मंगलवार, 14 अगस्त 2018

अन्तर्मन


घनघोर अंधेरा छाये जब
कोई राह नज़र ना आये जब
कोई तुमको फिर बहकाये जब
इस बात पे थोड़ी देर तलक
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अन्तर्मन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अन्तर्मन सच बोलेगा...

जब लम्हा-लम्हा 'आरी' हो
और ग़म खुशियों पे भारी हो
दिल मुश्किल में जब पड़ जाये
कोई तीर सोच का गड़ जाये
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अन्तर्मन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अन्तर्मन सच बोलेगा..

जब सच-झूठ में फर्क ना हो
जब गलत-सही में घिर जाओ
तुम नज़र में अपनी गिर जाओ
इस बात पे थोड़ी देर तलक
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अन्तर्मन की सुन लेना
मुमकिन है हम-तुम झूठ कहें
पर अन्तर्मन सच बोलेगा...

ये जीवन एक छाया है
दुख, दर्द, मुसीबत माया है
दुनिया की भीड़ में खोने लगो
तुम खुद से दूर होने लगो
तुम आँखें अपनी बंद करना
और अन्तर्मन की सुन लेना
मुमकिन है हम तुम झूठ कहें
पर अन्तर्मन सच बोलेगा ...।

-साभार (वाट्स अप)

रविवार, 12 अगस्त 2018

क्या 15 अगस्त ही है स्वतन्त्रता दिवस..!


 क्या आप जानते हैं भारत को स्वतंत्रता कब प्राप्त हुई? आप कहेंगे- "हां", 15 अगस्त 1947 को। यदि मैं कहूं कि आपका जवाब गलत है, तो आप चौंक जाएंगे। लेकिन इतिहास बताता है भारत की आजादी का शंखनाद 30 दिसम्बर सन 1943 को अंडमान-निकोबार से हो गया था। 30 दिसम्बर सन 1943 के ही दिन नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में सर्वप्रथम आजादी की घोषणा करते हुए तिरंगा फ़हराया था। यह भारत की आज़ादी का शंखनाद था। विडम्बना है कि कांग्रेसी शासन ने विद्वेषता के चलते इस अति-महत्त्वपूर्ण तथ्य को नज़र अंदाज़ किया।
"21 अक्टूबर 1943 को सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपींस, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा आक्रमण किया और कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त भी करा लिया।"
-(साभार: विश्व ज्ञानकोश)

प्रस्तुति: पं. हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 7 अगस्त 2018

एक थी ’सहमत’


जिस प्रकार आतंक का कोई धर्म; कोई मज़हब नहीं होता, उसी प्रकार देशभक्ति और वतनपरस्ती का भी कोई धर्म; कोई मज़हब नहीं होता। इतिहास साक्षी है ऐसी हुतात्माओं का जिन्होंने जात-पात और पँथ से ऊपर उठकर मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। ऐसी ही एक क्रान्तिकारी थी-"सहमत"। "सहमत" उसका असली नाम नहीं है, उसका वास्तविक नाम शायद हम देशवासियों को कभी पता भी ना चले। लेकिन हम भारतवासियों के लिए उसके नाम से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण उसकी शख़्सियत व उसके कार्य हैं। वह एक मुस्लिम घर में पैदा हुई और पली-बढ़ी। उसके पिता भारत के लिए पाकिस्तान की जासूसी करते थे। पिता के ही नक्शे-कदम पर चलकर उसने वतनपरस्ती को ही अपना ईमान बनाया और अपने प्राणों की परवाह किए बगैर पाकिस्तान की जासूसी की। 21 वर्षीय इस देशभक्त क्रान्तिकारी युवती की जासूसी के कारण ही भारत अपनी नौसेना के एकमात्र एयरक्राफ़्ट केरियर जहाज ...विक्रान्त को पाकिस्तानी हमले से बचा पाया। पाकिस्तान की जासूसी करते हुए पकड़े जाने का अन्देशा होने पर उस बहादुर युवती ने ना केवल दो हत्याएँ की वरन् अपनी सूझबूझ से सफलतापूर्वक अपने काम को अंजाम देकर भारत वापस लौट आई। इस युवती के जीवन पर हाल ही में मेघना गुलज़ार ने "राज़ी" नामक फ़िल्म का निर्माण किया है। वर्ष 2008 में इस युवती पर भारतीय नौसेना में लेफ़्टिनेंट कर्नल रहे हरिन्दर एस. सिक्का की लिखी पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसका नाम है-"कालिंग सहमत"। "सहमत" ने भारत लौटकर अपनी बाकी ज़िंदगी पंजाब के एक छोटे से गाँव मलेर कोटला में बिताई। जहाँ वो ग्रामीणों के विकास के लिए अनवरत् कार्य करती रहीं। यहां तक कि उन्होंने अपने जीवन पर लिखी किताब व अपने ऊपर बनी फ़िल्म से मिले धन को समाज कल्याण के लिए दान कर दिया। इस देशभक्त युवती के बारे में नौसेना में रहे लेफ़्टिनेंट कर्नल (से.नि.) हरिन्दर एस. सिक्का कहते हैं-"एक पूर्व सैनिक होने के बावजूद मुझे यह स्वीकारते हुए गर्व है कि देशभक्ति का सच्चा अर्थ मैंने "सहमत" से जाना है।" अपनी जासूसी को सफल अंजाम तक पहुंचाने के उद्देश्य से की गई दो हत्याओं के कारण "सहमत" मानसिक विषाद से ग्रस्त हो गई थी। हाल ही में इस क्रान्तिकारी युवती का मलेर कोटला में निधन हो गया।
समस्त भारतवासियों की ओर से मैं इस देशभक्त क्रान्तिकारी को सादर नमन करता हूँ।
जय हिन्द...!

