1. अनभ्यासे विषं विद्या, अजीर्णे भोजनं विषं।
विषं सभा दरिद्रस्य, वृद्ध पुरूषस्य तरूणी विषं॥
विषं सभा दरिद्रस्य, वृद्ध पुरूषस्य तरूणी विषं॥
अर्थ- बिना अभ्यास के विद्या विष के सामान है, बिना पचा भोजन विष के समान
है, दरिद्रों की सभा विष के समान है और वृद्ध पुरूष के लिए जवान स्त्री विष के समान
है।
2. असंतुष्टा द्विजा नष्टा: सन्तुष्टाश्च महीभुज:।
सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलांगना॥
सलज्जा गणिका नष्टा निर्लज्जाश्च कुलांगना॥
अर्थ- असंतुष्ट रहने से ब्राह्मण नष्ट हो जाते हैं, संतुष्ट रहने से राजा नष्ट हो जाते हैं, लज्जावान वेश्या नष्ट हो जाती है एवं कुल की स्त्रियां निर्लज्ज होने से नष्ट हो जाती हैं।
3. शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात्परं सुखं।
न तृष्ण्याया: परो व्याधि: न च धर्मो दयासम:॥
न तृष्ण्याया: परो व्याधि: न च धर्मो दयासम:॥
अर्थ- शान्ति के समान कोई तप नहीं है, सन्तोष के समान कोई सुख नहीं है, तृष्णा के समान कोई संकट नहीं है एवं दया के समान कोई धर्म नहीं है।
4. उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्।
मौने च कलहो नास्ति-नास्ति जागृतो भयम्॥
अर्थ- परिश्रम से दरिद्रता का नाश होता है, जप से पाप का नाश होता है, मौन से कलह का नाश होता है एवं जागरण से भय का नाश होता है।
5. कोकिलानां स्वरो रूपं स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम्।
विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥
अर्थ-कोयल की वाणी ही उसका सौंदर्य (रूप) है, स्त्री के लिए पतिव्रत धर्म ही उसका सौंदर्य (रूप) है, कुरूप व्यक्ति के लिए उसकी विद्या ही उसका सौंदर्य (रूप) है एवं तपस्वियों के लिए क्षमा ही ही उनका सौंदर्य (रूप) है।
साभार- नीतिशास्त्र
प्रस्तुति: ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

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