शनिवार, 27 दिसंबर 2014

“पीके” का विरोध - उचित या....?


आमिर खान अभिनीत फ़िल्म “पीके” रिलीज़ होते ही सुपरहिट हो गई और सुपरहिट होते ही विवादों में घिर गई। ऐसा लगता है मानो सुपरहिट होना और विवादित होना एक ही सिक्के दो पहलू हैं। हिन्दू संगठनों द्वारा फ़िल्म में दिखाए गए कुछ दृश्यों व संवादों पर गंभीर आपत्तियां दर्ज़ कराई गई हैं। इस मुद्दे को लेकर मीडिया भी अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है किंतु पत्रकारों से निष्पक्ष रहने की अपेक्षा की जाती है। लगता है वर्तमान पत्रकारिता में यह बात दिन-ब-दिन मुश्किल होती जा रही है। विभिन्न समाचार चैनलों पर फ़िल्म “पीके” से उठे विवाद पर समीक्षात्मक बहस का प्रसारण हो रहा है। जिसे देखकर ऐसा लगा मानो एंकर और  संपादकों ने यह पहले ही तय कर लिया है कि हिन्दू संगठनों का विरोध अनुचित है। एंकर द्वारा बार-बार  सेंसर बोर्ड के फ़िल्म को पास कर इसे प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाने की दलील दी जा रही थी। इस दलील को देते वक्त शायद पत्रकार महोदय इस बात को भूल गए थे कि कुछ माह पहले उन्हीं के चैनल ने सेंसर बोर्ड के कथित भ्रष्टाचार को लेकर एक रिपोर्ट दिखाई थी जिसमें सेंसर बोर्ड पर फ़िल्म निर्माताओं से पैसे (रिश्वत) लेकर फ़िल्म पास करने का आरोप था। दूसरी ओर एक फ़िल्म समीक्षक फ़िल्म के जर्बदस्त हिट होने की बात को लेकर हिन्दू संगठनों के आरोपों को खारिज कर रहे हैं। क्या किसी फ़िल्म का हिट होना ही उसमें दिखाई गई सामग्री के सही होने की एकमात्र कसौटी है? यदि ऐसा है तो फिर वीरसावरकर,चटगांव,स्वदेश, दो दूनी चार,चलो दिल्ली,गुज़ारिश,मि.एण्ड मिसेज अय्यर,जैसी अनेक संदेशात्मक फ़िल्में जो या तो असफ़ल रहीं या नाममात्र को सफ़ल रहीं, वे सब खराब और बकवास फ़िल्में हैं। आज हमारे देश में इस बात को बच्चा-बच्चा जानता है कि फ़िल्में कैसे हिट होती हैं या कराई जाती हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही “हैप्पी न्यू ईयर” नामक एक फ़िल्म आई थी जो सुपरहिट हुई थी इस फ़िल्म में कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर गाए जाने वाले हिन्दुओं के प्रसिद्ध भजन “राधे-राधे बोलो जय कन्हैया लाल की” को एक आईटम सांग की तरह प्रस्तुत कर उस पर एक अत्यंत भौंडा व अश्लील नृत्य दिखाया गया है, क्या यह भी सही था? फ़िल्म के पक्ष में तर्क देने वालों का कहना है कि इस फ़िल्म में कुरीतियों का विरोध किया गया है। मैं ऐसे तमाम लोगों से बड़ी विनम्रता से पूछना चाहता हूं कि क्या उन्हें कुरीति और आस्था में अन्तर समझ आता है? पूजा-पाठ करना,मंदिर जाना,दान देना,गौ-सेवा करना ये कुरीति नहीं; आस्था है। कोई भी व्यक्ति या संस्था किसी भी धर्म के पूजा-पाठ करने के तरीके तब तक निर्धारित नहीं कर सकता जब तक कि वे किसी को हानि नहीं पहुंचाते हों। सती प्रथा,देवदासी प्रथा,बलिप्रथा,विधवा विवाह निषेध,भ्रूणहत्या ये सब कुरीतियां है जिनका समय-समय पर हमारे हिन्दू महापुरूषों ने ही विरोध किया और वे बन्द हुईं लेकिन कुरीति की आड़ में धर्म का मखौल स्वीकार नहीं किया जा सकता। केन्द्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को अविलम्ब इस मामले में हस्तक्षेप कर केन्द्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) को निर्देशित करना चाहिए जिससे इस फ़िल्म से विवादित अंश हटाए जाएं और भविष्य में इस प्रकार के विवादों पर अंकुश लग सके।
-संपादक