-प्रस्तुति: पं. हेमन्त रिछारिया

शिव को क्या व कैसे चढ़ाएं


हमारे सनातन धर्म की पूजा पद्धति में पुष्प अर्पण का विशेष महत्त्व है। फ़िर चाहे वे पुष्प माला के रूप में हों, अर्चन के रूप में हों या पुष्पांजलि के रूप में। वैसे तो पूर्ण श्रद्धाभाव से अर्पित किए गए
पुष्प ईश्वर स्वीकार कर लेते हैं किन्तु हमारे शास्त्रों में किस देव को कौन से पुष्प चढ़ाए जाएं यह निर्देशित किया गया है। साथ ही साथ यह भी बताया गया है कि पुष्प चढ़ाने की सही विधि कौन सी है। आईए इस पवित्र श्रावण में मास में हम जानते हैं कि चन्द्रमौलिश्वर भगवान शिव को कौन से पुष्प अर्पित किए जाने चाहिए-
भगवान को शिव को अर्पित किए जाने वाले पुष्प-
भगवान शिव को श्वेतार्क मदार अर्थात् सफ़ेद अकाव एवं बिल्वपत्र बहुत प्रिय है। श्रावण मास में भगवान शिव को सफ़ेद अकाव के फूल की माला अर्पित करने से विशेष लाभ होता है। इसके अतिरिक्त भगवान शंकर को नीला अकाव, कनेर, धतूरे का पुष्प, शिव कटास, अपराजिता के पुष्प, शमी पुष्प, शंखपुष्पी, चमेली, नागकेसर, नागचम्पा, खस, तगर्म गूलर, पलाशम केसर, कमल आदि पुष्प भी प्रिय हैं।
शिवजी को नहीं चढाए जाते ये पुष्प-
शिवजी की पूजा में कुछ पुष्पों का चढ़ाया जाना शास्त्रसम्मत नहीं है। वे हैं- कदम्ब, केवड़ा, केतकी, शिरीष, अनार, जूही आदि।
पुष्प अर्पण करने की सही विधि-
किसी भी देवी-देवता को पुष्प अर्पित करने की एक खास विधि होती है। शास्त्रानुसार उसी विधि अनुसार देवी-देवताओं को पुष्प अर्पण करना चाहिए। पुष्प सदैव जिस अवस्था में खिलते हैं उसी अवस्था में अर्पित किए जाने चाहिए अर्थात् पुष्प का मुख आकाश की ओर होना चाहिए। वहीं दूर्वा सदैव अपने ओर करके अर्पित की जानी चाहिए एवं बिल्व पत्र सदैव नीचे मुख रखते हुए चढ़ाना चाहिए। पुष्प अर्पित करने से पूर्व उन्हें सूंघना नहीं चाहिए। कीड़े वाले पुष्प भगवान को अर्पित नहीं किए जाते। जिन पुष्पों में पैर छू गया हो ऐसे पुष्प भी भगवान को अर्पित नहीं किए जाते। भगवान को बासी पुष्प अर्पित नहीं किए जाते। शास्त्रानुसार माली के घर के फूलों को कभी बासी नहीं माना जाता, अत: माली से फूल लेते समय बासी पुष्प का विचार नहीं करना चाहिए।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

