रविवार, 23 फ़रवरी 2020

आज़ाद है ’शाहीन’, कैद में बाग है।


   


सियासत की जाने कैसी ये आग है,
आज़ाद हैशाहीन’, कैद में बाग है।

उन्हें सिखा रहे हो उसूल मुहब्बत के
नफ़रत से जिनके चूल्हों में आग है

गुमराह मुंसिफ़ पाकीज़ा ना तेरा दामन
मुफ़लिसों के लहू का उस पर भी दाग है

उनसे शिकायत कैसी वो गैर जो ठहरे
मुल्क जला रहे जो घर के चिराग हैं

गाफ़िल नहीं अजी हम खूब समझते हैं
तख्त--ताज की सारी ये दौड़ भाग है।

पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

(शाहीन-बाज/शिकारी पक्षी, उसूल-सिद्धान्त, मुंसिफ़-न्यायाधीश, मुफ़लिस-गरीब/बेसहारा, गाफ़िल-विमुख/लापरवाह)

बुधवार, 4 दिसंबर 2019

क्या वर्ष बदलने से बदलेगा भाग्य...!


वर्ष 2019 अपने अस्ताचल की ओर अग्रसर है और नूतन वर्ष द्वार पर दस्तक दे रहा है। नवीन वर्ष के स्वागत के साथ ही जनमानस के मन में यह उत्कंठा होने लगी है कि नया वर्ष उनके जीवन में क्या परिवर्तन लाने वाला है। ज्योतिषाचार्यों की नए साल को लेकर गणनाएं उनकी इस  उत्सुकता को और अधिक बल दे रहीं हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कैलेण्डर वर्ष बदलने से आपके भाग्य पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता! यह एक प्रामाणिक तथ्य है। नए साल को लेकर की जाने वाली अधिकांश भविष्यवाणियां भ्रांतियों से अधिक कुछ नहीं हैं, विशेषकर वे जो जातक, राशि व लग्न के सम्बन्ध में की जा रही हों। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि नए साल के मायने भी सभी धर्मों व समाजों में एक से नहीं है। हिन्दू धर्म में नया वर्ष चैत्र से माना जाता है वहीं गुजरात में दीपावली से नवीन वर्ष की मान्यता है, कहीं अंग्रेजी महीने जनवरी से नया साल मनाया जाता है। प्रामाणिक तथ्य सदैव सार्वभौम होते हैं जैसे सूर्य का ताप, सूर्य की तपिश समस्त चराचर जगत को समग्ररूपेण एक सा प्रभावित करती है।
कुछ भविष्यसंकेत प्रामाणित व सटीक अवश्य होते हैं जैसे नवीन वर्ष में साढ़ेसाती व ढैय्या का प्रभाव, ग्रहण के बारे में जानकारी, गुरू व शुक्र अस्त, ग्रह गोचर इत्यादि। जातक के सम्बन्ध में वर्षफल का निर्धारण उसके स्वयं के जन्मदिवस से होता है ना कि कैलेण्डर के नववर्ष से। जातक के वर्षफल के निर्धारण में निम्न तत्व महती भूमिका निभाते हैं-
1. मुंथा-मुंथा का वर्षफल निर्धारण में विशेष महत्त्व होता है। मुंथा निर्धारण के लिए वर्ष लग्न में अपनी आयु के वर्ष जोड़कर 12 से भाग देने पर जो शेष बचता है उसी राशि की "मुंथा" होती है। वर्ष लग्न में  4,6,7,8,12 भावगत मुंथा शुभ नहीं होती। जबकि 1,2,3,5 भावगत मुंथा शुभ होती है। शुभ ग्रह से युत, शुभ ग्रह से दृष्ट एवं बलवान मुंथा सदैव शुभ होती है
2. मुंथेश- मुंथा राशि के अधिपति ग्रह को "मुंथेश" कहते हैं। वर्षफल के निधार्रण में "मुंथेश" जन्म लग्नेश की ही भाँति महत्त्वपूर्ण होता है। वर्षकुण्डली में 4,6,8,12 भावगत मुंथेश शुभ नहीं होता। मुंथेश यदि पाप ग्रह से युत व दृष्ट हो तो परम अशुभफल देता है। मुंथेश यदि वर्षलग्न के अष्टमेश से युति करे तो कष्टदायक होता है।
3. वर्षलग्न- जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि का वर्षलग्न हो तो वर्ष में रोग व कष्ट होता है।
4. चन्द्रमा- वर्षकुण्डली में चन्द्रमा 1,6,7,8,12,भावों में पाप ग्रह से दृष्ट हो या पाप ग्रह से युत हो तो वर्ष में प्रबल अरिष्ट देता है। यदि वर्षकुण्डली में चन्द्रमा पर गुरू की दृष्टि हो तो अशुभता में अतीव कमी होकर शुभता में वृद्धि होती है।
5. वर्षकुण्डली- यदि वर्षकुण्डली में मुंथेश, वर्षेश और जन्म लग्नेश वर्ष कुण्डली में अस्त, नीचराशिगत, या पापग्रहों से युत हों या दृष्ट हों तो जातक का राजयोग भी सम्पूर्ण फलित नहीं होता।

उपर्युक्त तथ्यों से पाठकगण समझ ही गए होंगे कि नववर्ष की ज्योतिषीय गणनाएं कितनी सटीक व प्रामाणिक होती है। अत: नववर्ष के अवसर पर दिए जाने वाले राशिफल के सम्बन्ध अपने स्वविवेक से निर्णय करें।

-ज्योतिर्विद् पं हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com

रविवार, 17 नवंबर 2019

आस्था या अन्धविश्वास....!

कहते हैं आस्था व श्रद्धा को किसी तर्क या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। लोगों की किसी के प्रति आस्था ही उनके विश्वास का पर्याय होती है किन्तु जब यही आस्था एक सीमा का उल्लंघन कर सामाजिक ताने-बाने का अतिक्रमण करने लगती है तब यह अन्धविश्वास बन जाती है। इन दिनों मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले की पिपरिया तहसील का नयागांव ऐसे ही एक अन्धविश्वास का केन्द्र बना हुआ है। पिछले कुछ दिनों में यहां के सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व के जंगल में लगा हुआ एक "महुआ का पेड़" अपनी तथाकथित चमत्कारिक शक्तियों को लेकर चर्चा में आया। माना जा रहा है कि इस महुआ के पेड़ में कोई चमत्कारिक शक्ति है और इस पेड़ को छूने मात्र से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं। इस प्रकार की चर्चा के फैलते ही यहां दूर-दूर से लोग अपने असाध्य व गंभीर रोगों से मुक्ति पाने के लिए इस पेड़ को छूने आ रहे हैं। अब हालात इस कदर बेकाबू हो चले हैं कि लोगों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए प्रशासन को यहां भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा है। इन तमाम प्रशासनिक इंतजामों के बावजूद भी बीति रात यहां अराजतकता वातावरण देखने को मिला। प्रशासनिक व्यवस्थाओं व प्रतिबन्धों से नाराज़ ग्रामीणों व पुलिस के बीच झड़प व पत्थरबाजी की घटना हो गई जिसमें टी आई सहित कई लोग घायल हो गए। अब सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रकार की आस्था उचित है? आज अधिकांश लोगों की आस्था लाभ पर आधारित है। दूसरा स्वयंसिद्ध तथ्य यह है कि भीड़ का अपना कोई विवेक नहीं होता इसलिए भीड़ को बहकाना बहुत ही आसान होता है। जो लोग यह दावा कर रहे हैं कि इस पेड़ को छूने मात्र से असाध्य से असाध्य रोग ठीक हो रहे हैं क्या उन्होंने किसी ऐसे रोगी का चिकित्सकीय परीक्षण कर प्रमाण (मेडिकल रिपोर्ट) प्रस्तुत किए जिसका कोई असाध्य रोग इस पेड़ को छूने मात्र से ठीक हुआ हो? यदि अफवाहों को दरकिनार करें तो अब तक एक भी ऐसा मामला प्रकाश में नहीं आया है जो तर्कसंगत इस बात का प्रमाण प्रस्तुत कर सके कि इस पेड़ को छूने मात्र से असाध्य रोग ठीक होते हैं। किन्तु आज के दौर में लोग सदैव लाभ व उम्मीद को अपनी आस्था का आधार बनाते हैं भले ही वास्तविकता चाहे जो हो। अब ज़रा विचार कीजिए कि जिस पेड़ को इस आशा से छूने जा रहे लोग कि वह उनके असाध्य रोग ठीक करेगा यदि वहां जाकर घायल हो जाएं; जैसा कि ग्रामीणों व पुलिस की झड़प के बाद हुआ, तो क्या वह चमत्कारिक हो सकता है? कई बार व्यक्ति की इच्छाशक्ति जिसे अंग्रेजी में "विलपावर" कहा जाता है वह भी इन सब बातों के पीछे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। हो सकता कुछ व्यक्तियों को इस पेड़ को छूने से न्यूनाधिक लाभ हुआ हो तो उसकी वजह इस पेड़ की चमत्कारिक शक्ति का नहीं अपितु उनके स्वयं की इच्छाशक्ति (विलपावर) है। आज के सोशल मीडिया के युग में अफ़वाहों को प्रचारित-प्रसारित करना बहुत आसान है। इसके पीछे कुछ अराजक तत्वों के निजी लाभ भी होते हैं। कल तक जिस गांव के बारे में जिले के लोगों को भी पता नहीं था वह आज दूर-दराज के लोगों के पर्यटन का केन्द्र बनता जा रहा है। इससे वहां के ग्रामीणों की व्यापारिक गतिविधियों को भी निश्चित लाभ हुआ है। यह एक बड़ा दुष्चक्र व सुनियोजित व्यापारिक विज्ञापन भी हो सकता है। आज के दौर में हमें कमज़ोर आस्था की नहीं अपितु दृढ़ आस्था व श्रद्धा की आवश्यकता है जो केवल ईश्वर के प्रति होनी चाहिए, शेष सब अपने से हो जाता है। मेरी "वेबदुनिया" के माध्यम से आप समस्त पाठकों से अपील है कि इस प्रकार की अफवाहों पर कतई विश्वास ना करें एवं इन्हें आगे प्रचारित व प्रसारित होने से रोकें।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com


मंगलवार, 3 सितंबर 2019

क्यों कहते हैं "गणपति बप्पा मोरया"...!



गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया " का जयकारा हमेशा ही सुनायी देता है। कई बार आपने भी ये जयकारा लगाया होगा लेकिन क्या कभी आपने ये सोचा है कि आखिर ये जयकारा क्यों लगाते हैं? कहां से इस जयकारे की उत्पति हुई? इसके पीछे एक ऐतिहासिक तथ्य है। गणपतिजी के इस जयकारे की जड़ें महाराष्ट्र के पुणे से 21 किमी. दूर बसे चिंचवाड़ गांव में हैं। चिंचवाड़ जन्मस्थली है एक ऐसे संत की जिसकी भक्ति और आस्था ने लिख दी एक ऐसी कहानी, जिसके बाद उनके नाम के साथ ही जुड़ गया गणपति का भी नाम। पंद्रवी शताब्दी में एक संत हुए, जिनका नाम था मोरया गोसावी, कहते हैं भगवान गणेश के आशीर्वाद से ही मोरया गोसावी का जन्म हुआ था और मोरया गोसावी भी अपने माता-पिता की तरह भगवान गणेश की पूजा अराधना करते थे। हर साल गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर मोरया चिंचवाड़ से मोरगांव गणेश की पूजा करने के लिए पैदल जाया करते थे। कहा जाता है कि बढ़ती उम्र की वजह से एक दिन खुद भगवान गणेश उनके सपने में आए और उनसे कहा कि उनकी मूर्ति उन्हें नदी में मिलेगी और ठीक वैसा ही हुआ, नदी में स्नान के दौरान उन्हें गणेश जी की मूर्ति मिली। इस घटना के बाद लोग ये मानने लगे कि मोरया गोसावी गणपति बप्पा के सच्चे व अनन्य भक्त हैं। तभी से भक्त चिंचवाड़ गांव में मोरया गोसावी के दर्शन के लिए आने लगे। कहते हैं जब कोई भक्त मोरया गोसावी जी के पैर छूते तो संत मोरया अपने भक्तों से मंगलमूर्ति कहते थे और फिर ऐसे शुरुआत हुई मंगलमूर्ति मोरया की। जो जयकारा पुणे के पास चिंचवाड़ गांव से शुरू हुआ आज वो जयकारा पूरे देश में गणपति बप्पा के भक्तों द्वारा लगाया जाता है। पुणे के चिंचवाड़ में मोरया गोसावी का मंदिर भी है जहां प्रतिदिन भक्त मत्था टेकने आते हैं। मोरया गोसावी मंदिर में साल में दो बार विशेष उत्सव का आयोजन किया जाता है। एक तो भाद्रपद महीने में व दूसरा माघ महीने में जब मंदिर से पालकी निकलती है, जो मोरगांव के गणपति मंदिर में दर्शनों के लिए ले जायी जाती है। उसी तरह दूसरा उत्सव दिसंबर महीने में चिंचवाड़ गांव में ही मनाया जाता है जब बड़ी संख्या में देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और दिनभर चलने वाले धार्मिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनते हैं। मान्यता है कि मोरया गोसावी मंदिर में आने से अष्टविनायक के दर्शन-पूजन के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में न केवल बप्पा का अद्भुत रूप विराजमान है बल्कि बप्पा के परम भक्‍त मोरया गोसावी के साथ-साथ उनके आठ वंशजों की समाधि भी है जो गणपति के प्रति इनकी आस्था की कहानी सुनाती है।

-(डा.सुनील जोशी जी की फ़ेसबुक पेज से साभार)

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

दैनिक राशिफल का सच...!

आप सभी ने न्यूज़ चैनलों समाचार पत्रों में नित्य प्रसारित प्रकाशित होते दैनिक राशिफल को तो अवश्य देखा सुना होगा। आजकल अधिकांश व्यक्ति प्रात:काल समाचार पत्र में सर्वप्रथम दैनिक राशिफल वाले स्तंभ में अपनी राशि का फलित देखकर अपने दिन का पूर्वानुमान लगाने में उत्सुक रहते हैं और सांझ ढ़लते ही महसूस करते हैं कि उनकी राशि का जो फ़लित दैनिक राशिफल में बताया गया था वह तो असत्य निकला। इसके बाद वे ज्योतिष शास्त्र को कोसने लगते हैं। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। आज हम पाठकों को दैनिक राशिफल से जुड़ी कुछ महत्त्वपूर्ण प्रामाणिक जानकारियां देने जा रहे हैं। हम अपने पाठकों को बताना चाहते हैं कि आजकल जिस प्रकार दैनिक राशिफल बताया जाता है वह पूर्णत: भ्रामक अप्रामाणिक होता है। उसका कोई शास्त्रोक्त ज्योतिषीय आधार नहीं होता। यही वजह है कि करीब-करीब 99 फ़ीसदी दैनिक राशिफल का फलित असत्य निकलता है। जिन व्यक्तियों का फलित सही होता भी है वह उनकी निजी जन्मपत्रिका की ग्रहस्थितियों, दशाओं ग्रह-गोचर का परिणाम होता है। आप निश्चित ही यह बात सुनकर चौंक जाएंगे। कुछ विद्वान इससे अपनी भिन्न राय भी रखेंगे किन्तु हम यहां आपके विचार हेतु कुछ तथ्य प्रस्तुत करना चाहते हैं जिनके अध्ययन से आप स्वयं दैनिक राशिफल की प्रामाणिकता का अंदाज़ा लगा सकते हैं।
1. ग्रह गोचर-
ज्योतिष शास्त्र में फलित के लिए ग्रहस्थिति मुख्यरूपेण उत्तरदायी होती है, चाहे वह जन्मपत्रिका की ग्रहस्थिति हो या गोचर की। ज्योतिष के गोचर शास्त्र के अनुसार ग्रह गोचर अर्थात ग्रहों का राशि परिवर्तन प्रतिदिन नहीं होता। समस्त नौ ग्रहों के गोचर का अलग-अलग काल है जिनमें सूर्य,बुध,शुक्र लगभग 1 माह, मंगल 57 दिन, गुरू 1 वर्ष, राहु-केतु 1.5 (डेढ़) वर्ष, शनि ढाई (2.5) वर्ष में अपनी राशि परिवर्तन करते हैं। अब बात करें चन्द्रमा के गोचर की तो चन्द्रमा भी सवा दो दिन में अपनी राशि परिवर्तन करते हैं। इसका आशय यह हुआ कि सवा दो दिनों तक तो ग्रहस्थितियों में परिवर्तन नहीं होगा। यदि किसी ग्रह का गोचर हुआ भी तो अगले दिन से लेकर पुन: तीन दिनों तक वही स्थिति रहेगी, जो ग्रह जिस राशि में स्थित है उसी राशि में रहेगा तो ऐसे समान ग्रहस्थिति के आधार पर फलित प्रतिदिन कैसे परिवर्तित हो सकता है आप स्वयं सोचिए!

2. जन्मपत्रिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण-
ज्योतिष शास्त्र में किसी जातक के फलित के लिए उसकी जन्मपत्रिका की लग्न कुण्डली को सर्वाधिक महत्ता प्रदान की गई है तत्पश्चात नवमांश कुण्डली, उसके बाद वर्ग कुण्डली, फ़िर विंशोत्तरी दशाएं, उसके बाद योगिनी दशाएं और सबसे अन्त में गोचर को मान्यता दी गई है। जब गोचर को ही फलित करते समय सबसे अन्तिम पायदान पर रखा जाता है तो केवल चन्द्र के गोचर नक्षत्र से दैनिक राशिफल निकालना कहां तक उचित प्रामाणिक है।

3. दैनिक राशिफल भी होता है-
अब उपर्युक्त आधार पर क्या यह मान लिया जाए कि ज्योतिष शास्त्र में दैनिक राशिफल होता ही नहीं है; नहीं ऐसा कदापि नहीं है। दैनिक राशिफल भी ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत ही आता है किन्तु वह प्रत्येक जातक का निजी होता है और उसका आधार प्रश्न कुण्डली नष्टजातकम पद्धति होता है। उस दैनिक राशिफल के लिए व्यक्ति को ज्योतिषी से प्रश्न करना होता है कि "मेरा आज का दिन कैसा रहेगा?" तब ज्योतिषी प्रश्न कुण्डली के आधार पर अथवा उस व्यक्ति से कोई अंक पूछकर उसके दिन के बारे गणना कर उस दिन का भविष्य संकेत उसे देता है। इस प्रकार का दैनिक राशिफल व्यक्तिगत होता ना कि सार्वजनिक। अत: हमारे मतानुसार समाचार पत्रों न्यूज़ चैनलों में प्रसारित-प्रकाशित होने वाले दैनिक राशिफल के फलित को गंभीरता से ना लेते हुए अपनी जन्मपत्रिका की ग्रहस्थितियों, दशाओं अपनी राशि गोचर पर अधिक विश्वास करना चाहिए। यदि किसी दिन के बारे में जानना बहुत आवश्यक हो तो किसी विद्वान दैवज्ञ से प्रश्न कर इस सम्बन्ध में निर्णय करना अधिक श्रेयस्कर लाभदायक रहता है।

-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र
सम्पर्क: astropoint_hbd@yahoo.com