मंगलवार, 24 मार्च 2015

रत्न धारण में सावधानी रखें

कई लोगों को रत्न धारण करने शौक होता है। कुछ अल्प ज्ञानी ज्योतिषी भी इस शौक के लिए जिम्मेवार होते हैं जिनका अक्सर रत्न बेचने वालों से बड़ा गहरा संबंध होता है इसलिए जब भी मैं किसी मित्र को रत्न ना धारण करने सलाह देता हूं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता। कुछ मित्र मायूस भी हो जाते हैं। सामान्यतः ज्योतिष के क्षेत्र में राशि रत्न, लग्नेश का रत्न, विवाह के गुरू का रत्न, तो आजकल एक नया फ़ैशन लाकेट का चल निकला है जिसमें ज्योतिषीगण लग्नेश,पंचमेश व नवमेश के रत्नों का लाकेट बनवाकर पहनने का परामर्श देते हैं। मेरे देखे ऐसा करना अनुचित है। रत्नों के धारण करने में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। रत्नों को धारण करने से पहले उन ग्रहों की जन्मपत्रिका में स्थिति व अन्य ग्रहों से संबंध का ज्ञान होना अतिआवश्यक है, चाहे वे रत्न लग्नेश अथवा राशीश के ही क्यों ना हों। यह भी देखना आवश्यक है कि जिस ग्रहा रत्न धारण कर रहे हैं वह किस ग्रह से क्या संबंध बना रहा है अथवा किस ग्रह से अधिष्ठित राशि का स्वामी है। यदि एकाधिक रत्न धारण की स्थिति बन रही हो तो वर्जित रत्नों का ध्यान भी रखा जाना आवश्यक है। पंचधा मैत्री में ग्रहों के आपसी संबंध की भी रत्न धारण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक सर्वथा गलत धारणा यह है कि रत्न हमेशा ग्रह शांति के लिए पहना जाता है जबकि वास्तविकता इसे ठीक विपरीत है, रत्न हमेशा ग्रह के बल में वृद्धि करने के लिए धारण किया जाता है। कुछ रत्न ग्रहशांति के उपरान्त अल्प समयावधि के लिए ही धारण किए जाते हैं। अतः रत्न धारण करने से पूर्व अत्यंत सावधानी रखते हुए रत्न धारण करने से पूर्व किसी श्रेष्ठ ज्योतिषी से भलीभांति परामर्श के बाद ही रत्न धारण करें अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है।
-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
“प्रारब्ध ज्योतिष केन्द्र”

बुधवार, 18 मार्च 2015

बुद्धत्व


जीवन की आपाधापी में,
अक्सर जब मन घबराता है।
उस पार से कोई बुलाता है,
तन चलने को अकुलाता है।
मगर “यशोधरा” का पल्लू ,
पैरों से लिपट जाता है।
“सिद्धार्थ” रूपी  ये मन मेरा,
“बुद्ध” होते-होते रह जाता है॥

-हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 16 मार्च 2015

फ़ूलों में भी है संवेदनाएं

एक दिन मेरे मित्र जो श्रीविद्या के साधक हैं वे ढेर सारे पलाश के फ़ूलों से भरी थैली (जिसमें कुछ अधखिली कलियां भी शामिल थीं) लिए मुझसे मिलने आए। मैंने जब इतने फ़ूलों का प्रायोजन उनसे पूछा तो कहने लगे कि इन फ़ूलों से भगवती का अर्चन करूंगा। मैंने पुनः पूछा कि ये कितने फ़ूल हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि-सवा लाख! ये सुनते ही मैं चौंक पड़ा। मैंने उनसे कहा कि आपने सिर्फ़ अपने अर्चन के लिए प्रकृति का कितना नुकसान कर दिया, आखिर प्रकृति भी तो परमात्मा का ही अंग है। इसे नुकसान पहुंचाना परमात्मा को पीड़ा पहुंचाना है, मेरे देखे यह उचित नहीं है। चूंकि उन्होंने दिन भर बड़ा अथक परिश्रम करके इन फ़ूलों को तोड़ा था और स्वभाव से वे पंडित थे सो उन्होंने मेरी इस बात का कड़ा विरोध किया। वो मुझे समझाने लगे कि फ़ूल तो ईश्वर पर चढ़ाने के लिए ही होते हैं। मैंने कहा आपको नहीं लगता कि डाल पर खिले फ़ूल पहले ही प्रकृति ने ईश्वर पर चढ़ा दिए अब और क्या चढ़ाना? और चढ़ाना ही है तो डाल से गिरे हुए फ़ूलों को चुनकर चढ़ाओं किंतु शास्त्रों में इस प्रकार की भ्रामक बातें लिखी हैं कि सवा लाख फ़ूल चढ़ाने से यह होगा, सवा लाख बेलपत्र चढ़ाने से वह होगा सो सब निकल पड़ते है पर्यावरण को हानि पहुंचाने। इस पर वे कहने लगे क्या भगवती पर फ़ूल नहीं चढ़ाएं? प्रत्युत्तर में मैंने कहा कि कोई फ़ूल का पौधा रोपित कर दो जब इसमें सवा लाख फ़ूल आएंगे तो आपका अर्चन पूर्ण हो जाएगा। इसी प्रकार की भ्रामक बातों के कारण ही हमारे धर्म पर कटाक्ष करने का अवसर अक्सर लोगों को मिल जाता है। मेरे देखे संख्या नहीं भाव महत्वपूर्ण है। यदि प्रेमपूर्ण ह्रदय से मात्र एक पांखुरी अर्पित कर दी जाए तो सवा लाख क्या सवा अरब के बराबर हो जाती है। आपने सुना है जब भगवान कृष्ण को उनकी रानियों ने अपने आभूषणों से तौलना चाहा तो वे नहीं तुले जब एक तुलसी दल पलड़े पर रखा तब भगवान आसानी से तुल गए। मगर पंडित यदि शास्त्रों से मुक्त हो जाए तो संत हो जाए। शास्त्रों में काम की बातें थोड़ी हैं और जो हैं उन्हें समझना और भी कठिन। भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्री जगदीशचंद्र बोस ने क्रैस्कोग्राफ़ नामक यंत्र बनाकर एक अनुसंधान किया जिसमें उन्होंने यह सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी संवेदनशील स्नायु तंत्र होता है और उनका जीवन भी विभिन्न भावनाओं से युक्त होता है। प्रेम,घृणा,भय,सुख,दुःख,आनन्द,मूर्छा के प्रति असंख्य प्रकार की प्रतिक्रियाओं की भावानुभूति जिस प्रकार सब प्राणियों में होती है उसी प्रकार पेड़-पौधों में भी होती है। सनातन धर्म ने बड़ी मूल्यवान पहल की जो पत्थर की ईश्वर की प्रतिमा बनाई। उसके पीछे उद्देश्य यह था हमारी दृष्टि इतनी संवेदनशील हो जाए कि पाषाण में भी सजीव ईश्वर का दर्शन कर सके किंतु अभी तक कोमल फ़ूलों में भी जिन लोगों को संवेदना नज़र नहीं आ रही वे क्या पाषाण में इसे देख पाने में समर्थ होंगे इसमें मुझे संदेह है।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

सोमवार, 9 मार्च 2015

ज्योतिष को “विंडो शापिंग” ना समझें

अक्सर यात्रा के दौरान या किसी समारोह में जब मैं अपना परिचय एक ज्योतिषी के रूप में देता हूं तब बड़ी रोचक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं। कुछ लोग इसे अंधविश्वास को बढ़ाने वाली ठग विद्या सिद्ध करने के लिए कुतर्क करने लगते हैं, कुछ परीक्षक की भांति मेरे ज्ञान का परीक्षण करने लगते हैं तो कुछ झट अपनी कुण्डली निकालकर या पास ही पड़े किसी कागज़ पर कुण्डली उकेरकर फ़लित पूछने लगते हैं। मेरा इस प्रकार का व्यवहार करने वाले तमाम महानुभावों से यही निवेदन है कि ज्योतिष कोई “विंडो शापिंग” नहीं है कि आप यूं ही तफ़री के लिए बाज़ार गए वहां निरूद्देश्य दुकानों पर ताक-झांक करते हुए कोई वस्तु पसन्द आ गई और दुकानदार से मोल-भाव जम गया तो खरीद ली अन्यथा आगे बढ़ गए। यहां मुझे रामायण का रावण -वध प्रसंग स्मरण आ रहा है। जब प्रभु श्रीराम ने भूमि पर गिरे अंतिम सांसे गिनते रावण की ओर इशारा कर लक्ष्मण जी को आदेश दिया कि जाओ इस महापंडित से उपदेश ग्रहण करो तब लक्ष्मण जी रावण के सिर की ओर जाकर खड़े हो गए तब रावण ने यह कहते हुए अपना मुंह फ़ेर लिया कि लक्ष्मण जब हम किसी से कुछ ग्रहण करने जाते हैं तो याचक की भांति जाना चाहिए तब लक्ष्मण जी रावण के पैर की तरफ़ जाकर बैठे किंतु  पुनः  रावण ने यह कहते हुए मुंह फ़ेर लिया किया जब भी किसी विद्वान से भेंट करने जाओ तो खाली हाथ नहीं जाना चाहिए तब कहते हैं लक्ष्मण जी ने वहीं भूमि से एक तिनका उठाकर महापंडित रावण को भेंट किया तब जाकर रावण ने लक्ष्मण को उपदेश दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि हर कार्य की एक मर्यादा होती है; एक उचित तरीका होता है, उस मर्यादा से परे जाकर उस कार्य को करना मेरे देखे पाप करने जैसा है। विद्वानों को चाहिए कि महत्वपूर्ण कार्यों की मर्यादा एवं उचित मार्ग के संबंध में जनमानस को मार्गदर्शित करें।


-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

शनिवार, 24 जनवरी 2015

लुईस ब्रेल

लुईस ब्रेल
लुईस ब्रेल नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए वरदान कही जाने वाली  “ब्रेल लिपि” के जनक माने जाते हैं। लुईस ब्रेल ने ही “ब्रेल लिपि” का अविष्कार कर नेत्रहीनों के लिए ज्ञान के मार्ग खोले। लुईस ब्रेल का जन्म फ़्रांस में पेरिस के निकट एक छोटे से गांव में 4 जनवरी सन् 1809 में हुआ। सिर्फ़ तीन साल की छोटी से उम्र में एक हादसे में उन्होंने अपनी दोनों आंखों की रोशनी गंवा दी। बुद्धिमान ब्रेल नेत्रहीनों के पढ़ने के लिए एक रास्ता खोजना चाहते थे। 12 साल की उम्र में उन्होंने डाट्स की एक प्रणाली के साथ प्रयोग किया। 17 साल की उम्र में उन्होंने एक नई प्रणाली का अविष्कार किया जिसे “ब्रेल लिपि” कहा जाता है। लुईस ब्रेल का निधन 6 जनवरी सन् 1852 को हुआ।
(साभार)

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

बदल रहा है “संघ”

कल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के छः प्रमुख उत्सवों में से एक “मकर संक्राति” के अंतर्गत आयोजित नगर एकत्रीकरण सहभोज में जाने का अवसर प्राप्त हुआ। वहां संघ के एक पदाधिकारी(जिनके स्तरहीन बौद्धिक चर्चा मैं पूर्व में भी “सरल-चेतना” में कर चुका हूं) की विशिष्ट सेवा-सत्कार देख कर मुझे संघ के संस्थापक डाक्टरजी की याद आ गई। डाक्टरजी द्वारा संस्थापित संघ में और वर्तमान संघ में ज़मीन-आसमान का ना सही किंतु कुछ तो अन्तर है। कहां तो सादगी,समानता और राष्ट्रवादिता ही मूल मंत्र था और आज...! मेरे देखे सिर्फ़ कुर्ता-पायजामा पहन लेने मात्र से सादगी नहीं आ जाती। सादगी तो अंतःकरण का विषय है।डाक्टरजी के संघ को अपना आदर्श और स्वयं को उसके स्वयंसेवक मानने वाले मुझ जैसे कई मित्रों को इस कुरूप सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा कि “संघ” अब बदल रहा है। संघ के अधिकांश स्वयंसेवक इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में हिचक महसूस करते हैं किंतु दबी ज़ुबान से वे भी इस सच्चाई से इंकार नहीं कर सकते। यदि हम बीमारी से ही मुंह फ़ेर लेंगे तो उसकी चिकित्सा किस प्रकार कर पाएंगे। आज संघ में कई ऐसे जीवनदायी सदस्य और पदाधिकारी हैं जो संघ की विचारधारा के विपरीत आचरण करते हैं। उनका यह आचरण संघ की छवि को धूमिल करता है। अक्सर उन पर किसी प्रकार की प्रतिबंधात्मक कार्रवाई को ना करने के पीछे तर्क के रूप में उनका जीवनदायी सदस्य होना बताया जाता है। यहां विचारणीय तथ्य यह है क्या किसी संगठन के जीवनदायी सदस्य होने से तात्पर्य उस संगठन को नष्ट करने की दिशा में कार्य करना है या उसे संवर्द्धित करना है? ऐसे जीवनदायी सदस्यों से क्या लाभ? हम यह नहीं कह रहे आज आवश्यकता संघ को पुराना स्वरूप छोड़कर बदलते युग के साथ बदलने की है। हमारे मतानुसार तो आवश्यकता संघ को बदलते युग के साथ ना बदलने की है; जबकि बदलाव प्रतीत हो रहा है। डाक्टरजी का संघ तो हर युग में प्रासंगिक व अनुकूल है। छोटे-मोटे परिवर्तन समझ में आते हैं किंतु मूल सिद्धांतो में परिवर्तन उचित नहीं। आज आवश्यक्ता इस बात की है कि निरन्तर परीक्षण कर इस प्रकार के प्रदूषणों को रोका जाए। जिससे संघ की अविरल धारा निर्मल व निर्बाध बहती रहे।

-हेमन्त रिछारिया

ग़ज़ल

मौन दृष्टि निर्विकार चेहरा है
शब्द कैद अधरों पर पहरा है

सुधियों के सागर में डूब रहे
लगता है दंश कोई गहरा है

भारी एकान्त और तरूणाई
दुर्बल से प्राण बोझ दोहरा है

भ्रम है विश्वास जिसे समझे हो
यौवन बंजारा कब ठहरा है

-गौरी खान “गुमराह”