मंगलवार, 16 मई 2017

दैनिक राशिफ़ल एक मिथ्या धारणा है

आपने समाचार पत्रों या टेलीविज़न चैनलों में ज्योतिष कार्यक्रमों के तहत "दैनिक राशिफ़ल" पढ़ा या देखा होगा। जिसमें सभी १२ राशियों दैनिक फ़लित बताया जाता है। कई लोग इसके आधार अपनी दैनिक योजनाएं भी बनाते हैं। मैं आपको इस तथ्य से अवगत करवाना चाहता हूं कि दैनिक राशिफ़ल एक मिथ्या धारणा है। जानिए क्यों?

क्योंकि इसका आधार गोचर ग्रहाचार होता है-
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दैनिक राशिफ़ल का आधार गोचर ग्रहाचार होता है किन्तु नौ ग्रहों के ग्रहाचार की अपनी विलग-विलग अवधि है जैसे सूर्य, बुध और शुक्र एक राशि में लगभग १ माह रहते हैं मंगल ५७ दिन, गुरु १ वर्ष, राहु-केतु डेढ़ वर्ष और शनि सबसे अधिक ढ़ाई वर्ष रहता है किन्तु चन्द्र ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जो एक राशि में सवा दो दिन रहते हैं जिसके आधार पर दैनिक राशिफ़ल बताने की परम्परा चल निकली है। अत: दैनिक राशिफ़ल का मुख्य आधार चन्द्र का गोचर होता है। अब चन्द्र जब सवा दो दिन एक राशि में रहता है तब इसका फ़लित दैनिक आधार पर कैसे हो सकता है आप स्वयं विचार कीजिए। अत: सवा दो दिनों के बाद भी यदि समस्त राशियों का फ़लित बताया जाए तब तो उचित है किन्तु दैनिक फ़लादेश अनुचित है। हां कोई श्रद्धालु यदि कोई कार्य विशेष के लिए जानना चाहते हैं तब चन्द्र की स्थिति से उसका शुभ-अशुभ बताया जा सकता है।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 12 मई 2017

"ज्योतिष का भ्रामक विज्ञापन ना करें"

आज ज्योतिष से जुड़ी एक ख़बर का विश्लेषण कर रहा था तो बड़े रोचक तथ्य सामने आए। एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में एक तथाकथित ज्योतिषी की विज्ञापननुमा ख़बर प्रकाशित हुई जिसमें उन्होंने यह बताया कि बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर जो ग्रहयोग बने हैं वे 297 वर्ष बाद बने हैं और भविष्य में ये अद्भुत योग कब बनेंगे इसके बारे गणना नहीं की जा सकती। मैं स्तब्ध था कि आख़िर ऐसे कौन से अद्भुत योग बन रहे हैं सो मैंने भी उन योगों के बारे में कुछ जाँच-पड़ताल की जिनके बारे में इन महानुभाव ज्योतिषी ने बताया था। विश्लेषण के पश्चात मैंने पाया कि ऐसे तो कोई बहुत अद्भुत योग नहीं बन रहे हैं जिनके बारे में इस प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने ऐसा मीडिया कवरेज दिया। "बुधादित्य योग", "शनि-मंगल" का षडाष्टक योग, सूर्य का उच्चराशिस्थ होना ये सब कोई अद्भुत योग तो नहीं हैं। बहरहाल, जब मैंने उनकी बताए अनुसार 297 वर्ष पूर्व में बन रहे इन योगों की दिनांक जो उनके अनुसार 22 अप्रैल 1720 थी को आधार बनाकर अपना पंचांग परीक्षण किया तो पाया कि उस दिन पूर्णिमा अवश्य थी लेकिन उस दिन इस प्रकार के योग विशेषकर "बुधादित्य योग" जिसे आधार बनाकर यह पूरा विज्ञापन प्रकाशित किया गया था वह बन ही नहीं रहा था और ना ही "शनि-मंगल" का षडष्टक था। मैं आश्चर्यचकित था, मैंने प्रति-परीक्षण के लिए कम्प्यूटर की सहायता ली लेकिन परिणाम वही आया। मेरे देखे किसी भी ज्योतिषी को ज्योतिष का भ्रामक विज्ञापन नहीं करना चाहिए। यदि हम ज्योतिष की प्रतिष्ठा में वृद्धि नहीं कर सकते तो हमें ज्योतिष की प्रतिष्ठा धूमिल करने का कोई अधिकार नहीं है। आज के तकनीकी युग में किसी को बेवकूफ़ बनाना इतना आसान नहीं है। मेरे ऐसे तमाम तथाकथित ज्योतिषियों से आग्रह है कि अपनी थोड़ी सी महत्त्वाकांक्षा की पूर्ती के लिए व्यर्थ व तथ्यहीन बातें बताकर ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा को धूमिल ना करें। आप सब मित्रों की संतुष्टि के लिए मैं अपनी गणना के चित्र भी प्रस्तुत कर रहा हूं आप स्वयं मेरी बातों की प्रामाणिकता देख सकते हैं। जो मित्र कम्प्यूटर इत्यादि का ज्ञान रखते हैं वे स्वयं 22 अप्रैल 1720 कुण्डली साफ़्टवेयर में दर्ज़ कर जन्मपत्रिका बनाकर इन ग्रहयोगों की सच्चाई देख सकते हैं।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सोमवार, 1 मई 2017

वोट सरकार के, जोखिम जनता का-

ख़बर है प्रदेश के नौ जिला सहकारी बैंको के लायसेंस रद्द होने की कगार पर हैं। इन बैंको का सीआरएआर (कैपिटल टू रिस्क एसेट्स रेशो) गिरकर ९ प्रतिशत से नीचे आ गया है। जिसके चलते आरबीआई और नाबार्ड ने इनके बैंकिग लायसेंस रद्द करने की चेतावनी दी है। बैंक से जुड़े सूत्रों से जब इस मुद्दे पर  चर्चा हुई तो उन्होंने इसका सारा दोष राजनीति पर मढ़ते हुए इसके पीछे का सारा रहस्य समझाया। उनके अनुसार सरकार की शून्य प्रतिशत पर ब्याज़ बाँटने एवं किसानों से ऋण वसूलने में सख़्ती ना करने व ब्याज माफ़ करने की नीति ही इसके लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है। सहकारी बैंको का संचालन एक प्रतिनिधि मण्डल के माध्यम से होता है जिसमें अधिकांश राजनीतिक क्षेत्र के व्यक्ति होते हैं इसके चलते भ्रष्टाचार भी इन बैंको के खराब प्रदर्शन के लिए उतना ही ज़िम्मेवार है जितना कि सरकार की लोकलुभावन व अव्यवहारिक नीतियाँ। प्रदेश में सहकारी बैंको की हालत ख़स्ता है इससे पूर्व भी सरकार कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक को बन्द कर उसके विलय को मन्जूरी दे चुकी है। ये बात और भी आश्चर्यजनक है कि इस बैंक के अधिकांश अधिकारी व कर्मचारियों का सहकारी बैंक में संविलियन प्रस्तावित है जिनके ऊपर खुद लायसेंस रद्द होने की तलवार लटक रही है। ऐसे में मेरा सवाल यह है कि आख़िर सरकार की वोट आकर्षित करने की लोकलुभावन अव्यवहारिक नीतियों का ख़ामियाज़ा जनता क्यों भुगते? वोट राजनीतिक दलों के और जोखिम जनता का! क्या यही आपके विकास का गणित है? एक ध्यान देने योग्य अतिमहत्तवपूर्ण तथ्य यह भी है इन बैंकों के अधिकांश खातेदार किसान हैं। यदि इन बैंको का लायसेंस रद्द होता है तो इन बैंको में सावधि जमा (एफ़डी) के रूप में जमा इन किसानों धनराशि के भुगतान को ज़िम्मेवार कौन होगा? यह बात किसी साधारण से व्यक्ति के भी समझ में आ सकती है कि जब बैंक शून्य प्रतिशत पर ब्याज़ देंगे और उसकी वसूली नहीं करेंगे तो बैंके पाव धनराशि आएगी कहां से। इस पर तुर्रा ये कि नाबार्ड और प्रदेश सरकार भी कोई अतिरिक्त सहायता इन बैंको को नहीं देगी, भ्रष्टाचार तो व्याप्त है ही तो ऐसे में यह बैंक आख़िर कब तक चल पाएंगे! एक ना एक दिन इनका डूबना सुनिश्चित है। ऐसे में इन बैंको के खातेदारों की राशि विवादों में फ़ंसने का ज़िम्मा क्या प्रदेश सरकार लेगी? इससे पूर्व भी एक महिला बैंक इसी प्रकार राजनीति व भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है जिसके खातेदारों को एड़ियाँ रगड़-रगड़कर कई वर्षों बाद अपनी जमा पूँजी वापस मिली। इन सबके चलते जो सबसे बड़ी हानि हो रही है वह बैंको के प्रति आम जनता में विश्वास की निरन्तर कमी, कुछ माह पूर्व के नोटबन्दी के निर्णय ने इस विश्वास को बेहद कमज़ोर किया जब लोगों को अपनी ही जमा पूँजी निकालने के घण्टों बैंकों की लाईनों में लगना पड़ा और जमा पूँजी भी राशन की तरह एक निश्चित मात्रा में ही प्राप्त हुई। मेरा प्रदेश के मुखिया से आग्रह है कि केवल "विश्वास" को सहकारिता मन्त्री बना देने मात्र से इन बैंको के प्रति जनता में विश्वास नहीं बढ़ेगा, उसके लिए आवश्यक है ज़मीनी स्तर पर कुछ ठोस प्रयास कर प्रदेश की इन ख़स्ताहाल सहकारी बैंको स्थिति सुधारी जाए एवं अपनी लोकलुभावन अव्यवहारिक नीतियाँ त्वरित बन्द की जाएं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

रविवार, 30 अप्रैल 2017

अर्ज़ किया है...


 (1.)   "ज़रा आँखें तो तरेरिए ममत्व के लिए,
         सिंह की दहाड़ सिर्फ़ हिन्दुत्व के लिए?"
       
(2.)  "मेरी तकरीर ना कौम की हिफ़ाज़त के लिए है,
        ये सियासी बातें तो फ़कत सियासत के लिए हैं"

(3.)   "मुफ़लिसों के लहू की जाने कैसी ये प्यास है,
         मौत के सौदागरों को जन्नत की तलाश है।"  

(4.)  "मैं परेशां हूं हमने आधा कश्मीर हारा क्यों
        लोग परेशां है कटप्पा ने बाहुबली मारा क्यों"

(5)   "ये कोई सियासी भूल सा लगता है
         वो संग फ़ेके तो फ़ूल सा लगता है"

(6)   "मन्दिर-मस्ज़िद पे सियासत उन्हें चमकानी है
        हमें तो साहब अपने चूल्हे की आग जलानी है"

(7)   "शाह-औ-मुफ़लिस का फ़र्क कैसे मिटता
        ए कज़ा तूने सब बराबर कर दिया"

(8)    "दिल पे लगी हर चोट बुरी होती है
         मन्न्तों बाद कोई गोद हरी होती है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

"ध्यान" है आध्यात्मिक सेल्फ़ी

वर्तमान समय में स्वदर्शन अर्थात "सेल्फ़ी" लेने का बड़ा फ़ैशन है। युवाओं से लेकर बुज़ुर्गों व महिलाओं तक पर इसका नशा सर चढ़कर बोल रहा है। मुझे इस प्रकार के "सेल्फ़ी" चलन से लगा कि "सेल्फ़ी" का प्रचलन तो हमारे देश में; हमारी आध्यात्मिक परम्परा में सदियों से है किन्तु इस रूप में नहीं, मेरे देखे आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" "ध्यान" है। जिसमें आप वास्तविक व प्रामाणिक रूप में अपना "आत्मदर्शन" करते हैं। उसमें आपका शरीर ही आपका उपकरण अर्थात डिवाइस होता है और जब वह "सेल्फ़ी" ली जाती है तो उसे किसी भी मंच पर साझा नहीं करना पड़ता वह तो स्वयमेव प्रत्येक व्यक्ति को दिखाई देने लगती है किन्तु उस प्रकार की "सेल्फ़ी" आज की "सेल्फ़ी" की तरह कुछ पलों में नहीं ली जा सकती उसके लिए तो धैर्य व शान्ति के साथ निर्विचार होकर अपने शरीर रूपी मोबाईल को अनुकूलित अर्थात "कस्टमाईज़" करना पड़ता है। आज की "सेल्फ़ी" तो बस शरीर का ही प्रतिबिम्ब हैं किन्तु "ध्यान" रूपी सेल्फ़ी में वह दिखाई देता है, जो है, जिसे शास्त्रों में कहा गया है "एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति" या फ़िर "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" अर्थात "चैतन्य"। आईए प्रयास करें कि हम कभी आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" लेने में सक्षम हो सकें क्योंकि आध्यात्मिक जगत की "सेल्फ़ी" कभी नष्ट नहीं होती शेष सारी "सेल्फ़ी" शरीर रूपी मोबाईल के फ़ार्मेट होते ही "डीलिट" हो जाती हैं।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

वीवीआईपी मानसिकता भी ख़त्म हो

अभी-अभी मोदी सरकार ने वीआईपी कल्चर को ख़त्म करने का आगाज़ करते हुए सभी वीवीआईपी वाहनों से लाल बत्ती हटाने का फ़ैसला लिया। यह एक स्वागत योग्य कदम है लेकिन इतने भर से काम चलने वाला नहीं हमें वीवीआईपी मानसिकता भी ख़त्म करनी होगी। इस देश में जहां अदना सा सरपंच या मण्डल अध्यक्ष अपना पद छोड़ने के बाद भी पूर्व सरपंच या पूर्व मण्डल अध्यक्ष लिखता  है वहां केवल वाहनों पर से लाल बत्ती हटाने से काम नहीं चलेगा। इस देश में वीवीआईपी मानसिकता को ख़त्म करने की पहल होनी चाहिए। यह पहल केवल सरकार नहीं कर सकती सरकार ने तो जो कदम उठाना था वह उठा ही लिया है लेकिन इसमें आम जनता को भी सहयोग करना होगा। आख़िर कौन वे लोग हैं जो इन आम से नेताओं को ख़ास बना देते हैं? ये हम और आप ही हैं जो नेताओं को अपने ख़ास होने का अहसास व आभास कराते हैं। आपने देखा होगा कोई राजनेता या अभिनेता कहीं दिख जाए उसके चरण-चुम्बन व सेल्फ़ी लेने की होड़ सी लग जाती है। उसके आस-पास कई लोग स्वयं ही उसके सुरक्षाकर्मियों की भूमिका अदा करने लग जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? ऐसा दो कारणों से होता है पहला तो इसलिए होता है कि हम उस प्रतिष्ठित व्यक्ति को आधार बनाकर अपना अहंकार तुष्ट करना चाहते हैं, दूसरा हम उस नेता की नज़र में उसके ख़ास बनना चाहते हैं जिससे हमारे दैनिक जीवन के समस्त नैतिक-अनैतिक कार्यों में बाधा ना पड़े। वाहनों पर लगी लाल बत्ती को त्वरित हटाना सम्भव था, जो कर दिया गया है लेकिन हमारे समाज में व्याप्त इस "अति-महत्त्वपूर्ण व्यक्ति संस्कृति" (वीवीआईपी कल्चर) को हटाना शायद इतना आसान ना होगा। समाज में फ़ैली इस कुव्यवस्था को तभी हटाया जा सकता है जब आम नागरिक अपने स्वार्थ पर अंकुश लगा कर राष्ट्रहित के बारे सोचें। इस दिशा में हुई एक सकारात्मक पहल का हमें स्वागत करना चाहिए।

-ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

सन्त राबिया ने की थी कुरान में तरमीम

इन दिनों देश में "तीन तलाक" के मुद्दे को लेकर काफ़ी गहमागहमी है। न्यूज़ चैनल पर आए दिन इस मुद्दे को लेकर बहस-मुबाहिसे होते रहते हैं। ऐसी एक बहस देखकर बड़ी हैरानी हुई कि कुछ लोग धर्म को लेकर किस हद तक कट्टर हो जाते हैं और मानवता रूपी अपने सबसे बड़े धर्म से विमुख हो जाते हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम धर्मगुरू व मुस्लिम समाज दो भागों में बँटा नज़र आ रहा है। तीन तलाक के नाम पर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों से देश की अधिकांश जनता जो कि मुस्लिम नहीं भी है, पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। मेरे देखे शास्त्र यदि ठीक से ना समझा जाए तो वह शस्त्र से भी अधिक ख़तरनाक व हानिकारक सिद्ध हो सकता है यह इसका ज्वलंत उदाहरण है, इसीलिए हमारे सनातन धर्म में तो एक समय तक शास्त्रों के अध्ययन का अधिकार भी हर किसी को प्राप्त नहीं था, इस निषेध के पीछे एकमात्र उद्देश्य यही था कि शास्त्र का अध्ययन केवल वही व्यक्ति करे जो उसे भलीभाँति समझ सकता हो। जहाँ तक बात है कुरान की तो कई इस्लाम के जानकारों के अनुसार कुरान में तीन तलाक के इस रूप का कोई ज़िक्र नहीं है। यहाँ मैं मुस्लिम सन्त राबिया का ज़िक्र करना चाहूँगा जिन्होंने कुरान में भी तरमीम करने का साहस दिखाया था। राबिया अपने ज़माने की एक बहुत ऊँचे दर्जे की मुस्लिम सन्त हुई हैं। एक बार एक मुस्लिम फ़कीर हसन उनके यहाँ मेहमान था उसने जब इबादत के वक्त कुरान को पढ़ा तो उसमें एक वाक्य कटा हुआ पाया उसने सोचा कि कुरान में तो तरमीम (संशोधन) हो ही नहीं सकती, यह तो गुनाहे-अज़ीम (सबसे बड़ा अपराध) है। जब उसने राबिया से इस बारे में पूछा तो राबिया ने कहा कि यह तरमीम उसने खुद की है। हसन ने पूछा कि राबिया कुरान में आख़िर ऐसा क्या लिखा है जो तेरे जैसी सन्त को इसमें तरमीम करना पड़ी? इस पर राबिया ने उत्तर देते हुए कहा कि "कुरान का वचन है शैतान को घृणा करो और हसन जबसे मुझे इलहाम (ईश्वरानुभूति) हुआ है तबसे मुझे किसी में भी शैतान नज़र नहीं आता बस खुदा ही खुदा नज़र आता है तो मैं घृणा किससे करूं इसलिए मैंने कुरान के इस वाक्य को काट दिया।" कितनी खूबसूरत व श्रेष्ठ बात सन्त राबिया ने कही अगर यही बात आज के मौलाना समझ लें तो सारा मसला ही हल हो जाए। मैं सदैव कहता हूँ कि धर्म एक व्यवस्था मात्र है जो समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए बनाई गई है। अत: जो नियम, जो रीति-रिवाज़, जो बात समाज को अव्यवस्थित करे वो धर्म से सम्बन्धित नहीं हो सकती, चाहे वह किसी पंथ की हो, चाहे किसी ग्रंथ की हो। तीन तलाक जैसे नियमों को जितनी जल्दी हो सके विदा दे दी जानी चाहिए।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)