बुधवार, 20 फ़रवरी 2019

रायचन्द

विश्व में एक विशेष प्रकार की मनुष्य जाति पाई जाती है उसका नाम है-"रायचन्द"। वैसे तो यह विश्व के सभी देशों में पाए जाते हैं किन्तु हमारे देश में रायचन्दों की मात्रा बहुतायत है। ये आपको अत्यन्त सुलभ रूप से किसी चाय-पान की दुकान, चौक-चौराहों, चौपालों, सोशल मीडिया व न्यूज़ चैनलों पर  किसी ना किसी मुद्दे अथवा समस्या पर अपनी राय देते आसानी से दिख जाएंगे। रायचन्द का मुख्य कार्य किसी भी मसले अथवा ज्वलन्त समस्या पर बिन मांगे अपनी निर्मूल्य राय का देना होता है। रायचन्द बिनमांगी राय देने में सिद्धहस्त होते हैं। किसी भी ज्वलन्त समस्या व मुद्दे पर अपनी राय तत्क्षण प्रकट करने का हुनर इन्हें बखूबी आता है, भले ही उस क्षेत्र से इनका दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध ना हो। रायचन्द के लिए उम्र का कोई बन्धन नहीं होता, ये किसी भी उम्र के हो सकते हैं। जब भी देश अथवा कभी-कभी तो विदेश में भी कोई संकट या समस्या आती है तो उस मसले पर यह अपनी निर्मूल्य राय देकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में पीछे नहीं रहते। रायचन्द "वसुधैव कुटुम्बकम" की अवधारणा में घोर विश्वास करते हैं और समूची वसुन्धरा को अपना कुटुम्ब मानते हुए विश्व के किसी भी देश के किसी भी कोने में होने वाली घटनाओं व मुद्दों पर अपनी राय प्रकट करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। एक फ़िल्मी गीत है "ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बन्धन" किन्तु रायचन्द इसे अपने सन्दर्भ में कुछ इस प्रकार लेते हैं-"ना भौगौलिक सीमा हो, ना ज्ञान का हो बन्धन...।" अत: वे हर मुद्दे पर अपनी राय प्रकट कर अपने दायित्व का निर्वाह करते हैं जैसे अमुक देश में किस व्यक्ति का राष्ट्रपति बनना हमारे देश के फायदेमन्द होगा, देश के आर्थिक हालात को बेहतर करने के लिए वित्तमन्त्री को क्या करना चाहिए, बजट कैसा होना चाहिए, सरकारी नीतियां कैसी बननी चाहिए, पड़ोसी देशों से हमारे सम्बन्धों को कैसे सुधारा जाना चाहिए, हमारी विदेश नीति कैसी होनी चाहिए, सेना की रणनीति कैसी होनी चाहिए, क्रिकेट टीम में किस खिलाड़ी को खिलाया जाना चाहिए, अमुक फ़िल्म में अभिनेता ने कहां चूक की, निर्देशक की क्या खामी रही, संगीतकार कहां गड़बड़ी कर गया, गायक कहां बेसुरा हो गया आदि-आदि। रायचन्द कहीं भी; किसी भी क्षेत्र में अपनी राय दे सकता है। रायचन्द के लिए शिक्षा का कोई न्यूनतम स्तर तय नहीं होता, बस आपमें मुट्ठाठेली करने की प्रबल योग्यता होनी चाहिए। मुट्ठाठेली अर्थात् वार्तालाप में घुसपैठ कर अपनी बात प्रमुखता से रखना एवं उस पर अड़े रहना। इसके साथ ही थोड़ी सी निर्लज्जता यदि आपमें है, फिर तो "सोने-पे-सुहागा" वाली बात चरितार्थ हो जाती है। इसके अतिरिक्त रायचन्द का एक विशेष गुण भी होता है जो उसे आम नागरिकों से अलग "रायचन्द" जैसी विशिष्ट श्रेणी में ला खड़ा करता है, वह गुण है-अपनी राय पर स्वयं अमल ना करना। उदाहरण के तौर पर रायचन्द यदि आपको देशभक्ति पर राय दे रहे हैं तो स्वयं वे कितने बड़े देशभक्त हैं या देशहित व देश की प्रगति के लिए उन्होंने क्या-क्या कार्य किए हैं यह पूछना आपकी सेहत के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है। ऐसी अशिष्टता करने से रायचन्द भड़क जाते हैं और आपको शारीरिक चोट भी पहुंचा सकते हैं। इनका कार्य केवल दूसरों को राय अर्थात् सलाह देना होता है स्वयं उस पर अमल करना नहीं। वर्तमान काल में हमारे देश में रायचन्द नामक प्रजाति तेजी से फल-फूल रही है। अब इससे देश व समाज को क्या लाभ हो रहा है यह तो कोई रायचन्द ही बेहतर बता सकता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

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