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

नक्षत्र पुरूष-डा. फूफ़ाजी

जीवन के सफ़र में अक्सर कई लोग मिलते और बिछड़ जाते हैं किंतु कुछ लोग बिछड़ने के बावज़ूद एक मीठी याद बनकर हमेशा साथ रहते हैं। इन्हीं लोगों को डा. हरिवंशराय बच्चन ने अपनी आत्मकथा “बसेरे से दूर” में “नक्षत्र पुरूष” कहा है। आज पुनः एक ऐसे ही “नक्षत्र पुरूष” का उल्लेख करने का मन कर रहा है। मेरे जीवन के यह नक्षत्र पुरूष हैं- डा.बाबूलालजी सोदावत जिन्हें मैं डा.फूफ़ाजी कहता था। ऊंचा-पूरा कद, गठीला शरीर, चमकती चांद के पीछे अर्द्धचंद्र के रूप में श्वेत केश, आंखों पर चश्मा,  तेजस्वी चेहरा। डा.फूफ़ाजी कुर्सी पर बैठे हुए अपना एक पैर हमेशा हिलाते रहते थे। उन्हें काफी पीना बहुत पसंद था। वर्तमान हरदा जिले की टिमरनी तहसील से कोई ४ किमी. दूर चारखेडा़ में डा. फूफ़ाजी रहते थे। पेशे से चिकित्सक किंतु व्यवहार से एक समाजसेवी। डा.साहब हरियाणवी ब्राह्मण थे। डा.फूफ़ाजी दादाजी के पारिवारिक चिकित्सक अर्थात् “फैमिली डाक्टर” तो थे ही साथ ही साथ दादाजी और डा.फूफ़ाजी में प्रगाढ़ मित्रता थी, वैसे कहने को जीजा-साले के रिश्ते का एक कच्चा-पक्का धागा भी था। डा. सोदावत जी की पत्नि गलाबाई और मेरे दादाजी का गांव एक ही होने की वजह से मेरे दादाजी ने गलाबाई को मुंहबोली बहन बना रखा था। इस नाते डा.फूफ़ाजी मेरे दादाजी को बड़े भाई सा सम्मान दिया करते थे। डा. फूफ़ाजी का कई वर्षों से निरन्तर हमारे घर हर दूसरे दिन आना और दादाजी, दादी और मेरे स्वास्थ्य का परीक्षण करने का नियम सुनिश्चित था। उनके इस नियम के बारे हमारे मुहल्ले में सभी को पता था इसी कारण कई मुहल्ले वाले भी सायं ४ बजते ही डा.फूफ़ाजी के आने का इंतज़ार करते थे। मैंने अक्सर दादाजी को दादी से पूछते हुए सुना था कि-“आज डा.साहब का टर्न है क्या?” डा.फूफ़ाजी के आने वाले दिन को दादाजी “टर्न” कहते थे। डा.फूफ़ाजी के आते ही हम सब उन्हें घेरकर उनके आस-पास एक सभा की तरह बैठ जाते थे; कुछ अस्वस्थ मुहल्ले वाले भी आ जाते थे। डा.फूफ़ाजी बारी-बारी सभी के स्वास्थ्य का परीक्षण कर उन्हें उचित सलाह या दवाईं देते थे। डा.फूफ़ाजी प्रायः निशुल्क ईलाज किया करते थे किंतु दादाजी के आक्रामक आग्रह के कारण उन्हें दादाजी-दादी के स्वास्थ्य परीक्षण की फ़ीस लेनी ही पड़ती थी। स्वास्थ्य परीक्षण के उपरांत हास-परिहास व किस्सागोई का सत्र शुरू होता था। डा.फूफ़ाजी के पास हमेशा किस्सों की भरमार रहती थी। वे अक्सर अपने बीते दो दिन में घटित होने वाली घटनाओं को मज़ेदार किस्से का रूप देकर सभी का मनोरंजन किया करते थे। डा.फूफ़ाजी का भरापूरा परिवार है उनके चार बेटे है। दो बेटे स्वंय चिकित्सक है। जो दादाजी को “मामाजी” कहकर संबोधित करते थे उनके ही कारण हरदा के अधिकांश चिकित्सक दादाजी को मामाजी कहकर पुकारने लगे थे। एक बार दादाजी गंभीर रूप से बीमार हो गए। बरसात का मौसम था। डा.