अध्यात्म जगत
की चर्चा आचार्य रजनीश
"ओशो"
के बिना अधूरी है।
"ओशो"
एक ऐसे सम्बुद्ध सदगुरू
हैं जिन्होंने मानवीय
चेतना को धर्म की
रूढ़िवादी व बद्धमूल धारणाओं
से मुक्त किया। "ओशो"
ने किसी नवीन धर्म
या पंथ का प्रतिपादन
नहीं किया अपितु उन्होंने
जनमानस का वास्तविक धर्म
से साक्षात्कार कराया।
वे भविष्य के मनुष्य
को
"ज़ोरबा दि बुद्धा" के
रूप में गढ़ना चाहते
थे।
"ज़ोरबा दि बुद्धा" अर्थात्
एक ऐसी मनुष्यता जो
नृत्य कर सके; गीत गा
सके,
वहीं ध्यान की ऊँचाईयों
को भी छूने जो
समर्थ हो सके। "ओशो"
ने इस जगत में
एक हंसते हुए धर्म
का आविर्भाव किया।
उन्होंने अपने सन्देशों में
नकारात्मकता व दमन के
स्थान पर सकारात्मकता व ध्यान पर
ही अधिक ज़ोर दिया।
वे केवल एक ही
बात का विशेष आग्रह
अपने प्रवचनों में
किया करते थे; वह है- ध्यान।
"ओशो"
का जन्म मध्यप्रदेश के
कुचवाड़ा में 11 दिसम्बर 1931 को
हुआ। उन्हें 21 वर्ष की
आयु में संबोधि की प्राप्ति
हुई। उन दिनों वे
जबलपुर कालेज में पढ़ाया
करते थे, वहीं से
उन्हें "आचार्य" कहा
जाने लगा। बाद में
उन्हें "भगवान" के
नाम से संबोधित किया
जाने लगा जो थोड़ा
विवादों में भी रहा।
"भगवान" संबोधन के सम्बन्ध
में
"ओशो"
की मान्यता थी "भगवत्ता
को प्राप्त व्यक्ति"। "ओशो"
ने अपने संन्यासियों को
निषेध व दमन के
स्थान पर ध्यान से
जोड़ा। उन्होंने उन
विषयों पर बहुत ही
मुखरता से बोला जिनकी चर्चा करने में धर्म-जगत
झिझकता है। "ओशो"
अपने समय से बहुत
पूर्व थे उनकी बातें
व सन्देश शायद उस
समय उतने प्रासंगिक ना
प्रतीत हो रहे हों
जब वे देह में
थे,
किन्तु वर्तमान परिदृश्य में
"ओशो"
दिनों-दिन प्रासंगिक होते
जा रहे हैं। आज
इस जगत को "ओशो"
जैसे ही सम्बुद्ध गुरुओं
की आवश्यकता है।
"ओशो"
का सारा दर्शन प्रेम
व ध्यान पर आधारित
था। वे परमात्मा का
साक्षात्कार प्रेम व ध्यान
के माध्यम करने में
विश्वास रखते थे। "ओशो"
की देशनाओं से भारत
ही अपितु विश्व के
लगभग 19 देश प्रभावित हुए।
इन देशों के अनेकानेक
नागरिक "ओशो" के
अनुयायी बने। अमेरिका में
"ओशो"
की प्रसिद्धि का
अनुमान पाठक इस बात
से भलीभांति लगा
सकते हैं कि सन
1981 में
अमेरिका के ओरेगन स्थित
रेगिस्तान में ओशो अनुयायियों
द्वारा "रजनीशपुरम् " नामक
एक सम्पूर्ण नगर
ही बसा दिया गया
था। जहाँ लगभग 5000 से
अधिक संन्यासी नियमित
रूप से रहने लगे
थे। विशेष अवसरों पर
यहाँ देश-विदेश से
आने वाले संन्यासियों की
सँख्या दस से पन्द्रह
हज़ार तक पहुँच जाती
थी। अमेरिका ने उनकी
इसी प्रसिद्धि को
अपनी सम्प्रभुता के
लिए खतरा मानकर उन्हें
देश-निकाला
दे दिया था। सुप्रसिद्ध
लेखिका “सू एपलटन” ने अपनी
पुस्तक “दिया अमृत पाया
ज़हर”
में अमेरिका की रोनाल्ड
रीगन सरकार द्वारा "ओशो"
को थेलियम नामक ज़हर
दिए जाने की घटना
का शोधपूर्ण व
रोमांचक विवरण प्रस्तुत किया
है। स्वास्थ्य सम्बन्धी
प्रतिकूलताओं के कारण "ओशो"
ने 19 जनवरी 1990 को
पूना स्थित अपने आश्रम
में सायं 5 बजे के
लगभग अपनी देह त्याग
दी। इस अवसर पर
"ओशो"
के पूर्व निर्देशानुसार उनके
संन्यासियों द्वारा नाच-गाकर एवं
समूह ध्यान कर उनका
मृत्यु-महोत्सव मनाया गया।
पूना स्थित आश्रम में
ही
"ओशो"
का अस्थि- कलश स्थापित
उनकी समाधि का निर्माण
किया गया जहां आज
भी देश-विदेश के
हज़ारों संन्यासी आकर
"ओशो"
के द्वारा प्रवाहित ध्यान
की सरिता में अवगाहन
कर अपना जीवन धन्य
करते हैं।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
सम्पर्क:
astropoint_hbd@yahoo.com

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