अब मत मेरा निर्माण करो!
कुछ भी न अभी तक बन पाया,
युग-युग बीते, मैं घबराया;
भूलो मेरी विहलता को, निज लज्जा का तो ध्यान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!
इस चक्की पर खाते चक्कर
मेरा तन-मन-जीवन जर्जर,
हे कुम्भकार, मेरी मिट्टी को और न अब हैरान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!
कहने की सीमा होती है
सहने की सीमा होती है,
कुछ मेरे भी वश में, मेरा कुछ सोच-समझ अपमान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!
कवि- डा. हरिवंशराय बच्चन
कुछ भी न अभी तक बन पाया,
युग-युग बीते, मैं घबराया;
भूलो मेरी विहलता को, निज लज्जा का तो ध्यान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!
इस चक्की पर खाते चक्कर
मेरा तन-मन-जीवन जर्जर,
हे कुम्भकार, मेरी मिट्टी को और न अब हैरान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!
कहने की सीमा होती है
सहने की सीमा होती है,
कुछ मेरे भी वश में, मेरा कुछ सोच-समझ अपमान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!
कवि- डा. हरिवंशराय बच्चन
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| साभार: श्री अमिताभ बच्चन जी |


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