मंगलवार, 1 जनवरी 2019

जीवित शहीद: श्रीकृष्ण सरल

शताब्दी जयन्ती: 1-01-2019

                    "नहीं महाकवि और न कवि ही लोगों द्वारा कहलाऊँ,
                   'सरल' शहीदों का चारण था कहकर याद किया जाऊँ।"
यह अभिलाषा थी राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल" की। क्या.....कौन श्रीकृष्ण सरल? यह हमारी विडम्बना ही है कि जिस व्यक्ति ने सारा जीवन सिर्फ़ और सिर्फ़ क्रान्तिकारियों के योगदान को हम तक पहुँचाने के लिए लगा दिया। जिसने अपने परिवार की खुशियाँ, पत्नी के गहने यहाँ तक कि स्वयँ की जान भी दाँव पर लगा दी, उसका आज हम परिचय पूछते हैं। हालाँकि वो किसी परिचय का मोहताज नहीं, वह तो स्वयँ परिचय है राष्ट्रनिष्ठा का, देशप्रेम का, श्रद्धा और समर्पण का। सरल जी का कहना था कि मैं क्रान्तिकारियों पर इसलिए लिखता हूँ जिससे आने वाली पीढ़ियों को कृतघ्न ना कहा जाए।‍"जीवित-शहीद" की उपाधि से अलँकृतश्रीकृष्ण "सरल" सिर्फ नाम के ही सरल नहीं थे, सरलता उनका स्वभाव थी। राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण "सरल"  का जन्म 1 जनवरी 1919 को म.प्र. के गुना जिले के अशोकनगर में हुआ था। उनके पिता का नाम पं. भगवती प्रसाद बिरथरे और माता का नाम यमुना देवी था। जब सरलजी पाँच वर्ष के थे तभी उनकी माता का देहान्त हो गया था। आपने लगभग दस वर्ष की उम्र में काव्य-लेखन प्रारम्भ कर दिया था। प्रारम्भ से ही आपकी रूचि राष्ट्रीय लेखन एवं क्रान्तिकारियों के जीवन में रही। आपने निजी व्यय से करीब बीस लाख किलोमीटर की यात्रा क्रान्तिकारियों के जीवन को खँगालने के उद्देश्य से की। 15 महाकाव्यों का लेखन करने वाले इस महान कवि ने अपने निजी व्यय से 125 पुस्तकें,45 काव्य-ग्रन्थ,4 खण्ड काव्य,31 काव्य संकलन,8 उपन्यास का प्रकाशन किया। शासन की ओर से उन्हें ना तो कोई सहयोग मिला और न ही शासन ने उनके लिखे साहित्य के विक्रय में कोई रूचि दिखाई। सौतेले व्यवहार में समाज के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले पत्रकारिता जगत ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। शायद श्रीकृष्ण सरल तथाकथित समालोचकों एवं पत्रकारों की दृष्टि में महान साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आते। ठीक भी है, ऐसे कार्य महान व्यक्ति नहीं अपितु दीवाने ही कर पाते हैं। देशभक्ति और भारतमाता के सपूतों के प्रति श्रद्धावनत् "सरल"जी से बड़ा दीवाना और कहाँ? निश्चय ही सरल जी की काव्य यात्रा एक दीवानापन था; वैसा ही दीवानापन जैसा कबीर में था, मीरा में था और उसे समझने और महसूस करने के लिए बुद्धि से अधिक ह्रदय की आवश्यकता होती है। आज ह्रदय पाषाण होते जा रहे हैं। अगर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देशप्रेम;बलिदान;राष्ट्रनिष्ठा ये बातें सिर्फ पागलपन का पर्याय बनकर रह जाएँगी और इनके लिए कोई अपने प्राण दाँव पर नहीं लगाएगा। सरल जी की यही चिन्ता उनकी काव्य-यात्रा में सर्वत्र परिलक्षित होती है। वे कहते हैं-
                   "पूजे ना गए शहीद तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
                   फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?"