फूफ़ाजी के अनुसार उन्हें पीलिया नामक रोग हो गया था। इस रोग का ईलाज डा.फूफ़ाजी ने अपने दैनिक नियमानुसार हमारे घर आकर ही किया किंतु अब वे हर दूसरे दिन के स्थान पर प्रतिदिन आने लगे थे। शाम होते डा.फूफ़ाजी आते और पीलियाग्रस्त दादाजी को बाटल चढ़ाते; इंजेक्शन लगाते और हमें उनकी देखभाल हेतु आवश्यक निर्देश देते। देखते ही देखते दादाजी के स्वास्थ्य पर डा.फूफ़ाजी के ईलाज का सकारात्मक असर होना भी शुरू हो गया था किंतु पूर्ण स्वस्थ होने में अभी कुछ दिन बाकी थे। एक दिन मूसलाधार बारिश हो रही थी। नदी-नाले अपने उफान पर थे। टिमरनी और चारखेड़ा मार्ग के बीच  का पुल नाले के उफान के कारन डूब गया था। दोनों ओर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग चुकी थी। पुल के ऊपर से पानी के तेज बहाव को देखते हुए बड़े वाहन ट्रक-बस इत्यादि भी एक ओर खड़े कर दिये गए थे। इधर शाम धीरे-धीरे गुजरती जा रही थी। हम सब डा.फूफ़ाजी का इंतज़ार कर रहे थे। दादाजी ने हमारी व्याकुलता देखते हुए हमें सांत्वना देकर कहा-“इतनी तेज़ बारिश में रास्ता बंद हो गया होगा अब डा.साहब नहीं आएंगे और वैसे भी मैं पहले की अपेक्षा स्वस्थ हूं, चिंता मत करो।” डा.फूफ़ाजी के आने का नियत समय बीत जाने के उपरांत हमने दादाजी की सात्वंना को ही अपनी तसल्ली का आधार बनाया और अपने-अपने कार्यों में संलग्न हो गए। अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला तो यह देखकर दंग रह गया कि सामने डा.फूफ़ाजी लंबा सा रेनकोट पहने हाथ में बैग थामें खड़े हैं। अंदर आते ही दादाजी थोड़ा नाराज़ होते हुए कहा डा.साहब इतनी बारिश में आने की क्या आवश्यकता थी? अब मैं स्वस्थ हूं। इस पर डा. फूफ़ाजी ने दादाजी को बाटल लगाने का उपक्रम करते हुए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा-“भैया, डाक्टर मैं हूं या आप।” उनके इस वाक्य ने गंभीर माहौल को हल्का-फुल्का कर दिया। कुछ देर बाटल समाप्ती के बाद किस्सागोई के सत्र में दादाजी ने डा.फूफ़ाजी से पुनः प्रश्न किया कि “आखिर आप यहां तक आए कैसे?” इस पर डा.फूफ़ाजी ने बताया कि कोई वाहन पुल पार ही नहीं कर रहा था। बड़ी देर के बाद एक ट्रक वाले ने डूबे पुल को पार करने की हिम्मत जुटाई तो मैंने उसे अपने साथ ले चलने का अनुरोध किया क इसपर उस ट्रक के चालक ने कहा कि “साहब देख लीजिए बहाव तेज है ट्रक बह भी सकता है। हमें तो खैर तैरना आता है।” इस पर मैंने कहा कि -“भाई यदि ट्रक बहा तो भी मरूंगा और यदि भैया को कुछ हो गया तो भी ये जीवन मृतवत ही हो जाएगा। जब मरना दोनों तरफ़ से ही है तो मित्रता और फ़र्ज़ निभाते हुए मरना ज़्यादा श्रेयस्कर है।” ये सुनकर हम सभी भाव-विभोर हो गए। इस प्रकार डा.फूफ़ाजी ने अपने जीवन की परवाह किए बिना अपना फ़र्ज़ व मित्रता निभाई।
-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

धर्मांतरण

ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया
पिछले कुछ दिनों से धर्मांतरण के मुद्दे को लेकर देश में खूब हो-हल्ला हो रहा है। इस मुद्दे ने जहां विपक्ष के लिए “डूबते को तिनके का सहारा...” वाला काम किया वहीं हमारे खबरनबीसों को एक माकूल मसाला मिला। इस मुद्दे को लेकर संसद ठप्प कर दी गई और जनता के लिए ज़रूरी कई बिल अधर में लटक गए। आम जनता बेचारी यह सोचती रह गई आखिर क्यूं हर बार धर्मांतरण इतना बड़ा मुद्दा बन जाता कि उसके सामने सभी कुछ बौना हो जाता है। आखिर यह धर्मांतरण है क्या...? इस सवाल का एक जवाब तो यह दिया जा सकता है कि अपनी इच्छा से बिना किसी प्रलोभन व भय के अपना धर्म छोड़ कर किसी और धर्म को अपना लेना या अंगीकार कर लेना “धर्मांतरण” है। इससे पूर्व कि हम “धर्मांतरण” की गहराई में प्रवेश करें उसके पहले हमें धर्म क्या है यह जान लेना अतिआवश्यक है। मेरी दृष्टि में धर्म एक व्यवस्था है। इसका ईश्वर से प्रत्यक्ष रूप से कोई संबंध नहीं है। ईश्वर तो सभी प्राणियों को जन्म से ही प्राप्त है, नास्तिकों को भी। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि “धारयति इति धर्म” जो धारण किया जा सके वह धर्म है या जो धारण करने योग्य हो वह “धर्म” है। आचार्य रजनीश ने स्वभाव को ही धर्म कहा है। गीता से भी इसी बात की पुष्टि होती है जब कृष्ण कहते हैं “स्वधर्मे निधनं श्रेय, परधर्मो भयावह” अर्थात् अपने स्वभाव के अनुसार आचरण करते हुए मर जाना श्रेयस्कर होता है। अब प्रश्न उठता है कि यदि कोई स्वेच्छा से अपना स्वभाव या धर्म परिवर्तन करना चाहे तो इसमें कुछ बुरा है? मेरे देखे व्यक्ति के संबंध में बुरा नहीं किंतु समष्टि के संबंध में बुरा है। ऐसा करने से सामाजिक असंतुलन के पैदा होने का खतरा है। अब मुद्दे पर लौटते हैं कि आखिर क्यों किसी और धर्म के व्यक्ति द्वारा हिन्दु धर्म को अपनाने पर बवाल मचता है। मुख्य रूप से यह विशुद्ध राजनीतिक षडयंत्र है। “हिन्दु” कोई धर्म नहीं वरन् एक संस्कृति है। इसे धर्म से जोड़कर जो विष का बीज पूर्व में बोया जा चुका है वर्तमान परिस्थिति उसी का परिणाम मात्र है। आपने सुना होगा कई शायर व कवि अपने नाम के साथ अपने शहर का नाम अपने तख़ल्लुस या उपनाम के रूप में प्रयुक्त करते हैं जैसे इंदौरी, भोपाली, इलाहाबादी,बरेलवी आदि। इनमें सभी धर्मों के लोग होते हैं किंतु किसी के धर्म में कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि यह बात उनकी बद्धमूल धारणाओं के विपरीत प्रतीत नहीं होती किंतु जब “हिन्दु” शब्द का ज़िक्र  किसी भी रूप में आता है तो समस्या खड़ी हो जाती है जबकि यह भी शहरों व स्थानों पर आधारित अन्य उपनामों की भांति प्रयोग किया जाने वाला शब्द मात्र है; कोई “धर्म” नहीं। इसने रूपांतरण कर जिस धर्म का रूप ले लिया है वह वास्तव में “सनातन धर्म” है। वास्तविक रूप में “हिन्दु” एक फ़ारसी शब्द है जो कि “सिन्धु” से बना है जो कि सिंध नदी के निकट रहने वालों का द्योतक है चूंकि फ़ारसी भाषा में “स” अक्षर का उच्चारण “ह” के रूप में किया जाता है इसलिए शब्द बना “हिन्दु”। जैसे पूर्व में बताया जा चुका है कि इंदौर में रहने वालों को इंदौरी, भोपाल में रहने वालों को भोपाली, इलाहबाद में रहने वालों इलाहबादी, और नहर के समीप रहने वालों को नेहरू कहे जाने में किसी कोई आपत्ति नहीं होती ठीक उसी प्रकार सिंध के निकट बसे व्यक्तियों को “सिन्धु” या “हिन्दु” कहे जाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आज देश की राजनीति में “हिन्दु” शब्द एक अछूत बनता जा रहा है इसके पीछे दोष हमारे विकृत मानसिकता वाले राजनेताओं का है। जो अपनी सत्तालोलुप प्रवृत्ति के चलते इस मुद्दे बेवजह गर्माए रखते हैं। जब हिन्दुओं को प्रलोभन देकर किसी और धर्म में प्रवेश करा दिया जाता है तब किसी भी दिशा से कोई हलचल नहीं होती किंतु जब कोई अपनी स्वेच्छा से पुनः अपने धर्म को अंगीकार करना चाहता है या किसी और धर्म का व्यक्ति सनातन धर्म की ओर आकर्षित होता है तो सभी की पीड़ा प्रारंभ हो जाती है। यदि हम थोड़ा सचेत और पूर्वाग्रह रहित होकर “हिन्दु” शब्द पर विचार करेंगे तो पाएंगे कि इस भारत-भूमि पर निवास करने वाले सभी “हिन्दु” हैं चाहे वे किसी भी पंथ या सम्प्रदाय के हों, रही बात धर्मांतरण की तो  बलपूर्वक एवं प्रलोभन देकर करवाया गया धर्म- परिवर्तन पाप और अपराध की श्रेणी में आता है; धर्म की नहीं।

-ज्योतिर्विद हेमन्त रिछारिया

रविवार, 30 नवंबर 2014

मतदान करें-


विनम्र निवेदन-


सम्माननीय़ मतदाताओं,
विश्व में भारत एक विशाल और सम्मानित लोकतंत्र के रूप में प्रतिष्ठित है। यहां समय-समय पर चुनाव रूपी यज्ञ  होते रहते हैं। जिसमें आप सभी मतदाता “मत” के रूप में अपनी आहुति डालते रहते हैं। निश्चित ही आपके द्वारा दिया गया एक “मत” आपके नगर, ग्राम, प्रदेश एवं देश के भाग्य निर्माण की क्षमता रखता है। आपका एक “मत” भारत की उन्नति व अवनति की फ़सल का बीज है। अतः इसका प्रयोग अत्य़ंत विवेकपूर्ण तरीके से होना चाहिए। जातिवाद, क्षेत्रवाद, परिवारवाद एवं धार्मिकता के आधार पर “मत” देने की अपेक्षा राष्टवाद, विकास, चरित्र एवं राजनैतिक शुचिता के अधार पर ही वोट दें। जब हम अस्वस्थ होने पर अपने चिकित्सक का चुनाव एवं गंतव्य तक पहुंचने के लिए साधन का चुनाव पूर्ण सावधानी व विवेक से करते हैं तो अपने जन-प्रतिनिधियों के चुनाव में लापरवाही क्यों? यदि आज हमारे जन-प्रतिनिधियों में अधिकांश आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं तो उन्हें चुनने वाले हम ही हैं। पिछले कुछ वर्षों से राजनीति में असामाजिक तत्वों का प्रवेश बढ़ता जा रहा है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए स्वस्थ परम्परा की शुरूआत नहीं है। आज देश का मतदाता जागरूक नहीं है। जिसके परिणामस्वरूप सत्ता की कुंजी जनता के हाथ से फ़िसलकर चंद बिचौलियों व भ्रष्टाचारियों के हाथों में चली गई है। जो अपने स्वार्थ के लिए सरकारी तंत्र को कठपुतलियों की तरह नचाते हैं। आज सत्ता की डोर फ़िर से जनता के हाथों में लाने की आवश्यकता है। अतः पूर्ण विवेक से मतदान करें, शत-प्रतिशत मतदान करें। विवेकपूर्ण मतदान कर भारतीय लोकतंत्र को पतन के गर्त में जाने से रोकने में सहभागी बनें।
जय हिन्द...!

-“ज्योतिर्विद” हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2014

प्राण-प्रतिष्ठा का गूढ़ अर्थ

पंडितजन कहते हैं कि हम भगवान की प्राण प्रतिष्ठा कर रहे हैं। भगवान की प्राण प्रतिष्ठा! आश्चर्य की बात है। जो परमात्मा इस जगत के समस्त प्राणियों में प्राणों का संचार करता है हम उस परमात्मा में प्राणों की प्रतिष्ठा कर रहे हैं। कैसी मूढ़तापूर्ण बात है। मेरे देखे यदि शास्त्र गलत हाथों में पड़ जाए तो वह शस्त्र से भी ज़्यादा खतरनाक हो जाता है। यदि नर, नारायण के प्राणों की प्रतिष्ठा करने में सक्षम हो जाए तो वह नारायण से भी बड़ा हो जाएगा क्योंकि जन्म देने वाला सदा ही जातक से बड़ा होता है। इसीलिए नारायण की नर लीलाओं में नारायण को जन्म देने वाले माता-पिता के आगे स्वयं नारायण झुके हैं। ये बड़ी गहरी बात है। शास्त्रों में किसी पाषाण प्रतिमा या पार्थिव की प्राण प्रतिष्ठा करना बहुत सांकेतिक है। यहां प्राण प्रतिष्ठा से आशय केवल इतना ही है कि हमें एक ना एक दिन अपनी इस पंचमहाभूतों से बनी देह-प्रतिमा में परमात्मा; जो कि पहले से ही इसमें उपस्थित है, उसका साक्षात्कार कर उसे इस देह में प्रतिष्ठित करना है; प्रकट करना है। मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्टा का उपक्रम करना इसी बात का स्मरण मात्र है इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। अब इस गूढ़ बात का अपने स्वार्थ के लिए अर्थ का अनर्थ कर कुछ पीठाधीश्वर कह देते हैं कि अचेतन-अयोग्य की पूजा नहीं की जानी चाहिए इसलिए हम परमात्मा की प्राण प्रतिष्ठा कर रहे हैं और जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं की जा सकती वे पूजनीय नहीं है। कितनी निम्न स्तरीय बात है, शास्त्रों के गूढ रहस्यों को कैसा दूषित किया है। ऐसी ही बातों से सनातन धर्म की सबसे ज़्यादा होती है। मैं कोई प्राण-प्रतिष्ठा करने का विरोध नहीं कर रहा हूं किंतु प्राण-प्रतिष्ठा को इस रूप में प्रचारित करने का विरोध कर रहा हूं। ये तथाकथित जगतगुरू एक चींटी में भी प्राण का संचार नहीं कर सकते तो परमात्मा की प्राण-प्रतिष्ठा करना तो हास्यास्पद ही है। किंतु जैसा कि मैंने पूर्व में कहा प्राण-प्रतिष्ठा का कोई विरोध नहीं, विरोध इसके गलत अर्थ निकालने से है। यदि प्राण-प्रतिष्ठा का अर्थ करना ही है तो कौशल्या-दशरथ, मनु-शतरूपा, वसुदेव-देवकी, नंद-यशोदा के रूप में करें जिनकी भक्ति व प्रेम के कारण निराकार को नराकार लेना पड़ा। सच्ची प्राण-प्रतिष्ठा का यही अर्थ है। हम स्वयं को परमात्मा की भक्ति व प्रेम से इतना भरें कि एक ना एक दिन उसे इस देह रूपी प्रतिमा; जो उसने स्वयं अपने हाथों से निर्मित की है उसमें उसे प्रकट हो प्रतिष्ठित होना पड़े। जो ऐसी प्राण-प्रतिष्ठा करनें में समर्थ हो जाता है वही उदघोष करता है “अहं ब्रह्मास्मि”। इसलिए चाहें मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करें; चाहें ना करें, किंतु अपनी देह रूपी प्रतिमा में परमात्मा को प्रतिष्ठित अवश्य करें। मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करना तो इसी बात का संकेत मात्र है।
-हेमन्त रिछारिया

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

अर्ज़ किया है...


“सुनकर जमाने कि बाते, तु अपनी अदा मत बदल
 यकीन रख अपने खुदा पर, यूँ बार बार खुदा मत बदल।”

“जिस नजाकत से ये लहरें मेरे पैरों को छूती हैं,
 यकीन नहीं होता इन्होने कभी कश्तियाँ डुबोई होंगी।”

“बहुत दूर तक जाना पड़ता है,
 सिर्फ यह जानने के लिए, नज़दीक कौन है।”

“झूठ अगर यह है कि तुम मेरे हो,
 यकीं मानो,मेरे लिए सच का कोई मायना नहीं।”

“वो दोस्त मेरी नजर में बहुत मायने रखते हैं,
 वक़्त आने पर सामने मेरे जो आइने रखते हैं।”

“मौत का भी यकीन है उनपर भी ऐतबार है,
 देखते हैं पहले कौन आता है हमे तो दोनों का इंतजार है।”

“हमारे दिल की मत पूछो बड़ी मुश्किल में रहता है,
 हमारी जान का दुश्मन हमारे दिल में रहता है।”

“गुमनाम है लोग वतन पर जान देने वाले,
 यहाँ लोग तो थपड खाकर मशहूर हो जाते है।”

“आग लगाना मेरी फितरत में नही है,
 मेरी सादगी से लोग जलें तो मेरा क्या कसूर।”

“मयखाने में आऊंगा ,मगर पिऊंगा नहीं साकी
 ये शराब मेरे गम भुलाने की औकात नहीं रखती।”

कहां ज़रूरत है हाथ में पत्थर उठाने की
तोड़नेवाले तो दिल ज़ुबां से तोड़ देते है....

(सभी अशआर बराए-मेहरबानी)

“एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है
 बेजान छ्त; दीवारों को घर कर देता है।”
-महेश्वर
 

सोमवार, 25 अगस्त 2014

गलत परंपरा का विरोध हो,संत का नहीं

इन दिनों आध्यात्मिक जगत में साईं-शंकराचार्य विवाद का उन्माद अपने चरम पर है। मीडिया के लिए तो यह विवाद संजीवनी बना हुआ है। कवर्धा में हुई धर्म-संसद की इकतरफ़ा बहस के उपरांत में कुछ प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें कहा गया कि “साईं बाबा भगवान नहीं है;संत नहीं और ना ही गुरू हैं”। उनकी मूर्तीयां सनातन हिन्दू मंदिरों से हटाई जानी चाहिए। अब प्रथम दृष्टया तो ये बचकानी बातें हैं जिनसे देश व समाज में अराजकता स्थिति उत्पन्न होने की संभावना है। मशहूर शायर बशीर बद्र का बहुचर्चित शेर है-“सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा”, भगवान से आशय क्या है? राम, कृष्ण, शिव, ब्रह्मा,दुर्गा क्या ये भगवान की श्रेणी में आते हैं, फ़िर बुद्ध,महावीर,जीसस,नानक,मुहम्मद कौन है! भगवान कोई संकीर्ण अवधारणा नहीं है वरन भगवान एक सर्वव्यापी;सर्वसमावेशी तत्व है। व्यक्तिवादी भगवान जिस रूप में हिन्दू धर्म में पूजा जाता है वह एक थोथी परिकल्पना मात्र है। वहीं ये भी अकाट्य सत्य है कि नर ही नारायण बनता है। ओशो कहते हैं भगवान से आशय है-“भगवत्ता को उपलब्ध व्यक्ति, जिसमें भगवत्ता उतरी हो।” हमारे सारे तत्वदर्शियों का सारा जोर भगवत्ता पर भगवान पर नहीं। अद्वैत का दर्शन हमारा अपना दर्शन है। हिन्दू धर्म की कई शाखाएं मूर्ती पूजा विरोधी है उदाहरण के तौर पर आर्य समाज। कौन भगवान है;कौन नहीं, धर्म-संसद में इस बात का निर्णय कर प्रमाण-पत्र जारी करना अपने आप में हास्यास्पद बात है। किसी को भगवान मानना या नहीं मानना ये आस्था का विषय है;प्रेम का विषय है, ये और बात है कि वर्तमान में प्रेम का स्थान लाभ ने लिया है। भगवान तर्क व बुद्धि का विषय नहीं बल्कि ह्रदय और प्रेम का विषय है। भगवान और भक्त का संबंध;या यूं कहें कि प्रेम का संबंध नितांत निजी होता है इसके बीच कोई भी नहीं आ सकता, स्वयं शंकराचार्य भी नहीं क्योंकि “प्रेम गली अति सांकरी तां में दो ना समाय। मैं था तब हरि नहीं,अब हरि हैं मैं नाय॥” एक बड़ा प्यारा पद है-“ये तो प्रेम की बात है उधौ बंदिगी तेरे बस की नहीं है।” संत दरिया कहते हैं-“ब्रह्मा विष्णु दस औतार, ये सब के सुपने के व्यवहार।” कबीरदासजी ने भी इस प्रकार की जड़ मान्यताओं का कडा विरोध करते हुए कहते हैं-“पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ,पंडित भया ना कोय। ढ़ाई आखर प्रेम का,पढै़ सो पंडित होय”,किंतु इसका यह आशय कदापि नहीं है कि साईं बाबा को सनातनी मंदिरों के हिन्दू देवी-देवताओं को साथ रखकर उनकी पूजा-अर्चना करना सही है। साईं बाबा निर्विवाद रूप से एक उच्च कोटि के संत थे जिनमें बुद्धत्व की झलक थी। संत की समाधि होती है मंदिर नहीं, वास्तव में शिरडी का साईं मंदिर एक समाधि है। यह बात स्पष्ट रूप से शिरड़ी के साईं मंदिर में भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिखी हुई है। यदि उस जगह केवल साईं बाबा की मूर्ती स्थापित करके उनकी पूजा अर्चना हो रही है तो उसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है ,वह आपत्तिजनक तब हो जाता है जब उनकी मूर्ती अन्य हिन्दू मंदिरों में स्थापित की जाती है। समाधि केवल उस स्थान पर होती है जहां उस संत का दिव्य शरीर रखा होता है,अन्यत्र नहीं। समाधियों का प्रचलन हमारे देश व धर्म में बहुत प्राचीन काल से है। कई संतों की समाधियां हमारे देश में है किंतु उनकी मूर्तीयों की जगह-जगह स्थापना करना;विशेषकर हिन्दू मंदिरों में हिन्दू देवी-देवताओं के साथ स्थापना करना एक गलत परम्परा है। शंकराचार्य को इस गलत परंपरा का विरोध करना चाहिए था, इसके उलट वे एक तत्वदर्शी संत का ही विरोध कर बैठे। उनके इस एक गलत कदम से आध्यात्मिक जगत में तो अराजकता माहौल उत्पन्न हुआ ही है किंतु इससे हिन्दू धर्म व शंकराचार्य पद की गरिमा को जो क्षति हुई है उसकी भरपाई करना असंभव नहीं तो दुष्कर कार्य अवश्य है।

“ज्योतिर्विद” हेमन्त रिछारिया
 प्रारब्ध ज्योतिष संस्थान