इन दिनों देश में "तीन तलाक" के मुद्दे को लेकर काफ़ी गहमागहमी है। न्यूज़ चैनल पर आए दिन इस मुद्दे को लेकर बहस-मुबाहिसे होते रहते हैं। ऐसी एक बहस देखकर बड़ी हैरानी हुई कि कुछ लोग धर्म को लेकर किस हद तक कट्टर हो जाते हैं और मानवता रूपी अपने सबसे बड़े धर्म से विमुख हो जाते हैं। तीन तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम धर्मगुरू व मुस्लिम समाज दो भागों में बँटा नज़र आ रहा है। तीन तलाक के नाम पर महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों से देश की अधिकांश जनता जो कि मुस्लिम नहीं भी है, पीड़ित मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ी दिखाई दे रही है। मेरे देखे शास्त्र यदि ठीक से ना समझा जाए तो वह शस्त्र से भी अधिक ख़तरनाक व हानिकारक सिद्ध हो सकता है यह इसका ज्वलंत उदाहरण है, इसीलिए हमारे सनातन धर्म में तो एक समय तक शास्त्रों के अध्ययन का अधिकार भी हर किसी को प्राप्त नहीं था, इस निषेध के पीछे एकमात्र उद्देश्य यही था कि शास्त्र का अध्ययन केवल वही व्यक्ति करे जो उसे भलीभाँति समझ सकता हो। जहाँ तक बात है कुरान की तो कई इस्लाम के जानकारों के अनुसार कुरान में तीन तलाक के इस रूप का कोई ज़िक्र नहीं है। यहाँ मैं मुस्लिम सन्त राबिया का ज़िक्र करना चाहूँगा जिन्होंने कुरान में भी तरमीम करने का साहस दिखाया था। राबिया अपने ज़माने की एक बहुत ऊँचे दर्जे की मुस्लिम सन्त हुई हैं। एक बार एक मुस्लिम फ़कीर हसन उनके यहाँ मेहमान था उसने जब इबादत के वक्त कुरान को पढ़ा तो उसमें एक वाक्य कटा हुआ पाया उसने सोचा कि कुरान में तो तरमीम (संशोधन) हो ही नहीं सकती, यह तो गुनाहे-अज़ीम (सबसे बड़ा अपराध) है। जब उसने राबिया से इस बारे में पूछा तो राबिया ने कहा कि यह तरमीम उसने खुद की है। हसन ने पूछा कि राबिया कुरान में आख़िर ऐसा क्या लिखा है जो तेरे जैसी सन्त को इसमें तरमीम करना पड़ी? इस पर राबिया ने उत्तर देते हुए कहा कि "कुरान का वचन है शैतान को घृणा करो और हसन जबसे मुझे इलहाम (ईश्वरानुभूति) हुआ है तबसे मुझे किसी में भी शैतान नज़र नहीं आता बस खुदा ही खुदा नज़र आता है तो मैं घृणा किससे करूं इसलिए मैंने कुरान के इस वाक्य को काट दिया।" कितनी खूबसूरत व श्रेष्ठ बात सन्त राबिया ने कही अगर यही बात आज के मौलाना समझ लें तो सारा मसला ही हल हो जाए। मैं सदैव कहता हूँ कि धर्म एक व्यवस्था मात्र है जो समाज को सुव्यवस्थित करने के लिए बनाई गई है। अत: जो नियम, जो रीति-रिवाज़, जो बात समाज को अव्यवस्थित करे वो धर्म से सम्बन्धित नहीं हो सकती, चाहे वह किसी पंथ की हो, चाहे किसी ग्रंथ की हो। तीन तलाक जैसे नियमों को जितनी जल्दी हो सके विदा दे दी जानी चाहिए।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र (म.प्र.)

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