रविवार, 3 मई 2020

क्या ज्योतिष की दृष्टि से आप हैं "ग्रीन जोन" में...!

  
आज समूचा विश्व "कोरोना" नामक महामारी से पीड़ित हैं। संसार के सभी देश अपने-अपने तरीकों से इस वैश्विक महामारी से निपटने का प्रयास कर रहे हैं। इस समय अनेक देशों ने स्थानीय स्तर पर तालाबन्दी अर्थात् "लाकडाउन" किया हुआ है। भारत में भी पिछले एक माह से "लाकडाउन" चला आ रहा है। "कोरोना" वायरस से निपटने के लिए अभी तक कोई कारगर ईलाज नहीं खोजा जा सका है, और ना ही "कोरोना" के स्वभाव का कोई ठीक-ठीक अनुमान लगाया जा सका है। इस वायरस ने सभी को प्रभावित किया है, चाहे वह 6 माह की बच्ची हो, 25 वर्ष का युवा हो, 40 वर्ष का प्रौढ़ हो, या 60 से 80 तक की आयु के वृद्ध। "कोरोना" से हुई मौतों में भी हमें असमान्य नियम देखने को मिला है जहां एक ओर तो 40 वर्षीय प्रौढ़ "कोरोना" की जंग हार कर काल के गाल में समा गए वहीं 90 वर्षीय वृद्ध "कोरोना" को शिकस्त देकर पूर्ण स्वस्थ हो गए। अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? यदि हम इस बीमारी से संक्रमित होने वाले व्यक्ति एवं इससे ग्रसित होकर स्वस्थ होने वाले व्यक्तियों व इससे प्रभावित होकर प्राण गंवा देने वाले व्यक्तियों को रेड, आरेंज व ग्रीन; तीन ज़ोन में विभक्त कर ज्योतिषीय आधार पर इसका विश्लेषण करने का प्रयास करें तो हम हमारी सर्तकता व सावधानी की दिशा में एक कदम ओर अग्रसर हो सकेंगे। ज्योतिष शास्त्र में किसी जातक के किसी रोग से पीड़ित होने व उस रोग से उसकी प्राणहानि होने के जोखिम के संकेत उसकी जन्मपत्रिका के अवलोकन के आधार पर मिलते हैं।
रोग का अधिपति ग्रह "षष्ठेश" -
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ज्योतिष शास्त्र में कुण्डली के छठे भाव को रोग का भाव माना गया है एवं इसके अधिपति ग्रह जिसे "षष्ठेश" कहा जाता है, रोग का अधिपति ग्रह माना गया है। यदि किसी जातक पर "षष्ठेश" की महादशा या अन्तर्दशा चल रही हो तो वह निश्चित ही किसी ना किसी रोग से पीड़ित होगा। जन्मपत्रिका में "षष्ठेश" रोग का पक्का कारक होता है। अत: यदि कोई जातक जन्मपत्रिका के अनुसार "षष्ठेश" की महादशा या अन्तर्दशा भोग रहा है तो वह अवश्य ही रोग से पीड़ित हो जाएगा। यदि "षष्ठेश" जन्मपत्रिका के किसी शुभ या लाभ भाव में स्थित हो तो ऐसे में रोगग्रस्त होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा जातक शीघ्र ही रोग से मुक्त नहीं होता।

"मारकेश" की दशा देती है मृत्युतुल्य कष्ट-
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संसार में जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु होना अवश्यंभावी है लेकिन यह मृत्यु कब होगी इसका स्पष्ट संकेत भी ज्योतिष शास्त्र से मिल सकता है। जन्मपत्रिका के द्वितीयेष, सप्तमेष व द्वादशेष मारकेश ग्रह माने गए हैं इनमें द्वितीयेष व सप्तमेष को प्रबल मारकेश माना गया है। ज्योतिष में "मारकेश" मृत्यु देने वाला ग्रह होता है। यदि मारकेश शनि, मंगल, सूर्य, जैसे क्रूर ग्रह हों या "मारकेश" ग्रह राहु-केतु से संयुक्त हों तो यह अधिक हानिकारक हो जाते हैं। मारकेश की महादशा या अन्तर्दशा में जातक मृत्युतुल्य कष्ट पाता है और यदि आयु पूर्ण हो चुकी हो तो ऐसे में जातक की इन दशाओं में मृत्यु होना भी सम्भव है।


