मंगलवार, 3 अगस्त 2021

कब करें हवन, क्या होता "अग्निवास"!

 

हमारे सनातन धर्म में हवन, यज्ञ, अग्निहोत्र का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दू परम्परा में कोई भी मांगलिक कार्य हवन किए बिना सम्पूर्ण नहीं माना जाता चाहे वह विवाह हो, देव प्रतिष्ठा हो, गृहप्रवेश हो, व्रतोद्यापन, ग्रहशान्ति अनुष्ठान आदि सभी कार्यों की पूर्णता हवन से ही होती है। शास्त्रानुसार विप्रों को तो नित्य अग्निहोत्र करना चाहिए किन्तु जब कभी किसी विशेष कार्य हेतु हवन करना हो तो उसमें अग्निवास का पृथ्वी पर होना अनिवार्य माना गया है। हवन की अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है इसलिए हवन वाले दिन अग्नि का वास पृथ्वी पर होना आवश्यक होता है। वहीं अग्नि की साक्षी भी मांगलिक कार्यों में महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। अत: अग्निवास के पृथ्वी पर होने से हवन के शुभफलों में वृद्धि होकर कार्य सिद्धि में कोई भी संशय नहीं रहता है। आज हम अपने पाठकों के लिए यह महत्त्वपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं कि पक्षानुसार किन तिथियों व दिनों में अग्नि का वास पृथ्वी पर होता है। आईए जानते हैं-

-नीचे दिए गए विवरण में जब अमुक तिथि; अमुक वार को होगी तभी अग्निवास पृथ्वी पर होगा जैसे कृष्ण पक्ष प्रतिपदा के दिन यदि सोमवार और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को रविवार होगा तो अग्निवास पृथ्वी पर होगा अत: इस दिन हवन करना अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक उत्तम व श्रेयस्कर रहेगा।

कृष्ण पक्ष  -    वार  -                   तिथि

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01-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - प्रतिपदा

02-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - द्वितीया

03-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - तृतीया

04-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - चतुर्थी

05-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - पंचमी

06-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - षष्ठी

07-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - सप्तमी

08-         मंगलवार-बुधवार,शनिवार                - अष्टमी

09-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - नवमी

10-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - दशमी

11-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - एकादशी

12-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - द्वादशी

13-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - त्रयोदशी

14-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - चतुर्दशी

15-         रविवार,मंगलवार,बुधवार                 - अमावस

शुक्ल पक्ष  -    वार                      -तिथि

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01-         रविवार, सोमवार, गुरूवार,शुक्रवार         - प्रतिपदा

02-         रविवार,बुधवार,,गुरूवार                 - द्वितीया

03-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - तृतीया

04-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - चतुर्थी

05-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - पंचमी

06-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - षष्ठी

07-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - सप्तमी

08-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - अष्टमी

09-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - नवमी

10-         रविवार,बुधवार,गुरूवार                  - दशमी

11-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - एकादशी

12-         सोमवार,मंगलवार,शुक्रवार,शनिवार         - द्वादशी

13-         रविवार,सोमवार,गुरूवार,शुक्रवार           - त्रयोदशी

14-         रविवार,मंगलवार,बुधवार                 - चतुर्दशी

15-         मंगलवार,बुधवार,शनिवार                - पूर्णिमा

 

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

 

 

 

बुधवार, 14 जुलाई 2021

17 जुलाई 2021 से होंगे सूर्य "दक्षिणायण"-

 


इस माह की दिनांक 17, आषाढ़ शुक्ल अष्टमी, दिन शनिवार से सूर्यदेव "दक्षिणायण" होने जा रहे हैं। हमारे शास्त्रों में सूर्य के "दक्षिणायण" व "उत्तरायण" होने का विशेष महत्त्व होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत में इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त होने पर भी पितामह भीष्म ने अपनी देहत्याग कर मृत्युलोक से प्रस्थान करने के लिए सूर्य के "उत्तरायण" होने की प्रतीक्षा की थी। ऐसी मान्यता है कि सूर्य के "उत्तरायण" रहते देहत्याग होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है जबकि "दक्षिणायण" के समय मृत्यु होने पर जीव को पुन: इस नश्वर संसार में लौटना पड़ता है।

