शनिवार, 24 मार्च 2018

राम का वनवास, ज्योतिष का दोष कहाँ ?


प्रभु श्रीराम के जीवन में जो बात सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है; वह है उनका अपने अनुज भरत के लिए राज्य का त्याग कर वनवास जाना। कुछ विद्वान उनके वनवास गमन को लेकर उनकी जन्मपत्रिका और गुरू वशिष्ठ द्वारा की गई उनके राज्याभिषेक की सँस्तुति को दोषी ठहराते हैं। वे अपने इस तथ्य के समर्थन में रामचरितमानस की इन पँक्तियों का उदाहरण देते हैं-
"जोग,लगन,ग्रह,वार,तिथि, सकल भए अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षजुत, राम जनम सुख मूल।"
इन पँक्तियों को आधार बनाकर अक्सर लोग ज्योतिष का मखौल उड़ाते हुए कहते हैं कि जब सभी कुछ अनुकूल था जो प्रभु श्रीराम के जीवन में इतने कष्ट क्यों आए? जबकि इस प्रकार का तर्क सर्वथा अनुचित है क्योंकि यदि आप उक्त पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे तो पाएँगे कि "योग, लगन, ग्रह, वार" का अनुकूल होना यहाँ भगवान श्रीराम के परिप्रेक्ष्य में नहीं कहा गया है, यहाँ यह बात समस्त जड़ व चेतन के परिप्रेक्ष्य में कही गई है। यहाँ दूसरी पँक्ति स्पष्ट सँकेत करती है कि "चर अरु अचर हर्षजुत, राम जनम सुख मूल।" अर्थात् समस्त जड़ और चेतन के लिए योग,लग्न,ग्रह,वार सभी कुछ अनुकूल हो जाते हैं जब भगवान राम का जन्म अर्थात् प्राकट्य होता है क्योंकि प्रभु श्रीराम का जन्म समस्तों सुखों का मूल है।
ज्योतिष को सन्देह के घेरे में लाने हेतु दूसरा तर्क प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक के मुहूर्त्त को लेकर दिया जाता है कि जब गुरू वशिष्ठ ने भगवान के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त निकाला था तो उन्हें राज्याभिषेक के स्थान पर वनवास क्यों जाना पड़ा? यह तर्क भी सरासर अनुचित है क्योंकि गुरू वशिष्ठ ने कभी श्रीराम के राज्याभिषेक का मुहूर्त्त निकाला ही नहीं था। रामचरितमानस की ये पँक्तियाँ देखें-
"यह विचार उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ॥"
अर्थात राजा दशरथ ने अपने मन में प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक का विचार कर शुभ दिन और उचित समय पाकर अपना यह विचार गुरू वशिष्ठ जी को जाकर सुनाया था। यहा शुभदिन और सुअवसर का उल्लेख वशिष्ठ जी के पास जाने के समय के सन्दर्भ में है, ना कि भगवान राम के राज्याभिषेक के सम्बन्ध में। जब राजा दशरथ वशिष्ठ जी से मिलने पहुचे तब गुरू वशिष्ठ ने उनसे कहा-
"अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें॥
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेऊ नरेस रजायसु देहू॥
अर्थात राजा का सहज प्रेम देखकर वशिष्ठ जी ने उनसे राजाज्ञा देने को कहा। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुरू अनहोनी का संकेत कर सकता है किन्तु राजाज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। यहाँ भी गुरू वशिष्ठ संकेत करते हुए कहते हैं-
"बेगि बिलम्बु करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
 सुदिन सुमंगलु तबहिं जब राम होहिं जुबराजु॥"
अर्थात् शुभदिन तभी है जब राम युवराज हो जाएँ। यहाँ वशिष्ठ जी ने यह नहीं कहा कि राम ही युवराज होंगे। आगे एक और संकेत में कहा गया है-
"जौं पाँचहि मत लागै नीका, करहु हरषि हियैं रामहि टीका।"
अर्थात् यदि पंचों कों (आप सब को) यह मत अच्छा लग रहा है तो राम का राजतिलक कीजिए।
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि गुरू वशिष्ठ ने केवल राजाज्ञा और जनमत के वशीभूत होकर प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक की सहमति प्रदान की थी ना कि भगवान राम की जन्मपत्रिका व पँचांग इत्यादि देखकर मुहूर्त्त निकाला था। ऐसे में रामचरितमानस की इन पँक्तियों का गूढ़ अर्थ समझे बिना इन्हें आधार बनाकर ज्योतिष शास्त्र को दोष किस प्रकार दिया जा सकता है! प्रभु श्रीराम के वनवास के लिए ज्योतिष शास्त्र को दोष देना सर्वथा अनुचित व गलत है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

