गुरुवार, 25 जनवरी 2018

"पद्मावत"- भारतीय सँस्कृति से खिलवाड़

आज भारी विरोध और न्यूनाधिक हिंसा के पश्चात संजयलीला भंसाली की विवादास्पद फ़िल्म "पद्मावत" देश में रिलीज़ हो गई। क्यों ना अपने निजी लाभ व स्वार्थ के लिए देश का सौहार्दपूर्ण वातावरण खराब करने के लिए संजयलीला भंसाली पर कार्रवाई की जाए? जबकि उन्हें इस बात का भलीभाँति अन्देशा था। फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही उन्हें राजपूत समाज ने सावधानी रखने की हिदायत दी थी इसके पश्चात उन्होंने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर अपनी यह घटिया फ़िल्म बना डाली। मेरे देखे कोई भी सभ्य समाज अपने पूर्वजों व आराध्यों के प्रणय-दृश्यों को यूँ सार्वजनिक तौर पर देखना-दिखाना स्वीकार नहीं करेगा। यह हमारी भारतीय सँस्कृति व परम्परा नहीं है। राजस्थान उन राज्यों में है जहाँ आज भी प्राचीन परम्पराओं का पालन बड़े आदर के साथ किया जाता है। हमारे शास्त्रों ने भी जनभावनाओं के विरूद्ध किसी कार्य को करने का निषेध किया है। महज़ मनोरंजन और अपने निजी लाभ के लिए किसी की आस्था व मान्य परम्पराओं का अपमान स्वीकार नहीं किया जा सकता। वहीं क्या आप समझते है कि आज के दौर की किसी भी अभिनेत्री में रानी "पद्मिनी" के पात्र को निभाने का सामर्थ्य है? कहाँ रानी पद्मिनी ने अपने शील को पर-पुरूष से सुरक्षित रखने  के लिए स्वयं को अग्निदेव को समर्पित कर दिया था कहाँ आज की ये अभिनेत्रियाँ जो हर दूसरी फ़िल्म विलग-विलग अभिनेताओं के साथ अमर्यादित तरीके से व्यवहार की करती दिखाई देती हैं। चाहे इन अभिनेत्रियों के वस्त्र हों, इनके सँवाद हों या इनके नृत्य हों सभी भारतीय सँस्कृति का स्पष्ट उल्लँघन करते प्रतीत होते हैं, भला इन्हें रानी "पद्मिनी" का पात्र निभाने का अधिकार है? जो अपने जीवन में रानी "पद्मिनी" के आदर्शों व सिद्धान्तों का मखौल उड़ाती नज़र आती हैं। मैं यहाँ स्मरण करूं देश के महान अभिनेता श्री मुकेश खन्ना जी का जिन्होंने बी.आर.चोपड़ा कृत "महाभारत" में भीष्म पितामह का किरदार निभाने के बाद अपने हर किरदार को बेहद सावधानी से चुना और अपने निजी जीवन में आज तक अत्यंत मर्यादित रूप रह रहे हैं। आज भी देश में ऐसे कई अभिनेता है जो राष्ट्रहित हेतु पूर्णरूपेण समर्पित भाव से कार्यरत हैं। "पद्मावत" के निर्देशक कभी भी देशवासियों को इस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न दिखाई नहीं दिए। जब आप अपने देश व समाज की प्रतिष्ठा में वृद्धि नहीं कर सकते तो आपको उसे धूमिल करने का भी कोई अधिकार नहीं है। कुछ देर के लिए मान भी लिया जाए कि संजयलीला भंसाली सही हैं तो भी उन्हें जनभावनाओं का आदर व सम्मान कर इस मुद्दे का समाधान स्वयं निकालना चाहिए था, जो उन्होंने नहीं किया। भला क्यों राज्यों का पुलिस बल आपकी इस घटिया फ़िल्म को सुरक्षा प्रदान करे? क्या प्रदेशों का पुलिस बल इसलिए है कि किसी के घटिया मनोरंजन को सुरक्षा दे! नहीं, राज्यों का पुलिस बल अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए होता है, ना कि किसी व्यक्ति की निम्नस्तरीय सोच को संवर्द्धित व पोषित करने के लिए। मेरे देखे इस प्रकार की फ़िल्में अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में भारतीय सँस्कृति व परम्पराओं को विनष्ट करने का कुत्सित प्रयास है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

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