शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

अटलजी को दो कविताएं


मौत से ठन गई...


ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई...


मैंने जन्म नहीं मांगा था...


मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांग करूंगा।

जाने कितनी बार जिया हूं,
जाने कितनी बार मरा हूं।
जन्म-मरण के फ़ेरे से मैं,
इतना पहले नहीं डरा हूं।

अन्तहीन अंधियार ज्योति की,
कब तक और तलाश करूंगा।
मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांग करूंगा।

बचपन, यौवन और बुढ़ापा
कुछ दशकों में खत्म कहानी।
फिर-फिर जीना; फिर-फिर मरना,
यह मजबूरी या मनमानी?

पूर्व जन्म के पूर्व बसी,
दुनिया का द्वाराचार करूंगा।
मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांग करूंगा।

-"भारत रत्न" श्री अटलबिहारी वाजपेयी

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