क्या है "उत्तरायण" व "दक्षिणायण"-

शास्त्रानुसार एक सौर वर्ष में दो अयन होते हैं।

1. उत्तरायण 2. दक्षिणायण

1. उत्तरायण-सूर्य की उत्तर गति अर्थात् चलन को सूर्य का "उत्तरायण" (सौम्यायन) होना कहा जाता है। गोचरवश जब सूर्य मकर राशि से मिथुन राशि तक गोचर करता है तब इस अवधि को सूर्य का "उत्तरायण" होना कहा जाता है। "उत्तरायण" का प्रारम्भ "मकर-संक्रान्ति" से होता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है। यह अत्यन्त शुभ व सकारात्मक होता है। अत: समस्त शुभ एवं मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुण्डन, दीक्षा, गृहप्रवेश, व्रतोद्यापन, उपनयन संस्कार (जनेऊ), देव-प्रतिष्ठा आदि सूर्य के "उत्तरायण" रहते ही अधिक श्रेयस्कर माने गए हैं। उत्तरायण में शिशिर, वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतु आती हैं।

2. दक्षिणायण-सूर्य की दक्षिण गति अर्थात् चलन को सूर्य का "दक्षिणायन" (याम्यायन) होना कहा जाता है। गोचरवश जब सूर्य कर्क राशि से धनु राशि तक गोचर करता है तब इस अवधि को सूर्य का "दक्षिणायण" कहा जाता है। "दक्षिणायण" का प्रारम्भ कर्क-संक्रान्ति से होता है। दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि माना गया है। यह काल अत्यन्त नकारात्मक व निर्बल होता है। अत: समस्त शुभ एवं मांगलिक कार्यों जैसे विवाह, मुण्डन, दीक्षा, गृहप्रवेश, व्रतोद्यापन, उपनयन संस्कार (जनेऊ), देव-प्रतिष्ठा आदि का सूर्य के "दक्षिणायण" रहते निषेध होता है किन्तु अत्यावश्यक होने पर यथोचित वैदिक पूजन कर इन्हें सम्पन्न किया जा सकता है। दक्षिणायण में वर्षा, शरद एवं हेमन्त ऋतु आती हैं।

क्या होती है संक्रान्ति-

शास्त्रानुसार सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में गोचरवश प्रवेश करने को "संक्रान्ति" कहा जाता है। एक सौर वर्ष में बारह संक्रान्तियां आती हैं। सूर्य गोचरवश एक राशि में एक माह तक रहते है अत: संक्रान्ति प्रतिमाह आती है। गोचरवश सूर्य जिस राशि में प्रवेश करते हैं उसी राशि के नाम के अनुसार संक्रान्ति का नाम होता है जैसे सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश को "कर्क संक्रान्ति" व मकर राशि में प्रवेश को "मकर संक्रान्ति" कहते हैं। इन समस्त बारह संक्रान्तियों में "मकर संक्रान्ति" का विशेष महत्त्व होता है क्योंकि इसी दिन से सूर्य "उत्तरायण" होते हैं।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

सोमवार, 12 जुलाई 2021

स्त्रियों को दण्डवत प्रणाम क्यों नहीं करना चाहिए..!

हमारे सनातन धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के लिए यथासामर्थ्य पूजा करना अनिवार्य बताया गया है। शास्त्रों में पूजा करने के विविध रूप व विधान बताए गए हैं। जिनके माध्यम से श्रद्धालु अपने इष्टदेव की पूजा कर उनके श्रीचरणों में अपनी श्रद्धा ज्ञापित कर सकता है। पूजा के यह विविध प्रकार पंचोपचार,दशोपचार,षोडशोपचार पूजन कहे जाते हैं। इन सभी प्रकारों में सर्वश्रेष्ठ प्रकार षोडषोपचार पूजन विधि का माना गया है। षोडषोपचार पूजन विधि में सोलह विविध उपचारों से भगवान की पूजा की जाती है जिसमें अन्तिम उपचार षाष्टांग दण्डवत प्रणाम माना गया है। दण्डवत प्रणाम की हमारी पूजा विधि में सर्वाधिक मान्यता होती है। दण्डवत प्रणाम को सभी प्रकार के प्रणामों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है किन्तु क्या आप यह जानते हैं कि हमारे शास्त्रों में स्त्रियों को दण्डवत प्रणाम करने का सर्वथा निषेध है। शास्त्रनुआर स्त्रियों को कभी भी किसी के भी सम्मुख दण्डवत प्रणाम नहीं करना चाहिए। आजकल अनेक स्थानों पर देखने में आता है कि स्त्रियां भी मन्दिरों, पूजास्थलों व परिक्रमा आदि में षाष्टांग दण्डवत प्रणाम करती हैं जो शास्त्रानुसार अनुचित है। ऐसा क्यों है इसका समाधान हमें "धर्मसिन्धु" नामक ग्रन्थ में मिलता है जिसमें स्पष्ट निर्देश है- "ब्राह्मणस्य गुदं शंखं शालिग्रामं च पुस्तकम्। वसुन्धरा न सहते कामिनी कुच मर्दनं॥ अर्थात् ब्राह्मणों का पृष्ठभाग, शंख, शालिग्राम, धर्मग्रन्थ (पुस्तक) एवं स्त्रियों का वक्षस्थल (स्तन) यदि सीधे भूमि (बिना आसन) का स्पर्श करते हैं तो पृथ्वी इस भार को सहन नहीं कर सकती है। इस असहनीय भार को सहने के कारण वह इस भार को डालने वाले से उसकी श्री (अष्ट लक्ष्मियों) का हरण कर लेती है। ब्राह्मणों का पृष्ठभाग, शंख, शालिग्राम, धर्मग्रन्थ (पुस्तक) एवं स्त्रियों के वक्षस्थल को पृथ्वी पर सीधे स्पर्श कराने वाले की अष्ट-लक्ष्मियों क्षय होने लगता है। अत: शास्त्र के इस निर्देशानुसार स्त्रियों को दण्डवत प्रणाम कभी नहीं करना चाहिए। स्त्रियों को दण्डवत प्रणाम के स्थान पर घुटनों के बल बैठकर अपना मस्तक भूमि से लगाकर ही प्रणाम करना चाहिए एवं ब्राह्मणों को, शंख को, शालिग्राम भगवान को, धर्मग्रन्थ (पुस्तक) को सदैव उनके यथोचित आसन पर ही विराजमान कराना चाहिए। 
 
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया 
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र 
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com 
 
प्रणाम की सही मुद्रा-

गुरुवार, 20 मई 2021

शनै: शनै: हिन्दुत्व फैशन बनता जा रहा है।

मेरे देखे वर्तमान समय में हिन्दुत्व फैशन बनता जा रहा है। जिस प्रकार वस्त्र, केश सज्जा आदि की जब एक विशेष प्रकार की फैशन आती तो सभी उसी फैशन का अनुसरण करने लगने में अपनी शान समझते हैं। फैशन प्रारम्भ होती है किसी प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा....इसीलिए तो कम्पनियां बड़े-बड़े अभिनेताओं से विज्ञापन करवाती हैं ताकि आम लोग उन्हें देखकर उसका अनुसरण करें बिना इसका परीक्षण किए कि जो वह अभिनेता कह या कर रहा है वह उनके लिए उचित है भी या नहीं। वे बस उस अभिनेता का अनुसरण अपने अहंकार को तुष्ट करना चाहते हैं और करते भी हैं। धीरे-धीरे अब यही बात "हिन्दुत्व" पर भी लागू हो रही है। आज हर ग्रुप या मित्र के वाट्सअप सन्देश के माध्यम से हिन्दुत्व का तथाकथित समर्थन करते और विधर्मियों की लानत-मनामत करती खबरें आप तक निश्चय ही पहुंच रहीं होंगी। ऐसे सन्देशों का प्रामाणिकता व उद्गम (sorce) का परीक्षण किए बिना ही स्वयं को हिन्दुत्व का बड़ा पैरोकार मानने वाले अन्य समूहों व मित्रों को भेजकर हिन्दुत्व की रक्षा में तत्पर बैठे रहते हैं। पाठकों से निवेदन है कि इन समर्थकों द्वारा प्रेषित सन्देशों का तटस्थ रूप से परीक्षण करते हुए निम्न प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास कीजिए। 1. क्या मारपीट, दंगा, लूट, कानून-व्यवस्था का उल्लंघन, आदि कार्य केवल कुछ विशेष व्यक्तियों द्वारा ही किए जाते हैं या अराजक तत्वों द्वारा? 2. क्या वाट्सअप पर ऐसे सन्देश अन्य मित्रों को भेजने से इस प्रकार के कृत्यों पर रोक लगेगी? 3. क्या वाट्सअप का मंच सही व उचित जगह है या फिर पुलिस-थाना व कोर्ट? 4. इस प्रकार की सामग्री अग्रेषित करने या रिकार्ड करने वाले स्वयं उचित मन्च पर इसकी शिकायत क्यों नहीं करते? ऐसे सन्देशों में लिखी शब्दावली को पढ़कर ही स्पष्ट हो जाता है कि जिन्हें शुद्ध हिन्दी तक लिखना नहीं आ रही वे हिन्दुत्व के पैरोकार बने बैठे है। उनकी बुद्धि का स्तर उनकी लेखनी से ही स्पष्ट हो रहा है कि वे मात्र हिन्दुत्व के फैशन से प्रभावित होकर ये सब कर रहे हैं। हर बात को एक धर्म विशेष के चश्में से देखना अब तक विधर्मियों की आदत थी अफ़सोस अब यह स्वधर्मियों की भी बनती जा रही है। हम एक अति से दूसरी अति की ओर बढ़ चले हैं और शास्त्र का बहुमूल्य वचन है-"अति सर्वत्र वर्जयेत्।"

