सोमवार, 29 जनवरी 2018

'ग्रहण' का रहस्य


31 जनवरी को अँग्रेजी नववर्ष का पहला चन्द्रग्रहण है। ग्रहण से आप सभी परिचित हैं लेकिन क्या आप ग्रहण को जानते हैं! आज हम ग्रहण से जुड़ी कुछ बद्धमूल धारणाओं की चर्चा करेंगे। ग्रहण से जुड़ी जो सबसे बड़ी धारणा है, वह है "सूतक"। ग्रहण के "सूतक" के नाम पर लोगों का घर से बाहर आना-जाना अवरुद्ध कर दिया जाता है। यहाँ तक कि सूतक के कारण मन्दिरों के भी पट बन्द कर दिए जाते हैं। ग्रहणकाल में भोजन पकाना एवं भोजन करना वर्जित माना गया है। ग्रहण के मोक्ष अर्थात् ग्रहणकाल के समाप्त होते ही स्नान करने की परम्परा है। यहाँ हम स्पष्ट कर दें कि इन सभी परम्पराओं के पीछे मूल कारण तो वैज्ञानिक है, शेष उस कारण से होने वाले दुष्प्रभावों को रोकने के उद्देश्य से बनाए गए देश-काल-परिस्थित अनुसार लोक नियम। वैज्ञानिक कारण तो स्थिर होते हैं लेकिन देश-काल-परिस्थिति अनुसार बनाए गए नियमों को हमें वर्तमान काल के अनुसार अद्यतन (अपडेट) करना आवश्यक होता है, तभी वे जनसामान्य के द्वारा मान्य होते हैं और उनका अस्तित्व भी बना रह पाता है अन्यथा वे परिवर्तन की भेंट चढ़ ध्वस्त हो जाते हैं। किसी भी नियम को स्थापित करने के पीछे मुख्य रूप से दो बातें प्रभावी होती हैं, पहली-भय और दूसरी-लोभ; लालच। इन दो बातों को विधिवत् प्रचारित कर आप किसी भी नियम को समाज में बड़ी सुगमता से स्थापित कर सकते हैं। धर्म में इन दोनों बातों का समावेश होता है। अत: हमारे समाज के तत्कालीन नीति-निर्धारकों ने वैज्ञानिक कारणों से होने वाले दुष्प्रभावों से जन-सामान्य को बचाने के उद्देश्य से अधिकतर धर्म का सहारा लिया। जिससे यह दुष्प्रभाव आम जन को प्रभावित ना कर सकें किन्तु आज के सूचना और प्रौद्योगिकी वाले युग में जब हम विज्ञान से भलीभाँति परिचित हैं तब इन बातों को समझाने हेतु धर्म का आधार लेकर आसानी से ग्राह्य ना हो सकने वाली बेतुकी दलीलें देना सर्वथा अनुचित सा प्रतीत होता है। आज की युवा पीढ़ी रुढ़बद्ध नियमों को स्वीकार करने में झिझकती है। यही बात ग्रहण से सन्दर्भ में शत-प्रतिशत लागू होती है। आज की पीढ़ी को  "सूतक" के स्थान पर सीधे-सीधे यह बताना अधिक कारगर है कि ग्रहण के दौरान चन्द्र व सूर्य से कुछ ऐसी किरणें उत्सर्जित होती हैं जिनके सम्पर्क में आ जाने से हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और यदि ना चाहते हुए भी इन किरणों से सम्पर्क हो जाए तो स्नान करके इनके दुष्प्रभाव को समाप्त कर देना चाहिए। वर्तमान समय में "ग्रहण" का यही अर्थ अधिक स्वीकार व मान्य प्रतीत होता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 28 जनवरी 2018