श्रीकृष्ण सरल जी के बारे में मत्तवपूर्ण बातें-
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1. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी ने अपना अधिकांश लेखन केवल क्रान्तिकारियों को केन्द्रित कर ही किया।
2. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी ने अपने निजी व्यय 10 से अधिक महाकाव्य, 4 खण्ड-काव्य, 125 पुस्तकें,
45 काव्य-खण्ड, 31 काव्य-संकलन एवं 8 उपन्यासों का प्रकाशन किया।
3. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी ने अपने लेखन हेतु प्रामणिक तथ्य संकलित करने के उद्देश्य से निजी व्यय से 10 देशों लगभग 10 लाख किमी से अधिक की यात्राएं की।
4. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी को अपनी स्वनाम-धन्य कृति "क्रान्ति-गंगा" को लिखने में 27 वर्षों का समय लगा।
5. राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी को अपनी कृतियों महाकाव्यों के प्रकाशन हेतु अपनी सम्पत्ति तक बेचनी पड़ी।
6. शहीद भगतसिंह पर लिके महाकाव्य का विमोचन करने हेतु शहीदे-आज़म भगतसिंह की माताजी स्वयं श्रीकृष्ण सरल जी के आमन्त्रण पर उपस्थित हुई थीं।
7. जीवन पर्यन्त क्रान्तिकारियों पर अपनी लेखनी चलाने वाले राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी के प्रति सरकारों शासन का व्यवहार अधिकतर उपेक्षापूर्ण ही रहा।

श्रीकृष्ण सरल जी के बारे में विद्वानों का कहना है-
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1. “श्री सरल जीवित शहीद हैं। उनकी साहित्य-साधना तपस्या कोटि की है।
-महान क्रान्तिकारी पं. परमानन्द
2. “सरल जी का लेखन ऐतिहासिक दस्तावेज से कम नहीं है, वह नेताजी सुभाष और आजाद हिन्द फौज का स्थायी स्मारक सिद्ध होगा।
-कर्नल जी.एस.ढिल्लन, आजाद हिन्द फौज
3सरल साहब ने इतनी साहित्यिक ऊंचाई प्राप्त कर ली है कि उन्हें कोई भी अलंकरण छोटा ही पड़ेगा।
-भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जैलसिंह जी
4. “सरल जी के लेखन का मूल्यांकन तो इतिहास ही कर सकेगा। हम तो केवल उनकी वन्दना कर सकते हैं।
-तत्कालीन सांसद श्री शंकरदयाल सिंह
5. “भारतवर्ष में शहीदों का समुचित श्राद्ध यदि किसी ने किया है; तो वह किया है कविवर श्रीकृष्ण सरल ने।
-पं. बनारसीदास चतुर्वेदी

-पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पादक, “सरल-चेतना

रविवार, 23 दिसंबर 2018

कुम्भ 2019


नववर्ष 2019 के आगमन के साथ ही सनातन धर्म के महापर्व कुम्भ का आगाज़ भी हो जाएगा। वर्ष 2019 में कुम्भ महापर्व का प्रथम शाही स्नान मकर सँक्रान्ति को होने जा रहा है। जिसमें देश के प्रमुख साधु-सन्तों के साथ-साथ देश-विदेश से आए श्रद्धालुगण "प्रयागराज" स्थित त्रिवेणी में स्नान कर पुण्य अर्जित करेंगे। वर्ष 2019 में होने जा रहे कुम्भ में 3 शाही-स्नान के अतिरिक्त 5 पर्व- स्नान भी होंगे।
कुम्भ आयोजन का महत्त्व-
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कुम्भ के आयोजन में नवग्रहों में सूर्य, चन्द्र, गुरु और शनि की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए इन्हीं ग्रहों की गोचर में विशेष स्थितिवश "कुम्भ" का आयोजन होता है। सागर मथन से जब अमृत कलश प्राप्त हुआ तब अमृत-घट को लेकर देवताओं और असुरों में खींचतान प्रारम्भ हो गयी। इसमें अमृत कलश से छलक कर अमृत की बूद जहा पर गिरी वहापर "कुम्भ" का आयोजन किया जाने लगा। "कुम्भ" का आयोजन हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन व नासिक में किया जाता है। अमृत की छीनाछपटी के समय चन्द्रमा ने अमृत को बहने से बचाया। गुरू ने कलश को छुपा कर रखा। सूर्य देव ने कलश को फूटने से बचाया और शनि ने इन्द्र के कोप से रक्षा की। चूकि इन चार ग्रहों के सहयोग से ही अमृत की रक्षा हुई थी इसलिए जब भी इन ग्रहों का राशि-अनुसार विशेष सयोग होता है तब "कुम्भ" का आयोजन होता है। "कुम्भ" का प्रारम्भ आदि शंकराचार्य ने किया था। "कुम्भ" का व्यावहारिक पक्ष देखें तो प्राचीन काल में साधु-संन्यासी मेले इत्यादि जैसे मनोरजक कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लेते थे और समस्त साधु-संन्यासियों का एक ही स्थान पर दर्शन कर पाना आम नागरिकों के लिए भी सम्भव नहीं था किंचित इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर "कुम्भ" मेले की परम्परा का प्रारम्भ हुआ। "कुम्भ" में हमारे देश के प्रसिद्ध अखाड़ों का शाही-स्नान आकर्षण का प्रमुख केन्द्र होता है। ऐसी मान्यता है कि "कुम्भ-स्नान" करने से व्यक्ति आवागमन के दुष्चक्र से छूटकर मोक्ष को प्राप्त करता है। 

आईए जानते हैं शाही व पर्व स्नान की तिथियाँ -
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1. प्रथम शाही स्नान- 15 जनवरी 2019- मकर संक्रान्ति
2. द्वितीय शाही स्नान- 4 फरवरी 2019- मौनी अमावस्या
3. तृतीय शाही स्नान- 10 फरवरी 2019- वसंत पंचमी

पर्व स्नान-
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1. 17 जनवरी 2019- पौष एकादशी
2. 21 जनवरी 2019- पौष पूर्णिमा
3. 16 फरवरी 2019- माघी एकादशी
4. 19 फरवरी 2019- माघी पूर्णिमा
5. 4 मार्च 2019- महाशिवरात्रि

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

सत्य हुआ भविष्यसंकेत

हाल ही में सम्पन्न हुए पांच राज्यों में हुए विधानसभाओं के चुनावों राहुल गांधी के नेतृत्व को मिली सफ़लता की भविष्यवाणी हमारे द्वारा आज से 1 वर्ष पूर्व ही कर दी गई थी। हमारा यह आलेख दिनांक 16 दिसम्बर 2017 को रायपुर (छ्ग) के प्रतिष्ठित समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था-

कैसा रहेगा नई सरकारों का कार्यकाल..!


हाल ही सम्पन्न हुए पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस आशातीत सफ़लता प्राप्त कर तीन प्रमुख राज्यों में अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई है। मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में तो कांग्रेस ने 15 साल बाद सत्ता में वापसी की है। अब इन तीनों प्रदेशों के निवासियों को इस बात को लेकर उत्सुकता है कि आखिर नई सरकार का कार्यकाल कैसा रहेगा! क्या होगी नई सरकार के लिए चुनौतियां? हमने "वेबदुनिया" के पाठकों के लिए तीन राज्यों में गठित हुई नवीन सरकारों के शपथग्रहण के समय को आधार बनाकर इस प्रश्न का समाधान देने का प्रयास किया है-
1. मध्यप्रदेश-
मध्यप्रदेश सरकार के मुखिया श्री कमलनाथ ने मेष लग्न में शपथग्रहण किया है। मेष एक चर लग्न है। शपथग्रहण के समय मेष राशि का स्वामी मंगल लाभ भाव में स्थित था। चतुर्थ भाव में राहु स्थित है। वहीं सत्ता व कर्मक्षेत्र के अधिपति शनि नवम भाव में अपने नैसर्गिक शत्रु सूर्य के साथ स्थित हैं। धनेश शुक्र स्वराशिस्थ होकर सप्तम भाव में स्थित हैं। इन ग्रहस्थितियों के आधार पर यह संकेत मिल रहा है कि आने वाले वर्षों में सरकार को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। मार्च 2020 के बाद सरकार को जन-आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। इस अवधि में सरकार की लोकप्रियता में तेजी से कमी आएगी। इस अवधि में सरकार को अस्थिर करने के प्रयास होंगे। जिनसे निपटना सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती होगा। मार्च 2020 से मार्च 2021 के मध्य सरकार को भारी अन्तर्कलह से जूझना होगा। अक्टूबर 2020 के बाद सरकार के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने की भी संभावना है। चूंकि मेष एक चर लग्न है इसलिए सरकार के लिए अपनी स्थिरता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। धनेश का स्वराशिस्थ होना सरकार को आर्थिक मोर्चे पर कुछ सफ़लता का संकेत दे रहा है। किन्तु लाभेश व आयेश का अपने नैसर्गिक शत्रु के साथ युतिकारक होना सरकार को नए वित्तीय संसाधन में जुटाने में बड़ा अवरोध खड़ा करेगा। वर्ष 2021 से सरकार की लोकप्रियता में निरन्तर कमी आएगी एवं उसे जन-आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। लग्नेश के लाभ भाव में स्थित होने के कारण सरकार हर प्रतिकूल परिस्थिति से निपटने में सफ़ल होगी। सरकार के लिए मार्च 2020 से मार्च 2021 की अवधि बेहद चुनौतीपूर्ण रहेगी यदि इस अवधि की चुनौतियों पर सफ़लतापूर्वक विजय प्राप्त कर ली जाती है तो सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में सफ़ल होगी।
