गुरुवार, 20 मई 2021

शनै: शनै: हिन्दुत्व फैशन बनता जा रहा है।

मेरे देखे वर्तमान समय में हिन्दुत्व फैशन बनता जा रहा है। जिस प्रकार वस्त्र, केश सज्जा आदि की जब एक विशेष प्रकार की फैशन आती तो सभी उसी फैशन का अनुसरण करने लगने में अपनी शान समझते हैं। फैशन प्रारम्भ होती है किसी प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा....इसीलिए तो कम्पनियां बड़े-बड़े अभिनेताओं से विज्ञापन करवाती हैं ताकि आम लोग उन्हें देखकर उसका अनुसरण करें बिना इसका परीक्षण किए कि जो वह अभिनेता कह या कर रहा है वह उनके लिए उचित है भी या नहीं। वे बस उस अभिनेता का अनुसरण अपने अहंकार को तुष्ट करना चाहते हैं और करते भी हैं। धीरे-धीरे अब यही बात "हिन्दुत्व" पर भी लागू हो रही है। आज हर ग्रुप या मित्र के वाट्सअप सन्देश के माध्यम से हिन्दुत्व का तथाकथित समर्थन करते और विधर्मियों की लानत-मनामत करती खबरें आप तक निश्चय ही पहुंच रहीं होंगी। ऐसे सन्देशों का प्रामाणिकता व उद्गम (sorce) का परीक्षण किए बिना ही स्वयं को हिन्दुत्व का बड़ा पैरोकार मानने वाले अन्य समूहों व मित्रों को भेजकर हिन्दुत्व की रक्षा में तत्पर बैठे रहते हैं। पाठकों से निवेदन है कि इन समर्थकों द्वारा प्रेषित सन्देशों का तटस्थ रूप से परीक्षण करते हुए निम्न प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयास कीजिए। 1. क्या मारपीट, दंगा, लूट, कानून-व्यवस्था का उल्लंघन, आदि कार्य केवल कुछ विशेष व्यक्तियों द्वारा ही किए जाते हैं या अराजक तत्वों द्वारा? 2. क्या वाट्सअप पर ऐसे सन्देश अन्य मित्रों को भेजने से इस प्रकार के कृत्यों पर रोक लगेगी? 3. क्या वाट्सअप का मंच सही व उचित जगह है या फिर पुलिस-थाना व कोर्ट? 4. इस प्रकार की सामग्री अग्रेषित करने या रिकार्ड करने वाले स्वयं उचित मन्च पर इसकी शिकायत क्यों नहीं करते? ऐसे सन्देशों में लिखी शब्दावली को पढ़कर ही स्पष्ट हो जाता है कि जिन्हें शुद्ध हिन्दी तक लिखना नहीं आ रही वे हिन्दुत्व के पैरोकार बने बैठे है। उनकी बुद्धि का स्तर उनकी लेखनी से ही स्पष्ट हो रहा है कि वे मात्र हिन्दुत्व के फैशन से प्रभावित होकर ये सब कर रहे हैं। हर बात को एक धर्म विशेष के चश्में से देखना अब तक विधर्मियों की आदत थी अफ़सोस अब यह स्वधर्मियों की भी बनती जा रही है। हम एक अति से दूसरी अति की ओर बढ़ चले हैं और शास्त्र का बहुमूल्य वचन है-"अति सर्वत्र वर्जयेत्।"