ग़ज़ल

चित्र-साभार

ग़ज़ल
--------
उलझिए मत; उलझाइए मत,
दिल को बारहा समझाइए मत

फैलेगी घर का छप्पर फ़ूँक डालेगी,
चिंगारियों को बेतहाशा सुलगाईए मत

वो थककर ज़मीं पर ना लेट जाएँ
बूढ़े दरख़्तों को ज़ोर से हिलाईए मत

फ़िर दोनों तस्वीर बिगड़ जाएँगी
सियासत में मज़हब मिलाईए मत

सवाब नुमाईश का मोहताज नहीं होता
आप रिसालों में तो इसे छपाईए मत

एक ही नूर हर शय में है समाया
दानां आवाम को भड़काईए मत

एक हद तक ये जज़्ब करती है
रियाया को यूँ आज़माईए मत


-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

"पद्मावत"- भारतीय सँस्कृति से खिलवाड़

आज भारी विरोध और न्यूनाधिक हिंसा के पश्चात संजयलीला भंसाली की विवादास्पद फ़िल्म "पद्मावत" देश में रिलीज़ हो गई। क्यों ना अपने निजी लाभ व स्वार्थ के लिए देश का सौहार्दपूर्ण वातावरण खराब करने के लिए संजयलीला भंसाली पर कार्रवाई की जाए? जबकि उन्हें इस बात का भलीभाँति अन्देशा था। फ़िल्म की शूटिंग के दौरान ही उन्हें राजपूत समाज ने सावधानी रखने की हिदायत दी थी इसके पश्चात उन्होंने एक बेहद संवेदनशील मुद्दे पर अपनी यह घटिया फ़िल्म बना डाली। मेरे देखे कोई भी सभ्य समाज अपने पूर्वजों व आराध्यों के प्रणय-दृश्यों को यूँ सार्वजनिक तौर पर देखना-दिखाना स्वीकार नहीं करेगा। यह हमारी भारतीय सँस्कृति व परम्परा नहीं है। राजस्थान उन राज्यों में है जहाँ आज भी प्राचीन परम्पराओं का पालन बड़े आदर के साथ किया जाता है। हमारे शास्त्रों ने भी जनभावनाओं के विरूद्ध किसी कार्य को करने का निषेध किया है। महज़ मनोरंजन और अपने निजी लाभ के लिए किसी की आस्था व मान्य परम्पराओं का अपमान स्वीकार नहीं किया जा सकता। वहीं क्या आप समझते है कि आज के दौर की किसी भी अभिनेत्री में रानी "पद्मिनी" के पात्र को निभाने का सामर्थ्य है? कहाँ रानी पद्मिनी ने अपने शील को पर-पुरूष से सुरक्षित रखने  के लिए स्वयं को अग्निदेव को समर्पित कर दिया था कहाँ आज की ये अभिनेत्रियाँ जो हर दूसरी फ़िल्म विलग-विलग अभिनेताओं के साथ अमर्यादित तरीके से व्यवहार की करती दिखाई देती हैं। चाहे इन अभिनेत्रियों के वस्त्र हों, इनके सँवाद हों या इनके नृत्य हों सभी भारतीय सँस्कृति का स्पष्ट उल्लँघन करते प्रतीत होते हैं, भला इन्हें रानी "पद्मिनी" का पात्र निभाने का अधिकार है? जो अपने जीवन में रानी "पद्मिनी" के आदर्शों व सिद्धान्तों का मखौल उड़ाती नज़र आती हैं। मैं यहाँ स्मरण करूं देश के महान अभिनेता श्री मुकेश खन्ना जी का जिन्होंने बी.आर.चोपड़ा कृत "महाभारत" में भीष्म पितामह का किरदार निभाने के बाद अपने हर किरदार को बेहद सावधानी से चुना और अपने निजी जीवन में आज तक अत्यंत मर्यादित रूप रह रहे हैं। आज भी देश में ऐसे कई अभिनेता है जो राष्ट्रहित हेतु पूर्णरूपेण समर्पित भाव से कार्यरत हैं। "पद्मावत" के निर्देशक कभी भी देशवासियों को इस प्रकार की गतिविधियों में संलग्न दिखाई नहीं दिए। जब आप अपने देश व समाज की प्रतिष्ठा में वृद्धि नहीं कर सकते तो आपको उसे धूमिल करने का भी कोई अधिकार नहीं है। कुछ देर के लिए मान भी लिया जाए कि संजयलीला भंसाली सही हैं तो भी उन्हें जनभावनाओं का आदर व सम्मान कर इस मुद्दे का समाधान स्वयं निकालना चाहिए था, जो उन्होंने नहीं किया। भला क्यों राज्यों का पुलिस बल आपकी इस घटिया फ़िल्म को सुरक्षा प्रदान करे? क्या प्रदेशों का पुलिस बल इसलिए है कि किसी के घटिया मनोरंजन को सुरक्षा दे! नहीं, राज्यों का पुलिस बल अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए होता है, ना कि किसी व्यक्ति की निम्नस्तरीय सोच को संवर्द्धित व पोषित करने के लिए। मेरे देखे इस प्रकार की फ़िल्में अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में भारतीय सँस्कृति व परम्पराओं को विनष्ट करने का कुत्सित प्रयास है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 21 जनवरी 2018

