मौन दृष्टि निर्विकार चेहरा है
शब्द कैद अधरों पर पहरा है
सुधियों के सागर में डूब रहे
लगता है दंश कोई गहरा है
भारी एकान्त और तरूणाई
दुर्बल से प्राण बोझ दोहरा है
भ्रम है विश्वास जिसे समझे हो
यौवन बंजारा कब ठहरा है
-गौरी खान “गुमराह”
शब्द कैद अधरों पर पहरा है
सुधियों के सागर में डूब रहे
लगता है दंश कोई गहरा है
भारी एकान्त और तरूणाई
दुर्बल से प्राण बोझ दोहरा है
भ्रम है विश्वास जिसे समझे हो
यौवन बंजारा कब ठहरा है
-गौरी खान “गुमराह”
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें