग्नि के ताप की जरूरत  होती है इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इस समय होलिक-दहन किया जाता है जिससे वातावरण में पर्याप्त ताप व धुआँ उत्पन्न हो जो विषैले रोगाणुओं का नाश कर सके।

भद्रा उपरान्त ही करें "होलिका-दहन"-
शास्त्रोक्त मान्यतानुसार "होलिका-दहन" भद्रा के उपरान्त ही करना चाहिए। भद्रा में "होलिका-दहन" करने से राज्य,राजा व प्रजा पर संकट आते हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

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