प्रेम तो आनन्द स्वरूप है


आज से लगभग एक वर्ष पूर्व एक छात्र ने आत्महत्या की थी। मीडिया ने उसके लिखे सुसाइड नोट को दिखाया था। उस सुसाइड नोट की एक लाईन मेरे ज़ेहन में कुछ अटक सी गई - "यह बेहद कठिन है कि हम प्रेम करें और हमें दर्द ना मिले।" आज अधिकतर लोगों को शायद यह लाईन अपनी ज़िंदगी में घटित होती हुए लगे, लेकिन मेरे देखे प्रेम और दर्द का दूर-दूर का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह हो ही नहीं सकता कि आप प्रेम करें और आपको दर्द मिले। यदि दर्द मिल रहा है तो आप प्रेम नहीं कर रहे हैं। वर्तमान दौर में प्रेम के नाम सबकुछ किया जा रहा है बस प्रेम नहीं किया जा रहा है। शब्दों की अपनी मज़बूरी है जैसे मैंने कहा कि आप प्रेम करें और आपको दर्द मिले यह हो ही नहीं सकता, अब इसमें कुछ लोग कह सकते हैं कि फ़िर विरह के दर्द का क्या होगा? तो मैंने कहा कि शब्दों की अपनी मज़बूरी है वास्तविक रूप में तो प्रेम में जो विरह होता है वह भी आनन्ददायक ही होता है। इसलिए तो राष्ट्रकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर अपनी एक कविता में परमात्मा के दरवाज़े से बच निकलते हैं क्योंकि उन्हें मिलन के आनन्द की अपेक्षा विरह की टीस अधिक प्रिय लगती है। मेरा बस यही कहना है कि यह हो सकता है आपको जीवन में दर्द मिला हो लेकिन उसके लिए प्रेम को उत्तरदायी ठहराना अनुचित है क्योंकि आज अधिकतर लोग प्रेम शब्द से तो परिचित हैं किन्तु प्रेम से अपरिचित। मैं जीसस को याद करूं जिन्होंने कहा था "प्रेम ही परमात्मा है" और परमात्मा आनन्द स्वरूप है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 20 जनवरी 2018

एकान्त संगीत

अब मत मेरा निर्माण करो!
कुछ भी न अभी तक बन पाया,
युग-युग बीते, मैं घबराया;
भूलो मेरी विहलता को, निज लज्जा का तो ध्यान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!

इस चक्की पर खाते चक्कर
मेरा तन-मन-जीवन जर्जर,
हे कुम्भकार, मेरी मिट्टी को और न अब हैरान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!

कहने की सीमा होती है
सहने की सीमा होती है,
कुछ मेरे भी वश में, मेरा कुछ सोच-समझ अपमान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो !!

कवि- डा. हरिवंशराय बच्चन


साभार: श्री अमिताभ बच्चन जी

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

जय हो नर्मदा मैया...


वाह रे वाह मेरे भैया, जय हो नर्मदा मैया...
खोद दिया नगर सारा नर्मदाजल के नाम पर,
जनता को हैं लूट रहे थोथे विकास के काम पर।
पहले ही क्या माँ रेवा का आँचल साफ़-स्वच्छ रहा है!
शहर के गन्दे नालों का पानी निर्बाध उसमें बहा है।
अब वही दूषित जल जनता को पिलाओगे
हाय! नर्मदाजल घर के शौचालयों में डलवाओगे
माँ रेवा की खोह तो आज तक ना भरने पाई
रेत खोदने लेकिन तट पर मशीनें चलवाईं
इस पर भी अच्छे दिनों का दे रहे झूठा दिलासा
भ्रष्टाचार हुआ कितना बाद में होगा खुलासा
विकास हेतु निरीह जनों के सिर पर कर चढ़ा है
रातों-रात झट से देखो सम्पत्ति-कर बढ़ा है
कौन जाने विकास या विनाश की ये परिभाषा
जनता समझ ना पाती है राजनीति की भाषा
बस निवेदन है इतना चैन से जन को रहने दो
माँ रेवा का जल उसके अंक में कलकल बहने दो
शिखर चढ़ी धूल भी क्षण भर को तो इठलाती है
पवन के इक झोंके से लेकिन धूलधूसरित हो जाती है
फिर लोकतन्त्र में "दिनकर" की कविता पुन: दुहराती है
"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।"

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

’अप्पा सो परमप्पा‌’


आज बुद्ध और महावीर के प्रति मेरी श्रद्धा और बढ़ गई। बुद्ध और महावीर दोनों ही ने परमात्मा को इनकार कर दिया था। महावीर ने तो यहाँ तक कहा कि -"अप्पा सो परमप्पा" अर्थात् आत्मा ही परमात्मा है। वहीं बुद्ध का प्रसिद्ध वचन है -"अप्प दीपो भव:" अर्थात् अपने दीपक स्वयं बनो। बौद्ध और जैन दोनों ही दर्शनों में आत्मा के ऊपर किसी आकाशीय परमात्मा स्वीकार नहीं है। मेरे देखे यह उचित ही है। हमारे सनातन धर्म में आत्मा के ऊपर परमात्मा को स्वीकार किया गया है। इसका आशय यह नहीं कि बुद्ध और महावीर परमात्म तत्व से अपरिचित थे, नहीं.. कदापि नहीं, वे भलीभाँति परिचित थे किन्तु उन्होंने जनमानस को आत्मा पर ही रोके रखा क्योंकि वे जानते थे कि जो आत्मा को जानने में सक्षम हो गया वह परमात्मा से साक्षात्कार कर ही लेगा। यदि आत्मा को जाने बिना परमात्मा को समझने का प्रयास किया तो वह झूठ होगा। वर्तमान में हमारे कई तथाकथित साधु-सन्तों द्वारा अपने निजी स्वार्थ व लाभ के लिए परमात्मा के नाम पर झूठ को खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया गया है। आखिर ये कैसे सम्भव है कि देश में धर्मगुरूओं व धार्मिक आयोजनों में निरन्तर वृद्धि होती रहे और समाज आध्यात्मिक रूप से कँगाल होता रहे? इस समस्या का मुख्य कारण है परमात्मा के नाम पर फ़ैलाया गया झूठ और फ़रेब। जब तक असल प्रचलन में है तभी तक नकल की सँभावना होती है जब असल ही विदा हो जाता है तो समाज में नकल का कोई स्थान नहीं रहता। ये हमने अभी कुछ ही वर्षों पूर्व "विमुद्रीकरण" (नोटबन्दी) के रूप देख लिया है। बुद्ध और महावीर ने यही किया था, मनुष्य से उसका आकाशीय परमात्मा छीन कर उसे उसी के अन्दर प्रतिष्ठित आत्मा पर ला खड़ा किया था। क्योंकि जब परमात्मा से ही इनकार कर दिया जावेगा तो कोई व्यक्ति, बाबा या सन्त अपने परमात्मा होने का दावा करेगा कैसे! स्वर्ग-नर्क की बात तो फ़िर बेमानी ही समझिए, जिसके नाम पर लोगों को डराया या प्रलोभन दिया जाता है। यहाँ मुझे स्मरण आता है प्रबुद्ध महिला सन्त राबिया का जो सदैव अपने एक हाथ में मशाल और दूसरे में पानी का पात्र रखती थी और पूछने पर कहती थी कि "मैं मशाल से स्वर्ग में आग लगा दूँगी और नर्क को पानी में डुबो दूँगी। आशय बहुत स्पष्ट है कि स्वर्ग-नर्क, परमात्मा के नाम पर जो खेल चल रहा है उसे समाप्त करना ही सच्चे सन्त का लक्षण है। जो धर्मगुरू धर्म के नाम पर झूठ के इस जाल को काटने के स्थान पर और अधिक बुनता है उसे धर्मगुरू या उपदेशक कहना सर्वथा अनुचित है। जब तक ऐसे तथाकथित धर्मगुरू व उपदेशक समाज में रहेंगे तब तक आम आदमी का इस प्रकार के फ़र्जी बाबाओं के चँगुल से मुक्त हो पाना मुश्किल है।
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया