चहुँओर अँधियारा है
दिनकर भी थक हारा है
लेकिन मेरी देहरी पर
उजियारे को लाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...
तन्हाई का डेरा है
दु:ख ने किया बसेरा है
इस भीषण दावानल में
अपना हाथ बढ़ाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा...
बहुत दूर किनारा है
प्रतिकूल नदी की धारा है
भँवर में फँसी नैया की
अब पतवार चलाना होगा
तुम्हें दीप जलाना होगा....
-ज्योतिर्विद
पं. हेमन्त रिछारिया

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