शनिवार, 14 दिसंबर 2013

दुख का मौसम

तेरा हाथ मेरे कांधे पर दरिया बहता जाता है
कितनी ख़ामोशी से दुख का मौसम गुज़रा जाता है

पहले ईंट;फिर दरवाजे;अबके छत की बारी है
याद नगर में एक महल था,वो भी गिरता जाता है

अपना दिल है एक परिंदा जिसके बाज़ू टूटे हैं
हसरत से बादल को देखे बादल उड़ता जाता है

सारी रात बरसने वाली बारिश का मैं आंचल हूं
दिन में कांटों पर फैलाकर मुझे सुखाया जाता है

हमने तो बाज़ार में दुनिया बेची और खरीदी है
हमको क्या मालूम किसी को कैसे चाहा जाता है

-बशीर बद्र

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

तुम्हारी भी जय-जय; हमारी भी जय-जय


सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है दिल्ली में आम आदमी पार्टी अल्पमत की सरकार बनाने को तैयार हो गई है। यदि यह खबर सत्य साबित होती है तो इस निर्णय से तीनों ही दलों ने अपने- अपने हित साधने की कोशिश करेंगे किंतु वास्तव में हित किसका सधता है ये तो समय ही बताएगा। “आप” के इस निर्णय को थोड़ा समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर आम आदमी पार्टी थोड़ा सियासी नखरा दिखाने के बाद अल्पमत की सरकार बनाने को तैयार क्यों हुई, इसके पीछे सीधा और साफ़ कारण है उसकी छवि। आम आदमी पार्टी किसी भी सूरत में अपनी बेदाग व ईमानदार छवि के साथ समझौता नहीं करना चाहती है, साथ ही साथ वह देश की जनता को यह भी बताना चाहती है कि वह सत्ता की लालची नहीं है इसलिए “आप” ने पहले सबसे बड़े दल भाजपा को आगे किया जो कि उसके पक्ष में रहा, किंतु भाजपा के इनकार के बाद अब आम आदमी पार्टी अल्पमत की सरकार बनाकर एक साथ दो निशाने साधना चाहती है पहला यह कि वह अपनी ज़िम्मेवारी से भाग नहीं रही है, दूसरा यदि भाजपा या कांग्रेस किसी जनहितैषी मुद्दे जैसे लोकायुक्त बिल लाना, विधायकों के वेतन भत्ते और सुविधाओं में कटौती करना इत्यादि को लेकर उसकी सरकार गिराते हैं तो वह जनता के बीच यह साबित करने में कामयाब हो जाएगी कि हम यदि ईमानदारी से काम करते हैं तो बीजेपी और कांग्रेस हमें करने नहीं देते इसलिए हम अल्पमत की सरकार नहीं बना रहे थे। जो भी दल “आप” की सरकार गिराएगा आने वाले चुनावों में आम आदमी पार्टी उसके विरूद्ध माहौल बनाएगी। अब बात भाजपा और कांग्रेस की करें तो भाजपा भी लोकसभा चुनाव से पहले किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती वहीं उसके लिए यह बात भी लाभदायक है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार बनाए क्योंकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही के पास अब तक आम आदमी पार्टी की आलोचना करने का कोई ठोस आधार नहीं है। दोनों ही दल हार्दिक रूप से यह चाहते हैं कि आम आदमी पार्टी सत्ता में आए और फिर उसकी नाकामियों को आधार बनाकर ये दल उसे जनता के बीच घेरें क्योंकि किसी बीज में आए अंकुर उखाड़ फेंकना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल उस अंकुर से बने छ्तनार वृक्ष को उखाड़ फेंकना होता है। यही बात आम आदमी पार्टी पर भी लागू होती है क्योंकि “आप” के ज़्यादातर विधायक या यूं कहें कि लगभग सभी; अनुभवहीन है जिन्हें सत्ता चलाने का कोई भी अनुभव नहीं है ऐसे में जब यही विधायक मंत्री बनकर मंत्रालय की ज़िम्मेवारी संभालेंगे; नई-नई योजनाएं व योजनाओं के लिए बजट बनाएंगे तो यह बात इनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगी। ऐसे में शुरूआत में शासन चलाने में आई परेशानियों और निर्णयों एवं चुनाव पूर्व किए गए वादों का ठीक ढंग से क्रियान्वयन ना कर पाना भाजपा व कांग्रेस दोनों ही के लिए संजीवनी का काम करेगा इसलिए ये दोनों ही दल चाहते हैं “आप” सरकार बनाकर एक-डेढ़ साल शासन कर ले जिससे अगले चुनावों उसके विरूद्ध प्रचार के लिए इन दोनों दलों के पास कुछ ठोस आधार व मुद्दे हों। जहां तक “आप” की सरकार गिराने की बात है तो यह कदम उचित समय पर अविश्वास प्रस्ताव के जरिये उठाया जा सकता है।
-हेमन्त रिछारिया

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

किसको डालूं वोट रामजी


किसको डालूं वोट रामजी
सब में ही है खोट रामजी
किसको डालूं वोट...

वादों की भरमार है देखो
लूटा सब संसार है देखो
लोकतंत्र की मर्यादा पर
करते कैसी चोट रामजी
किसको डालूं वोट.....

नकली-नकली चेहरे हैं
राज़ बड़े ही गहरे हैं
सबने अपने मुखमंडल पे
डाली तगड़ी ओट रामजी
किसको डालूं वोट....

आज़ादी के खातिर देखो
कितने फांसी पर झूले
सत्तालोलुपता में नेता
वो कुर्बानी भूले
ऐसी बातें दिल को
मेरे रही कचोट रामजी
किसको डालूं वोट...

-हेमंत रिछारिया

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

कभी लौट कर नहीं आया...

बिछ्ड़ गया तो कभी लौट कर नहीं आया
सफ़र में उसके कहीं अपना घर नहीं आया

वो एहतराम से करते हैं खून भरोसे का
हमें अब तक मगर ये हुनर नहीं आया

मेरे वादे का जुनूं देख,तुझसे बिछड़ा तो
कभी ख़्वावों में भी तेरा जिकर नहीं आया

दुश्मनी हमने भी की है मगर सलीके से
हमारे लहज़े में तुमसा ज़हर नहीं आया

(साभार)

रिक्त


मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

चुनावी माहौल

एक बार देखी हमने श्वानों की लडा़ई
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई
एक गुर्राया; दूजे ने पंजा बढ़ाया; तीसरा काटने को आतुर,
हड्डी ले भागा वही जो श्वान था सबसे चातुर।

फिर कुछ दिनों के बाद जब चुनाव है आया,
हमारी नज़रों के सामने वही दृश्य दोहराया।
हमने देखी फिर से वही श्वानों की लड़ाई,
हड्डी एक थी किंतु सबने उसपर नज़र गड़ाई।
सुना था कि अपने क्षेत्र में "श्वान" भी "सिंह" होता है,
ये कैसा माहौल है यारों जहां "सिंह" "श्वान" होता है।

-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

“गांधीजी के बंदर”

चार बंदर आपस में बात कर रहे थे। एक बोला-"गांधी बापू ने कहा है बुरा मत देखो",  दूसरा बोला-"बुरा मत सुनो",  तीसरे ने कहा-बुरा मत कहो", तभी चौथे ने कहा- "यारों, लेकिन बुरा करने से मना थोड़े किया है।" चारों बंदर खिलखिला के हँस पड़े।”

-हेमन्त रिछारिया