हिय प्रांगण वीरान न होतापीडा का मुझको भान न होता
कल्पनाओं को पंख न लगते
अभिव्यक्ति उनमान न होता
नैनोंं से काजल न बहता
स्वप्न कोई पलकों पे रहता
न टूटी मन की तारें होतीं
न यों नित तकरारें होतीं
मुस्काने को मुझ पागल के
होंंठ अगर ये हिले न होते
फूल अधूरी आशाओं के
मरूभूमि पर खिले न होते
काश! हमें तुम मिले न होते
-दीपिका 'ओझल'
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