रविवार, 23 फ़रवरी 2020

आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है।


   


सियासत की जाने कैसी ये आग है,
आज़ाद हैशाहीन’, कैद में बाग है।

उन्हें सिखा रहे हो उसूल मुहब्बत के
नफ़रत से जिनके चूल्हों में आग है

गुमराह मुंसिफ़ पाकीज़ा ना तेरा दामन
मुफ़लिसों के लहू का उस पर भी दाग है

उनसे शिकायत कैसी वो गैर जो ठहरे
मुल्क जला रहे जो घर के चिराग हैं

गाफ़िल नहीं अजी हम खूब समझते हैं
तख्त--ताज की सारी ये दौड़ भाग है।

पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

(शाहीन-बाज/शिकारी पक्षी, उसूल-सिद्धान्त, मुंसिफ़-न्यायाधीश, मुफ़लिस-गरीब/बेसहारा, गाफ़िल-विमुख/लापरवाह)

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