होली: कुछ विशेष बातें



होली वैसे तो रंगो का त्यौहार है लेकिन हमारे सनातन धर्म में होली के पर्व का विशेष धार्मिक महत्त्व है। होली से जुड़ी प्रह्लाद की कथा तो आप सभी को भलीभाँति विदित ही है लेकिन होली की रात्रि यन्त्र निर्माण, तन्त्र-साधना एवं मन्त्र सिद्धि के लिए एक श्रेष्ठ मुहूर्त्त होती है। होली की रात्रि को सम्पन्न की गई साधना शीघ्र सफ़ल व फ़लदायी होती है। 
आईए जानते हैं होली से जुड़ी कुछ विशेष बातें-
 
होली से भविष्यसंकेत-
प्राचीन समय में होली के पर्व पर होलिका-दहन के उपरान्त उठते हुए धुएँ को देखकर भविष्यकथन किया जाता था। यदि होलिका-दहन से उठा धुआँ पूर्व दिशा की ओर जाता है तब यह राज्य, राजा व प्रजा के लिए सुख-सम्पन्नता का कारक होता है। यदि होलिका का धुआँ दक्षिण दिशा की ओर जाता है तब यह राज्य, राजा व प्रजा के लिए सँकट का सँकेत करता है। यदि होली का धुआँ पश्चिम दिशा की ओर जाता है तब राज्य में पैदावार की कमी व अकाल की आशँका होती है। जब होलिका-दहन का धुआँ उत्तर दिशा की ओर जाए तो राज्य में पैदावार अच्छी होती है और राज्य धन-धान्य से भरपूर रहता है। लेकिन यदि होली का धुआँ सीधा आकाश में जाता है तब यह राजा के लिए संकट का प्रतीक होता है अर्थात् राज्य में सत्ता परिवर्तन की सँभावना होती है ऐसी मान्यता है।

होली का वैज्ञानिक आधार-
हमारे सनातन धर्म से जुड़ी हुई अनेक परम्पराएँ व पर्व भले किसी ना किसी पौराणिक कथा से सम्बन्धित हों लेकिन अधिकाँश वे किसी ना किसी वैज्ञानिक आधार से सम्बन्धित अवश्य होती हैं। होली के पर्व के पीछे भी एक सशक्त वैज्ञानिक आधार है। होली का पर्व अक्सर उस समय मनाया जब शीत ऋतु विदा ले रही होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन हो रहा होता है। इसे दो ऋतुओं का "सन्धिकाल" कहा जाता है। यह "सन्धिकाल" अनेक रोगों व बीमारियों को जन्म देने वाले रोगाणुओं का जनक होता है। आपने अक्सर देखा होगा कि इस काल में आम जनमानस रोग का शिकार अधिक होता है क्योंकि वातावरण में इस "सन्धिकाल" से उत्पन्न रोगाणुओं की सँख्या अधिक मात्रा में होती है। इन रोगाणुओं को समाप्त करने के लिए प्रचण्ड अग्नि के ताप की जरूरत  होती है इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इस समय होलिक-दहन किया जाता है जिससे वातावरण में पर्याप्त ताप व धुआँ उत्पन्न हो जो विषैले रोगाणुओं का नाश कर सके।

भद्रा उपरान्त ही करें "होलिका-दहन"-
शास्त्रोक्त मान्यतानुसार "होलिका-दहन" भद्रा के उपरान्त ही करना चाहिए। भद्रा में "होलिका-दहन" करने से राज्य,राजा व प्रजा पर संकट आते हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

बुधवार, 31 जनवरी 2018

ज्योतिष और चिकित्सकीय दृष्टिकोण


किसी ज्योतिषी द्वारा जन्मपत्रिका देखने के बाद जब ग्रहशान्ति, जप, दान, रत्न-धारण इत्यादि का परामर्श दिया जाता तब अक्सर लोगों की जिज्ञासा होती है कि इस ग्रहशान्ति कर्म से उन्हें कितने दिनों में लाभ हो जाएगा? साँसारिक दृष्टि से उनका यह प्रश्न उचित भी प्रतीत होता है। ठीक उसी प्रकार जैसे हम बाज़ार में किसी वस्तु को क्रय करने से पूर्व उसकी भलीभाँति जाँच-पड़ताल करने के उपरान्त ही उसे क्रय करते हैं। वहीं अस्वस्थ होने पर जब हम किसी चिकित्सक के पास जाते हैं तब भी हमारे मन में यही प्रश्न होता है कि अमुक दवा से हम कितने दिनों में पुन: स्वस्थ हो जाएँगे! हम उसी चिकित्सक और औषधि को श्रेष्ठ मानते हैं जो हमें तत्काल लाभ देती है। व्यावसायिक एवं साँसारिक दृष्टिकोण से यह सर्वथा उचित मनोभाव है किन्तु जब विषय धर्म, आस्था, ईश्वर और विश्वास सम्बन्धी होता है तब यह मनोभाव अनुचित प्रतीत होता है। हमें धर्म व आस्था के क्षेत्र में व्यावसायिक व चिकित्सकीय दृष्टिकोण नहीं रखना चाहिए। हमारी भावदशा तो एक कृषक की भाँति होनी चाहिए। जिस प्रकार एक कृषक बीजारोपण से पूर्व भूमि तैयार करता है, फ़िर उसमें बीज डालता है, उस बीज की खाद-पानी डालकर उचित देखभाल करता है किन्तु यह सब करने मात्र से ही वह फ़ल या फ़सल प्राप्त करने का अधिकारी नहीं हो जाता है। इन सबके अतिरिक्त वह एक अति- महत्त्वपूर्ण कार्य करता है जो उसके द्वारा बोए गए बीज में अंकुरण का मुख्य कारण बनता है, वह है- प्रार्थना एवं पूर्ण श्रद्धा व धैर्य के साथ प्रतीक्षा। प्रतीक्षा कैसी; धैर्य कैसा!, जो श्रद्धा और विश्वास से परिपूर्ण हो। परमात्मा हमारे दास नहीं हैं जो हमारे द्वारा किए गए पूजा-पाठ, जप-तप, दान के अधीन होकर हमें हमारा अभीष्ट देने के लिए बाध्य हों। परमात्मा तो सदा-सर्वदा बिना किसी कारण के कृपा करते हैं इसीलिए हमारे शास्त्रों में परमात्मा को "अहैतु" कहा गया है। "अहैतु" का अर्थ है बिना किसी हेतु के अर्थात् जो अकारण कृपा करें। अब यक्ष-प्रश्न यह उठता है कि जब परमात्मा बिना किसी कारण के ही कृपा करते हैं तब इन ग्रहशान्तियों, पूजा-पाठ, नामजप, दान इत्यादि से क्या प्रायोजन? इस प्रश्न के समाधान के लिए एक बात समझनी अत्यन्त आवश्यक है कि ईश्वर कृपा तो नि:सन्देह करते हैं लेकिन उस कृपा को हम तक पहुँचाने के लिए एक निमित्त की आवश्यकता उन्हें भी होती है। क्या योगीश्वर भगवान कृष्ण कौरवों की चतुरंगिणी सेना को अपनी भृकुटि-विलास मात्र से परास्त नहीं कर सकते थे? किन्तु उन्होंने अपने इस कार्य के लिए अर्जुन को निमित्त बनाया। सम्पूर्ण गीता का यही सन्देश है- निमित्त हो जाना, साक्षी हो जाना। कर्ताभाव का सर्वथा त्याग कर देना। केवल कुछ कर्मकाण्ड या पूजा-विधानों को सम्पन्न कर देने मात्र से हम शुभफ़ल पाने के अधिकारी नहीं हो जाते। शुभफ़ल प्राप्ति के लिए आवश्यकता होती है सतत शुद्ध मन व निर्दोष चित्त से प्रार्थना करने की। जब हमारी प्रार्थनाएँ ईश्वर तक पहुँचती है तब वे स्वयं हमें सँकेत देते हैं। अब अपने इ्न सँकेतों तो हम तक पहुँचाने के लिए वे किसी ज्योतिषी को निमित्त बनाएँ या फ़िर उस ज्योतिषी के द्वारा बताए गए पूजा-विधानों व ग्रहशान्तियों अथवा वे चाहें तो बिल्कुल तुच्छ और निरर्थक सा प्रतीत होने वाला कोई निमित्त भी चुन सकते हैं यह सब उनकी इच्छा पर निर्भर करता है। हम अपने कुछ वर्षों के अनुभव के आधार पर यह अनुभूत सत्य आप पाठको को बताना चाहेंगे कि यदि शुद्ध मन व निर्दोष भाव से पूजा-विधान एवं प्रार्थनाएँ की जाएँ तो सकारात्मक परिणाम प्राप्त होते ही हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 29 जनवरी 2018

'ग्रहण' का रहस्य


31 जनवरी को अँग्रेजी नववर्ष का पहला चन्द्रग्रहण है। ग्रहण से आप सभी परिचित हैं लेकिन क्या आप ग्रहण को जानते हैं! आज हम ग्रहण से जुड़ी कुछ बद्धमूल धारणाओं की चर्चा करेंगे। ग्रहण से जुड़ी जो सबसे बड़ी धारणा है, वह है "सूतक"। ग्रहण के "सूतक" के नाम पर लोगों का घर से बाहर आना-जाना अवरुद्ध कर दिया जाता है। यहाँ तक कि सूतक के कारण मन्दिरों के भी पट बन्द कर दिए जाते हैं। ग्रहणकाल में भोजन पकाना एवं भोजन करना वर्जित माना गया है। ग्रहण के मोक्ष अर्थात् ग्रहणकाल के समाप्त होते ही स्नान करने की परम्परा है। यहाँ हम स्पष्ट कर दें कि इन सभी परम्पराओं के पीछे मूल कारण तो वैज्ञानिक है, शेष उस कारण से होने वाले दुष्प्रभावों को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए देश-काल-परिस्थित अनुसार लोक नियम। वैज्ञानिक कारण तो स्थिर होते हैं लेकिन देश-काल-परिस्थिति अनुसार बनाए गए नियमों को हमें वर्तमान काल के अनुसार अद्यतन (अपडेट) करना आवश्यक होता है, तभी वे जनसामान्य के द्वारा मान्य होते हैं और उनका अस्तित्व भी बना रह पाता है अन्यथा वे परिवर्तन की भेंट चढ़ ध्वस्त हो जाते हैं। किसी भी नियम को स्थापित करने के पीछे मुख्य रूप से दो बातें प्रभावी होती हैं, पहली-भय और दूसरी-लोभ; लालच। इन दो बातों को विधिवत् प्रचारित कर आप किसी भी नियम को समाज में बड़ी सुगमता से स्थापित कर सकते हैं। धर्म में इन दोनों बातों का समावेश होता है। अत: हमारे समाज के तत्कालीन नीति-निर्धारकों ने वैज्ञानिक कारणों से होने वाले दुष्प्रभावों से जन-सामान्य को बचाने के उद्देश्य से अधिकतर धर्म का सहारा लिया। जिससे यह दुष्प्रभाव आम जन को प्रभावित ना कर सकें किन्तु आज के सूचना और प्रौद्योगिकी वाले युग में जब हम विज्ञान से भलीभाँति परिचित हैं तब इन बातों को समझाने हेतु धर्म का आधार लेकर आसानी से ग्राह्य ना हो सकने वाली बेतुकी दलीलें देना सर्वथा अनुचित सा प्रतीत होता है। आज की युवा पीढ़ी रुढ़बद्ध नियमों को स्वीकार करने में झिझकती है। यही बात ग्रहण से सन्दर्भ में शत-प्रतिशत लागू होती है। आज की पीढ़ी को  "सूतक" के स्थान पर सीधे-सीधे यह बताना अधिक कारगर है कि ग्रहण के दौरान चन्द्र व सूर्य से कुछ ऐसी किरणें उत्सर्जित होती हैं जिनके सम्पर्क में आ जाने से हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और यदि ना चाहते हुए भी इन किरणों से सम्पर्क हो जाए तो स्नान करके इनके दुष्प्रभाव को समाप्त कर देना चाहिए। वर्तमान समय में "ग्रहण" का यही अर्थ अधिक स्वीकार व मान्य प्रतीत होता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 28 जनवरी 2018

ग़ज़ल

चित्र-साभार

ग़ज़ल
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उलझिए मत; उलझाइए मत,
दिल को बारहा समझाइए मत

फैलेगी घर का छप्पर फ़ूँक डालेगी,
चिंगारियों को बेतहाशा सुलगाईए मत

वो थककर ज़मीं पर ना लेट जाएँ
बूढ़े दरख़्तों को ज़ोर से हिलाईए मत

फ़िर दोनों तस्वीर बिगड़ जाएँगी
सियासत में मज़हब मिलाईए मत

सवाब नुमाईश का मोहताज नहीं होता
आप रिसालों में तो इसे छपाईए मत

एक ही नूर हर शय में है समाया
दानां आवाम को भड़काईए मत

एक हद तक ये जज़्ब करती है
रियाया को यूँ आज़माईए मत


-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

"पद्मावत"- भारतीय सँस्कृति से खिलवाड़

आज भारी विरोध और न्यूनाधिक हिंसा के पश्चात संजयलीला भंसाली की विवादास्पद फ़िल्म "पद्मावत" देश में रिलीज़ हो गई। क्यों ना अपने निजी लाभ व स्वार्थ के लिए देश का सौहार्दपूर्ण वातावरण खराब करने के लिए संजयलीला भंसाली पर कार्रवाई की जाए? जबकि उन्हें इस बात का भलीभाँति अन्देशा था। फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही उन्हें राजपूत समाज ने सावधानी रखने की हिदायत दी थी इसके पश्चात उन्होंने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर अपनी यह घटिया फ़िल्म बना डाली। मेरे देखे कोई भी सभ्य समाज अपने पूर्वजों व आराध्यों के प्रणय-दृश्यों को यूँ सार्वजनिक तौर पर देखना-दिखाना स्वीकार नहीं करेगा। यह हमारी भारतीय सँस्कृति व परम्परा नहीं है। राजस्थान उन राज्यों में है जहाँ आज भी प्राचीन परम्पराओं का पालन बड़े आदर के साथ किया जाता है। हमारे शास्त्रों ने भी जनभावनाओं के विरूद्ध किसी कार्य को करने का निषेध किया है। महज़ मनोरंजन और अपने निजी लाभ के लिए किसी की आस्था व मान्य परम्पराओं का अपमान स्वीकार नहीं किया जा सकता। वहीं क्या आप समझते है कि आज के दौर की किसी भी अभिनेत्री में रानी "पद्मिनी" के पात्र को निभाने का सामर्थ्य है? कहाँ रानी पद्मिनी ने अपने शील को पर-पुरूष से सुरक्षित रखने  के लिए स्वयं को अग्निदेव को समर्पित कर दिया था कहाँ आज की ये अभिनेत्रियाँ जो हर दूसरी फ़िल्म विलग-विलग अभिनेताओं के साथ अमर्यादित तरीके से व्यवहार की करती दिखाई देती हैं। चाहे इन अभिनेत्रियों के वस्त्र हों, इनके सँवाद हों या इनके नृत्य हों सभी भारतीय सँस्कृति का स्पष्ट उल्लँघन करते प्रतीत होते हैं, भला इन्हें रानी "पद्मिनी" का पात्र निभाने का अधिकार है? जो अपने जीवन में रानी "पद्मिनी" के आदर्शों व सिद्धान्तों का मखौल उड़ाती नज़र आती हैं। मैं यहाँ स्मरण करूं देश के महान अभिनेता श्री मुकेश खन्ना जी का जिन्होंने बी.आर.चोपड़ा कृत "महाभारत" में भीष्म पितामह का किरदार निभाने के बाद अपने हर किरदार को बेहद सावधानी से चुना और अपने निजी जीवन में आज तक अत्यंत मर्यादित रूप रह रहे हैं। आज भी देश में ऐसे कई अभिनेता है जो राष्ट्रहित हेतु पूर्णरूपेण समर्पित भाव से कार्यरत हैं। "पद्मावत" के निर्देशक कभी भी देशवासियों को इस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न दिखाई नहीं दिए। जब आप अपने देश व समाज की प्रतिष्ठा में वृद्धि नहीं कर सकते तो आपको उसे धूमिल करने का भी कोई अधिकार नहीं है। कुछ देर के लिए मान भी लिया जाए कि संजयलीला भंसाली सही हैं तो भी उन्हें जनभावनाओं का आदर व सम्मान कर इस मुद्दे का समाधान स्वयं निकालना चाहिए था, जो उन्होंने नहीं किया। भला क्यों राज्यों का पुलिस बल आपकी इस घटिया फ़िल्म को सुरक्षा प्रदान करे? क्या प्रदेशों का पुलिस बल इसलिए है कि किसी के घटिया मनोरंजन को सुरक्षा दे! नहीं, राज्यों का पुलिस बल अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए होता है, ना कि किसी व्यक्ति की निम्नस्तरीय सोच को संवर्द्धित व पोषित करने के लिए। मेरे देखे इस प्रकार की फ़िल्में अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में भारतीय सँस्कृति व परम्पराओं को विनष्ट करने का कुत्सित प्रयास है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 21 जनवरी 2018

प्रेम तो आनन्द स्वरूप है


आज से लगभग एक वर्ष पूर्व एक छात्र ने आत्महत्या की थी। मीडिया ने उसके लिखे सुसाइड नोट को दिखाया था। उस सुसाइड नोट की एक लाईन मेरे ज़ेहन में कुछ अटक सी गई - "यह बेहद कठिन है कि हम प्रेम करें और हमें दर्द ना मिले।" आज अधिकतर लोगों को शायद यह लाईन अपनी ज़िंदगी में घटित होती हुए लगे, लेकिन मेरे देखे प्रेम और दर्द का दूर-दूर का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह हो ही नहीं सकता कि आप प्रेम करें और आपको दर्द मिले। यदि दर्द मिल रहा है तो आप प्रेम नहीं कर रहे हैं। वर्तमान दौर में प्रेम के नाम सबकुछ किया जा रहा है बस प्रेम नहीं किया जा रहा है। शब्दों की अपनी मज़बूरी है जैसे मैंने कहा कि आप प्रेम करें और आपको दर्द मिले यह हो ही नहीं सकता, अब इसमें कुछ लोग कह सकते हैं कि फ़िर विरह के दर्द का क्या होगा? तो मैंने कहा कि शब्दों की अपनी मज़बूरी है वास्तविक रूप में तो प्रेम में जो विरह होता है वह भी आनन्ददायक ही होता है। इसलिए तो राष्ट्रकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर अपनी एक कविता में परमात्मा के दरवाज़े से बच निकलते हैं क्योंकि उन्हें मिलन के आनन्द की अपेक्षा विरह की टीस अधिक प्रिय लगती है। मेरा बस यही कहना है कि यह हो सकता है आपको जीवन में दर्द मिला हो लेकिन उसके लिए प्रेम को उत्तरदायी ठहराना अनुचित है क्योंकि आज अधिकतर लोग प्रेम शब्द से तो परिचित हैं किन्तु प्रेम से अपरिचित। मैं जीसस को याद करूं जिन्होंने कहा था "प्रेम ही परमात्मा है" और परमात्मा आनन्द स्वरूप है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया