मौन दृष्टि निर्विकार चेहरा है
शब्द कैद अधरों पर पहरा है
सुधियों के सागर में डूब रहे
लगता है दंश कोई गहरा है
भारी एकान्त और तरुणाई
दुर्बल से प्राण बोझ दोहरा है
भ्रम है; विश्वास जिसे समझे हो
यौवन बंजारा कब ठहरा है
कवि-गौरीखान "गुमराह" (बाबई)
उपर्युक्त कविता को सस्वर सुनने के लिए नीचे दिया गया वीडियो देखें-
पार्श्वस्वर: श्रीयुत राधेश्याम जी रावल 'बाबूजी' (उज्जैन)