क्रूर ग्रह की दशा होती है हानिकारक-
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उपर्युक्त दशाओं के अतिरिक्त क्रूर ग्रहों जैसे अष्टमेश व राहु-केतु की दशाएं भी जातक के स्वास्थ्य व जीवन के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। उपर्युक्त ग्रह स्थितियों व दशाओं के आधार पर यदि हम जातकों को तीन जोन में विभक्त करें तो आईए जानते हैं कि ज्योतिष की दृष्टि से आप किस जोन में कहे जाएंगे-
1. ग्रीन जोन- सर्वप्रथम हम ज्योतिष के ग्रीन जोन वाले जातकों का विश्लेषण करते हैं। यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप "षष्ठेश", "मारकेश" व "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा के प्रभाव में नहीं हैं और आप पर किसी शुभ ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा चल रही है तो आप सुरक्षित अर्थात् "ग्रीन जोन" में माने जाएंगे।
2. ओरेंज जोन- यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप पर "षष्ठेश", या किसी "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा चल रही है किन्तु "मारकेश" की महादशा-अन्तर्दशा व प्रत्यन्तर दशा से आप प्रभावित नहीं हैं अथवा आप केवल "षष्ठेश" या किसी "क्रूर ग्रह" की प्रत्यन्तर दशा भोग रहे हैं। यदि आपका "षष्ठेश" 6,8,12 जैसे हानि स्थान में हो एवं आप पर किसी शुभ ग्रह की महदशा या अन्तर्दशा चल रही हो तब आप "ओरेंज जोन" में माने जाएंगे।
3. रेड जोन-यदि आपकी जन्मपत्रिका के अनुसार वर्तमान में आप "षष्ठेश", "मारकेश" व "क्रूर ग्रह" की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा के प्रभाव में है और आप पर किसी शुभ ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा नहीं चल रही है एवं आप "मारकेश" की महादशा या अन्तर्दशा के प्रभाव में हैं तो आप अत्यन्त असुरक्षित अर्थात् "रेड जोन" में माने जाएंगे। यदि किसी जातक पर वर्तमान में महादशा (मारकेश/षष्ठेश), अन्तर्दशा ((मारकेश/षष्ठेश) व प्रत्यन्तर दशा (मारकेश/षष्ठेश/क्रूर ग्रह) का संयोग बन रहा हो तो ऐसे जातक को अत्यन्त सावधान व सर्तक रहने की आवश्यकता है। पूर्व वर्णित विंशोत्तरी दशाओं के साथ यदि जातक पर "संकटा" नामक योगिनी दशा चल रही हो तब ऐसा जातक निश्चित रूप से "रेड जोन" में माना जाएगा।

(निवेदन- उपर्युक्त विश्लेषण जिज्ञासु व ज्योतिष शास्त्र में रुचि रखने वाले पाठकों को केन्द्र में रखकर प्रस्तुत किया गया है। पाठकों की व्यक्तिगत जन्मपत्रिका की ग्रहस्थिति एवं दशाओं के आधार पर उनका स्वास्थ्य सम्बन्धी जोखिम कम या अधिक हो सकता है। अत: पाठकों से अतिविनम्र निवेदन है कि वे किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी असावधानी व लापरवाही से बचें। उपर्युक्त आलेख को केवल सामान्य जानकारी तक ही सीमित रखें व इसके आधार पर स्वास्थ्य सुरक्षा सम्बन्धी निर्णय ना लें।)

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com



सोमवार, 27 अप्रैल 2020

कोरोना संकट: परमात्मा का विराट रूप


आज समूचा विश्व "कोरोना" नामक महामारी से भयाक्रान्त है। लगभग 5 माह पूर्व इस खतरनाक वायरस ने चीन के वुहान शहर में अपनी आमद दी और फिर विश्व के अधिकांश देशों को इसने अपनी चपेट में ले लिया। भारत भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। इस घातक विषाणु का अभी तक कोई कारगर ईलाज नहीं खोजा जा सका है सिवाय इससे बचने के। कोरोना वायरस से बचाव के लिए चीन सहित अधिकांश देशों ने "लाकडाउन" विकल्प को अपनाकर इसके दुष्प्रभाव में कमी करने में सफलता प्राप्त की है। मौजूदा हालात यह हैं कि विगत कुछ दिनों से विश्व के अनेक देश किसी पक्षाघात के रोगी की तरह जड़वत अपनी गतिविधियों को बन्द किए जस के तस रुके हुए हैं। लोग अपने-अपने घरों में बन्द हैं, कल-कारखानों पर ताला है, परिवहन के साधनों के पहिए थमे हुए हैं, मजदूर बेरोजगार बैठे हैं। ऐसे लग रहा है जैसे समूचा विश्व रुक सा गया है। अब इस परिस्थिति को क्या कहें; प्राकृतिक आपदा, महामारी का प्रकोप या परमात्मा का विराट रूप! मेरे देखे वर्तमान संकट को यदि परमात्मा का विराट रूप कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दरअसल ये एक जंग है भौतिकवाद और अध्यात्म के मध्य। जब भी मनुष्य ने स्वयंभू सर्वशक्तिमान बनने का दु:साहस किया है तब-तब प्रकृति ने उसे इसी प्रकार अपना विराट रूप दिखाकर सावधान किया है। प्राकृतिक आपदाएं यूं ही नहीं आती, हर आपदा हमारे लिए एक संकेत होती है। हम अपने भौतिकतावादी दृष्टिकोण में इतने उलझे हुए होते हैं कि हमें इस बात का पता ही नहीं चलता कि कब हमने प्रकृति का दोहन करने के स्थान पर शोषण करना आरम्भ कर दिया। पर्यावरण...प्रकृति परमात्मा का ही रूप है। हमने अपने तथाकथित विकास के लिए परमात्मा के इस प्रकट रूप का बुरी तरह अनादर किया है। जिस भौतिकवाद को हमें परिधि पर रखना था उसे हमने अपने जीवन का केन्द्र बना लिया और जो अध्यात्म हमारे जीवन का केन्द्र होना चाहिए था उसे हमने परिधि पर रख दिया। इसी असंतुलन का परिणाम आज भिन्न-भिन्न प्रकार की आपदाओं के रूप में मनुष्यता के सामने है। तनिक विचार कीजिए दूसरे पर आधिपत्य जमाने के चलते हम शस्त्रों की कैसी बाढ़ ले आए हैं विश्व में। परमाणु बम तक हमने बना डाले, आखिर क्यों? केवल दूसरों पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए। आज विश्व में जितने परमाणु बम हैं वे पूरी वसुधा को विनष्ट करने के लिए शायद पर्याप्त होंगे। ईश्वर ने हमें जीवित रखने के लिए शुद्ध जल, शुद्ध वायु, क्षुधा तृप्ति के लिए सुस्वादु और पौष्टिक आहार की व्यवस्था प्राकृतिक रूप से की थी किन्तु हमने भौतिकतावाद की अन्धी दौड़ में इसे बुरी तरह प्रदूषित कर दिया। आज का मनुष्य अध्यात्म से कोसों दूर है। अध्यात्म से दूर होने का आशय है- आत्मानुशासन से दूर होना। आज जो महामारी हमारे सम्मुख सुरसा सा मुख खोले खड़ी है वह भी केवल कुछ मनुष्यों द्वारा नियत अनुशासन के उल्लंघन का परिणाम मात्र है। मनुष्य जब प्रकृति प्रदत्त स्वतन्त्रता से परे उच्छंखलता व स्वच्छंदता का आचरण करने लगता है तब इस प्रकार की चेतावनी हमें प्रकृति के ही द्वारा मिलती है। मनुष्य कभी भी सर्वशक्तिमान व पूर्ण स्वतन्त्र नहीं हो सकता। वह सदैव अपने जीवनयापन के लिए प्रकृति के बनाए अनुशासन को मानने के लिए बाध्य है। जब भी वह इस अनुशासन का उल्लंघन करता है उसे इस प्रकार के परिणाम भोगने ही पड़ते हैं। इसे आप परमात्मा की ओर से दिया गया दण्ड कह लें या फ़िर प्राकृतिक आपदा, वास्तव में यह हमारे अनुशासनहीन व स्वच्छंद जीवनशैली का परिणाम है। आज "कोरोना" नामक इस महामारी ने हमें अवसर दिया है कि हम अपने अंतस में झांके और इस अकाट्य सत्य का साक्षात्कार करें कि हमें जो कुछ भी अपने जीवनयापन के लिए प्राप्त हुआ है; चाहे वे हमारी सांसे ही क्यों ना हो, परमात्मा की ओर से दिया गया प्रसाद है। हम उसके अधिकारी नहीं हैं; वह केवल हमें ईश्वर की कृपा से मिला है अत: हम उसका आदर करें। हमें अपनी भौतिकतावादी जीवनशैली को परिवर्तित करना होगा क्योंकि भौतिकतावादी जगत का सत्य इन कुछ दिनों में हम सभी के सामने आ चुका है। आज बड़ी-बड़ी महाशक्तियां इस अदने से विषाणु के आगे घुटने टेकने पर विवश हो चुकी हैं। वर्तमान समय की आवश्यकता प्रकृति के साथ लयबद्ध होने की है ना कि अपने तथाकथित विकास के लिए उसके शोषण करने की। हमें अपने विकास के मानदण्ड बदलने होंगे। हम विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश के सहभागी नहीं बन सकते। हमें अपने लोभ, लालच व वर्चस्व की लड़ाई को स्थगित करना होगा। हम सर्वशक्तिमान है इसलिए स्वच्छंद आचरण करेंगे ऐसी आत्मवंचनाओं से हमें बचना होगा। आज हमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना के आधार पर अपना आचरण करना सीखना होगा। सर्वशक्तिमान केवल ईश्वर है, जगत में जो भी गति हो रही है वह उसी नियंता की इच्छा का परिणाम मात्र है। यदि उसकी मर्ज़ी ना हो तो समस्त अस्तित्व चाहकर भी गति नहीं कर सकता, "कोरोना संकट इसका जीवन्त उदाहरण है। समस्त अस्तित्व को उसी सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान के अनुशासन में चलना होता है। जब भी इस अनुशासन की मर्यादा का अतिक्रमण होता है इस प्रकार के संकट हमें सावधान करने आते रहते हैं। अब यह हम पर है कि हम इन संकेतों से कितना सीखते हैं। यह महामारी आज नहीं तो कल विदा हो जाएगी लेकिन इस महामारी के चलते सीखा हुआ सबक यदि हम भूले तो हो सकता दुबारा मनुष्यता इस सबक को सीखने के लिए बचे ही ना।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
संपादक (सरल-चेतना)

27.04.2020

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

अच्छे दिन...!



किसने सोचा था दौड़-भाग में,
ऐसे भी दिन आएंगे।
आपाधापी छोड़ सारे,
घर में ही सुस्ताएंगे॥

घंटे;घड़ियाल;वे तुमुल नाद,
थमे हैं सारे वाद-विवाद।
बाजारों के कोलाहल पर,
सन्नाटे छा जाएंगे॥
    किसने सोचा था....
दूरी ही वरदान बनी है,
जीवन की पहचान बनी है।
मौत से देखो ठनी है ऐसे,
शस्त्रों का सामान बनी है।
देह के सारे रिश्ते-नाते,
और निकट आ जाएंगे।
    किसने सोचा था...

हवा बह रही ठसक से देखो,
मुक्त हुई है कसक से देखो।
नद;नदियां, झरने सारे,
अब स्वच्छ बहते जाएंगे।
     किसने सोचा था...
 
आंख दिखा भय कंपित करते
अट्टाहासों नभ गुंजित करते
दम्भी अधिपति देखो सारे
औंधे मुंह गिर जाएंगे।

किसने सोचा था दौड़-भाग में,
ऐसे भी दिन आएंगे।

कवि-पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

पृथकता (आइसोलेशन) या अस्पृश्यता (छुआछूत) …!


प्राचीनकाल में पृथकता (आइसोलेशन) को अस्पृश्यता (छुआछूत) का नाम देकर जहां सवर्णों की बड़ी आलोचना की गई वहीं एक विशेष वर्ग को निन्दित व घृणास्पद समझने का कुत्सित प्रयास किया गया। मेरे देखे दोनों ही दृष्टिकोण पूर्वाग्रह से प्रेरित अतिवादी दृष्टिकोण थे। वास्तविकता में पृथकता (आइसोलेशन) और अस्पृश्यता (छुआछूत) देश-काल-परिस्थिति के अनुसार की गई स्वास्थ्य सम्बन्धी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के अंग हैं जिन्हें उस दौर की आवश्यकता के अनुसार परिभाषित किया गया। जिस प्रकार आज "लाकडाउन"और "कर्फ़्यू" एक ही व्यवस्था के अंग हैं बस उन्हें परिभाषित करने का ढंग अलग है लेकिन दोनों ही व्यवस्थाओं का उद्देश्य एक है कि लोग घर से बाहर ना निकलें। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आज एकान्तवास (क्वारंटाइन) या पृथकता (आइसोलेशन) में रखे गए व्यक्ति पापी या अपराधी नहीं हैं वे केवल एक संक्रामक रोग से पीड़ित हैं या हो सकते हैं, जो उनसे किसी अन्य व्यक्ति या सम्पूर्ण समाज में फ़ैल सकता है। ठीक उसी प्रकार प्राचीन समय में जिन्हें "शूद्र" कहा जाता था वे कोई अपराधी, पापी या घृणास्पद व्यक्ति नहीं थे; वे केवल उनके द्वारा सम्पादित किए जाने वाले कार्यों के आधार पर स्वास्थ्य सम्बन्धी सामाजिक सुरक्षा को देखते हुए समाज से एक सीमित दूरी पर रखे जाते थे। सामाजिक स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु बनाई गई इस सीमित दूरी को वर्ग विशेष के तथाकथित ठेकेदारों ने मनुवादी सोच, छुआछूत व अस्पृश्यता का नाम देकर समाज में एक गहरी खाई का निर्माण कर सामाजिक सौहार्द्र को समाप्त कर दिया। ज़रा सोचिए जब आज के वैज्ञानिक युग में जहां मनुष्यता चांद को पददलित करने का दम्भ भरती है वहां इस प्रकार के संक्रामक रोग का कोई ईलाज खोजना सम्भव नहीं हो पा रहा है; केवल उस समय की छुआछूत व अस्पृश्यता (आज के दौर के क्वारंटाइन व आइसोलेशन) के, तो प्राचीन समय में ऐसे संक्रमित रोग का ईलाज खोजना भला कहां सम्भव हो पाता! ऐसे में तथाकथित छुआछूत व अस्पृश्यता (क्वारंटाइन व आइसोलेशन); वास्तविकता में पृथकता, नितांत आवश्यक थी। अपितु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है इस विशुद्ध सामाजिक स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यवस्था को कुछ व्यक्तियों ने अपने अहंकार को परिपोषित करने का साधन बना लिया था किन्तु कुछ लोगों की नासमझी के कारण किसी आवश्यक व उपयोगी सिद्धान्त से उत्पन्न किसी सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाना भी अनुचित है। हम इस बात को स्वीकर करते हैं कि समय के साथ-साथ देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार इस प्रकार की व्यवस्थाओं की समुचित समीक्षा कर उन्हें समाप्त या जारी रखने पर निर्णय लिया जाना भी आवश्यक होता है। आज समूचा विश्व इस बात को स्वीकार व इसका समर्थन करने पर विवश है।

- पं. हेमन्त रिछारिया
(संपादक "सरल चेतना")

रविवार, 29 मार्च 2020

मत आना तू गांव बन्धु


मत आना तू गांव बन्धु
दूषित होगी छांव बन्धु।

हवा हुई जहरीली है,
राह बड़ी पथरीली है।
दिल पे पत्थर रखकर,
रोक बढ़ते पांव बन्धु।
मत आना तू गांव बन्धु॥

तूफ़ान ने आकर घेरा है,
भय ने किया बसेरा है।
जर्जर होती पतवारों से,
खेना है यह नाव बन्धु।
मत आना तू गांव बन्धु॥

नियति की यह चौसर है,
हर कोई इक मोहर है।
सोच-समझ फेंको पांसे,
हार ना जाएं दांव बन्धु।
मत आना तू गांव बन्धु॥

कवि-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया 
("कोरोना" महामारी के कारण पलायन करते प्रवासियों को समर्पित कविता)

29.03.2020

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

कब मिलेगी "कोरोना" संकट से मुक्ति..?



आज समूचा विश्व "कोरोना" वायरस नामक महामारी से भयाक्रान्त है। विश्व की बड़ी आबादी आज "कोरोना" से संक्रमित है। जो स्वस्थ हैं उन्हें अत्यधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) के अनुसार अभी तक इस बीमारी का कोई कारगर ईलाज नहीं खोजा जा सका है। भारत समेत विश्व के अनेक देश "कोरोना" को महामारी घोषित कर चुके हैं। स्वयं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी इसे "वैश्विक महामारी" की श्रेणी में रखा है। आज हर कोई जानना चाहता है मानवजाति इस महामारी के संकट से कब मुक्त होगी। इसके लिए वह चिकित्सा एवं ज्योतिष की ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देख रहा है। ज्योतिष से सम्बन्धित होने के कारण हमारे पास भी इस प्रश्न को लेकर कई जिज्ञासाएं आईं। आईए ज्योतिष शास्त्र की "प्रश्न कुण्डली" की व्यवस्था को आधार बनाकर हम इस प्रश्न का समाधान खोजने का प्रयास करते हैं।

प्रश्न लग्न "स्थिर" श्रेणी की है-
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"कोरोना" सम्बन्धी प्रश्न की कुण्डली सिंह लग्न की बनी है जो स्थिर श्रेणी की है। इसके परिणामस्वरूप यह अभी यथास्थिति का संकेत कर रहा है अर्थात् अभी जो वैश्विक स्थिति है उसमें बहुत अधिक परिवर्तन की उम्मीद नहीं है। स्थिर लग्न इसी घटनाक्रम के कुछ दिनों तक जारी रहने का संकेत कर रहा है।

एकादशेश मित्रक्षेत्री किन्तु राहु अधिष्ठित है
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प्रश्न कुण्डली का एकादशेश मित्रक्षेत्री होकर केन्द्रस्थ है। एकादशेश राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी होकर लग्न को पीड़ित कर रहा है। लग्नेश स्वयं लग्नभंग योग बनाकर अष्टमस्थ है एवं लाभेश राहु से पीड़ित है, जो अत्यन्त हानिकारक है। यह एक प्रतिकूल स्थिति है।

विंशोत्तरी दशा-
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-विशोंत्तरी दशा के अनुसार अभी जून तक कोई बड़ी राहत मिलती प्रतीत नहीं हो रही है। जून के बाद स्थिति में उत्तरोत्तर सुधार आएगा लेकिन पूर्णत: इस संकट से मुक्ति के लिए अभी विश्व को थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी।

(निवेदन- उपर्युक्त विश्लेषण प्रश्नकुण्डली आधारित है जो सामान्य जिज्ञासा के समाधान के लिए दिया गया है। हम "वेबदुनिया" के पाठकों से निवेदन करते हैं कि वे अपने स्वास्थ्य का समुचित ध्यान रखें एवं "कोरोना" संक्रमण से बचने के लिए की जा रही व्यवस्थाओं में स्थानीय प्रशासन को अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करें।)

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


रविवार, 23 फ़रवरी 2020

आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है।


   


सियासत की जाने कैसी ये आग है,
आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है।

उन्हें सिखा रहे हो उसूल मुहब्बत के
नफ़रत से जिनके चूल्हों में आग है

ए गुमराह मुंसिफ़ पाकीज़ा ना तेरा दामन
मुफ़लिसों के लहू का उस पर भी दाग है

उनसे शिकायत कैसी वो गैर जो ठहरे
मुल्क जला रहे जो घर के चिराग हैं

गाफ़िल नहीं अजी हम खूब समझते हैं
तख्त-ओ-ताज की सारी ये दौड़ भाग है।

पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

(शाहीन-बाज/शिकारी पक्षी, उसूल-सिद्धान्त, मुंसिफ़-न्यायाधीश, मुफ़लिस-गरीब/बेसहारा, गाफ़िल-विमुख/लापरवाह)