जब भी फ़िल्म "पानसिंह तोमर" देखता हूं तो मुझे बड़ी पीड़ा होती है। आखिर कैसे हमारी भ्रष्ट व्यवस्था ने एक अन्तर्राष्ट्रीय एथलीट को डकैत बना दिया। आप भी जानिए कहानी "पानसिंह तोमर" की-
- पानसिंह तोमर वर्ष 1949 फ़ौज में भर्ती हुए।
- पानसिंह तोमर वर्ष 1958 में स्टीपल चेज़ (बाधा दौड़) के नम्बर 1 खिलाड़ी बनें।
- पानसिंह तोमर 7 वर्षों तक लगातार नेशनल चैम्पियन रहे।
- पानसिंह तोमर ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 30 पदक जीते।
- पानसिंह तोमर ने वर्ष 1979 में फ़ौज से रिटायरमेन्ट लिया।
- पानसिंह तोमर अपनी 1 बीघा जमीन वापस लेने के लिए बागी बने।
- पानसिंह तोमर का एनकाउण्टर 1 अक्टूबर 1981 को पुलिस अधिकारी एम. पी. सिंह चौहान ने किया।
- पानसिंह तोमर को पहली गोली हवलदार त्रिभुवन सिंह की लगी।
इनका कहना है-
* पानसिंह बहुत ही अच्छा और हंसमुख इंसान था मगर हालात के कारण उसे डाकू बनना पड़ा
(मिल्खा सिंह)
* पानसिंह शराफ़त के पुतले थे- जे.एस. सैनी (पानसिंह के कोच व पूर्व नेशनल कोच)
* पानसिंह तो फ़ौज का आदमी था; अच्छा आदमी था, जमीन वापस दिला देते तो डकैत नहीं बनता।
(दस्यु मोहर सिंह गुर्जर)
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| पानसिंह का परिवार |
मुठभेड़ के बाद पानसिंह की आखिरी तस्वीर-
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| मृतक पानसिंह तोमर |
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| एम. पी. सिंह चौहान |





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