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

कोरोनाकाल में प्रियजन की विदाई



हमारे सनातन धर्म में षोडश संस्कारों का विशेष महत्त्व होता है। जीवात्मा गर्भ में प्रवेश से लेकर देहत्याग करने तक सोलह प्रकार के विभिन्न संस्कारों से गुजरता है। सनातन धर्मानुसार वैसे तो सभी सोलह संस्कार आवश्यक हैं किन्तु देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कुछ संस्कारों का लोप हो जाता है। इन षोडश संस्कारों में जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दो संस्कार हैं वे हैं गर्भाधान एवं अन्तिम-संस्कार, क्योंक गर्भाधान संस्कार के दौरान हम गर्भ में श्रेष्ठ आत्मा का आवाहन करते हैं एवं अन्तिम संस्कार में हम उस आत्मा को विदाई देते हैं। हमारे शास्त्रों में इन दोनों संस्कारों सहित सभी षोडश संस्कारों को करने का पूर्ण विधि-विधान उल्लेखित है जिसके अनुसार हमें यथासमय यह संस्कार करने चाहिए। वर्तमान समय में हमारी पीढ़ी व देश "कोरोना" महामारी नामक एक विकट समस्या से जूझ रहा है। इस महामारी ने असमय ही कई लोगों से उनके प्रियजनों को छीन लिया है। इस महामारी के प्रकोप से बचने के लिए चिकित्सकों द्वारा इस रोग से अपने प्राण गंवा चुके व्यक्तियों का अन्तिम-संस्कार भी एक विशेष रीति से करने का मार्गदर्शन दिया गया है, जिसमें प्रियजनों को दाह-संस्कार से दूर रखा जाता है। आज अनेक नगरों में "लाकडाऊन" भी लगा हुआ है जिससे अन्तिम-संस्कार के बाद की क्रियाएं भी विधिवत् सम्पन्न नहीं हो पा रही हैं। हमारे शास्त्रों के अनुसार यदि व्यक्ति का अन्तिम-संस्कार पूर्ण विधि-विधान से नहीं किया जाता है तो उसकी आत्मा को सद्गति प्राप्त नहीं होती है। ऐसे में दिवंगत व्यक्तियों के परिजनों के समक्ष बड़ी दुविधा है कि वे अपने प्रियजन को शास्त्रानुसार विदाई किस प्रकार दें, जिससे उनकी आत्मा को सद्गति प्राप्त हो। मित्रों, इसे प्रभु की इच्छा व उनके विराट रूप का प्राकट्य ही कहें कि हमें इस विषय पर आलेख के माध्यम से आपका मार्गदर्शन करना पड़ रहा है। बहरहाल, "हरि इच्छा बलवान" को स्वीकार करते हुए आज हम "सरल-चेतना" के पाठकों को "कोरोना" से दिवंगत हुए व्यक्तियों के अन्तिम-संस्कार के बारे उनके परिजनों हेतु कुछ शास्त्रोक्त जानकारी देंगे। आप सभी को विदित है कि इस महामारी से दिवंगत हुए व्यक्तियों के अन्तिम-संस्कार में उनके परिजनों को दूर रखा जा रहा है एवं उत्तर क्रिया जैसे दशगात्र आदि के लिए भी ब्राह्मण उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं ऐसे में उनका श्राद्ध किस प्रकार किया जाए इस सम्बन्ध में शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है-"श्रद्धया इदं श्राद्धम्" अर्थात् श्रद्धा से ही श्राद्ध है। आप इस नियम के अनुसार अपने दिवंगत हो चुके प्रियजन के लिए पूर्ण श्रद्धा से दस अथवा तेरह (देश-काल-लोक परम्परा अनुसार ) दिनों तक निम्न कर्म करें।