2. छत्तीसगढ़-
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने मिथुन लग्न में शपथ ली है। मिथुन एक द्विस्वभाव लग्न है। शपथग्रहण के समय मिथुन राशि का स्वामी बुध छठे भाव स्थित था। मिथुन लग्न में बुध चतुर्थेश अर्थात् जनता के कारक भी होते हैं। बुध पर राहु का दृष्टि प्रभाव भी है। कर्मक्षेत्र व सत्ता का तात्कालिक कारक गुरु भी छठे भाव में स्थित है एवं गुरू पर भी राहु का दृष्टि प्रभाव है। इन ग्रहस्थितियों के आधार पर यह संकेत मिल रहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार के लिए अपना कार्यकाल पूरा करना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। वर्ष 2020 में सरकार को गंभीर अन्तर्विरोध का सामना करना पड़ेगा। इस अवधि में सरकार के मुखिया व नेतृत्व के प्रति अन्तर्कलह सामने आएगी। सत्तारुढ़ के दल के अन्दर ही नेतृत्व परिवर्तन की मांग ज़ोर पकड़ेगी। मिथुन लग्न के स्वभाव एवं विंशोत्तरी दशाओं के आलोक में वर्ष 2020-2023 के मध्य राज्य की सरकार में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। धन भाव में राहु का स्थित होना सरकार के लिए वित्तीय क्षेत्र में कठिनाईयों का संकेत कर रहा है। सरकार को आर्थिक मोर्चे पर गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। वर्ष 2020 में सरकार की लोकप्रियता में कमी आएगी। इस अवधि में सरकार के प्रति विपक्ष आक्रामक रहेगा। सरकार को जन-आक्रोश का सामना करना पड़ेगा। लग्नेश की स्थिति व कर्मक्षेत्र पर क्रूर ग्रहों के प्रभाव के कारण सरकार को अन्तर्विरोध के चलते अपना स्थायित्व बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। यदि सरकार इन चुनौतियों से सफ़लतापूर्वक निपट लेती है तो सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में सफ़ल रहेगी। 
3. राजस्थान-
राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गेहलोत ने कुम्भ लग्न में शपथग्रहण की थी। कुम्भ एक स्थिर लग्न है। कुम्भ लग्न का स्वामी शनि सत्ता का नैसर्गिक कारक होता है। शपथग्रहण के समय लग्नेश शनि लाभ भाव में स्थित थे। यह एक बहुत अनुकूल स्थिति है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिल रहा कि राजस्थान सरकार अपना कार्यकाल बड़ी सफ़लता सहजता के साथ पूर्ण करेगी। सत्ता कर्मक्षेत्र के अधिपति का  लग्नस्थ होना सरकार को स्थायित्व प्रदान करेगा। धनेश लाभेश का केन्द्रस्थ होना सरकार को आर्थिक मोर्चे पर सफ़लता प्रदान करेगा। सरकार अपने विकास कार्यों को गति प्रदान करने में कामयाब होगी। जनता के तात्कालिक कारक चर्तुर्थेश शुक्र का स्वराशिस्थ होकर त्रिकोण भाव में स्थित होना सरकार के लोकप्रिय होने का संकेत दे रहा है। सरकार को जनता का प्रेम सहयोग प्राप्त होगा। राहु का छठे भाव में स्थित होने के कारण सरकार अपने विरोधियों से कुशलतापूर्वक निपटने में सक्षम होगी एवं सरकार पर विपक्ष हावी नहीं हो पाएगा। अन्तिम निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि राजस्थान सरकार शेष दो सरकारों की तुलना में अधिक सहजता सफ़लता के साथ अपना कार्यकाल पूर्ण करेगी।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com