सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/
सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
कविता
इसीलिए तो होली हंसती आज है इसी ठिठोली में फागुन की लाज है, इसकी लाली में खिलता श्रंगार है मलो अबीर गुलाल तुम्हे तो अधिकार है। आओ आज प्यार कर लें फिर प्यार को इसी रंग में रंग दें सब संसार को। -शिवमंगल सिंह "सुमन"
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