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

कोरोनाकाल में प्रियजन की विदाई



हमारे सनातन धर्म में षोडश संस्कारों का विशेष महत्त्व होता है। जीवात्मा गर्भ में प्रवेश से लेकर देहत्याग करने तक सोलह प्रकार के विभिन्न संस्कारों से गुजरता है। सनातन धर्मानुसार वैसे तो सभी सोलह संस्कार आवश्यक हैं किन्तु देश-काल-परिस्थिति के अनुसार कुछ संस्कारों का लोप हो जाता है। इन षोडश संस्कारों में जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दो संस्कार हैं वे हैं गर्भाधान एवं अन्तिम-संस्कार, क्योंक गर्भाधान संस्कार के दौरान हम गर्भ में श्रेष्ठ आत्मा का आवाहन करते हैं एवं अन्तिम संस्कार में हम उस आत्मा को विदाई देते हैं। हमारे शास्त्रों में इन दोनों संस्कारों सहित सभी षोडश संस्कारों को करने का पूर्ण विधि-विधान उल्लेखित है जिसके अनुसार हमें यथासमय यह संस्कार करने चाहिए। वर्तमान समय में हमारी पीढ़ी व देश "कोरोना" महामारी नामक एक विकट समस्या से जूझ रहा है। इस महामारी ने असमय ही कई लोगों से उनके प्रियजनों को छीन लिया है। इस महामारी के प्रकोप से बचने के लिए चिकित्सकों द्वारा इस रोग से अपने प्राण गंवा चुके व्यक्तियों का अन्तिम-संस्कार भी एक विशेष रीति से करने का मार्गदर्शन दिया गया है, जिसमें प्रियजनों को दाह-संस्कार से दूर रखा जाता है। आज अनेक नगरों में "लाकडाऊन" भी लगा हुआ है जिससे अन्तिम-संस्कार के बाद की क्रियाएं भी विधिवत् सम्पन्न नहीं हो पा रही हैं। हमारे शास्त्रों के अनुसार यदि व्यक्ति का अन्तिम-संस्कार पूर्ण विधि-विधान से नहीं किया जाता है तो उसकी आत्मा को सद्गति प्राप्त नहीं होती है। ऐसे में दिवंगत व्यक्तियों के परिजनों के समक्ष बड़ी दुविधा है कि वे अपने प्रियजन को शास्त्रानुसार विदाई किस प्रकार दें, जिससे उनकी आत्मा को सद्गति प्राप्त हो। मित्रों, इसे प्रभु की इच्छा व उनके विराट रूप का प्राकट्य ही कहें कि हमें इस विषय पर आलेख के माध्यम से आपका मार्गदर्शन करना पड़ रहा है। बहरहाल, "हरि इच्छा बलवान" को स्वीकार करते हुए आज हम "सरल-चेतना" के पाठकों को "कोरोना" से दिवंगत हुए व्यक्तियों के अन्तिम-संस्कार के बारे उनके परिजनों हेतु कुछ शास्त्रोक्त जानकारी देंगे। आप सभी को विदित है कि इस महामारी से दिवंगत हुए व्यक्तियों के अन्तिम-संस्कार में उनके परिजनों को दूर रखा जा रहा है एवं उत्तर क्रिया जैसे दशगात्र आदि के लिए भी ब्राह्मण उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं ऐसे में उनका श्राद्ध किस प्रकार किया जाए इस सम्बन्ध में शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है-"श्रद्धया इदं श्राद्धम्" अर्थात् श्रद्धा से ही श्राद्ध है। आप इस नियम के अनुसार अपने दिवंगत हो चुके प्रियजन के लिए पूर्ण श्रद्धा से दस अथवा तेरह (देश-काल-लोक परम्परा अनुसार ) दिनों तक निम्न कर्म करें।

1. शास्त्र का वचन है-"तस्माच्छ्राद्धं नरो भक्त्या शाकैरपि यथाविधि" अर्थात् धनाभाव अथवा अन्य कोई प्रतिकूल परिस्थिति होने पर दिवंगत व्यक्ति के परिजन केवल शाक (हरी सब्जी, जैसे पालक इत्यादि) के माध्यम से श्राद्ध सम्पन्न कर सकते हैं। दस अथवा तेरह दिनों तक प्रतिदिन कुतपकाल (अपरान्ह 11:35 से 12:35) के मध्य गाय को शाक खिलाने से श्राद्ध की पूर्णता होती है।

शाक की अनुपलब्धता होने पर विष्णु पुराण का निर्देश है कि कुतपकाल में श्राद्धकर्ता एकान्त में खुले आकाश के नीचे जाकर अपने हाथों को आसमान की ओर उठाकर यह प्रार्थना करे-" हे मेरे प्रियजन! मेरे पास श्राद्ध करने के लिए अनुकूल परिस्थिति नहीं है किन्तु मेरे पास आपके निमित्त श्रद्धा व भक्ति है। मैं इन्हीं के द्वारा आपको संतुष्ट करना चाहता हूं और मैंने शास्त्राज्ञा में अपने दोनों हाथ आकाश में उठा रखे हैं। आप मेरी श्रद्धा व भक्ति से ही तृप्त हों।"

2. दीपदान- दस अथवा तेरह (देश-काल-लोक परम्परा अनुसार ) दिनों तक दक्षिण दिशा में अपने दिवंगत हो चुके प्रियजन के लिए तिल के तेल (तिल के अभाव में किसी भी तेल) का दीपक प्रज्जवलित करें।

नारायबलि कर्म-

-------------------

उपर्युक्त वर्णित शास्त्रोक्त निर्देश आपत्तिकाल के लिए त्वरित करने योग्य कर्म हैं किन्तु इनके करने मात्र से विधिवत् अन्तिम-संस्कार ना किए जाने सम्बन्धी दोष का निवारण तब तक नहीं होगा जब तक कि इस निमित्त "नारायणबलि कर्म" को सम्पन्न ना कर लिया जाए क्योंकि ऐसे व्यक्ति जिनका शास्त्रोक्त रीति से विधिवत् अन्तिम-संस्कार नहीं किया जाता है वे सभी "दुर्मरण" की श्रेणी में आते हैं एवं "दुर्मरण" वाले व्यक्तियों के निमित्त "नारायणबलि" कर्म का किया जाना अत्यन्त आवश्यक होता है। शास्त्रानुसार "नारायणबलि" कर्म ना करने से दिवंगत आत्मा को सद्गति  प्राप्त नहीं होती है। "नारायणबलि" कर्म परिस्थिति सामान्य होने के उपरान्त किसी भी श्राद्धपक्ष में सम्पन्न किया जा सकता है। यदि "नारायणबलि" कर्म किसी तीर्थक्षेत्र या पवित्र नदी के तट पर दिवंगत होने की तिथि से तीन वर्षों के अन्दर सम्पन्न किया जाता है तो इसके शुभफल में अतीव वृद्धि होती है एवं दिवंगत व्यक्ति को सद्गति प्राप्त होने में किसी प्रकार का संशय नहीं रह जाता है। अत: हमारा पाठकों से विशेष निवेदन है कि जिनके परिजन भी "कोरोना" महामारी से दिवगंत हुए हो वे अपनी सुविधानुसार उनके निमित्त "नारायणबलि" कर्म अवश्य सम्पन्न करें जिससे उन्हें सद्गति प्राप्त हो।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

एकादशी व्रत कब करें

 


हमारे सनातन धर्म में एकादशी व्रत का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। शास्त्रानुसार हर हिन्दू धर्मावलम्बी के लिए एकादशी व्रत रखना श्रेयस्कर माना गया है वहीं वैष्णवों के लिए तो एकादशी  व्रत अनिवार्य बताया गया है। हिन्दू धर्म में एकादशी के व्रत को पुण्यदायक माना गया है। यह व्रत दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को किया जाता है लेकिन वर्तमान में अधिकतर श्रद्धालुओं को इस व्रत की तिथि निर्धारण को लेकर बड़ा असमंजस बना रहता है, इसका मुख्य कारण है पंचांगों में दो दिन एकादशी व्रत का उल्लेख होना। इसके कारण श्रद्धालुगण इस दुविधा में रहते हैं कि वे आखिर किस दिन एकादशी का व्रत करें। आज हम "सरल-चेतना" के पाठकों के लिए इस दुविधा का समाधान हेतु कुछ शास्त्रसम्मत जानकारियां दे रहे हैं-

1. सूर्योदयव्यापिनी तिथि (उदयातिथि) की सर्वग्राह्यता-

शास्त्रानुसार एकादशी व्रत में सदैव सूर्योदयव्यापिनी तिथि जिसे लोकभाषा में "उदयातिथि" कहते हैं; उसे ही ग्रहण किया जाता है अर्थात् जिस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि होगी उसी दिन एकादशी तिथि का व्रत रखा जाना चाहिए।

2. स्मार्त, वैष्णव एवं सर्व के लिए निर्देश-

जैसा की पूर्व में सूर्योदयव्यापिनी तिथि (उदयातिथि) की सर्वग्राह्यता के सम्बन्ध में शास्त्र का मत पाठकों को बताया जा चुका है लेकिन अक्सर पंचांगों में यह दो दिन बताया जाता है ऐसा इसलिए है क्योंकि सनातन धर्मानुसार स्मार्त व वैष्णव की श्रेणी अनुसार किसी भी व्रत को किया जाना श्रेयस्कर माना गया है। पाठकों ने अक्सर पंचांग में व्रत के आगे "स्मार्त" एवं "वैष्णव" लिखा देखा होगा। यह इस बात का संकेत है कि "स्मार्त" वाले दिन केवल स्मार्त श्रेणी के अन्तर्गत आने वाले श्रद्धालु उस व्रत को करेंगे एवं "वैष्णव" वाले दिन "वैष्णव" श्रेणी में आने वाले श्रद्धालुगण उस व्रत को करेंगे। जब व्रत के आगे "सर्वे." लिखा हो तो उस दिन "स्मार्त" एवं "वैष्णव" दोनों ही श्रेणी के श्रद्धालुगण उस व्रत को उस दिन कर सकते हैं। वर्तमान समय में कुछ पंचांगों में "निम्बार्क" भी लिखा जाने लगा है जिससे आशय है उस दिन "निम्बार्क" सम्प्रदाय के दीक्षित श्रद्धालु उस व्रत को करेंगे यद्यपि शास्त्रानुसार "स्मार्त" एवं "वैष्णव" श्रेणियां ही सर्वमान्य होती हैं।

"स्मार्त" व "वैष्णव" की श्रेणी में कौन आते हैं-

--------------------------------------------------

पंचांग अनुसार "स्मार्त" व "वैष्णव" की श्रेणी अन्तर्गत तिथि सुनिश्चित होने के उपरान्त अब दुविधा यह होती है कि इन श्रेणियों में कौन से श्रद्धालुगण आते हैं। आईए जानते हैं-

1. स्मार्त- इस श्रेणी के अन्तर्गत सभी गृहस्थ एवं वे श्रद्धालु आते हैं जो किसी भी वैष्णव सम्प्रदाय से दीक्षित नहीं हैं अर्थात् जिन्होंने "वैष्णव" सम्प्रदाय के गुरू से दीक्षा प्राप्त नहीं की है।

2. "वैष्णव"- इस श्रेणी के अन्तर्गत वे सभी श्रद्धालु आते हैं जो वैष्णव सम्प्रदाय से दीक्षित हैं और जिन्होंने "वैष्णव" सम्प्रदाय के गुरू से दीक्षा प्राप्त की है।

3. "निम्बार्क"- इस श्रेणी के अन्तर्गत वे सभी श्रद्धालु आते हैं जो "निम्बार्क" सम्प्रदाय से दीक्षित हैं और जिन्होंने "निम्बार्क" सम्प्रदाय के गुरू से दीक्षा प्राप्त की है।

हमारा विश्वास है कि उपर्युक्त विश्लेषण से अब पाठकों को किसी भी व्रत की तिथि के निर्धारण में किसी प्रकार की कोई दुविधा नहीं रहेगी। उपरोक्त शास्त्रसम्मत निर्देश केवल एकादशी ही नहीं अपितु हर व्रत की तिथि निर्धारण में समान रूप से लागू होता है। प्राचीन समय से मान्यता है कि "वैष्णवों" का व्रत "स्मार्त" के अगले दिन ही होता है।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

"समाज आगे सत्ता पीछे, तभी होगा स्वस्थ विकास"- गोविन्दाचार्य

  नर्मदा यात्रा व अध्ययन प्रवास पर निकले देश के प्रसिद्ध चिन्तक, विचारक और एक समय बीजेपी का "थिंक टैंक" माने जाने वाले श्री के.एन.गोविन्दाचार्य अपनी यात्रा प्रवास के दौरान 25 फरवरी 2021 को डोंगरवाड़ा नर्मदा तट पर स्थित "नर्मदा आश्रम" पहुंचे। उनकी इस यात्रा में सहयात्री बने ज्योतिषाचार्य पं. हेमन्त रिछारिया ने उनसे विभिन्न विषयों पर चर्चा की। प्रस्तुत है ज्योतिषाचार्य पं. हेमन्त रिछारिया के साथ श्री गोविन्दाचार्य की बातचीत के प्रमुख अंश-

  • पं. रिछारिया- आपकी नर्मदा यात्रा का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
  • श्री गोविन्दाचार्य-मेरी यह यात्रा नितान्त धार्मिक व आध्यात्मिक है। अपने अन्दर खुद को देखने की कोशिश है और नर्मदा मैया से प्रार्थना कि वे हमें आगे की राह दिखाएं। इस यात्रा का उद्देश्य बस इतना ही है।
  • पं. रिछारिया-हमारे देश में राजपथ है, राजभवन है, राजनीति है, नेताओं का व्यवहार राजा के जैसा है। क्या हम लोकतन्त्र की परिभाषा में चूक कर रहे हैं?
  • श्री गोविन्दाचार्य-हम पहले से चूक गए हैं। आजादी के पहले, आजादी के बाद की संरचना के लिए गांधी जी ने तीन विषयों पर विशेष जोर दिया, एक था सम्पूर्ण गौरक्षा, सम्पूर्ण गौहत्या बन्दी कानून बनना चाहिए। दूसरा था भारतीय भाषाओं को महत्त्व देना, अंग्रेजी जाए-अंग्रेजियत जाए। तीसरा ग्रामस्वराज्य की बात कही थी, उसके लिए पंचायतों को, ग्राम-सभाओं को मजबूत करना चाहिए, वो भी छूट गया। बहुत मुश्किल से गौहत्या बन्दी और पंचायती राज को संविधान के निदेशित सिद्धान्तों में समाविष्ट किया गया है। उसके बाद भी आधा-अधूरा काम हुआ जो व्यस्थित रूप से नहीं हो पाया। यहीं जो हम चूके, रास्ता भूल गए कहीं निकल गए। इसका मूल कारण मैं मानता हूं आत्मविश्वास का अभाव। आत्मविश्वास के अभाव में स्वालम्बन ना होकर परावलम्बन की नीति अपनाई। आत्मविश्वास का आधार होना चाहिए था स्वाभिमान, स्वाभिमान का आधार होना चाहिए था स्वत्व-बोध। स्वत्व-बोध में भारत की परम्परा के बारे में मन में अभिमान, वो चूक गए हम रास्ता, परानुकरण में लग गए। कभी देश को कुछ लोग रूस बनाने में लग गए, कभी चीन बनाने में लग गए, कभी अमेरिका बनाने में लग गए, आजकल कुछ लोग ब्राजील बनाने के चक्कर में हैं।
  • पं. रिछारिया-आपने कुछ वर्ष पूर्व कहा था कि राजनीति समाजाभिमुख होना चाहिए, सत्ताभिमुख नहीं। आज की राजनीति को कैसे देखते हैं, कुछ प्रगति हुई है?
  • श्री गोविन्दाचार्य-प्रगति तो समाज की ओर से हुई है मैं यह मानता हूं, राजनैतिक लोगों के द्वारा यह प्रगति नहीं हुई है। समाज जरूर मुंह फेर रहा है राजनैतिक लोगों से, राजनैतिक लोगों की प्रतिष्ठा व साख बुरी तरह गिरी है समाज की नज़रों में, यह समाज का वैशिष्ट है। राजनीति सामाजिक बदलाव का औज़ार ना रहकर सत्ता प्राप्ति का निरंकुश खेल बनकर रह गई है। इसमें येन-केन-प्रकारेण सत्ता प्राप्त करना और उस पर टिके रहना यही मानो लक्ष्य रह गया है। इसमें जनता की ओर से ही परिवर्तन की मुहिम चलानी पड़ेगी ऐसा मुझे लगता है।
  • पं. रिछारिया-राजनैतिक लोगों की प्रामाणिकता के पतन के पीछे आम जनता का कितना दायित्व व दोष देखते हैं आप?
  • श्री गोविन्दाचार्य-लोकतन्त्र में तो जन ही सर्वाधिक निर्णायक व सर्वोपरि है। जन की चेतना, जन की समझ और जन की हिस्सेदारी यही लोकतान्त्रिक प्रगति के रास्ते का उसूल है। इसमें समाज के स्तर पर और बहुत कुछ होना चाहिए था। राष्ट्रीय सत्ताभिमुखी ना हो समाज, समाज खुद अपना आंकलन करना सीखे। अब के वक्त का तकाज़ा है सही बात को डटकर बोले, जो जहां है वहीं से बोले, यह समाज पर ज्यादा लागू होता है बनिस्बत सत्ता के।
  • पं. रिछारिया- लेकिन आज समाज के बीच से कोई आवाज़ उठती है तो उसे देशद्रोह मान लिया जाता है।
  • श्री गोविन्दाचार्य-मानने या ना मानने का निर्णय करने वाले वे कौन होते हैं, समाज होता है। समाज आत्मविश्वास से अपने विवेक का इस्तेमाल करे और समाज में सत्ता की आपाधापी में ना लगने वाले लोग देश की आवाज़ बने यह आज देश की सबसे बड़ी ज़रूरत है। समाज के स्तर पर समझ भी है केवल किंकर्तव्यविमूढ़ता थोड़ी सी है इसलिए सिविल सोसायटी इसको कहा जाता है, सिविल सोसायटी का भारतीय संस्करण उत्पन्न होने की ज़रूरत है। इसमें मेरा कहना है कि धर्म-सत्ता, समाज-सत्ता, राज-सत्ता और अर्थ-सत्ता चारों स्तरों पर सत्ता की आपाधापी में ना उलझने वाले साखयुक्त लोगों की ताकत बननी चाहिए जिसको मैं कहता हूं सज्जन-शक्ति का आग्रह।
  • पं. रिछारिया-आपको नहीं लगता कि आज जनप्रतिनिधियों ने लोकतन्त्र को शीर्षासन करवा दिया है? जनप्रतिनिधियों का कार्य है लोक की बात संसद तक पहुंचे परन्तु वे उल्टे दल की बात लोगों तक पहुंचाने लगे हैं।
  • श्री गोविन्दाचार्य-मानता हूं, मगर इसमें दोष किसका कहें जब कुएं में ही भांग पड़ी हो तो बाल्टी में निकालिए तो भी वही मिलेगा, लोटे में निकालिए तो भी वही मिलेगा इसलिए बात तो वहां है कि समाज के स्तर पर चेतनासमग्र हिस्सेदारी बढ़ाने की ज़रूरत है। मैं मानता हूं कि वह निचले स्तर से ही शुरू होना पड़ेगा। उच्च-स्तर पर बदलाव का उत्तर ही है निचले स्तर से शुरूआत। समाज आगे सत्ता पीछे, तभी होगा स्वस्थ विकास।
  • पं. रिछारिया-आप पर्यावरण प्रदूषण के लिए बौद्धिक प्रदूषण को कितना ज़िम्मेवार मानते हैं?
  • श्री गोविन्दाचार्य-भारत का आधार है संयमित उपभोग, पश्चिम बाजारवाद का उसूल है पाशविक उपभोग। मूलत: उपभोग में संयम जीवनशैली का हिस्सा है। इसके लिए धर्म-सत्ता, समाज-सत्ता आगे बढ़े और अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करे, यह वक्त की ज़रूरत है।
  • पं. रिछारिया-क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने चरमोत्कर्ष के बाद अब उतार की ओर अग्रसर है?
  • श्री गोविन्दाचार्य-मुझे तो यह नहीं मालूम। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सत्ता पर निर्भर नहीं है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार तो भरपूर हुआ है। दुनियाभर में सबसे बड़ा संगठन है। समाज के अराजक तत्वों पर अगर कोई सबसे बड़ा अवरोध है तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है।

                   


 

 

 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

जन्मपत्रिका में ज्योतिषी बनने के योग

 

आज जैसे-जैसे विज्ञान प्रगति के सोपान चढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ज्योतिष व विज्ञान का फ़ासला कम होता जा रहा है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आने वाले कुछ दशकों में ज्योतिष विज्ञान के रूप में प्रसिद्धि पा लेगा लेकिन यह तभी सम्भव है जब श्रेष्ठ व विद्वान ज्योतिषीगण ज्योतिष कार्य को रूढ़िगत सिद्धान्तों एवं व्यावसायिक मापदण्डों से ऊपर उठकर अनुसंधनात्मक एवं शोधपरक रूप में करें। क्या यह योग्यता हर ज्योतिषी को अनिवार्यरूपेण प्राप्त हो सकती है? इस प्रश्न का उत्तर भी हमें ज्योतिशास्त्र में ही मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में एक श्रेष्ठ ज्योतिषी या भविष्यवक्ता बनने के कुछ विशेष योगों व ग्रहस्थितियों का उल्लेख हमें प्राप्त होता है। यह विशेष ग्रहस्थितियां व योग यदि किसी जातक की जन्मपत्रिका में हों तो वह एक श्रेष्ठ व अनुसंधानात्मक ज्योतिष कार्य करने वाला ज्योतिषी होता है। किसी भी ज्योतिषी की पत्रिका का विश्लेषण कर यह पता लगाया जा सकता है कि उसमें भविष्यकथन करने की योग्यता है भी या नहीं। एक आध्यात्मिक व श्रेष्ठ ज्योतिषी की पहचान उसकी जन्मपत्रिका में स्थित ग्रहों की विशेष स्थिति से सरलता से की जा सकती है। आईए जानते हैं कि वे कौन से ग्रह, योग व ग्रहस्थितियां होती हैं जिनके फलस्वरूप जातक एक श्रेष्ठ भविष्यवक्ता बन सकता है।
 
गुरू की शुभ स्थिति-
श्रीमद्भगवदगीता में कहा गया है "गहना कर्मणो गति:" अर्थात् कर्म की गति गहन है। मनुष्य के संचित कर्मों से ही "प्रारब्ध" का निर्माण होता है। जातक को जन्मपत्रिका में जो भी शुभाशुभ योग व ग्रहस्थितियां प्राप्त होती हैं वे सभी पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम होती हैं। कर्म के सिद्धान्त को समझ पाना एक दुष्कर कार्य है जो बिना विवेक के असम्भव है। ज्योतिष शास्त्र में गुरू को बुद्धि, विवेक व अध्यात्म का प्रतिनिधि ग्रह माना गया है। अत: एक श्रेष्ठ ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में गुरू की शुभ स्थिति होना अनिवार्य है। एक विद्वान ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में गुरू का केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ, स्वग्रही, उच्चग्रही, उच्चाभिलाषी ग्रह होना आवश्यक है। गुरू की शुभ स्थिति के बिना कोई भी जातक अच्छा ज्योतिषी नहीं बन सकता। 

बुध की शुभ स्थिति-

ज्योतिष शास्त्र में बुध को वाणी का नैसर्गिक कारक माना गया है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी के लिए वाक् सिद्धि होना आवश्यक है। बिना वाणी को सिद्ध किए कोई भी जातक एक सफल भविष्यकवक्ता नहीं बन सकता। वाक् सिद्धि के लिए बुध का शुभ स्थिति में होना अनिवार्य है। बुध की शुभ स्थिति के लिए बुध का जन्मपत्रिका में केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ व उच्चराशिस्थ या उच्चाभिलाषी होना आवश्यक है।

सूर्य की शुभ स्थिति-

ज्योतिष शासत्रानुसार सूर्य आत्मा का कारक है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी तब तक आध्यात्मिक रूप से समृद्ध नहीं होगा जब तक की उसकी जन्मपत्रिका में सूर्य की शुभ स्थिति नहीं होगी। आध्यात्मिक ज्योतिषी के लिए सूर्य का केन्द्रस्थ, त्रिकोणस्थ, लाभस्थ व उच्चराशिस्थ या उच्चाभिलाषी होना आवश्यक है।

बुध-गुरू का सम्बन्ध-

ज्योतिष शास्त्र के नियमानुसार बुध एवं गुरू के परस्पर प्रबल सम्बन्ध के बिना कोई जातक श्रेष्ठ भविष्यवक्ता नहीं बन सकता। विद्वान भविष्यवक्ता की जन्मपत्रिका में बुध व गुरू का पारस्परिक सम्बन्ध होना अनिवार्य है। ये सम्बन्ध चार प्रकार से क्रमश: प्रबलता प्राप्त करता है-

1. बुध-गुरू की युति

2. बुध-गुरू का दृष्टि सम्बन्ध

3. बुध-गुरू अधिष्ठित राशिस्वामी का दृष्टि सम्बन्ध

4. बुध-गुरू का परस्पर राशि परिवर्तन सम्बन्ध

पंचम् भाव एवं पंचमेश- 

जन्मपत्रिका के पंचम् भाव को उच्चशिक्षा एवं विवेक का प्रतिनिधि भाव माना जाता है। पंचम् भाव का अधिपति विवेक व बुद्धि का तात्कालिक कारक होता है। एक अच्छे ज्योतिषी की जन्मपत्रिका में पंचमेश का शुभ भावों में स्थित होना आवश्यक है एवं पंचम् भाव पर किसी अशुभ ग्रह का प्रभाव भी नहीं होना चाहिए। 

अष्टम् भाव व केतु की भूमिका भी महत्तवपूर्ण-

ज्योतिष शास्त्रानुसार केतु को मोक्ष का कारक माना गया है। एक श्रेष्ठ ज्योतिषी तभी सटीक भविष्यवाणी कर सकता है जब उसे पराविज्ञान का लाभ मिले। जन्मपत्रिका का अष्टम् भाव आयु के साथ-साथ पराविद्याओं का भी होता है यदि अष्टम् भाव का सम्बन्ध किसी प्रकार से भी केतु से हो तो ऐसे जातक को पराविद्या का लाभ किसी वरदान की तरह प्राप्त होता है। इस योग के फलस्वरूप वह जातक सटीक भविष्यसंकेत करने में सक्षम होता है।

उपर्युक्त ज्योतिषीय विवेचन के आधार पाठकगण यह भलीभांति समझ चुके होंगे कि ऊपर वर्णित ग्रहस्थिति के बिना कोई भी जातक श्रेष्ठ व प्रामाणिक ज्योतिषी नहीं बन सकता है। यहां पाठकों को यह बताना लाभदायक होगा कि हमारी जन्मपत्रिका में ऊपर वर्णित ग्रहस्थितियों में से अधिकांश ग्रहस्थितियां (प्रत्येक सिद्धान्त में से एक अवश्य उपस्थित) निर्मित हुई हैं। मुझे विश्वास है कि अब ज्योतिष-शास्त्र की प्रामाणिकता का निर्णय आप सभी सुधि पाठकगण भलीभांति कर सकेंगे।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com 


शनिवार, 21 नवंबर 2020

क्या करें जब मिले ना शुभ मुहूर्त्त!

हमारे सनातन धर्म में किसी भी कार्य के लिए शुभ व शुद्ध मुहूर्त्त की अनिवार्य आवश्यकता बताई गई है; विशेषकर विवाह,गृहप्रवेश,गृहारम्भ, मुण्डन, द्विरागमन आदि में, किन्तु कई बार ऐसी ग्रहस्थितियों का निर्माण हो जाता है कि अपेक्षानुसार हमें शुभ व शुद्ध मुहूर्त्त नहीं मिल पाता है। ऐसी परिस्थिति में मन दुविधाग्रस्त हो किंतर्व्यविमूढ़ हो जाता है। इस संशयग्रस्त स्थिति से निपटने के लिए हमारे शास्त्रों में कुछ विशेष मुहूर्त्त का उल्लेख है जिनमें विशेष दिन के अनुसार बनते है एवं इन मुहूर्त्तों में अन्य किसी ग्रहस्थिति का परीक्षण करने की आवश्यकता ही नहीं होती केवल इन दिनों का होना ही पर्याप्त होता है। ऐसे विशेष मुहूर्त्तों को हमारे मुहूर्त्त-शास्त्र में "साढ़े तीन मुहूर्त्त", "स्वयंसिद्ध मुहूर्त्त" या "अबूझ मुहूर्त्त" के नाम से जाना जाता है। आज हम "सरल-चेतना " के पाठकों को इन "अबूझ" मुहूर्त्तों के विषय में जानकारी देंगे। इन मुहूर्त्तों की संख्या प्रतिवर्ष "साढ़ेतीन" की होती है इसलिए इन्हें लोकाचार की भाषा में "साढ़ेतीन" मुहूर्त्त भी कहा जाता है। कुछ विद्वान "रविपुष्य" व "गुरूपुष्य" को भी इस श्रेणी में मान्य करते हैं किन्तु हम यहां स्पष्ट कर दें कि शास्त्रानुसार "रविपुष्य" एवं "गुरूपुष्य़" अबूझ मुहूर्त्त की श्रेणी में नहीं आते हैं।

आईए जानते हैं कि ये "साढ़े तीन" या "अबूझ" मुहूर्त्त कौन से होते हैं-

 "स्वयंसिद्ध मुहूर्त्त" या "अबूझ मुहूर्त्त"

1. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा/चैत्र नवरात्रि घट स्थापना/हिन्दू वर्षारम्भ)

2. वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया/अखातीज)

3. आश्विन शुक्ल दशमी (विजयादशमी/दशहरा)

4. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का अर्द्धभाग

उपर्युक्त मुहूर्त्तों में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, वैशाख शुक्ल तृतीया, आश्विन शुक्ल दशमी पूर्ण दिवस एवं कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का अर्द्धभाग शुभ होने से इन्हें "साढ़े तीन" मुहूर्त्त भी कहा जाता है।

विवाह मुहूर्त्त में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष नियम-

शास्त्रानुसार "स्वयंसिद्ध" या "अबूझ" मुहूर्त्त के अतिरिक्त विवाह में कार्तिक पूर्णिमा को विशेष मुहूर्त्त के तौर पर मान्य किया जाता है। जब विवाह का शुद्ध मुहूर्त्त ना बन पा रहा तो कार्तिक पूर्णिमा के पूर्व व पश्चात् के पांच दिन विवाह के लिए उपयुक्त माने गए हैं। यहां तक कि कुछ विद्वानों ने तो इन मुहूर्त्तों में त्रिबल शुद्धि व गुरू-शुक्रास्त को भी विचारणीय नहीं माना है लेकिन यह मुहूर्त्त केवल "आपातकाले मर्यादा नास्ति..." के सिद्धान्त अनुसार कुछ विशेष परिस्थितियों में ही ग्राह्य होते हैं।

 "गोधूलि लग्न" की ग्राह्यता-

मुहूर्त्त शास्त्र में "गोधूलि" लग्न को "स्वयंसिद्ध" मुहूर्त्त के तौर पर मान्यता प्रदान की गई है। जब विवाह का दिन सुनिश्चित हो जाए और पाणिग्रहण हेतु शुद्ध लग्न की प्राप्ति ना हो तो "गोधूलि" लग्न की ग्राह्यता शास्त्रानुसार बताई गई है। "गोधूलि लग्न" सूर्यास्त से 12 मिनिट पूर्व एवं पश्चात् कुल 24 मिनिट अर्थात् 1 घड़ी की होती है, मतान्तर से कुछ विद्वान से इसे सूर्यास्त से 24 मिनिट पूर्व व पश्चात् कुल 48 मिनिट का मानते हैं लेकिन शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है कि "गोधूलि लग्न" की ग्राह्यता केवल आपात परिस्थिति में ही होती है जहां तक सम्भव हो शुद्ध लग्न को ही प्राथमिकता देना चाहिए।

 -ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

 

 

 

विवाह में शुद्ध लग्न का चयन कैसे करें?

 

विवाह हमारे षोडश संस्कारों में एक महत्त्वपूर्ण संस्कार माना गया है। जीवनसाथी के बिना व्यक्ति का जीवन अधूरा माना जाता है। विवाह योग्य आयु होने एवं उपयुक्त जीवनसाथी के चुनाव के पश्चात अक्सर माता-पिता को अपने पुत्र-पुत्रियों के विवाह के मुहूर्त्त को लेकर बड़ी चिन्ता रहती है। सभी माता-पिता अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह श्रेष्ठ मुहूर्त्त में सम्पन्न करना चाहते हैं। विप्र एवं दैवज्ञ के लिए भी विवाह मुहूर्त्त का निर्धारण करना किसी चुनौती से कम नहीं होता है। विवाह मुहूर्त्त के निर्धारण में कई बातों का विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक होता है। शास्त्रानुसार श्रेष्ठ मुहूर्त्त कई प्रकार के दोषों को शमन करने में समर्थ होता है। अत: विवाह के समय पाणिग्रहणसंस्कार की लग्न का निर्धारण बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए। विवाह लग्न का निर्धारण करते कुछ बातों एवं ग्रहस्थितियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। आज हम "सरल-चेतना" के पाठकों को विवाह लग्न के निर्धारण से जुड़ी कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारी देंगे।

पाणिग्रहण संस्कार की लग्न शुद्धि हेतु निम्न बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए-

1. विवाह लग्न का चुनाव करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि विवाह लग्न वर अथवा कन्या के जन्म लग्न व जन्मराशि से अष्टम राशि का ना हो।

2. विवाह लग्न के निर्धारण में यदि लग्न में जन्मलग्न के अष्टमेश की उपस्थिति हो तो उस लग्न को त्याग दें। विवाह लग्न में जन्मलग्न के अष्टमेश का होना अति-अशुभ होता है।

3. विवाह लग्न में "लग्न भंग" योग नहीं होना चाहिए। विवाह लग्न से द्वादश भाव में शनि, दशम भाव में मंगल, तीसरे भाव में शुक्र, लग्न में पापग्रह या क्षीण चन्द्रमा स्थित नहीं होना चाहिए।

4. विवाह लग्नेश, चन्द्र व शुक्र अशुभ अर्थात 6, 8, 12 भाव में नहीं होने चाहिए।

5. विवाह लग्न में सप्तम व अष्टम भाव ग्रहरहित होने चाहिए।

6. विवाह लग्न कर्त्तरी योग से ग्रसित नहीं होना चाहिए।

7. विवाह लग्न अन्ध, बधिर या पंगु नहीं होना चाहिए। मेष, वृषभ, सिंह, दिन में अन्ध, मिथुन,कर्क,कन्या रात्रि में अन्ध, तुला, वृश्चिक दिन में बधिर, धनु,मकर रात्रि में बधिर, कुम्भ दिन में पंगु, मीन रात्रि में पंगु लग्न होती हैं किन्तु ये लग्न अपने स्वामियों या गुरू से दृष्ट हों तो ग्राह्य हो जाती हैं।

गोधूलि-लग्न की ग्राह्यता-

जब विवाह में पाणिग्रहण हेतु शुद्ध लग्न की प्राप्ति ना हो तो "गोधूलि" लग्न की ग्राह्यता शास्त्रानुसार बताई गई है। "गोधूलि लग्न" सूर्यास्त से 12 मिनिट पूर्व एवं पश्चात् कुल 24 मिनिट अर्थात् 1 घड़ी की होती है, मतान्तर से कुछ विद्वान से इसे सूर्यास्त से 24 मिनिट पूर्व व पश्चात् कुल 48 मिनिट का मानते हैं लेकिन शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है कि "गोधूलि लग्न" की ग्राह्यता केवल आपात परिस्थिति में ही होती है जहां तक सम्भव हो शुद्ध लग्न को ही प्राथमिकता देना चाहिए।

 

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया

प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com