1. शास्त्र का वचन है-"तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि" अर्थात् धनाभाव अथवा अन्य कोई प्रतिकूल परिस्थिति होने पर दिवंगत व्यक्ति के परिजन केवल शाक (हरी सब्जी, जैसे पालक इत्यादि) के माध्यम से श्राद्ध सम्पन्न कर सकते हैं। दस अथवा तेरह दिनों तक प्रतिदिन कुतपकाल (अपरान्ह 11:35 से 12:35) के मध्य गाय को शाक खिलाने से श्राद्ध की पूर्णता होती है।

शाक की अनुपलब्धता होने पर विष्णु पुराण का निर्देश है कि कुतपकाल में श्राद्धकर्ता एकान्त में खुले आकाश के नीचे जाकर अपने हाथों को आसमान की ओर उठाकर यह प्रार्थना करे-" हे मेरे प्रियजन! मेरे पास श्राद्ध करने के लिए अनुकूल परिस्थिति नहीं है किन्तु मेरे पास आपके निमित्त श्रद्धा व भक्ति है। मैं इन्हीं के द्वारा आपको संतुष्ट करना चाहता हूं और मैंने शास्त्राज्ञा में अपने दोनों हाथ आकाश में उठा रखे हैं। आप मेरी श्रद्धा व भक्ति से ही तृप्त हों।"

2. दीपदान- दस अथवा तेरह (देश-काल-लोक परम्परा अनुसार ) दिनों तक दक्षिण दिशा में अपने दिवंगत हो चुके प्रियजन के लिए तिल के तेल (तिल के अभाव में किसी भी तेल) का दीपक प्रज्जवलित करें।

नारायबलि कर्म-

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उपर्युक्त वर्णित शास्त्रोक्त निर्देश आपत्तिकाल के लिए त्वरित करने योग्य कर्म हैं किन्तु इनके करने मात्र से विधिवत् अन्तिम-संस्कार ना किए जाने सम्बन्धी दोष का निवारण तब तक नहीं होगा जब तक कि इस निमित्त "नारायणबलि कर्म" को सम्पन्न ना कर लिया जाए क्योंकि ऐसे व्यक्ति जिनका शास्त्रोक्त रीति से विधिवत् अन्तिम-संस्कार नहीं किया जाता है वे सभी "दुर्मरण" की श्रेणी में आते हैं एवं "दुर्मरण" वाले व्यक्तियों के निमित्त "नारायणबलि" कर्म का किया जाना अत्यन्त आवश्यक होता है। शास्त्रानुसार "नारायणबलि" कर्म ना करने से दिवंगत आत्मा को सद्गति  प्राप्त नहीं होती है। "नारायणबलि" कर्म परिस्थिति सामान्य होने के उपरान्त किसी भी श्राद्धपक्ष में सम्पन्न किया जा सकता है। यदि "नारायणबलि" कर्म किसी तीर्थक्षेत्र या पवित्र नदी के तट पर दिवंगत होने की तिथि से तीन वर्षों के अन्दर सम्पन्न किया जाता है तो इसके शुभफल में अतीव वृद्धि होती है एवं दिवंगत व्यक्ति को सद्गति प्राप्त होने में किसी प्रकार का संशय नहीं रह जाता है। अत: हमारा पाठकों से विशेष निवेदन है कि जिनके परिजन भी "कोरोना" महामारी से दिवगंत हुए हो वे अपनी सुविधानुसार उनके निमित्त "नारायणबलि" कर्म अवश्य सम्पन्न करें जिससे उन्हें सद्गति प्राप्त हो।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com