ऐसे मनाएं नागपंचमी


हमारे सनातन धर्म में ईश्वर को समग्ररूपेण देखने की परम्परा है। इसी वजह से हमने समस्त जड़-चेतन में परमात्मा को प्रत्यक्ष मानकर उनकी आराधना की है। यही कारण है कि जब हम ईश्वर के चैतन्य स्वरूप की बात करते हैं तो उसमें केवल मनुष्य ही नहीं अपितु समस्त पशु-पक्षियों का भी समावेश हो जाता है। हमारी धार्मिक परम्परा में विलग-विलग अवसर पर पशु-पक्षियों के दर्शन व पूजा का विधान है। इसी क्रम में "नागपंचमी" का पर्व भी मनाया जाता है। नाग को शास्त्रों में काल(मृत्यु) का प्रत्यक्ष स्वरूप माना गया है। वहीं व्यावहारिक रूप में इसे वन्य जीव संरक्षण से जोड़कर देखा जा सकता है। आईए जानते हैं कि "नागपंचमी" कैसी मनाई जानी चाहिए-
-नागपंचमी के दिन प्रात: काल स्नान करने के उपरान्त शुद्ध होकर यथाशक्ति (स्वर्ण, रजत, ताम्र) दो नाग की प्रतिष्ठा कर उनका धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पंचोपचार अथवा षोडषोपचार पूजन करना चाहिए। तत्पश्चात् "सर्पसूक्त" से प्रतिष्ठित नागों का दुग्धाभिषेक करना चाहिए। अभिषेक के पश्चात् हाथ जोड़कर निम्न प्रार्थना करनी चाहिए।
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायंकाले पठेन्नित्यं प्रात: काले विशेषत:।
तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्॥
उक्त प्रार्थना करने के बाद पूर्ण श्रद्धाभाव से प्रणाम कर एक नाग को किसी भी शिव-मन्दिर में शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए तथा दूसरे नाग को दूध से भरे दोने (पात्र) में रखकर किसी पवित्र नदी या बहते जल में निम्न विसर्जन प्रार्थना से प्रवाहित करना चाहिए।
विसर्जन प्रार्थना-
सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता:॥
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।
ये च वापीतड़ागेषु तेषु सर्वेषु वै नम"॥

जिन जातकों की जन्मपत्रिका में "कालसर्प" दोष हो उन जातकों को "नागपंचमी" वाले दिन उक्त पूजा अवश्य करनी चाहिए। नागपंचमी वाले दिन "कालसर्प" दोष निवारण पूजा करने से विशेष लाभ होता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

सोमवार, 6 अगस्त 2018

क्यों लिखते हैं "आस्तिक मुनि की दुहाई"


