सामाजिक,सांस्कृतिक व राष्ट्रवादी धरोहरों की सजग प्रहरी ई-पत्रिका/
सम्पादक- हेमन्त रिछारिया
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
कविता
नेह ने देह में सेंध दई अंखियान को रंग अबीरी भयो, तन तो तन है मन की का कहैं असरीरी हू थो सो सरीरी भयो, गहि गैल में चूम लियो नंदलाल ने हाय वह वहरीरी भयो, सब चाखन कूं लालच फिरें जैसे गोरी को गाल पंजीरी भयो। -आत्मप्रकाश शुक्ल
1 टिप्पणी:
आपको तथा आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ.nice
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