मंगलवार, 9 मार्च 2010

मेरे दोहे अनुभूति पर


निकले थे घर से कभी, हम सपनों के साथ
इक-इक करके राह में, सबने छोडा हाथ

प्यारी दैरो-हरम से,तेरी ये दहलीज़
मैंने तेरे नाम का, डाल लिया ताबीज़

रखने की गुलदान में, मत करना तुम भूल
नहीं महक सकते कभी, कागज़ के ये फूल

अब ये देखें बीच में, कौन हमारे आय
हम तो बैठे हैं यार, तुझको खुदा बनाय

रोके से रुकता नहीं, करता मन की बात
हम लाचार खड़े रहें, मन की ऐसी जात

कल मुझसे टकरा गई, इक नखराली नार
अधर पांखुरी फूल की, चितवन तेज कटार

तुमने छेड़ा प्यार का, ऐसा राग हुज़ूर
सदियों तक बजता रहा, दिल का ये संतूर

देखो ये संसार है, या कि भरा बाज़ार
संबंधों के नाम पर, सभी करें व्यापार

दुई रोटी के वास्ते, छोड़ दिया जब गांव
भरी दुपहरी यार क्यूं, ढूंढ रहे हो छांव

लौट बराती सब चले, अपने-अपने गांव
रुके रहे देहरी पर, रोली वाले पांव

तुमने अपने प्रेम का, डाला रंग;अबीर
घर बारै मैं आपना, होता गया कबीर

सच से होगा सामना, तो होगा परिवाद
बेहतर है कि छोड़ दो, सपनों से संवाद

-हेमंत रिछारिया

सोमवार, 8 मार्च 2010

फिल्म समीक्षा-"पा"


कल सुबह जब देश-दुनिया का हाल जानने के लिये जब अख़बार पर नज़र डाली तो निगाहें बरबस ही एक विग्यापन पर अटक गई। विग्यापन था फिल्म "पा" के बारे में जो शाम ५:३० बजे स्टार-प्लस पर प्रदर्शित होने वाली थी। यदा-कदा ही इस फिल्म के प्रोमो देखकर इतना तो यकीं हो ही गया था कि "पा" एक देखने लायक फिल्म है। पर जब शाम ५:३० बजे चाय की चुस्कियों के बीच जब यह फिल्म देखी तो मन आर.बाल्की; जो इस फिल्म के लेखक और निर्देशक हैं और अभिनय सम्राट अमिताभ बच्चन के प्रति नतमस्तक हो गया। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में बहुत ही उम्दा काम किया है। गहन संवेदनाओं; संदेशों और भरपूर मनोरंजन से लबरेज़ "पा" नि:संदेह ही सिने जगत की महानतम फिल्मों में से है। जहां तक अमित जी का सवाल है तो उम्र के इस पड़ाव पर १३ साल के बीमार बच्चे का जीवंत अभिनय कर पाना यदि किसी की सामर्थ्य में है तो बस इस महानायक के। भारतीय सिनेमा जगत में सैकड़ों निर्माता-निर्देशक है पर लीक से हटकर स्वस्थ और संदेशात्मक तस्वीर बनाने वाले उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। यहां मैं याद करना चाहूंगा फिल्म "ब्लैक" के निर्देशक संजयलीला भंसाली को, और "तारे ज़मीन पर" के लिये आमिर खान को इस प्रकार की फिल्में भारतीय सिने जगत को एक विशिष्टता प्रदान करतीं हैं। कुछ ही निर्माता निर्देशक ऐसे हैं जो व्यवसाय के आधार पर फिल्में ना बनाकर सामाजिक सुधार और सकारात्मक परिवर्तन के लिये फिल्में बनाते हैं। यहां यदि दि-ग्रेट शो मैन राजकपूर साहब को याद नहीं किया जाये तो यह अन्याय होगा। "प्रेम-रोग" जैसी फिल्म के जरिये उन्होने विधवा विवाह का जो संदेश दिया उसे भला कौन भूल सकता है। एक समय था जब ऐसी फिल्में बाक्स-आफिस पर औंधे मुंह गिरा करतीं थी परिणामस्वरूप भविष्य में कोई निर्माता-निर्देशक कबीर की जमात में शामिल होने की हिम्मत नहीं करता था। पर अच्छी बात है कि अब समय बदल रहा है अब ऐसी फिल्मों को दर्शक भी मिल रहे हैं और सम्मान भी लिहाज़ा अब कई निर्माता-निर्देशक इस ओर अपना ध्यान दें रहे हैं। आज समाज को स्वस्थ व अच्छे मनोरंजन की आवश्यकता है। जो उनके विकास में सहभागी हो सके, उनका मार्गदर्शन कर सके। "पा" इसी क्रम की एक बेहतरीन फिल्म है। इसके लिये मैं एक बार पुन: आर.बाल्की और अमिताभ बच्चन जी का ह्रदय से आभारी हूं, और उम्मीद करता हूं कि जल्द ही हमें ऐसी एक और फिल्म देखने को मिलेगी।

-हेमंत रिछारिया

सोमवार, 1 मार्च 2010

ऐसे खेलें फाग


आओ सखि हम तुम मिल खेलें, ऐसे अबके फाग
धो लें सारे द्वेष ह्रदय के, धो लें सारे राग।

लाज का अवगुंठन मुख पर, धरोगे आखिर कब तक
पांव तुम्हारे भी थिरकेंगे, जब छिड़ेंगे मेरे राग।