हमारे हिन्दू समाज में आज भी कई ऐसी पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं जिनसे व्यक्ति अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है। सर्प का नाम सुनते ही जनमानस में भयंकर भय व्याप्त हो जाता है। सर्प को काल(मृत्यु) का प्रत्यक्ष स्वरूप माना जाता है। सर्पदंश होने पर आज भी ग्रामीण अंचल में झाड़-फ़ूंक आदि सहारा लिया जाता है जो सर्वथा गलत है। सर्पदंश जैसी विकट परिस्थिति में झाड़-फ़ूंक व टोने-टोटके करने के स्थान पर शीघ्रातिशीघ्र चिकित्सक के पास जाना चाहिए। बहरहाल, आज हम प्राचीन समय में प्रचलित एक परम्परा के बारे में अपने पाठकों को अवगत कराएंगे। आपने यदा-कदा घरों के बाहरी दीवार "आस्तिक मुनि की दुहाई" नामक वाक्य लिखा देखा होगा। ग्रामीण अंचलों में इस वाक्य को घर की बाहरी दीवार पर लिखा हुआ देखना आम बात है। लेकिन क्या आप जानते हैं इस वाक्य को घर के बाहरी दीवारों पर क्यों लिखा जाता है! यदि नहीं, तो आज हम आपको इसकी पूर्ण जानकारी देंगे।
"आस्तिक मुनि की दुहाई" नामक वाक्य घर की बाहरी दीवारों पर सर्प से सुरक्षा के लिए लिखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस वाक्य को घर की दीवार पर लिखने से उस घर में सर्प प्रवेश नहीं करता। इस मान्यता के पीछे एक पौराणिक कथा है।
-कलियुग के प्रारम्भ में जब ऋषि पुत्र के श्राप के कारण राजा परीक्षित को तक्षक नाग ने डस लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई। जब यह बात राजा परीक्षित के पुत्र जन्मेजय को पता चली तो उन्होंने क्रुद्ध होकर अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए इस संसार से समस्त नाग जाति का संहार करने के लिए "सर्पेष्टि यज्ञ" का आयोजन किया। इस "सर्पेष्टि यज्ञ" के प्रभाव के कारण संसार के कोने-कोने से नाग व सर्प स्वयं ही आकर यज्ञाग्नि में भस्म होने लगे। इस प्रकार नाग जाति को समूल नष्ट होते देख नागों ने आस्तिक मुनि से जाकर अपने संरक्षण हेतु प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर आस्तिक मुनि ने नागों को बचाने से पूर्व उनसे एक वचन लिया कि जिस स्थान पर नाग उनका नाम लिखा देखेंगे उस स्थान में प्रवेश नहीं करेंगे और उस स्थान से सौ कोस दूर रहेंगे। नागों ने अपने संरक्षण हेतु आस्तिक मुनि को जब यह वचन दिया तब आस्तिक मुनि ने जन्मेजय को समझाया। आस्तिक मुनि के कहने पर जन्मेजय ने "सर्पेष्टि यज्ञ" बन्द कर दिया। इस प्रकार आस्तिक मुनि के हस्तक्षेप के कारण नाग जाति का आसन्न संहार रुक गया। इस कथा के अनुसार ही ऐसी मान्यता प्रचलित है कि आस्तिक मुनि को दिए वचन को निभाने के लिए आज भी सर्प उस स्थान में प्रवेश नहीं करते जहां आस्तिक मुनि का नाम लिखा होता है। इस मान्यता के कारण ही अधिकांश लोग सर्प से सुरक्षा के लिए अपने घर की बाहरी दीवार पर लिखते हैं-"आस्तिक मुनि की दुहाई।"

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

बुधवार, 1 अगस्त 2018

ब्राह्मणों की आठ श्रेणियाँ


सनातन धर्मानुसार ब्राह्मणों को इस धरती का देवता माना गया है। वहीं शास्त्रानुसार ब्राह्मण भगवान के मुख कहे जाते हैं। ब्राह्मण सदैव वन्दनीय है। ब्राह्मणों का अपमान ब्रह्म दोष का कारक होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्राह्मणों की भी श्रीणियाँ होती हैं। स्कँद पुराण के अनुसार ब्राह्मणों की आठ श्रेणियाँ निर्धारित की गई हैं। आज हम पाठकों के लिए इन आठ श्रेणियों का वर्णन करेंगे-
1. द्विज- जनेऊ धारण करने वाला ब्राह्मण "द्विज" कहलाता है।
2. विप्र- वेद का अध्ययन करने वाला वेदपाठी ब्राह्मण "विप्र" कहलाता है।
3. श्रोत्रिय- जो ब्राह्मण वेद की किसी एक शाखा का छ: वेदांगों सहित अध्ययन कर ज्ञान प्राप्त करता है उसे "श्रोतिय" कहते हैं।
4. अनुचान- जो ब्राह्मण चारों वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है उसे "अनुचान" कहा जाता है।
5. ध्रूण- जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र व स्वाध्याय करता है उसे "ध्रूण" ब्राह्मण कहते हैं।
6. ऋषिकल्प- जो ब्राह्मण अपनी इन्द्रियों को अपने वश में करके जितेन्द्रिय हो जाता है उसे "ऋषिकल्प" कहते हैं।
7. ऋषि- जो ब्राह्मण श्राप व वरदान देने में समर्थ होता है उसे "ऋषि" कहते हैं।
8. मुनि- जो ब्राह्मण काम-क्रोध से रहित सब तत्वों का ज्ञाता होता है और जो समस्त जड़-चेतन में समभाव रखता हो उसे "मुनि" कहा जाता है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
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