लाख करो मनुहार भले, बैंया ना छोडूंगा
व्यर्थ बहाने करके तुम, जाती हो जी भाग।

रंगो की बौछार चहुंदिस, अंबर पे लाली छाई
बूंदो का ले रूप झर रहा, नित नूतन अनुराग।

तेरे मेरे अधर मिलें, तो लगता ऐसे
चूम कली को ले उड़ जाए, जैसे भंवर पराग।

यौवन जब रंग में भीगे, कोई कैसे मन समझाए
उलझी अलकें; तिरछी पलकें, आग लगे है आग।

दिनकर चढ़ा मुंडेर, द्वार खड़े हुरियारे
कहे मैया ओ मूढ़मति, अब तो सपनों से जाग।

-हेमन्त रिछारिया

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

कविता

नेह ने देह में सेंध दई
अंखियान को रंग अबीरी भयो,
तन तो तन है मन की का कहैं
असरीरी हू थो सो सरीरी भयो,
गहि गैल में चूम लियो नंदलाल ने
हाय वह वहरीरी भयो,
सब चाखन कूं लालच फिरें
जैसे गोरी को गाल पंजीरी भयो।
-आत्मप्रकाश शुक्ल

होली के दोहे

दहकी दहकी दोपहर बहकी-बहकी रात।
फागुन आया गांव में लेकर ये सौगात॥

है चंदन के लेप सी ये सीने की आंच।
सखि पाती बिन बैन के नैन मूंदकर बांच॥

खनक उठे हैं लाज के बागी बाजूबंद।
संयम के हर छंद को होने दो स्वछंद॥
-शिवओम अम्बर

बरस नया ले आ गया, रंगो का त्यौहार।
चटक-मटक गोरी फिरे, पिय करे मनुहार॥

केशर से रंगी बदन, कस्तूरी सी रात।
पायल बिछ्वे कर रहे, चुपके-चुपके बात॥

यह यायावर ज़िंदगी, चलते-चलते पांव।
भर पिचकारी मार दे, आए तेरे गांव॥

दहक रहा टेसू खड़ा, घूंघट में है पीर।
बंधन सारे तोड़कर, गोरी हुई अधीर॥

कजरारे नयना हंसे, गाल बने गुलाब।
रंग गुलाबी मन हुआ, मिलने को बेताब॥
-प्रेमचंद सोनवाने

कविता

इसीलिए तो होली हंसती आज है
इसी ठिठोली में फागुन की लाज है,
इसकी लाली में खिलता श्रंगार है
मलो अबीर गुलाल तुम्हे तो अधिकार है।
आओ आज प्यार कर लें फिर प्यार को
इसी रंग में रंग दें सब संसार को।
-शिवमंगल सिंह "सुमन"

रविवार, 14 फ़रवरी 2010

प्रेम ही परमात्मा है


प्रेम चतुर्दशी यानि वेलेंटाइन-डे का विरोध करना तो जैसे कुछ लोगों का कर्तव्य बन गया है। जब भी यह त्यौहार आता है ये लोग अपनी पिटी पिटाई दलीलों के जरिए इसका विरोध करना शुरु कर देते हैं। ये लोग तो इतना भी नहीं जानते कि जिन शिव के ये सैनिक होने का दावा करते हैं उन्ही शिव ने प्रेम के वशीभूत होकर ही पार्वती के बिछोह से क्षुब्द होकर स्रष्टि का प्रलय कर दिया था। जीसस, मीरा, क्रष्ण, महावीर, बुध्द आदि सभी ने प्रेम को स्वीकार किया है। जीसस का प्रसिध्द वचन है- प्रेम ही परमात्मा है। फिर ये लोग इतना भी नहीं जानते कि ये किसका विरोध कर रहे हैं प्रेम का या पाश्चात्य संस्क्रति का। यदि प्रेम का तो यह एक कुत्सित मानसिकता है और यदि पाश्चात्य संस्क्रति का तो ये सिर्फ अपने अहंकार का पोषण है। मान लीजिए यदि किसी भारतीय पर्व को विदेशों में इस तरह मनाया जाय तब भी क्या ये इसी प्रकार विरोध करेंगे? प्रेम तो वह मार्ग है जिस पर चलकर परमात्मा को पाया जाता है। रामक्रष्ण ने एक बार अपने शिष्य से कहा था कि यदि तुमने संसार में किसी से भी प्रेम किया हो तो मैं उसे शुध्द करके तुम्हारा साक्षात्कार परमात्मा से करा सकता हूं परंतु यदि तुमने किसी से भी प्रेम नहीं किया है तो तुम्हें परमात्मा से मिला पाना कठिन है। समाज के तथाकथित ठेकेदार उसी प्रेम की संभावना को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं।हालांकि इस प्रकार विरोध प्रदर्शन करके वो इसे और स्थापित कर रहे हैं। इस बात से वो अनजान हैं क्योंकि जिस चीज़ को जितना दबाया जाता है वह उतनी ही उद्दीप्त होकर प्रकट होती है। आज आवश्यकता प्रेम के विरोध की नहीं बल्कि प्रेम के शुध्दिकरण की है। प्रेम का विरोध तो स्वयं परमात्मा का विरोध है इसलिये ही संत कबीर ने कहा है-
"पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया ना कोय !
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढै सो पंडित होय !!

- हेमन्त रिछारिया